गिरीशजीअमेरिका ने सोचा था कि ओसामा बिन लादेन के शव को समुद्र में दफनाएंगे तो लादेन जैसे शीर्षस्थ आतंकी का कोई अवशेष नहीं बचेगा और उसकी कोई ऐसी मजार वगैरह नहीं बन पाएगी, जहां उससे सहानुभूति रखने वाले पहुंच सकेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. एबटाबाद की जिस हवेली में लादेन को मारा गया, अब उसे कौतूहलवश देखने के लिए ही भारी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं. इसमें पुरुष, महिला और बच्चे भी शामिल हैं. वैसे एबटाबाद पहले भी प्राकृतिक सुंदरता के चलते पयर्टक स्थल के रूप में मशहूर था. लेकिन अब उसके प्रति जिज्ञासा के और भी बढ़ने के आसार हैं. लादेन की सबसे छोटी पत्नी यमनी जो अंतिम समय उसके साथ थी 'उसके द्वारा यह खुलासा होने पर कि लादेन पिछले पांच साल से वहीं रह रहा था' अनेक मसले उठ गए हैं.

पहला तो यह कि पाक सरकार और उसका खुफिया तंत्र क्या वाकई लादेन की रिहाइश में अनजान था, जैसा कि वो दावा कर रहा है? इस्लामाबाद से महज सौ किलोमीटर दूर और सेना के महत्वपूर्ण केंद्र के बगल में वर्षों से लादेन रह रहा हो, और पूरा भारी-भरकम तंत्र अनजान हो, यह बात किसी के गले नहीं उतर रही-बहरहाल, अब पाक सरकार ने इस पर जांच बैठा दी है, लेकिन उसका कोई नतीजा भी निकलेगा, किसी को यकीन नहीं है. लेकिन दिलचस्प यह है कि लादेन को लेकर तनाव झेल रहे अमेरिका-पाक रिश्ते में उसका अंतिम स्थल कोई ऐतिहासिक भावनात्मक धरोहर बने, क्या यह वाशिंगटन को बर्दाश्त होगा? कतई नहीं. इसके पहले इराकी राष्‍ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी के बाद जो गलती अमेरिका कर चुका था, उसे न दोहराते हुए इसीलिए लादेन के शव को अरब सागर में दफनाने की योजना पर अमल किया गया. उसने सोचा था कि जिस तरह से सद्दाम की कब्र पर लोग जाते हैं, वो बात लादेन के साथ न होने पाए और इस तरह आतंक के इस प्रतीक का नामोनिशान ही खत्म हो जाएगा. लेकिन उसे यह अंदाजा न था कि लोग लादेन के साथ हुई गोलीबारी की उस अंतिम जगह को ही एक 'रहस्यात्मक प्रतीक' के रूप में स्वीकार कर लेंगे और फिर ऐसे मामले तो किंवदंतियों के सहारे भी बढ़ते हैं. जैसे कि लादेन को गोली मारी गई या उसने खुद को गोली मारी? वाकई लादेन ही ओसामा की हवेलीमरा या फिर कोई और मारा गया और नाम लादेन का लगा दिया? अमेरिकियों ने तो लादेन को काफी पहले ही मार दिया था, उसे कवर करने के लिए यह कहानी गढ़ी गई या फिर यह सारा ड्रामा पाकिस्तान को दबाव में लेने के लिए रचा गया? या यह सब कुछ महज वाशिंगटन-इस्लामाबाद की नूरा कुश्ती भर है? फिलहाल ऐसे ढेरों सवाल एबटाबाद पहुंचने वालों की बातचीत और फुसफुसाहट में तैर रहे हैं.

उधर, लादेन के मारे जाने के बाद अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा पहली बार ग्राउंड जीरो पहुंचे और उन्होंने 9/11 शहीदों की याद में फूल चढाए. हालांकि ओबामा ने वहां कोई भाषण या वक्तव्य नहीं दिया, लेकिन राष्‍ट्रपति कार्यालय से बाद में जारी बयान में उनकी भावनात्मक संवेदना को अमेरिकी राष्‍ट्रीयता से जिस तरह से जोड़ा गया है, उसका सीधा अर्थ सियासी है. यानी अगले राष्‍ट्रपति चुनाव में ओबामा की इस आधार पर गिरती साख को बचाने और बढ़ाने की कोशिश कि- अमेरकियों के दुश्मन नंबर एक लादेन को मार गिराया गया. यानी कि आर्थिक मंदी की मार को भावनात्मक आधार पर निपटाने की कोशिश. लेकिन ग्राउंड जीरो की तर्ज पर एबटाबाद की यह हवेली किसी भावनात्मक धरोहर में तब्दील हो- ये तो वाशिंगटन को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं हो सकता. शायद इसीलिए अब इस हवेली को ही बारूद से उड़ाने की बात भी उठ रही है. अब ये वाकई साकार हो भी पाएगा या सिर्फ ख्‍याली पुलाव भर है या यदि इसे उड़ा भी दिया गया तो उस जमीन का क्या होगा, जहां ये हवेली खड़ी है? अच्छी या बुरी याद और उससे जुडी किंवदंतियां तो तब भी जुड़ी रह सकती हैं, उससे कैसे निपटेंगे? बहरहाल, इन सारी स्थितियों के बीच वाशिंगटन अब लादेन की उस यमनी पत्नी के अमेरिका प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है, जिससे वो खुद पूछताछ करना चाहता है. वो यह भी चाहता है कि इस्लामाबाद उन पंद्रह लोगों को भी प्रत्यर्पित करे, जो किसी न किसी वजह से हवेली में आते-जाते रहते थे. अभी तक के संकेत तो यही हैं कि पाकिस्तान इन्हें वाशिंगटन के हवाले करने को राजी नहीं दिख रहा.

उधर, अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में लादेन के मारे जाने के पहले से सीआईए और आईएसआई के रिश्तों की खटास अब हद पार कर रही है. तभी तो पाक सेनाध्यक्ष कयानी ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने एबटाबाद जैसी कार्रवाई फिर की तो वो बर्दाश्त से बाहर की बात होगी. तब हम द्विपक्षीय संबंधों पर पुनर्विचार करेंगे. दूसरी ओर पाक के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल तलत मसूद का भी कहना है कि अमेरिका के साथ संबंधों की पुनर्रचना जरूरी है. सीआईए से सम्बद्ध रेमंड डेविस द्वारा कई पाकिस्तानियों की हत्या और मुआवजा अदायगी के बाद उसके जेल से छूटने के पश्चात अब पाकिस्तान में अमेरिकियों की संख्या कम होनी चाहिए. उनकी खुली आवाजाही पर भी रोक होनी चाहिए. आखिर सीआईए को अनेक जानकारी आईएसआई ने ही दी है. पाकिस्तानी विदेश सचिव सलमान बशीर ने भी लादेन को लेकर पाक सरकार और खुफिया तंत्र पर 'डबल गेम' के आरोपों से इनकार किया है. लेकिन खुद अमेरिका ने जो जानकारी हासिल की है, उसके अनुसार अल कायदा 9/11 की दसवीं बरसी पर अगले सितंबर में अमेरिका में ट्रेनों पर हमला करने वाला था. यहां गौरतलब है कि कयानी ने जिस तरह से खिसियाहट में अमेरिका और भारत के खिलाफ नाराजगी भरा बयान दिया है और भारत को ही नहीं अमेरिका को भी ये बताने की कोशिश की है कि वो ऐसी हमलावर कार्रवाई के बारे में आगे कभी न सोचे- दरअसल ऐसा पाकिस्तानी अवाम के सामने बोलना उनकी मजबूरी भी है.

उधर, अंतर्राष्‍ट्रीय परिदृश्य के संदर्भ में देखे तो अरब दुनिया से सटे पाकिस्तान का असर व्यापक रूप से अनेक क्षेत्रों पर पड़ रहा है. अमेरिका विरोधी धारा की अगुवाई जहां ईरान बहुत सधे हुए कदमों से कर रहा है, वहीं सऊदी अरब अमेरिका के समर्थन का कोई मौका छोड़ना नहीं चाह रहा. मिस्र और ट्यूनीशिया में वाशिंगटन समर्थक सरकारों के गिरने के बाद जिस तरह से सऊदी अरब, यमन, मोरक्को, कतर, जॉर्डन, ओमान, बहरीन जैसे देशों में जम्हूरी हवा को दबाने की कोशिश हुई है और दूसरी ओर सीरिया, लीबिया जैसे देशों में विरोधियों और लोकतंत्र समर्थकों को मदद देने का प्रयास जारी है- उससे न केवल अमेरिका बल्कि पश्चिमी खेमे की भी कलई खुली है.

बहरहाल, ऐसे समय जबकि अफगानिस्तान से जल्दी ही अमेरिकी सेनाओं की वापसी शुरू होने वाली है और वाशिंगटन अरब दुनिया में राजतंत्रों का समर्थन करके क्षेत्र में पकड़ बरकरार रखने को आतुर है, वह नहीं चाहेगा कि पाकिस्तान उसके हाथ से निकल जाए. यह उसकी जरूरत भी है और मजबूरी भी. पाकिस्तान और अमेरिका- दोनों ही इस तथ्य को अच्छी तरह से जानते हैं. तभी तो पाकिस्तान आर्थिक रूप से वाशिंगटन पर निर्भर रहने के बाद भी उसे दिखावे के लिए ही सही धमकाने की हिमाकत भी करता है और अमेरिका खुले आम ये भी कहता है कि जरूरत होगी तो फिर से ऐसे ही हमले होंगे. लेकिन गौर करने की बात है कि जब दिल्ली 9/11 और 26/11 में साम्य होने की बात करता है और वाशिंगटन की कार्रवाई को एक नजीर के रूप में पेश करके पाकिस्तान पर दबाव बनाता है, तो वाशिंगटन तुरंत यह भी साफ करता है कि 9/11 और 26/11 एक नहीं है और वाशिंगटन ऐसी किसी कार्रवाई में भारत के साथ नहीं है. गौर करें दिल्ली में अमेरिकी और पश्चिमी हुक्मरान दोनों की तुलना करते और साम्य बताते नहीं थकते, लेकिन नए हालात में बयान भी बदलते हैं. हमें भी हालात को समझते हुए अपने राष्‍ट्रीय हितों में राजनीति को व्यवहारिक बनाने की जरूरत है. रही 'डबल गेम' की बात, तो अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर हितों की पूर्ति में पाकिस्तान ही नहीं, अमेरिका भी यही करता है, इसे समझा जाना चाहिए.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार के संपादक हैं. इन दिनों पुणे में हैं. उनका यह लिखा 'लोकमत समाचार' में प्रकाशित हो चुका है. गिरीशजी से संपर्क This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.  के जरिए किया जा सकता है.