"फ्रांस के साथ 7.8 बिलियन यूरो यानि करीब 59 हजार करोड़ रुपये के इस सौदे के तहत भारत को 36 रॉफेल लड़ाकू विमान हासिल होगा"। लीजिए, शुरू हो गया 21वीं सदी के महान मानवीय सभ्यताओं के बीच व्यापार। यह हास्यास्पद है और हास्यास्पद ही नहीं बल्कि मजाक है। मजाक हम गरीब और अनपढ़ जनता का नहीं बल्कि मजाक महान फ्रांस का है, मजाक फ्रांस के विद्वानों और उनके महान साहित्यों का है, मजाक फ्रांस के उस गौरवशाली इतिहास का है जो इस आधुनिक युग में "स्वतंत्रता, समानता और इन सबसे बढकर 'भाईचारे'" को अपने देश में स्थापित करने व इस विचार को पूरी दुनिया में इसे फैलाने व स्थापित करने का श्रेय लेता रहता है।

मजाक फ्रांस के समाजवाद का है फ्रांस के मौजूदा सरकार का है जो अपने को समाजवादी कहती है और स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे को स्थापित करने का तरीका विध्वंसक हथियारों में खोजती नजर आती है। मजाक उस महान भारत का भी है जो खुद को दुनिया में शांति का दूत मानता है, मजाक बुद्ध का है, मजाक महावीर का है, मजाक कबीर का है, मजाक गाँधी का है, मजाक भगत सिंह का जिन्होंने हथियारों की जगह विचारों महत्व दिया। मजाक प्रधानमंत्री के ब्रिटिश पार्लियामेंट में दिये हुए बयान का है जिसमें उन्होंने खुद को बुद्ध और गाँधी के देश का बताया। लेकिन इन सबमें सबसे अच्छी बात यह है कि हम तो एक्सपोज थे ही लेकिन अब वक्त किताबी महान फ्रांस को भी एक्सपोज करने का है और उसके समाजवाद का भी जो मानव जीवन के लिए जरूरी भोजन, कपड़ा, मकान, दवा, पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाने वाली ऊर्जा, सड़क, रेल और अत्याधुनिक तकनीक जैसे वस्तुओं के व्यापार के स्थान पर उसे समाप्त करने वाले विध्वंसक विमानों के व्यापार में समाधान खोज रहा और अपने पड़ोसियों के साथ समाधान यूरोपिन यूनियन में।

हमारी दुनिया में अब तक 15493 एटमी हथियार एक-दूसरे से सुरक्षा के नाम के बन चुके हैं। लेकिन यह समझ नहीं बन पायी कि क्या अब वो देश एक-दूसरे से सुरक्षित है जिनके पास परमाणु हथियार हैं या उनके किसान-मजदूर-महिला-बेरोजगार  सुरक्षित हैं और अगर अभी भी सुरक्षित नहीं हुए तो आखिर कैसे होंगे ? सवाल यह है कि हमें एक-दूसरे से डरते क्यों है? ऐसा कैसे हो सकता है कि भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश के लोग अपने देश के बार्डर पर एक-दूसरे से डरते, लड़ते, झगड़ते और नफरत करते हैं वहीं दूसरी तरफ वही नागरिक दुबई, शारजाह, सिंगापुर, हांगकांग, टोकियो, पेरिस, बर्लिन, लंदन, न्यूयॉर्क और कैलिफोर्निया आदि स्थानों में प्रेम से रहते हैं, एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, व एक-दूसरे के साथ ही सुरक्षित महसूस करते हैं। जो इस संस्कृति से परिचित नहीं, उनके लिए विश्वविद्यालयों और दिल्ली जैसे महानगरों के उदाहरण ज्यादा आसान हो सकते हैं क्योंकि इन स्थानों पर मणिपुर, असम व अन्य राज्यों के लोग असुरक्षित महसूस करते थे लेकिन जैसे-जैसे बातचीत बढ़ी वो ज्यादा सुरक्षित हुए। बातचीत बढाने के लिए सरकार व पुलिस द्वारा कई सांस्कृतिक कार्यक्रम जारी हैं।

हे! दुनिया के सम्मानित नागरिकों, हम सभी को समझने और पुनर्चिंतन की आवश्यकता है कि हमारी सुरक्षा न तो परमाणु हथियारों से होगी और न ही किसी लड़ाकू विमान से हो सकती है बल्कि एकसाथ बैठने, खाना-खाने, बातचीत करने, मिलने और एक-दूसरे को जानने से होगी और कोई दूसरा रास्ता नहीं। कपड़े और पहनावे में तो हम यूरोपिन हो गये फिर हमारे कर्म बाबा आदम के जमाने के क्यों हो ? हमें यह समझना पड़ेगा कि दूरियाँ संदेह और डर पैदा करती हैं जबकि बातचीत से भरोसा और सुरक्षा। हमें यूरोपिन यूनियन के मॉडल की तरफ बढना पड़ेगा। सोशल मीडिया सरकारी बार्डर को लगातार तोड़ रही है और यह संकेत दे रही कि आगे आने वाले समय में लोकतंत्र का कोई बार्डर नहीं होगा।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सभी छात्रों हेतु छात्रावास व यूरोपिन यूनियन के तर्ज पर दक्षिण एशियाई यूनियन के संयोजक हैं, आपसे अनुरोध हैं कि ये लेख आपके सम्मनित संस्थान में प्रकाशित होता हैं तो कृपया इसकी एक पीडीएफ फाइल भेजने का कष्ट करें।

धन्यवाद

प्रवीन सिंह

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