अमेरिका के 24 से ज्ज्यादा प्रदेशों की जेलों में हजारों कैदी श्रमिकों ने दो सप्ताह से ज्यादा हड़ताल रखी लेकिन अमेरिकी मीडिया ने इसे ब्लैकआउट कर रखा। बड़े या कहें कि तुर्रमखां मीडिया घरानों न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, एनबीसी न्यूज, एबीसी न्यूज, एमएसएनबीसी, फॉक्स न्यूज, सीएनएन और एनपीआर ने लेशमात्र भी इस ऐतिहासिक प्रिजन लेबर स्ट्राइक को जगह नहीं दी। आलम यह रहा कि इन अखबारों एवं न्यूज चैनलों पर नजर गड़ाए रखने वालों को इस हड़ताल की भनक तक नहीं लगी।

हड़ताल 9 सितंबर से शुरू हुई थी। मौका था एटिका जेल विद्रोह की 49वीं वर्षगांठ का। यह जेल कैदी बगावत 1971 में हुई थी। इन कैदियों की प्रमुख मांग थी-- जेल की दशा और स्वास्थ्य सुविधाओं को सुधारा जाए, शिक्षा सुविधा दी जाए, यूनियन बनाने का अध्धिकार मिले, बिना मजदूरी के काम कराना बंद किया जाए, जेल की बेतहाशा भीड़ खत्त्म की जाए, पैरोल आसान बनाया जाए, और अमेरिका में दास प्रथा का अंत हो। करीब नौ लाख कैदी श्रमिक इंडस्ट्रीज का सालाना दो बिलियन डालर का काम करते हैं, लेकिन मेहनताने के नाम पर उन्हें जो मिलता है वह तुच्छ से भी तुच्छ है। कैदी-श्रमिकों की इस सबसे बड़ी हड़ताल से पूरा अमेरिकी जनमानस बेखबर, अनभिज्ञ-अनजान रहा।

इस घटना से एक बात तो साफ हो गई कि लोगों की मीडिया पर निर्भरता बहुत ज्ज्यादा है। दूसरी सबसे गंभीर या कहें कि एक तरह का अक्षम्य अपराध मीडिया ने किया। उसने जान-बूझकर इस हड़ताल को कवरेज नहीं दी, इसका प्रमाण्ण यह है कि जबसे हड़ताल शुरू हुई तब से सीएनएन ने-क्लिंटन्न्स बॉडी डबल-स्टोरीज चलाई। न्यूयॉर्क टाइम्स -वीमेन गेटिंग बजकट्स और एबीसी न्यूज अपने सहयोगी चैनल डिज्नी की आने वाली फिल्म को लेकर एक्सक्लूसिव टेलर आदि दिखाता रहा। हालांकि उनके पास जेल कैदियों की अप्रत्याशित नेशनल हड़ताल को दिखाने एवं रिपोर्टें प्रकाशित करने की पूरी जगह-भरपूर एयर टाइमिंग थी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। अलबत्ता चंद अखबारों जैसे द नेशन, सिटी लैब, एनगैजेट, मनी वॉच, बजफीड और वॉल स्ट्रीट जर्नल ने इस हड़ताल को कवर किया।

यह हड़ताल पूरी तरह से शांतिपूर्ण रही। इस हड़ताल की आयोजकों में से एक संस्था इन्कारसरेटेड वर्कर्स ऑर्गेजाइजिंग कमेटी की मीडिया प्रभारी एज्ज्जुरा क्रिस्पिनो फिर भी मीडिया के प्रति नरम रहीं और उम्मीद जताई कि भविष्य में मीडिया का साथ उन्हें जरूर मिलेगा। हालांकि उन्होंने एक हकीकत बेहद अफसोस से कही कि उनकी शंतिपूर्ण हड़ताल पर मीडिया का रवैया उपेक्षा वाला है, लेकिन यदि हड़ताल के दौरान हिंसा हुई होती या हिंसा करा दी गई होती तो यही मीडिया कवरेज के लिए दौड़ पड़ता और उनके बीच ही होड़ लग जाती। इस संबंध में उन्होंने एक बार एक जेल में हुई पथराव की घ्घटना का जिक्र किया जिसमें जेल अधिकारियों पर कथित रूप से पत्थर गिरे थे। तब मीडिया ने इसकी बढ़-चढ़ कर कवरेज की थी और सरकार का जमकर पक्ष लिया़ था। 

इस हड़ताल में संपत्त्त्ति का कोई नुकसान नहीं हुआ। इसमें भूख हड़तालें भी हुईं, कैदी-श्रमिकों को किसी भी तरह की अन्य गतिविध्धियां करने से रोका गया। बावजूद इसके किसी भी तरह की अशांति नहीं हुई। कैदियों के आंदोलन की कवरेज न होने की एक बड़ी वजह कारपोरेट मीडिया के सबसे बड़े एडवर्टाइजर्स द्वारा कैदी श्रमिकों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया जाना है। इसीलिए मीडिया, कैदी श्रमिकों को हमेशा निरुत्साहित करने की जुगत में लगा रहता है।

एटी एंड टी, बैंक ऑफ अमेरिका, शेवरों, एली लिली, जीईआईसीओ, मकडोनल्ड्स और वॉलमार्ट आदि सभी प्रिजन लेबर का इस्तेमाल करते हैं और सभी कारपोरेट मीडिया के स्पांसर्स हैं। वेरीजोन नामक कारपोरेशन के पास याहू और हफिंगटन पोस्ट नामक बड़े मीडिया आउटलेट्स हैं। यह कारपोरेशन भी प्रिजन लेबर का जबर्दस्त दोहन करता है। यही नहीं, इस हड़ताल से थोड़ी सहानुभूति रखने वाले मीडिया हाउसेज ने भी अपने व्यापक राजनीतिक लक्ष्यों-उद्देश्यों के लिए इस हड़ताल की अनदेखी कर दी।

बता दें कि इस देशव्यापी हड़ताल को आयोजित करने में जेल के कैदियों ने अवैध रूप से लाए गए सेलफोनों, सोशल मीडिया पेजों और बाहरी सहयोगियों की मदद ली। इस हड़ताल में करीब 20 हजार कैदी शामिल हुए। हड़ताल के समर्थन में अमेरिका के दर्जनों शहरों और विदेशों में रैलियां एवं प्रदर्शन हुए।

भूपेंद्र प्रतिबद्ध
चंडीगढ़
मो. 9417556066