अमेरिका का अल कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन के खिलाफ चलाया गया 'ऑपरेशन जेरीनेमो' की सारे संसार में तारीफ हो रही है कि किस प्रकार उसके नेवी सील के जांबाज कमांडोज ने एबटाबाद में पाकिस्तानी सैन्य अकादमी की नाक के नीचे मात्र 40 मिनट में पाकिस्तानी सरकार, सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई को खबर हुए बगैर दुनिया के सबसे वांटेड आतंकवादी को न सिर्फ मार गिराया बल्कि उसका शव और कम्प्यूटर आदि सुबूत लेकर स्टील्थ टेक्नॉलॉजी से निर्मित हेलीकाप्टरों में उड़कर अपने ठिकाने पर लौट भी आये। दुनिया को इसकी सूचना तभी लगी जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने व्हाइट हाउस से यह सम्बोधन किया कि लादेन मारा जा चुका है। अब सारी बहस इस पर हो रही है कि लादेन के शव के फोटो क्यों नहीं जारी किये गये, उसे समुद्र को क्यों दफना दिया गया, सारे आपरेशन की खबर पाकिस्तान सरकार को क्यों नहीं दी गयी, क्या पाकिस्तान को ओसामा के ठिकाने की जानकारी थी, अमेरिकी हमले के दौरान पाकिस्तानी सेना की नाकामी पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं।

जहां तक भारत का सवाल है सरकार ने वही लकीर पीटते हुए पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर चिंता जताई और मुम्बई हमलों के मास्टरमाइंड हाजी सईद के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए एक बार फिर पाकिस्तान को मोस्ट वांटेड 25 आतंकवादियों की लिस्ट सौंप दी है। मीडिया में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि मुम्बई बम ब्लास्ट के आरोपी कुख्यात सरगना दाऊद इब्राहीम के खिलाफ भी भारी को अमेरिकी तर्ज पर सैन्य कार्रवाई करनी चाहिए और भारतीय आर्मी चीफ ने कहा था कि सेना के तीनों अंग मिलकर इस तरह का आपरेशन करने में सक्षम हैं। पाकिस्तान ने इस पर नाराजगी जताई कि भारत इस तरह की बात सोचे भी नहीं, उधर अमेरिका ने पुनः वजीरिस्तान में द्रोण हमले कर पुनः साबित कर दिया कि वह गीदड़ भभकियों ने नहीं डरता, जो उसे करना होता है वह करके ही रहता है। भारत को नाभिकीय अस्त्रों से लैस अपने पड़ोसी की कारस्तानियों को सहने के सिवाय कोई उपाय नहीं।

दुनिया भर में खुफिया तंत्र की नाकामी कोई हैरत की बात नहीं है। भारत को तो इसका कुछ ज्यादा ही खामियाजा भुगतना पड़ा है। जरा आपरेशन जेरोनिमो और 26/11 के मुम्बई हमलों में समानता देखें जहां कराची से मुम्बई के लिये दस लोग बोट में सवार होकर चलते हैं और भारतीय नेवी, तटरक्षक बल और खुफिया एजेंसियों की सारी चौकसी को धता बताते हुए मुम्बई के ताज, ओबराय होटल, छत्रपति शिवाजी टर्मिनल सहित आठ स्थानों पर खूनी खेल खेलते हैं जिसमें 164 लोगों की जान जाती है और 300 से ज्यादा लोग घायल होते हैं। पश्चिम बंगाल के पुरूलिया जिले में भी 17 दिसम्बर 1995 को लातविया का एक विमान न जाने कहां से आता है और सैकड़ों एके-47 सहित भारी मात्रा में गोला बारूद गिराकर गायब हो जाता है। विमान के लौटते वक्त या तीन दिन बाद (यह अभी तक स्पष्ट नहीं है) पुनः भारतीय नभ क्षेत्र में प्रवेश के समय रडार की पकड़ में आने पर भारतीय वायुसेना के विमान उसे कवर करते हुए जबरन मुम्बई हवाई अड्डे पर उतरने के लिये मजबूर कर देते हैं।

भारत ने पहले 1974 और फिर 1998 में पोखरन में नाभिकीय परीक्षण किये तो अमेरिका सहित दुनिया भर के जासूसी सेटेलाइट भी इसे सूंघ तक नहीं पाये थे, इसके जवाब में पाकिस्तान ने भी परीक्षण कर डाला। एक बार फिर खुफिया सूत्र और विशेषज्ञ तक इसका अंदाजा नहीं लगा सके। कारगिल युद्ध के समय भी जब पाकिस्तानी सेना के घुसपैठिये सैंकड़ों किलोमीटर अंदर तक घुस आये और अपने अस्थायी अड्डे बनाकर उनमें एंटी एयरक्राफट गन समेत तमाम गोला बारूद जमा कर लिया तो एक स्थानीय चरवाहे की सूचना पर भारतीय सेना एक्‍शन में आयी अन्यथा खुफिया एजेंसिया तो कानों में तेल डालकर सोयी हुई थीं। उन्हें इस बात का अंदाजा तक नहीं था कि हिमालय के जिन क्षेत्रों को सर्दियों के दौरान गश्‍त रहित छोड़ दिया जाता था, वहां घुसकर पाकिस्तानी भारतीय चेक पोस्टों और टाइगर हिल व तोलोलिंग जैसी लड़ाई की दृष्टि से महत्वपूर्ण चोटियों पर कब्जा कर लेंगे। पाकिस्तान की योजना श्रीनगर को लेह से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग और सियाचिन तक पहुंचने वाले बटालिक-तुरतुक सेक्टर सहित पूरे कारगिल इलाके को कब्जाने की थी, जिसे भारतीय सेना के जांबाज जवानों ने नेस्तनाबूद कर दिया और अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद नवाज शरीफ को सेना वापस बुलाने का अलोकप्रिय फैसला करना पड़ा। विशेषज्ञों का मानना था कि अभियान जल्द ही और बिना ज्यादा क्षति के पूरा किया जा सकता था, अगर भारतीय सेना लाइन ऑफ कंट्रोल पार कर घुसपैठियों की रसद लाइन को नष्ट कर देती लेकिन तब आणविक ताकत बन चुके दो पड़ोसी मुल्क खुले तौर पर एक-दूसरे के सामने आ जाते जो इन दोनों के साथ-साथ विश्‍व शांति के लिये भी घातक होता।

कारगिल युद्ध में घुसपैठियों के नाम पर सैन्य हस्तक्षेप ने पाकिस्तान को विश्‍व बिरादरी में अलग-थलग कर दिया था। ओसामा के मारे जाने के बाद एक बार फिर पाकिस्तान पर उंगली उठ रही हैं। सेना के पास एक बार फिर कहने के लिये कुछ नहीं है। आईएसआई चीफ शुजा पाशा मुंह छिपाये घूम रहे हैं और न जरदारी न गिलानी ही इस बात की सफाई दे पा रहे हैं कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर अमेरिका से अरबों डालर की मदद पाने के बावजूद पाकिस्तान को यह पता कैसे नहीं लगा कि ओसामा इस्लामाबाद के इतने नजदीक कैसे रह रहा था। खुफिया एजेंसियों की नाकामी सिर्फ हमारे ही हिस्से में नहीं है। 7/11 को अमेरिका में हुए आतंकवादी हमलों ने दुनिया को ही बदलकर रख दिया था जब सीआईए तक को नहीं पता चला कि किस तरह विमानों को मिसाइल बनाकर वर्ल्ड ट्रेड टॉवर उड़ा दिया जायेगा। ओसामा की मौत को कट्टर इस्लामी तब के में शहादत बनाकर पेश किया जा रहा है और अलकायदा ने भी बदला लेने की धमकी दी है। ऐसे में ओसामा के मारे जाने के बाद यह दुनिया कुछ ज्यादा ही असुरक्षित हो गयी लगती है।

लेखक निखिल अग्रवाल पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं तथा कई समाचार पत्रों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.