जगमोहन फुटेला कोताही करे कोई, पर इतना भी काफूर ना हो/खुदगर्जी के हाथों, इतना भी मजबूर ना हो जितना कि आज पाकिस्तान है. फ्रांस में सरफ़रोश होते प्रधानमन्त्री गिलानी हों या इस्लामाबाद में मीडिया से रूबरू होते विदेश सचिव सलमान बशीर. चेहरे उड़े हैं. आखों के अक्स चेहरे के भावों से मेल नहीं खाते. थोड़ी सी बेवफाई फिल्म के एक गीत का वो शे'र शायद इसी सीन के लिए लिखा गया हो-कौन ढूंढे सवाल दर्दों के,लोग तो बस सवाल करते हैं. सवाल समस्या हो गए हैं.शक्लें दोनों की देखी नहीं जातीं.ओसामा दुश्मन दोनों का था. मारा भी दोनों ने मिल के होगा. घर के भेदी के बिना तो भगवान राम भी रावण को नहीं मार पाए थे.पर पाकिस्तान है कि मानने को तैयार नहीं है.मान लेता तो नाम नेकी मिलती. अब बदनामी ज्यादा है. पढ़िए, पाकिस्तान के विदेश सचिव ने प्रेस कांफ्रेंस में क्या क्या कहा.

उन्होनें कहा, पूछे बताये बिना अमेरिकी हेलीकाप्टरों का यूं आना-जाना पाकिस्तानी संप्रभुता का हनन नहीं था. इसलिए कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ने को सेक्योरिटी काउन्सिल ने बोला है.अमेरिकी हेलीकाप्टर इसलिए पाकिस्तानी राडार की पकड़ में नहीं आए क्योंकि वो बहुत नीची उड़ान भरे हुए थे (वे कहते कहते रह गए कि उनके राडारों को जाम कर दिया गया था). नहीं मालूम कि कुल कितने हेलीकाप्टर थे. पता तब चला जब एक गिरा. गिरा तो पहले ये पता लगाया गया कि कहीं कोई अपना ही तो नहीं गिरा है (ये पता होने के बावजूद कि पाकिस्तान के हेलीकाप्टर रात में उड़ा नहीं करते हैं. ये पता लगने में भी दस मिनट लग गए. इस के बाद नौसेना प्रमुख ने थल सेना प्रमुख कियानी को फ़ोन किया. बशीर मानते हैं कि इस फोन के मिलने में भी कुछ वक्त लगा क्योंकि फोन भी वो इस्तेमाल किया जाना था जो कहीं टेप शेप न होता हो. इसके बाद फ़ौज को आगाह किया गया. फिर कुछ देर फ़ौज को भी लग ही गयी एक्शन लेने में. इतनी देर में अमेरिकी हेलीकाप्टर अपना काम कर के जा चुके थे. बशीर साहब फरमाते हैं ये भी अच्छा ही हुआ (वर्ना फ़ालतू में अमरीकियों के साथ पंगा हो गया होता).

और जब उनसे पूछा गया कि क्या कोई और भी ऐसा कर के जा सकता है?...तो वे सकुचाये, सठियाये और फिर गुर्राए- नहीं,किसी ने ऐसा कभी सोचा भी तो मुंह की खाएगा. ज़ाहिर है ये सवाल भारतीय सेना प्रमुख के उस जवाब से से निकला था, जिसमें उन्होंने कह दिया था कि कभी करना पड़े तो भारतीय सेना भी ऐसा कर पाने में सक्षम है. उनका मकसद ये बिलकुल नहीं था कि अमेरिका ने अपने दुश्मन को पाकिस्तान की सरज़मीं पे मारने के लिए ऐसा किया है तो भारत भी करेगा या कर सकता है.वो तो किसी ने सवाल पूछा कि क्या वैसी दक्षता भारतीय सेना की भी है तो जनरल ने बोल दिया कि हाँ, है.

लेकिन बशीर साहब फ़ैल गए. सारे कूटनीतिक तकाजों (मर्यादाओं) को ताक पे रख एक अफसर ने सियासत शुरू कर दी. विदेशी प्रधानमन्त्री (डा. मनमोहन सिंह) का बाकायदा नाम लेकर इलज़ाम लगाया कि वे और उनके अफसर भारत के अपने मसलों से ध्यान हटाने की खातिर इस तरह के बयान दे रहे हैं. लगे हाथ बशीर ने ताज पे हुए हमले के लिए भारतीय ख़ुफ़िया तंत्र की असफलता भी गिना दी और ये नसीहत भी दे डाली कि 'रा' अपनी हरकतों से बाज़ आए. चलिए खैर ओसामा तो मर के समुद्री जीवों का ग्रास बन गया लेकिन आइए अब ज़रा इस सब में पाकिस्तान की हुई फ़जीहत का सबब भी समझ लें. समझें कि क्यों पाकिस्तान किस सच को छुपाने के लिए झूठ पे झूठ बोल और फिर पशेमान भी हो रहा है.

इस को सिलसिलेवार समझना पड़ेगा. नंबर एक- जब किसी छोटे से गाँव में बसा कोई छोटा मोटा चोर उचक्का भी गाँव वालों की मदद के बिना पुलिस वालों के काबू नहीं आता, डकैत हमेशा मुखबिरों ने पकड़वाए या मरवाए हैं तो क्या ये मुमकिन है कि अमेरिका ने अकेले अपने दम पे उसे दूरबीन से देखा, न सोचा न समझा, न नीचे ज़मीन पे उसके आसपास उसकी ताकत का अंदाजा लगाया और सीधे अपने कमांडो उतार दिए उसकी छत पे? कामनसेंस कहती है कि कमांडो आपरेशन से पहले नीचे के इलाके को 'सेनेटाईज़' (औरों से खाली) ज़रूर किया गया होगा. नीचे स्थिति क्या है, अन्दर कितने लोग हो सकते हैं और असलहा कितना है इसका भी कोई ज़मीनी आकलन ज़रूर हुआ होना चाहिए. ये नीचे, उस घर के आसपास कुछ अपने लोगों के अलावा हो नहीं सकता. ये अपने लोग अमरीकी से दीखते तो नहीं हो सकते थे. आसपास कोई तो लोकल इंटेलिजेंस रही होगी. भले ही वो आईएसआई न हो.

दूसरी बात- क्या कोई मूरख भी मानेगा कि कोई फौजी हेलीकाप्टर आये धड़धड़ाते हुए. वहां छत पे कमांडों की लैंडिंग भी हो, लड़ाई और गोलीबारी भी और वे कुछ लाशों जैसी पैकिंग करें, लोडिंग भी और बड़े आराम से उड़ते बनें. वे चले भी जाएँ पाकिस्तान की सीमा पार कर के और फिर अमरीका का राष्ट्रपति पाकिस्तान के राष्ट्रपति को सोते से उठा कर फोन करे, बताये कि मेरे बन्दे तुम्हारे मुल्क में जाकर ये कारनामा कर आए हैं. यानी पाकिस्तान के राष्ट्रपति को पता अपनी फौज नहीं, अमरीका के फोन से चले? ...तीसरा- अमरीकी कमांडों सच में ही पाकिस्तान को पूछे बताए बिना आते, ऐब्ताबाद पंहुचने से पहले या आपरेशन के दौरान पाकिस्तानी फ़ौज के हाथों ओसामा समेत या उसके बिना मारे जाते तो सोचो साल भर बाद फिर चुनाव की दहलीज़ पे खड़े ओबामा का खुद अमेरिका में क्या हाल होता? इतने कच्चे तो ओबामा और उनके सलाहकार नहीं हो सकते कि ओसामा को मारने के बदले अपने बन्दे मरवा के आ जाएँ. उस हालत में तो पाकिस्तान की ये दलील भी कोई नहीं मानता कि आतंकवाद के खात्मे के लिए ये आपरेशन हुआ तो वो पाकिस्तान पे हमला नहीं है.

...तो जो हुआ वो मिल के न सही मिलीभगत से तो हुआ. सवाल ये है कि जब हुआ और दुश्मन वो पाकिस्तान का भी था तो ये क्यों कह रहे हो कि हमें कुछ नहीं पता..! ये 'हमें कुछ नहीं पता' भी आप इस लिए नहीं कह रहे कि आप को सच में कुछ नहीं पता. ऐसा भी नहीं है कि आप ओबामा को सारा क्रेडिट ले लेने देना चाहते हैं ताकि उनसे मिलने वाली अरबों रूपये की सहायता के बदले आप उन्हें अगले साल के राष्ट्रपति चुनाव में और मज़बूत उम्मीदवार हो जाने दें. इसलिए भी कि अगले साल कोई रिपब्लिकन जीत गया तो आपका बैंड बज जाएगा. आपको कुछ पता दरअसल इस लिए नहीं है कि अपनी इंटेलिजेंस या फ़ौज को आप खुद भी इस पूरे आपरेशन में कहीं इस्तेमाल नहीं करना चाहते थे. और वो इस लिए कि अमेरिका की तरह आप को खुद भी अपनी आईएसआई और फौज पे भरोसा नहीं था. डर था कि पाकिस्तानी फौज और आईएसआई को कहीं भनक भी लगी तो ओसामा का मरना तो नहीं, हाँ मगर बचना यकीनी हो जाएगा.

आज भी आपको डर ये है कि खुद अपनी ही सेना और आईएसआई में तालिबान के हमदर्दों में दर्द का दरिया बह सकता है. फोटो दिखाने न दिखाने के पीछे भी आशंका हिंसा की नहीं, डर दरअसल पाकिस्तान में बगावत का है. और इस के साथ जुडा है, पापी पेट का सवाल. सच तो ये है कि आतंकवाद न होता तो उस से निबटने के नाम पर अरबों रूपये की अमरीकी मदद न होती. इस मायने में पहले आपको ओसामा सूट करता था अब उसके वारिस करेंगे. आप उन्हें ये समझाना चाहते हो कि भाई तुम बेफिक्र रहो. तुम रहोगे तो पाकिस्तान को अमरीकी मदद रहेगी. इस लिहाज़ से ओसामा ही मारा है सिर्फ. अल कायदा और उसका आतंकवाद ज़िंदा है.

लेखक जगमोहन फुटेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों वेब मीडिया की दुनिया में सक्रिय हैं.