पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी की भारत यात्रा के साथ ही एक बार फिर से भारत-पाक के बीच बेहतर सम्बंधों की आस बढ़ गई है। हिना की इस यात्रा के साथ ही कई सवाल मौजूं हो गए हैं। मसलन भारत-पाक के बीच बेहतर संबंध न होने के दो प्रमुख कारण कश्मीर और आंतकवाद हैं। हिना रब्बानी ने एक चैनल से कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद को ज्यादा झेल रहा है ऐसे में दोनों को मजबूती से एक होकर इस लड़ाई को लड़ने की जरुरत है। इस वार्ता के चंद दिनों पहले, 13 जुलाई को मुंबई में बम धमाके हुए थे। यह धमाके उस वक्त हुए जब भारत-पाक के बीच वार्ता और 2 जी स्पेक्ट्रम जैसे महत्वपूर्ण मुद्दा जोर पकड़ा था तो वहीं 19 जुलाई को भारत के साथ रणनीतिक वार्ता के लिए अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भी नई दिल्ली पहुंच रही थीं।

13 जुलाई को हुए धमाकों के बाद लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि जब तक आतंकवादी ढांचों को ध्वस्त नहीं किया जाता पाकिस्तान के साथ बातचीत करने से किसी मकसद का हल नहीं निकलेगा। तो वहीं अरुण जेटली ने मुंबई के सबक शीर्षक वाले अपने वक्तव्य में कहा कि अमेरिका में 9/11 की घटना के बाद कोई भी फिर हमला करने का दुस्साहस नहीं जुटा पाया। यहां इस बात पर गौर करने की जरुरत है कि भारत-पाक वार्ता के कई अवसरों पर आतंकी वारदातें भारत में हुईं हैं। पिछले दिनों संचार माध्यमों ने भी इस बात को प्रमुखता से उठाया कि नवंबर 2008 में भी मुंबई को उसी समय आतंकी हमले का निशाना बनाया गया था जब पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी भारत दौरे पर थे।

इसी तरह सितंबर 2006 में मालेगांव में मस्जिद के पास हुए विस्फोटों के वक्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए हवाना, ब्राजील और क्यूबा की यात्रा पर जा रहे थे। उस वक्त तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने परवेज मुशर्रफ से न मिलने की मांग भी की थी। ऐसे में हमें आतंकी वारदातों के ‘कचरे के ढेर’ से आतंकी संगठनों का पता लगाने वाली नीति को छोड़कर आतंकवाद की पूरी परिघटना के राजनीतिक निहितार्थों को समझने की आवश्यकता है। जिस तरह पाकिस्तान आज आंतरिक आतंकवाद को झेल रहा है वैसे ही हालात भारत के भी हैं। ऐसे में आतंकवाद के मसले पर बातचीत में भारत को भी यह स्वीकारना होगा कि वह भी आंतरिक आतंकवाद को झेल रहा है। मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस, अजमेर शरीफ जैसे अनकों आतंकी वारदातों में हिंदुत्ववादी गुटों का नाम आना इस बात का प्रमाण है। समय-समय पर गृह मंत्री तक ने भगवा आतंकवाद को देश के लिए बड़ा खतरा बताया है।

अभी हाल में टू जी मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री ए राजा का बयान आने के बाद जब भाजपा ने चिदंबरम को घेरा तो उन्होंने कहा कि दंक्षिणपंथी आतंकी समूहों की जांच होने से भाजपा बौखलाई है। स्पष्ट रुप से ऐसे कई दक्षिणपंथी कट्टरपंथी तत्व संघ से जुडे़ हुए हैं। उन्होंने कहा कि वे बम बनाते हैं और बम विस्फोट भी करते हैं। गृह मंत्री ने भारत के पास दंक्षिणपंथी कट्टरपंथी आतंकी मामलों के दस्तावेज उपलब्ध होने तक की बात कही। स्वदेशी आतंकवादी गुटों से बढ़ रहे खतरों पर चिंता जताते हुए गृह मंत्री ने कहा कि ऐसे गुट अब अनुभवहीन नहीं रहे, बल्कि इन्हें बम बनाने और उन्हें इधर से उधर ले जाने में भी विशेषज्ञता हासिल हो गई है। 13 जुलाई को हुए धमाकों की पृष्ठभूमि में चिदंबरम ने कहा कि ऐसे गुटों से उपज रहा खतरा बढ़ गया है। 13 जुलाई को हुए मुंबई धमाकों में शक की सूई इंडियन मजाहिद्दीन की ओर घूम रही है? पर उन्होंने कहा, ‘नहीं’। उन्होंने कहा कि मुंबई पुलिस ने अभी तक मेरे साथ कोई जानकारी साझा नहीं की है और मैं कोई विवरण देने की स्थिति में नहीं हूं।

ऐसे हालात में जब पूरी जांच की दिशा में कई पेंच हैं। और पिछले दिनों जिस तरह एटीएस और एनआईए की बीच जांच को लेकर कई अंतर्विरोधों के चलते एनआईए यह कह कर पीछे हट गई की मुबई एटीएस जांच में सहयोग नहीं कर रही है और उसके द्वारा दिए गए तथ्यों को नकार रही हैं, तब ऐसे में आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है। क्योंकि आतंकवाद की भी एक राजनीति है जिसे सिर्फ कानून व्यवस्था के सवाल तक सीमित करके देखना बेमानी होगा। क्योंकि यह सब राजनीतिक उद्देश्यों के तहत हो रहा है, जिसका निराकरण भी राजनीतिक ही होगा। पर मुंबई धमाकों की जांच की दिशा पर गौर करें तो शुरु से ही इसे इंडियन मुजाहिद्दीन और लश्कर-ए-तैयबा से जोड़कर इसका दोष पाकिस्तान के मत्थे मढ़ने की कोशिश भारतीय राज्य ने की। जबकि घटना के बाद गृह मंत्री ने कहा था कि किसी समूह विशेष की ओर इशारा करना अभी जल्दबाजी होगी। पर हर एक संभावित शत्रु समूह को अपनी जांच के दायरे में लेने वाली बात सिर्फ बयानों तक ही सीमित रह गई है।

इस बात पर हमें गौर करने की जरुरत है क्यों कि पाकिस्तान की विदेश मंत्री ने भारत दौरे के दौरान एक चैनल से समझौता एक्सप्रेस विस्फोट पर कहा कि शुरू में जांच कुछ और थी बाद में कुछ और निकली। ऐसे में हमें जल्दबाजी में किसी विशेष समुदाय समूह या देश पर आतंकवाद का तोहमत मढ़ने वाली अपनी पुरानी प्रक्रिया पर ठंडे दिमाग से सोचने की जरुरत है। इस बात पर गंभीरता इसलिए भी जरुरी हो जाती है कि हमारे देश में भी पाकिस्तान और अफगानिस्तान की तरह बहुसंख्यक कट्टरवादी समूह काम कर रहे हैं। हाल में नार्वे में हुए आंतकी वारदात में भी हमारे यहां के हिंदुत्वादी राष्ट्रवादियों से समानता का मामला प्रकाश में आया है। आतंकी वारदात के आरोपी एंडर्स बहरिंग ब्रीविक ने अपने दस्तावेजों में भारत के दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादियों और अपने लक्ष्यों की बीच समानता जताई है। उसने कहा कि वह नार्वे से मुसलमानों को बाहर करना चाहता है, हमारा लक्ष्य एक है। संघ की खांटी सोच को समय-समय पर रखने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व सांसद वीपी सिंघल ने भी ब्रीविक के मकसद से सहमति जताते हुए तरीके पर नाइत्फाकी जताई। ऐसे में अगर आने वाले दौरों में आतंकवाद पर भारत गंभीर है तो उसे आतंकवाद की इस भयावह राजनीति को नजरंदाज नहीं करना चाहिए।

लेखक राजीव यादव यूपी पीयूसीएल के सचिव हैं.