ओसामा बिन लादेन का 20 साल का बेटा हमजा लादेन गायब है. वो कहां गया, कुछ पता नहीं. पिछले दिनों जब एबटाबाद में आधी रात हेलिकाप्टरों में सवार अमेरिकी सैनिकों ने लादेन के ठिकानेवाली हवेली पर धावा बोला था, तो बताया गया कि लादेन और उसके बेटे हमजा की गोलीबारी में मौत हो गई थी. लेकिन बाद में पता चला कि लादेन के साथ उसके बेटे की मौत जरूर हुई लेकिन मरनेवाला हमजा नहीं था, बल्कि वो 22 वर्षीय खालिद लादेन था. खालिद भाई है हमजा का.

सभी जानते हैं कि हमजा लादेन का चहेता बेटा है. और मारने वाले उसे अलकायदा का नया नेता या पिता लादेन का वारिस भी मानते हैं. लेकिन एबटाबाद में गोलीबारी के बाद से हमजा का पता नहीं है. तो क्या हमजा खुद वारदात के बाद फरार हो गया, या उसे फरार करा दिया गया?. बताते हैं कि अमेरिकी सैनिक हेलिकाप्टर में लादेन के शव, उसके कम्प्यूटर, सीडी और जरूरी दस्तावेजों के साथ एबटाबाद से रवाना हुए थे, तो उस वक्त हमजा वहीं था.

ये वही हमजा है, जो कई साल पहले तब सुर्खियों में आया था, जब पाकिस्तान में चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या की गई थी. हत्या करनेवालों में हमजा का भी नाम लिया गया था. फिर जब ब्रिटेन में 52 लोगों को मौत की नींद सुलानेवाले ट्रेन बम धमाके की पिछले महीने में बरसी पड़ी तो एक वेबसाइट पर हमजा को ये कहते सुना गया कि हमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रान्स और डेन्मार्क को बर्बाद कर देना है. बहरहाल, अब जबकि लादेन उसके परिवारवालों और अलकायदा से संबद्ध खास लोगों की खोजबीन हो रही है, तो हमजा का नाम फिर से सुर्खियों में है. लेकिन अब दुनिया भर का खुफिया तंत्र ये भी मान रहा है कि हमजा ही लादेन की जगह लेगा. क्योंकि वो अपने पिता का नजदीकी तो था ही, साथ ही उसने पहले से ही आतंकी घटनाओं में हाथ आजमाना भी शुरू कर दिया था.

लेकिन फिलहाल लाख टके का सवाल यही है कि अमेरिकी सैनिकों के एबटाबाद से जाने के बाद जब हवेली के बाकी सभी लोग पाकिस्तानी सुरक्षाबलों की हिरासत में थे तो हमजा कैसे और कहां गायब हो गया? जाहिर है, शक की सुई फिर से इस्लामाबाद की ओर ही है. और ये शक बेवजह हो, ऐसा नहीं है. पहले की अनगिनत घटनाओं को छोड दें तो भी हाल की कई घटनाएं हैं, जो पाकिस्तान की हताश, निराश, दिग्भ्रमित स्थिति का बयान तो करती ही हैं, साथ ही खुद को अपमानित हालात से उबारने के पाकिस्तानी प्रयास के लेखे-जोखे का कम उसमें और भी उलझते जाने का ज्यादा खुलासा करती हैं.

कृपया ध्यान दें. पहला तो यही कि अब पाकिस्तानी अधिकारियों ने अमेरिकियों से यह कहना शुरू कर दिया है कि यदि वे बिन लादेन की बीवियों और अन्य घरवालों से पूछताछ करना चाहते हैं तो उन्हें ऐसा तभी करने दिया जाएगा जब वे एबटाबाद से कब्जे में लिए गए लादेन के कम्प्यूटर और अन्य दस्तावेज, सीडी वगैरह पाकिस्तान के हवाले करेंगे. अभी लादेन की पत्नियां और बच्चे पाकिस्तानी हिरासत में हैं. वाशिंगटन इनसे खुद पूछताछ करना चाहता है और वह इसके लिए लगातार इस्लामाबाद पर दबाव बना रहा है. मजे की बात यह है कि इस्लामाबाद इस हालिया आदान-प्रदान के प्रस्ताव से पहले भी गिरगिट की तरह कई रंग सिर्फ इसी मामले में बदल चुका है.

गौर करें कि इसके पहले पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने कहा था कि लादेन की विधवाओं और बच्चों से पूछताछ के लिए अमेरिका को इजाजत दी जाएगी. लेकिन तभी समाचार एजेंसियों के हवाले से इस्लामाबाद ने एक दूसरी बात यह कह दी कि बिन लादेन की पत्नियां चूंकि सउदी अरब और यमन की हैं, इसलिए पहले उनके मूल देश के अधिकारियों से इजाजत लेनी होगी. दिलचस्प है कि अभी इन अंतर्विरोधी बयानों के बारे में यह सोचा जा रहा था कि सही बयान कौन सा है, तभी पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता तहमीना जानजू ने यह कह कर सभी को चौंका दिया कि अमेरिका ने लादेन की बीवियों और बच्चों से पूछताछ के लिए कोई प्रस्ताव ही नहीं किया है. और अब इसी बीच आदान-प्रदान का नया प्रस्ताव भी आ गया. तो क्या माना जाए? क्या इस्लामाबाद जानता है कि वो क्या कर रहा है या फिर वो दबाव में परेशान होकर कुछ भी बोल रहा है? या फिर वो नियोजित ढंग से बयान बदल रहा है?

दूसरा उदाहरण देखें. हाल में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी ने पेरिस यात्रा के दौरान कहा कि बिन लादेन को लंबे समय तक न खोज पाना सिर्फ पाकिस्तानी खुफिया तंत्र या आईएसआई की ही विफलता नहीं थी, यह सारी दुनिया के खुफिया तंत्र की विफलता थी, जिनमें अमेरिकी तंत्र भी शामिल है. लेकिन गिलानी के इस बयान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तो कोई सहयोग नहीं ही मिला, खुद पाकिस्तान की सेना ने भी  इसे नकार दिया. पाक सेना प्रमुख अशफाक परवेज कियानी ने कहा कि  पाकिस्तान का खुफिया तंत्र बिन लादेन के मामले में असफल हो गया है. कियानी ने सेना के बडे अफसरों के नेतृत्व में इस चूक के लिए जांच के आदेश भी दिए हैं. दरअसल बयानों में विरोधाभास निराशा और अपमान से उपजे हैं और चूंकि अमेरिकी कार्रवाई के बाद यह संदेश जनता के बीच भी गया है. उससे स्थिति और भी पेचीदा हुई है.

अब जरा पाक सेना के अफसरों के बयानों पर गौर करें. पहले पाकिस्तानी वायुसेना के अधिकारियों ने कहा कि अमेरिकी सैनिकों के हेलिकाप्टरों के एबटाबाद में कार्रवाई की जानकारी इसीलिए नहीं मिल पाई क्योंकि अमेरिका ने पाकिस्तान के निगरानी यंत्रों को जाम कर दिया था. लेकिन इस बयान पर वाशिंगटन से जब दबाव पडा तो पाकिस्तानी अधिकारियों के तुरंत बयान बदला और कहा कि उनके राडार के स्विच बंद थे. लेकिन राडार के स्विच बंद होने के बयान पर जब जनता समेत सभी जगह किरकिरी हुई तो फिर नया बयान आ गया. कहा गया कि निगरानी व्यवस्था ठीक काम कर रही थी. अब सवाल यह है कि जब निगरानी व्यवस्था ठीक थी तो उन्हें अमेरिकी कार्रवाई की जानकारी क्यों नहीं हो पाई?

दरअसल 9/11 का एंटीक्लाइमेक्स था बिन लादेन का मारा जाना. लेकिन इस घटना का पाकिस्तान में घटित होना खुद पाकिस्तान के लिए, उसकी सेना और उसके पूरे सियासी तंत्र के लिए भारी परेशानी का कारण बन रहा है. पाकिस्तान का ’डबल गेम' ही उसके द्वंद्व का कारण बन रहा है. लेकिन वो अपनी दोहरी चाल से अभी भी बाज नहीं आ रहा है. तभी तो आईएसआई के पूर्व प्रमुख हमीद गुल ने हाल ही में बयान दिया है कि पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को देश की सभी दक्षिणपंथी पार्टियों को अगामी चुनाव के संदर्भ में एकजुट करना चहिए. इस  गठबंधन की जरूरत इसलिए है कि इस्लामी लोकतंत्र की मजबूत अवधारणा सामने आ सके और पश्चिमी लोकतंत्र की सोच को मजबूत जवाब भी मिल सके. लेकिन पर्दे के पीछे का सच यही है कि सेना-सरकार के साथ आतंकी-कट्टरपंथी-तालिबानी ताकतों के गठजोड के खुलासे के बाद वो फिर से कट्टरपंथियों को सियासत के नाम पर एकजुट करना चाहते हैं. अब वो इसमें कितना सफल हो पाते हैं, यह अलग बात है.

दूसरा उदाहरण देखें. लंदन के ’गार्जियन' अखबार में छपे मुशर्रफ और बुश के तत्कालीन समझौते और लादेन के मारे जाने वाले खेल का खुलासा भी पाकिस्तान के ’डबल खेल' को उजागर करता है. लेकिन इसी के साथ यह खबर भी सुर्खियों में है कि पाक राष्टन्पति आसिफ अली जरदारी ने पिछले दिनों काबुल जाकर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई को यह समझाने की कोशिश की कि अब अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान से हटने की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही उन्हें चीन से अपनी दोस्ती बढानी शुरू करनी चाहिए. इससे उसे सुरक्षा भी मिलेगी और उसका विकास भी होगा. जरदारी दरअसल करजई को भारत से दूरी बनाने के लिए फुसलाना चाह रहे हैं. लेकिन बात बनी नहीं. तभी तो भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अफगानिस्तान जाकर एक ओर आतंक के ठिकानों के सफाए की बात कर रहे हैं तो साथ ही अफगानिस्तान की सरकार को संसद, सड़क और अन्य निर्माण कार्यों में सहयोग का आश्वासन दे रहे हैं.

एक हजार भारतीय बसों को अफगानिस्तान की सड़कों पर उतारने की भी योजना है. दरअसल, लादेन के मारे जाने के ठीक बाद काबुल को दिल्ली का यह आश्वासन सिर्फ दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र द्वारा सबसे नए उभरते लोकतंत्र की मदद की ही बात नहीं है, बल्कि इसके पीछे पूरे क्षेत्र में आतंक से निपटने के साथ ही चीन को हद में रखने की अमेरिकी मंशा भी स्पष्ट है. तभी तो इसी मौके पर पाकिस्तान को उन पचास आतंकियों और वांटेड लोगों की लिस्ट भी भारत ने सौंपी है, इस आशा में कि शायद पाकिस्तान को सद्बुद्धि आए. तभी तो अब अमेरिकी कांग्रेस में यह विधेयक भी रखा गया है कि इस्लामाबाद को मिलने वाली भारी आर्थिक मदद में कटौती की जाए.

इस्लामाबाद की पोल पट्टी खुलने के बाद ऐसा होना स्वाभाविक भी है. लेकिन दोहरे मानदंड की बात पाकिस्तान की तरह ही अमेरिका पर भी लागू होती है. तभी तो वाशिंगटन एक ओर यह कहता है कि पाकिस्तान को मिलने वाली मदद जारी रहेगी तो दूसरी ओर वह कांग्रेस में पाक को मदद रोकने वाला विधेयक भी पेश करता है. यही नहीं प्रमुख अमेरिकी सिनेटर जॉन केरी जो कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय की नीति निर्माण समिति से सम्बद्ध हैं, पाकिस्तान पहुंच कर बिगडे रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की मंशा भी स्पष्ट करते हैं. तो यह दोहरापन सभी जगह है, शायद यह अंतर्राष्ट्रीय रिश्तों की जरूरत भी. लेकिन पाकिस्तान ने तो हद ही कर दी और अब यही उसकी सारी परेशानियों की जड़ भी है.

लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक है.