सतीश सिंह रक्षाबंधन भाई-बहन के प्यार को जताने का त्यौहार माना जाता है। इस पर्व में बहनें अपने भाईयों की कलाई पर राखी बाँधती हैं। भारत में इस त्यौहार को बड़े धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। अब चीन भी इस त्यौहार से जुड़ गया है। गौरतलब है कि सीधा-सीधा इस त्यौहार का भले ही चीन से कोई सरोकार नहीं है। फिर भी व्यापार के लिहाज से चीन का इस पर्व से गहरा रिश्‍ता है। रक्षाबंधन में एक महीना से भी कम समय बचा है और भारत का बाजार चीन की डिजाइनर राखियों से पट गया है। हर तरफ चाइना मेड राखियों की भरमार है। राखी के लिए कच्चा माल तक चीन से मंगवाया जा रहा है। दिल्ली के सदर बाजार, चाँदनी चौक, शंकर मार्केट एवं पहाड़गंज में राखी बनाने के लिए धागे, जरी, छोटी गुड़िया, कार्टून कैरेक्टर के छोटे टेडी इत्यादि चीन से आयात किये जा रहे हैं। चोरी से भी डिजाइनर राखी और उसको बनाने के लिए कच्चा सामान चीन से आ रहा है।

जाहिर है धीरे-धीरे चीन भारत के पूरे बाजार पर कब्जा कर रहा है। मोबाइल, नाई के दुकान का तौलिया, इलैक्ट्रॉनिक्स सामान, टूथब्रश, टूथपेस्ट, प्लॉस्टिक की बॉल्टी, खिलौने, फर्नीचर, बैग, साइकिल, आईना, सेविंग किट, चूड़ी, कंघी, पाउडर, क्रीम इत्यादि सभी उत्पाद हम चाइना मेड इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर ये सारे उत्पाद कानूनी तौर पर भारत के बाजार में आ रहे होते तो कम-से-कम हमें राजस्व का नुकसान नहीं होता। पर अफसोस की बात यह है कि आयात के माध्यम से चीन से भारत में महज 50-60 फीसदी उत्पाद ही आ रहा है।  मजबूरी में ही सही लेकिन आज हमारी दिनचर्या और चाइना मेड प्रोडक्ट्स के बीच चोली-दामन का रिश्‍ता कायम हो गया है। वस्तुतः चाइना मेड प्रोडक्ट्स इतने सस्ते होते हैं कि हम चाहते हुए भी चीन में बने उत्पादों का भारत के बाजारों में आना रोक नहीं पा रहे हैं। भले ही चाइना मेड उत्पादों की गुणवत्ता को संदेह से देखा जाता है। किन्तु अब यह भारत में आवश्‍यक बुराई बन गया है।

दरअसल बाजार की ताकत के सामने पूरी दुनिया नतमस्तक है। चीन अपनी इसी ताकत के बलबूते पर आज पूरी दुनिया पर राज कर रहा है। आर्थिक दृष्टिकोण से दुनिया का दूसरा सबसे ताकतवर देश वह पहले ही बन चुका है। पड़ोसी देश्‍ा होने के नाते भारत के लिए यह निश्चित ही रश्‍क का विषय हो सकता है। पर हकीकत में भारत और चीन के बीच में कोई तुलना नहीं किया जा सकता है। हालांकि भारत और चीन को आजादी लगभग एक समय मिली थी। लेकिन आज हर मामले में चीन हमसे आगे है। सड़क, रेल, रेल लाइन, पुल, पावर प्लांट जैसे फ्रंट पर चीन भारत तो छोड़िए अमेरिका के समकक्ष खड़ा है। प्रत्येक साल चीन आधारभूत संरचना के विकास पर 500 बिलियन डालर खर्च कर रहा है। इसे यदि हम सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह तकरीबन 9 फीसदी के आसपास है। जबकि यूरोप में महज जीडीपी का 5 फीसदी ही आधारभूत संरचना के विकास पर खर्च किया जाता है। अमेरिका में इसका प्रतिशत मात्र 2.4 फीसदी है।

अभी हाल ही में चीन में सागर पर बने 42 किलोमीटर लंबे विश्‍व के सबसे बड़े पुल (जिआओझाऊ वे ब्रिज) का उद्घाटन हुआ था। बीजिंग से शंघाई के बीच में हाई स्पीड रेल सेवा की शुरुआत भी कुछ दिनों पहले ही हुई थी। उल्लेखनीय है कि 1318 किलोमीटर लंबी दूरी का सफर यात्री अब सिर्फ 5 घंटे में पूरा कर सकेंगे। सथापत्य कला और इंजीनियरिंग के मामले में चीन आरंभ से ही दुनिया में अव्वल रहा है। चीन का ग्रेट केनॉल और ग्रेट वॉल दुनिया के आश्‍चर्यों में से एक है। रक्षा के दृष्टिकोण से भी चीन भारत से कई कदम आगे है। वह हर साल अपने रक्षा बजट में इजाफा करता है। उसने 2011 में अपने बजट का 12.7 फीसदी (91.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर) रक्षा मद पर खर्च किया था, जोकि पिछले साल की तुलना में 5.2 फीसद ज्यादा था। चीन नई तकनीक चुराने में भी माहिर है। इस संदर्भ में सबसे अच्छी बात यह है कि वह चुराई तकनीक पर देसी तड़का डालकर उसे नये क्लेवर में दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है। इसतरह वह चुराई नई तकनीक का आर्थिक दोहन करके अपने प्रतिद्धंदी से आसानी से आगे निकल जाता है।

आजकल चीन के कुनमिंग प्रांत में वहाँ के व्यापारी नकली एप्पल बेचकर जमकर मुनाफाखोरी कर रहे हैं। इस प्रांत में एप्पल का नकली स्टोर भी है। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस स्टोर में काम करने वाले कर्मचारियों तक को यह पता नहीं है कि वे एक नकली स्टोर में काम कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि चीन में एप्पल के अलावा अन्य नामचीन कंपनियां मसलन, आईपैड, आईफोन के उत्पाद भी गैरकानूनी तरह से बाजारों में बेचे जा रहे हैं। कई बार माल असली होते हैं, लेकिन कारोबारियों को कर चोरी करना रहता है। इसलिए वे तस्करी के जरिए बाहर से माल मंगवाते हैं। इसतरह के फर्जी व्यापारियों की चीन में बाढ़ आई हुई है।

कहने का तात्पर्य है कि चीन येन-केन-प्रकारेण अपनी श्रेष्ठता कायम रखना चाहता है और इस सपने को साकार करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है। दूसरी बात यह है कि चीन में शासन का स्वरुप तानाशाही है। लोगों के मन-मस्तिष्क में शासन के प्रति भय है। इस वजह से वहाँ राजस्व की उगाही का काफी ही बढ़िया प्रतिशत है। जमीन अधिग्रहण से लेकर अन्यान्य कार्यों में भ्रष्टाचार नाममात्र का है। देश की स्वतंत्रता एवं संम्प्रभूता को अक्षुण्ण रखने के लिए वहाँ के लोग प्रतिबद्ध हैं। जबकि भारत में आम से लेकर खास तक देश की जड़ को खोखला करने में लगा हुआ है। हर तरफ भ्रष्टाचार का बोलबाला है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। आधी से अधिक अबादी भूखी, नंगी और बेघर है। ऐसे में चीन से बराबरी करने की बात सोचना भी भारत के लिए बेमानी है। अपने सभी नागरिकों को यदि वह केवल रोटी, कपड़ा और मकान भी उपलब्ध करवाता है तो वह उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।

लेखक सतीश सिंह स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और स्वतंत्र लेखन करते हैं. सतीश से This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.  या 09650182778 के जरिए संपर्क किया जा सकता है.