: ये कहानी सिर्फ पायलट कैस हुसैन और फरीदा सिंह की ही नहीं है, आम जज्बातों की अभिव्यक्ति भी है : पिछले दिनों पाकिस्तानी वायुसेना के पूर्व पायलट कैस हुसैन ने जब 46 साल के बाद उस हमले के शिकार पीडित परिवार की बेटी को पत्र लिखकर माफी मांगी जिस में गलती से भारतीय नागरिक विमान के पायलट समेत आठ लोग मारे गए थे, तो सभी चौंके थे. बात 1965 के सितंबर महीने की है. उस हादसे में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता, उनकी पत्नी, तीन सहायक, एक पत्रकार और दो पायलटों के साथ उड़ रहे भारतीय नागरिक विमान को पाकिस्तान ने सीमा के एकदम नजदीक इस गलतफहमी में मार गिराया था कि वो भारत का लडाकू हमलावर विमान है, जो पाकिस्तानी क्षेत्र में घुस रहा था.

उस समय भारत-पाक युद्ध के पहले का महीनों से चल रहा तनावपूर्ण माहौल प्रभावी था और युद्ध के बादल मंडरा रहे थे. हालांकि तब इसे पाक की उकसाने वाली कार्रवाई ही माना गया था, लेकिन अब 46 साल बाद पाक लडाकू जेट के पायलट कैस हुसैन ने जिस तरह से भारतीय नागरिक विमान के मुख्य पायलट जहांगीर इंजीनियर की बेटी फरीदा सिंह से माफी मांगी है और इस घटना पर खेद व्यक्त करते हुए सभी आठों मारे गए व्यक्तियों के परिवारों को पत्र लिखकर खेद व्यक्त करने की बात कही है-  निश्चित रूप से विस्मय पैदा करने वाली है. आखिर 46 साल बाद ऐसा क्या हो गया जो माफी मांगने की जरूरत पड गई? और आश्चयर्जनक तथा हर्षित करने वाली बात तो यह है कि हुसैन के इस माफीनामे पर भारतीय पायलट जहांगीर इंजीनियर की बेटी फरीदा सिंह ने भी 'बडे दिल'  का परिचय देते हुए इस क्षमायाचना को अच्छी पहल बताते हुए इसे सदाशयी और सकारात्मक अंदाज में लिया है.फरीदा ने अपने योग्य, बहादुर और कर्तव्यनिष्ठ पिता और मां का हवाला देते हुए हुसैन को माफ भी कर दिया है. फरीदा ने जवाब में लिखा है कि मैं जानती हूं कि खेद व्यक्त करने वाली इस टिप्पणी के लिए आपको कितने साहस और साफगोई से काम लेना पड़ा होगा और ऐसा ही मुझे भी आपको माफ करते वक्त लेना पड़ रहा है.

लेकिन वृद्ध हो चुके पाकिस्तानी कैस हुसैन और भारतीय फरीदा सिंह के पत्रों में कुछ चुभती हुई बातें हैं तो भविष्य के प्रति बेहतरी के संकेत भी. परंतु इनका खुलासा करने के पूर्व बात इस 46 साल के लंबे अंतराल की. दरअसल, हुआ यह कि पाकी वायुसेना के पूर्व पायलट और लेखक एयर कोमोडोर कैसर तुफैल ने इस घटना के बारे में हाल में विस्तार से लिखा. तुफैल ने इस घटना से संबद्ध सभी पाक अफसरों से बातचीत की. उन्होंने राडार नियंत्रक और गतिविधियों को संचालित करने वाले संचालक से भी हुई वार्ता को प्रकाशित किया. तुफैल अपने लेखन से सिर्फ इस घटना की सच्चाई को सामने लाना चाहते थे, न कि यह बताना कि कौन सही था और कौन गलत? उन्होंने अपने आलेख में यह साबित किया था कि पाक नियंत्रकों की ओर से समझने में गलती हो गई और उन्होंने भारतीय नागरिक विमान को वायुसेना का हमलावर विमान समझ लिया. भारतीय विमान चालक की ओर से भी चूक यह हो गई कि वह भटक कर पाक सीमाक्षेत्र में घुस गया. जाहिर है उसे युद्ध के माहौल में सीमा क्षेत्र के इतने पास नहीं जाना चाहिए था.

दरअसल, तुफैल के इस आलेख के संदर्भ में कैस हुसैन ने फरीदा को ई-मेल के जरिए पत्र लिखा कि यह घटना आज भी मेरे दिमाग में इस तरह से ताजी है जैसे कि यह कल की ही बात हो... तब हुआ यह था कि निर्देशों के तहत मैं अपने जेट विमान को लेकर हमले की तैयारी में था तो तुम्हारे पिता ने मुझे देख लिया था और बचाव में दया की अपील भी की थी.  तब वे अपने विमान के डैनों को घुमाने लगे और विमान ऊपर की ओर ले जाने लगे. लेकिन तभी मुझे फिर से नियंत्रक का आदेश मिला कि विमान हमलावर है, उसे मार दो. इसके पूर्व नियंत्रक को मैंने यह भी बताया था कि विमान में आठ लोग सवार हैं और वह यातायात विमान है. मुझे हमले के लिए फिर से कार्रवाई निर्देश चाहिए. मुझे आशा थी कि नए निर्देश में मुझे अपना विमान लौटाने को कहा जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और निर्देश हमले का मिला. गलतफहमी इसलिए भी हुई क्योंकि भारतीय वायुसेना यातायात विमानों का प्रयोग भी कर रही थी.

बहरहाल, हमले के बाद जब मैं वापस लौटा तो खुश था कि दुश्मन के लडाकू विमान को मार गिराया था. लेकिन शाम को एआईआर से जब भारतीय समाचार सुना और असलियत पता चली तो बहुत दुख हुआ. लेकिन उस समय दुश्मनी के माहौल में इस दुख को व्यक्त नहीं कर सकता था. फिर तीन साल बाद रिटायर हो गया. दिमाग से ये बातें ओझल भी हो गईं. हुसैन ने लिखा है कि इतने साल बाद यह सब तब फिर से ताजा हो गया जब तुफैल ने विस्तार से यह सब लिखा. भारतीय मीडिया में भी इसे गलत ढंग से रखा गया... दरअसल, मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो यह मानते हैं कि युद्ध और प्यार में सब जायज होता है. इसलिए मैं जरूरी समझता हूं कि मैं बताऊं कि मैंने सिर्फ अपने कर्तव्यों को ही अंजाम दिया था. मुझे गलत न समझा जाए. मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि आप और आपका परिवार सलामत रहे. मैं आपके साथ ही हमले का शिकार हुए बाकी व्यक्तियों के परिवारों को भी पत्र लिखकर माफी मांग रहा हूं.

हुसैन और फरीदा के पत्रों में यह भावनात्मक अभिव्यक्ति भी हुई है कि आम लोग हमेशा ही राजनीति और इसकी महत्वाकांक्षा के शिकार होते रहे हैं. वे लड़ना नहीं चाहते. आपसी भाईचारे और सद्भाव से रहना चाहते हैं. लेकिन दुर्भाग्य कि उन्हें ही शिकार होना पड़ता है. दरअसल, सियासत से बहुत दूर विरोधी मुल्कों के आमजनों की अभिव्यक्ति भी यही है-  वे चाहते हैं कि मासूमों का खून बहना बंद हो और आपसी तनाव- घृणा खत्म हो. सामाजिक- सांस्कृतिक क्षेत्रों के मेल- मिलाप और खेल के जरिए एक हद तक इसमें सफलता भी मिली है, लेकिन अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है. आतंकवाद की समस्या आपसी दरार की बड़ी वजह है. लेकिन इस बात को समझा जाना चाहिए कि जब जब एक दूसरे देश में खेल के आयोजन होते हैं, खासकर क्रिकेट के, तो हजारों लोग आपसी प्यार-मोहब्बत के संदेश के साथ सीमा पार कर मिलते हैं. भावना के इस इजहार को सियायत को भी समझने-स्वीकारने की जरूरत है. यहां बात सिर्फ हुसैन-फरीदा की ही नहीं है, किसी खास मैच के आयोजन की नहीं है, सांस्कृतिक दलों के आदान-प्रदान की नहीं है, सीमा पर अमन का पैगाम देते मोमबत्ती मार्च की भी नहीं है-  हवा के इन झोंकों को महसूस करने और समझने की है-  जो सरहद के आरपार बिना किसी खौफ और बाधा के आती जाती है. इन सपनों को साकार करने की भी है जहां बहुसंख्यक आम लोगों के दिल से बस यही दुआ निकलती है-

उनका जो फर्ज है वो
अहल-ए-सियासत जाने
मेरा तो पैगाम-ए-मोहब्बत है,
जहां तक पहुंचे...

लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा लोकमत समाचार में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.