प्रमोद पांडेय...नहीं। यह न्याय नहीं है। ओसामा बिन लादेन के मारे जाने मात्र से आतंक या आतंकवाद का अंत हो गया यह सोचना जल्दबाजी होगी। ओसामा का मारा जाना किसी कथा का अंत नहीं, शुरुआत है। 11 सितम्बर, 2001 (9/11) को न्यूयॉर्क के जिन टावरों को गिराकर अलकायदा ने दुनियाभर में दहशत पैदा कर दी, वहां 01  मई की रात लादेन के मारे जाने से टावरों के स्थान पर बने जीरो ग्राउंड पर लोग जश्न में डूब गए। लादेन अमेरिका की मोस्ट वांटेड सूची में सबसे ऊपर था। इसीलिए अमरीकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने इसे एक उपलब्धि बताया है-'अल कायदा के खिलाफ कार्रवाई में यह अमेरिका की सबसे बड़ी उपलब्धि है। ...न्याय मिल चुका है।'

9/11 में तीन हजार से अधिक लोग मारे गए थे। अब जब पाकिस्तान में अमरीकी सैनिकों की विशेष कार्रवाई में अलकायदा के नेता लादेन को मार दिया गया है और इसकी पुष्टि भी कर दी गई है तो इस घटना को विविध प्रकार से देखा जा रहा है। ...नहीं, यह न्याय नहीं है। अमरीका को स्वरचित न्याय और शांति की परिभाषा से आगे निकलना होगा। चाहे ईराक हो या अफगानिस्तान या कोसोवो युद्ध या लैटिन अमेरीका में प्रभुत्व की स्थापना के लिए शक्ति प्रदर्शन --यह न्याय नहीं है। क्लिंटन के कार्यकाल में कोसोवो युद्ध की इजरायल जैसे सहयोगी समेत विश्व भर द्वारा निंदा की गई। भारत में 26/11 के आतंकी हमले को भी अमरीका ने सही से नहीं लिया। लादेन के पाकिस्तान में मारे जाने से यह साबित तो हो ही चुका है कि पाकिस्तान में आतंकवादियों को पनाह मिलती है। और यह नई बात भी नहीं है, लेकिन यहां अमेरिका खेल करता रहा है।

9/11 की घटना के बाद तत्कालीन अमरीकी राष्‍ट्रपति जॉर्ज बुश ने दुनिया से कहा था- 'या तो आप हमारे पक्ष में हैं या आतंकवादियों के साथ हैं।'  तीसरा कोई रास्ता नहीं है। इस तरह से देखें तो अमरीका के लिए लादेन का मारा जाना वाकई एक बहुत बड़ी उपलब्धि के समान है.... । एक दशक से अधिक समय से लादेन के पीछे पड़ी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के लिए यह मनोबल बढ़ाने से भी जुड़ा मामला है। लेकिन ध्यान से देखें तो हजारों लोगों के हत्यारा लादेन को देखकर ही आतंक या आतंकवाद को परिभाषित करना न्यायपूर्ण नहीं होगा।

इस घटना ने भी यह साबित किया है कि चाहे हम कितने भी कथित सभ्य समाज और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से संपन्न दुनिया में रह रहे हों, लेकिन यह एक प्रकार से 'मत्स्य न्याय' की तरह ही है। पश्चिमी दुनिया और अमेरिका के लिए न्याय और आतंक का बहुत ही सीमित अर्थ है। चाहे सद्दाम हुसैन हों या ओसामा बिन लादेन, कभी पश्चिमी दुनिया के ही पालन-पोषण के परिणाम स्वरूप आगे बढ़े। इन्हें अपने हित के लिए बखूबी इस्तेमाल किया गया, लेकिन जब इन्हीं के पाले-पोसे गए लोग इनके पीछे पड़ गए तो आतंक और आतंकवाद को लेकर इनकी सक्रियता बढ़ी। चाहे ईरान हो, ईराक या अफगानिस्तान या मध्य एशिया अमेरिका और पश्चिमी दुनिया की ताकतों ने जो न्याय के नाम पर जनसंहार को अंजाम दिया है वह किस प्रकार का न्याय है?

ईराक में जिस तरह से एक शक्तिशाली देश के सिरमौर ने रासायनिक हथियारों के बहाने पूरी दुनिया को ठेंगा दिखाते हुए सैनिक कार्रवाई की और एक संप्रभु देश के राष्‍ट्रपति को फांसी दे दी गई वह आदिम किस्म के समाज के न्याय की ही वकालत करता है। ताकत और अन्याय के बल पर न्याय को मनमाने पूर्ण ढंग से परिभाषित करना। सितम्बर, 2001 में न्यूयार्क पर तालिबानी हमलों ने अमेरिका को खाड़ी देशों के ऊर्जा संसाधनों पर जबरन कब्जा करने का एक बहाना दे दिया। एक प्रकार से अफगानिस्तान और ईराक में जो भी अमरीकी वर्चस्व को बढ़ावा दिया गया वह किसी प्रकार के न्याय की ओर रास्ता नहीं ले जाता। अफगानिस्तान के उत्तर-पश्चिमी सीमा से लगे तुर्कमेनिस्तान में प्राकृतिक गैस का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा भंडार और है, जिससे अमेरिका की अगले तीस साल तक की जरूरतें पूरी हो सकती हैं। तीसरी दुनिया के देशों को जिस तरह से नव साम्राज्यवादी ताकतें अपना हथियार और दूसरे प्रकार से उपनिवेश बना रही हैं उससे एक बड़ा संकट नजर आता है।

भारत, पाकिस्तान और तीसरी दुनिया के देशों में जो समस्याएं हैं, चुनौतियां हैं उसे ठीक प्रकार से देखने की बजाय मनमानेपूर्ण ढंग से ताकतवर देश देख रहे हैं। याद कीजिए पेरिस के 1968 के छात्र आंदोलन का मशहूर नारा था- 'बी प्रैक्टिकल एण्ड डू द इंपॉसिबल।' जिन लोगों ने यह नारा दिया था वे यह जानते थे कि लोगों के लिए सामान्य ढंग से जीना भी होता जा रहा है और संघर्ष के अलावा कोई मार्ग नहीं बचा है। यही स्थिति आज कई मामलों में देखने को मिल रही है कि बड़े किस्म के अपराध, जनसंहार करने वाले विकास के ढांचे और सत्ता के उन्माद को शांति के अर्थ में रखा जा रहा है। अक्टूबर,  2001 में जब आतंकवाद खत्म करने के नाम पर अफगानिस्तान पर हमला किया गया था,  तब दुनिया की वह बिरादरी, जो युद्ध के खिलाफ और शांति के पक्ष में थी, सन्न रह गई थी। अफगानिस्तान मसले पर हुए अंतरराष्‍ट्रीय मतदान में मुश्किल से ऐसा कोई देश था, जहां अमरीका ब्रिटेन के एक तरफ हमले के पक्ष में दस प्रतिशत भी समर्थन मिला हो। ईराक पर आक्रमण के मसले पर भी एक विश्वव्यापी विरोध था। लेकिन संयुक्त राष्‍ट्र को भी ठेंगा दिखा दिया गया और मनमानी की गई। क्या हिंसा और एकतरफा हमले का रास्ता चुनना विश्व शांति का प्रतीक है? यदि भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में देखें तो हमें यह लगता है कि पाकिस्तान में कई मामलों में कई चीजें सत्ता और सेना के नियंत्रण से भी से भी बाहर निकल चुकी हैं। सेना जिहादियों, आतंक, अमेरिका को लेकर उलझी हुई है तो राजनीति पूरी तरह विभाजित है।

दशहतगर्दी और हिंसा की आग में पाकिस्तान खुद जलता रहा है। आतंकवादी हमले में पाकिस्तान को परेशान और बर्बाद करते रहे। ऐसे में 9/11 और 26/11 को अलग-अलग चश्मे से आंकना और दुनिया की शांति और समृद्धि को अपने स्वार्थ के अनुसार बांचना कहीं का भी न्याय नहीं है। लादेन के मारे जाने को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है। अमेरिका के लिए यह उपलब्धि तो जरूर है। नए संकटों की शुरुआत भी हो सकती है। न्याय नहीं है यह। न्याय और आतंक का बहुत ही सीमित अर्थ है इनके लिए।

लेखक प्रमोद कुमार पांडेय पत्रकारिता विषय के शिक्षक हैं.