आलोक कुमारदो दिनों में बस्तर में तीन नक्सली हमले में 15 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए। व्यवस्था के बागियों की यह करतूत चिंताजनक है। चिंता इसलिए भी बड़ी है कि इलाके में सेना प्रशिक्षण केंद्र की शुरुआत हो रही है और आने वाले दिनों में इलाके के सुरक्षा की कमान भारतीय सेना के हाथ आने वाली है। जाहिर है मुकाबला बागियों और सेना के बीच शुरू होने का खतरा है। सेना को सरकारी संपदा से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ विशेष अधिकार के साथ कड़ाई से सैनिक धर्म निभाने की अनुमति मिल गई है। अब बस सेना के हाथ कमान थमाने की औपचारिकता भर पूरी होनी है। आने वाले दिनों में छत्तीसगढ के दंतेवाड़ा इलाके में संघर्ष भीषण होने वाला है।

सेना की सक्रियता इंद्रावी नदी के पार अबूझमांड इलाके में डेढ़ दशक से राज चले रहे आंध्र प्रदेश के नक्सलियों की मुसीबत बन सकती है। अभी तक नक्सल आपरेशन की जिम्मेदारी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के हाथ में है। गोरिल्ला तरीके से नक्सलियों के पुलिस बल पर हमले का मतलब अर्धसैनिक बल के जवानों की मौत रही है। बहरहाल जब कभी माओवादी हिंसा का सवाल आता है जेहन में नेपाली कांग्रेस के महासचिव विमलेंद्र निधि का एक बयान कौंध जाता है। उनका कहना है कि नेपाल में सशस्त्र विद्रोह करने वाले किसी भी माओवादी नेता को पड़ोसी चीन में ठौर नहीं मिला बल्कि छिपने के लिए वो लोकतांत्रिक भारत में हील जाते रहे। अगर चीन माओवाद के सफल प्रयोग का नतीजा है तो उसे कथित माओवादी विचारधारा के प्रसार के लिए मदद करना चाहिए था। माओत्से तुंग की विचारधारा को नेपाल अथवा भारत में अमलीजामा पहनाने में लगे माओवादियों को चीन में शरण मिलनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। नेपाली कांग्रेस के शीर्ष नेता का सरकार में शामिल नेपाली माओवादियों के बारे में कहना कड़वा तो है लेकिन सच है। राजशाही के खात्मे के नाम पर राष्ट्रद्रोह और बगावत का जुर्म करते वक्त नेपाली सेना की भय से सिर छिपाते माओवादी उतर में स्थित चीन जाने के बजाय खुद को भारत में छिपाना महफूज समझते रहे। अब यही माओवादी अपने दोस्तों के घर भारत का विरोध और विचारधारा के आधार पर चीन की पैरवी कर रहे हैं।

भारत की तरह चीन उदार नहीं। किसी अराजक तत्व के लिए वहां की अनुशासित व्यवस्था में जगह ढूंढना मुश्किल है। नेपाली माओवादियों के अगुआ पुष्प कमल दहल प्रचंड के साथ भारत के नक्सलवादियों के लिए भी चीन का यह रुख साफ रहा है। जिन नवसिखुए के मन में भ्रम है उनके लिए शुक्रवार को चीन के 90 वें स्थापना दिवस के मौके पर बीजिंग से संदेश आया है। चीन की काम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के वरिष्ठ अधिकारी आए पिंग ने नक्सलियों और माओवादी समूहों की विचारधारा को नामंजूर करने की बात कही है। उन्होंने खुलकर कहा कि चीन वामपंथी अतिवादी समूह के उस हिंसा के प्रयोग के खिलाफ हैं जिसके जरिए सरकार को उखाड़ फेंकने का सपना बुना जाता है। आए पिंग चीन की सरकार में उप मंत्री हैं।

विदेशी मीडिया से मुखातिब आए पिंग ने माओवादी फलसफे का गुणगान करने वालों को लगभग तमाचा मारते हुए कहा कि पार्टी माओ के जमाने में क्रांतियों का समर्थन करती थी जो 1976 में उनके निधन के साथ ही खत्म हो गया। आज के समय में आए पिंग का मानना है कि क्रांति का निर्यात नहीं किया जा सकता है बल्कि संबंधित देश की जनता को उनकी राष्ट्रीय स्थितियों के मुताबिक रास्ता चुनना चाहिए। चीन से निकली ये बातें उन विचारकों के लिए विचारणीय है जो माओत्से तुंग की गोरिल्ला युद्ध को व्यवस्था पर कब्जा करने के लिए आदर्श मानते हैं। माओवाद को जिंदा रखने के लिए इंसान की खून को क्रांति की तराजू पर तौलना जरूरी समझते हैं।

अपने देश की सच्चाई पर गौर करें तो कुल 144 जिलों में इन्हीं माओवादियों का प्रसार है। इनका हौसला दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है। दिल्ली और मुंबई में सक्रियता बढ़ाने के मंसूबे में लगे सशस्त्र विद्रोही माओवादियों के स्वपनिल योजना के मुताबिक वो सफलता की कगार पर हैं। इससे कैडरों में उम्मीद बढ़ी है। अतिवादी माओवादी अब दोगुने उत्साह से दंडकारण्य की जंगलों या फिर गढ़ चिरौली में गरीबों की ओट मे छिपकर जवानों को मौत की घाट उतार रहे हैं। कथित बदले के लिए ही सही जवानों की मौत के वक्त उनको तनिक ख्याल नहीं आता कि खाकी वर्दी में तैनात ये सैनिक भी किसी गरीब परिवार से आते हैं  और उनकी तरह ही मिशनरी हैं। जिस तरह मैदान पर लड़ते हुए मारे जाने वाले माओवादी विचारक युवक की मौत से माओवाद खत्म नहीं हो रहा उसी तरह सैनिकों की मौत से माओवाद का लाल झंडा फहराने का सपना पूरा नहीं हो सकता है। ये सैनिक आजीविका और राष्ट्र सेवा की संकल्प की वजह से ही घने वन में अपनी नियुक्ति स्वीकार करते हैं। इनका जीवन उसी राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण है जिसे संवारने के नाम पर ये माओवादी इंसान का खून बहाने से नहीं हिचकते। जाहिर है कि शहीद हो रहे सिपाही ना तो व्यवस्था को चलाने वाले हैं और न ही इनकी मौत से वो व्यवस्था खत्म होने वाली है, जिसे कथित माओवादी विचार से गरीबों का दुश्मन बताया जाता है।

माओवाद के अलख पर चीन जैसी व्यवस्था कायम करने वालों के लिए कुछ और भी सच है। मसलन चीन में पूरी कड़ाई के बावजूद भ्रष्टाचार का बोलबाला है। इंटरनेशनल ट्रांसपेरेंसी नाम की संस्था के हिसाब से भ्रष्टाचार के मामले में भी हम से नवोदित चीन काफी आगे है। चीन की कानूनी व्यवस्था में भ्रष्टाचार के दोषियों को फांसी पर चढ़ा देने जैसा सख्त कानून हैं। चीन के प्रांतीय गवर्नर तक को भ्रष्टाचार के मामले में फांसी पर चढ़ाया जा चुका है। लेकिन नव उदारवाद की चपेट में आए चीन के भ्रष्टाचारियों को फांसी के फंदे से डर नहीं लग रहा। यह सूरत बाबा रामदेव के समर्थकों के लिए भी विचारनीय है जो समाज में जागरूकता और सुचिता फैलाने के बजाय भ्रष्टाचारियों के लिए मृत्युदंड के प्रावधान को निदान मानते हैं। इंसान की मौत या इंसान का खून बहाने से कुछ संवरने वाला नहीं। ऐसे में, माओवाद के नाम पर चीन जैसी व्यवस्था के कायल अतिवादी वामपंथियों से उम्मीद बेकार लगती है। कई अधेड़ अतिवादी वामपंथी विचारकों को जानता हूं वो इसलिए भी खतरनाक लगते हैं कि दिल्ली -हैदराबाद के ड्राईंगरुम में बैठकर वो विचार तैयार करते हैं। युवाशक्ति उनके विचारों को जमीन पर उतारने के लिए जान पर खेलती है। जंगलों में युवा मारे जाते हैं नए बागी युवकों की फौज खड़ी करने के लिए बुजुर्ग अतिवादी वामपंथी जीवित रह जाते हैं।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने 'आज', 'देशप्राण', 'स्पेक्टिक्स इंडिया', 'करंट न्यूज', होम टीवी, 'माया', दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं.