गिरीश जी दुनिया में अपने शांत स्वभाव के लिए मशहूर नॉर्वे में जब पिछले सप्ताह 32 साल के एंडर्स बेहरिंग ब्रेविक ने लेबर पार्टी की युवा शाखा के कार्यक्रम में बम विस्फोट और घातक हथियारों से अंधाधुंध गोलीबारी करके लगभग 90 लोगों को बेवजह दर्दनाक मौत दी, तो सभी हिल उठे. एक द्वीप पर डेढ घंटे तक चले इस तांडव को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को भी पहुंचने में देर हुई क्योंकि नॉर्वे में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ऐसा कभी नहीं हुआ था और काफी हद तक ऐसे हादसों से अनजान नॉर्वे में खुद पुलिस को भी अनेक बार ऐसे हथियार लेकर चलने की इजाजत अब तक नहीं है. तब अटलांटिक पार बराक ओबामा से लेकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून तक सभी ने इसे इस्लामी आंतकवाद की नई वारदात मानते हुए बयान भी जारी कर दिए कि वे संकट की इस घड़ी में नॉर्वे के 'संघर्ष'  में उसके साथ हैं.

माना गया कि चूंकि इराक, अफगानिस्तान और लीबिया में नॉर्वे के सैनिक भी नाटो सेना के साथ हैं, इसलिए ये जवाब है इस्लामी आतंकवाद का. लेकिन तभी कई अनजान इस्लामी संगठनों ने खुद को आतंक का सरगना स्थापित करने की कोशिश में इसकी जिम्मेदारी भी ले ली. तभी नए खुलासों के साथ सवाल उठे कि यह कैसा संघर्ष है? संघर्ष आखिर किस आतंक से है? ये कैसा इस्लामोफोबिया है? क्या यह 9/11 और 26/11 जैसी घटना थी, जब राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने अलकायदा और दूसरे आतंकी संगठनों और भारत ने पाक प्रेरित आतंकवाद से निपटने की बात की थी? नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं था. खुलासे से जो सच्चाई सामने आई वो बिल्कुल अलग ही थी. हादसे के कुछ घंटे बाद ही नॉर्वे के प्रधानमंत्री जेंस स्टोल्टेनबर्ग ने बहुत ही संयत शब्दों में कहा कि इस हमले को हमारा जवाब होगा 'और ज्यादा खुलापन और ज्यादा लोकतंत्र'. स्टोल्टेनबर्ग ने यह भी कहा कि हमें इस हादसे का प्रयोग सिर्फ नॉर्वे या स्कैंडिनेविया में ही अनुदारवाद, वंशवाद और घृणा से लड़ने में नहीं करना है बल्कि पूरे यूरोप और दूसरी जगहों पर भी ऐसा ही करना है.

स्टोल्टेनबर्ग के जवाब से दुनिया चौंकी थी क्योंकि सामान्य रूप से सत्ताशीर्ष के पारंपरिक उत्तर से यह अलग था. लेकिन इस जवाब से बहस की दिशा ही बदल गई और मुद्दा यह बना कि पश्चिम के संपन्न देशों की तरह अनेक देशों में दक्षिणपंथी अतिवाद बढ़ रहा है और उससे देश की सीमाओं और उसके बाहर भी लोकतंत्र और खुलेपन से ही निपटा जा सकता है. तभी खुलासा यह भी हुआ कि गिरफ्तार ब्रेविक का इस्लामी संगठनों से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि वो तो मुस्लिमों का धुर विरोधी होने के साथ ही, यूरोपीय विचारधाराओं की भी मुखालिफत करता है जैसे लोकतंत्र, बहुसांस्कृतिक उदारवादी धारा और मार्क्सवाद इत्यादि का. उसके द्वारा जारी घोषणा-पत्र से यह भी पता चलता है कि वो नाजीवादी और फासीवादी अवधारणा के नजदीक है. वह ऐसे यूरोप की कल्पना करता है जिसमें दूसरे देशों के आप्रवासियों और मुस्लिमों के लिए जगह नहीं होगी. एक किस्म की भौगोलिक पवित्रता पर जोर है. यूरोप में भारत, चीन और दूसरे देशों के लोग काम करने के लिए लाए जाएंगे. लेकिन छह महीने या साल भर काम करने के बाद उन्हें वापस भेज दिया जाएगा. और वे शहर या नगरों से बाहर अलग बस्तियों में रहेंगे. वो जिस यूरोपीय व्यवस्था का पक्षधर है, उस संदर्भ में उसने रूसी राजनेता पुतिन और वेटिकनसिटी के पोप की प्रशंसा की है, वो भी उनके ईसाइयत पर जोर देने के कारण. ब्रेविक रादोवान करादजिक को यूरोपीय युद्धनायक और सम्मानित क्रुसेडर यानी धर्म योद्धा बताता है क्योंकि रादोवान ने सर्बिया को मुस्लिमों से अलग रखने का प्रयास किया. वो जापान, सिंगापुर, हांगकांग जैसे एकल समाज को काफी हद तक बेहतर मानता है.

तो यह है नए दक्षिणपंथी नायक ब्रेविक की अवधारणा. चौंकाने वाली बात यह भी है कि उसकी नजर भारत पर भी है और उसे परेशानी इस बात से है कि अफगानिस्तान के पूर्व में स्थित हिंदुकुश पर्वत से भारत सबक क्यों नहीं सीखता. उसने अनेक ऐतिहासिक प्रमाणों से यह बताने की कोशिश की है कि हिंदुकुश का तात्पर्य है-  हिंदुओं का संहार करनेवाली जगह. उसका कहना है कि लगभग आठ करोड़ हिंदुओं को मुस्लिम आक्रमणकारियों ने सन 1000 से 1525 में मुगलकाल की स्थापना के दरम्यान मार डाला था और भारत सरकार आज बजाय बदला लेने के उदार लोकतांत्रिक धारा की पोषक है. वामपंथी भी इसी धारा का समर्थन करते हैं. ब्रेविक ने 1982 में एनसीईआरटी द्वारा जारी भारत की समन्वयी संस्कृति आधारित इतिहास लेखन की आलोचना करते हुए इसे सच्चाई को छुपाने वाला बताया है. उसने राम जन्मभूमि / बाबरी मस्जिद विवाद का भी उल्लेख किया है. ब्रेविक ने संघ परिवार और उससे संबद्ध संगठनों का बाकायदा नाम लेते हुए उनसे आशा जताई है. लेकिन इन संगठनों ने ब्रेविक या उसकी विचारधारा से किसी भी तरह के रिश्ते से इनकार किया है.

बहरहाल, अभी तक के खुलासों से जो बात सामने आई है, वो बताती है कि ब्रेविक भले ही खुद को क्रांतिकारी कहे, लेकिन उसकी मानसिक स्थिति सामान्य नहीं है. यह शायद इसलिए भी है क्योंकि उसका पारिवारिक जीवन विखंडित, निराशाजनक और एकाकी रहा है. यह तर्क संभवतः उसे कानून की कठोरता से बचाने में मददगार हो, लेकिन ब्रिटेन के दो दक्षिणपंथी संगठनों से उसके संपर्क की बात सामने आई है. यहां पर ध्यान देने की बात यह है कि विभिन्न समाजों में दक्षिणपंथ की अलग-अलग धाराएं हैं. कहीं यह कट्टरपंथी- उग्रवाद, आतंकवाद की शक्ल में है, तो कहीं महिलाविरोधी और समाज के कमजोर तबकों के प्रति अनुदारवादी रवैये के रूप में, कभी यह बामियान में बुद्ध की सैकड़ों साल की प्रतिमाओं को तोड़ने के रूप में सामने आता है, तो कभी बाबरी विध्वंस की शक्ल में, कभी पाकिस्तान की मुख्तारनमाई और राजस्थान की भंवरी देवी का संघर्ष इन प्रवृत्तियों को चुनौती देता है तो कभी इस सुकून पर फिर से निराशा हावी होती है जब पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों के लिए आवाज उठाने वाले मंत्रियों सलमान तसीर और भट्टी की सरेआम हत्या कर दी जाती है, कभी भारत के गुजरात, उडीसा और कश्मीर की घटनाएं व्यथित करती हैं, तो कभी गैरलोकतांत्रिक ताकतों द्वारा बेनजीर की हत्या की तर्ज पर बर्मा में आंग सान सूकी को दशकों से नजरबंद रखा जाता है, ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हमला होता है या फिर सोमालिया में समोसा खाने के खिलाफ इस्लामी ताकतों का फरमान जारी होता है.

वजह बताई जाती है कि समोसा में ईसाइयत से जुड़ाव नजर आता है. इनके लिए मुद्दा सोमालिया में भूख और कुपोषण से लाखों बच्चों, बूढों, महिलाओं की मौत नहीं होता. तो ये हैं वे दकियानूसी-दक्षिणपंथी ताकतें, जो सभी जगह हैं, बस उनकी शक्लें अलग-अलग हैं. उनका कोई एक धर्म-मजहब नहीं है. लेकिन सभी जगह जवाब एक है-  लोकतंत्र. जहां तक भारत की बात है तो ये किसी ब्रेविक के कहने से अपनी विविधता को नहीं छोड़ सकता. यह उस गांधी का देश है जो कहता है-  ' ईश्वर अल्ला तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान'. जहां भांति-भांति के रंगबिरंगे फूल हैं, उनकी महक है-  और जिसका नाम हिंदुस्तान है. यही हमारी पूंजी है. तभी तो अल्लामा इकबाल कहते हैं-  'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा...'

लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा लोकमत समाचार में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.