गिरीश : भारत की आतंक की चेतावनी अब सच साबित हो रही : लंदन के 'गार्जियन'  अखबार ने सरकारी अधिकारियों के हवाले से लिखा है कि अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमले के बाद से अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्ते इतने खराब कभी नहीं रहे, जितने कि आज हैं. पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर की तल्खी को उद्धृत करते हुए लिखा गया है कि पाकिस्तान अब अमेरिका के इन आरोपों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के गुप्त रिश्ते अफगानिस्तान और कश्मीर के आतंकी गुटों और तालिबानियों से हैं. बशीर आईएसआई पर लगने वाले 'डबल गेम'  खेलने का आरोप भी गलत बताते हैं. ऐसे ही बयान पाकिस्तान के गृह मंत्री रहमत मलिक ने भी दिए हैं कि अमेरिका की ओर से 'ब्लेमगेम'  बंद होना चाहिए. और, अब तो दोनों देशों को आपसी रिश्ते फिर से नए सिरे से शुरू करने की जरूरत है.

दिलचस्प है कि 'गार्जियन' की ही तर्ज पर पाकिस्तान के 'पाक ट्रिब्‍यून'  ने भी लिखा है कि अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्ते कभी बहुत अच्छे हुआ करते थे. 9/11 के हमलों के बाद से अमेरिका ने 12 अरब डालर की सैन्य सहायता समेत कुल 21 अरब डालर की मदद इस्लामाबाद को दी है. लेकिन कुछ समय से सीआईए, डनेन हमले और अफगानिस्तान में शांति वार्ता में प्रगति न होना ऐसे मसले रहे, जिनसे संबंधों में कडुवाहट आ गई. पिछले दिनों सीआईए निदेशक लियोन पेनेटा से आईएसआई प्रमुख शुजा पाशा की अमेरिका में वार्ता के बाद भी बात नहीं बनी. इसके बाद सीआईए ने प्रेस विज्ञप्ति के जरिए कहा कि पाकिस्तान में उसका अपना खुफिया नेटवर्क है और अब उसे अफगानिस्तान के सीमावर्ती आदिवासी क्षेत्रों में द्रोण हमलों के लिए आईएसआई की खुफिया जानकारी की जरूरत नहीं है. इस पर पाक प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने वाशिंगटन से द्रोण हमले बंद करने और पाकिस्तान से खुफिया जानकारी के आगे भी आदान-प्रदान करने की अपील की, लेकिन बात बनी नहीं.

'पाक ट्रिब्‍यून'  और 'गार्जियन'  की ये दोनों प्रमुख खबरें वैसे तो एक ही बात की ओर इशारा करती हैं कि दोनों के रिश्ते न केवल खराब हैं, बल्कि आगे भी इसमें सुधार के संकेत नहीं हैं. लेकिन भारत के संदर्भ में इसका महत्व यह है कि कश्मीर और सीमा पार आतंकवाद की बात भारत लंबे समय से उठाता रहा है, लेकिन पहले उस पर ध्यान नहीं दिया गया. अब पानी के सिर के ऊपर से गुजरने पर अमेरिका को इसका एहसास हो रहा है. एहसास ज्यादा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि आगामी जुलाई से अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से वापसी की प्रक्रिया भी शुरू होने वाली है और अभी तक की स्थिति बहुत माकूल नहीं हो पाई है. अमेरिकी कांग्रेस सांसदों की हालिया रिपोर्ट तो यह साफ इशारा भी करती है कि आईएसआई का 'डबल गेम'  यह है कि वह चाहती है कि अमेरिका के हटने पर वहां पैदा हुए शून्य की भरपाई या तो पाकिस्तान करे या फिर पाक समर्थित तालिबानी या आतंकी गुट.

वैसे पाकिस्तान यह नहीं चाहता है कि अफगानिस्तान में शांति स्थापना में किसी भी तरह से भारत की कोई भूमिका हो और अमेरिका खुद ज्यादा से ज्यादा समय तक अफगानिस्तान में फंसा रहे. उसे चिंता यह है कि यदि ओबामा सरकार की योजना के तहत 2014 तक अमेरिकी सेना वापस चली गई तो उसे आतंक से निपटने के नाम पर मिल रही भारी-भरकम मदद पर विराम लग जाएगा या फिर वो काफी कम हो जाएगी. इसीलिए पाकिस्तान हर हाल में वाशिंगटन को अफगानिस्तान में उलझा कर रखना चाहता है. यही वजह है कि अमेरिका जहां अफगानिस्तान में मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के लिए चार लाख सैनिकों की भारी-भरकम व्यवस्था को बनाने की योजना को प्रमुखता से उठाता है, तो इस्लामाबाद इसे एक लाख तक इसलिए सीमित करना चाहता है कि कमजोर अफगानिस्तान का होना उसके लिए हितकर रहेगा.

पिछले दिनों युरोपीय संसद की बैठक में भी पाकिस्तान को लेकर दो प्रमुख प्रस्ताव पारित किए गए. उसमें पाकिस्तानी सरकार, सेना, खुफिया तंत्र में तालिबानियों की घुसपैठ पर चिंता जताई गई. पाकिस्तान में आतंकियों और उनके संगठनों तक पूरी सरकारी जानकारी के पहुंचने का मुद्दा युरोपीय संसद में प्रमुखता से उठा. इस बाबत राष्‍ट्रति ओबामा की 2009 में जताई गई इस चिंता को भी साझा किया गया कि ऐसी स्थिति में आतंकी पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों तक भी पहुंच बना सकते हैं या फिर उन्हें हासिल कर सकते हैं. परमाणु केंद्रों की प्रयोगशालाओं में भी उसकी घुसपैठ इसलिए भी संभव हो सकती है कि वहां के पुलिस-प्रशासन-सुरक्षातंत्र में भी वे दाखिल हो चुके हैं.

उदाहरण दिया गया कि हाल में जब वहां के मंत्री की हत्या सुरक्षाकर्मी द्वारा की गई तो उसे वहां की पूरी व्यवस्था ही नहीं, अदालत तक में नायक का दर्जा मिला. युरोपीय संसद ने इस बाबत युरोपीय आयोग को यह जांच करने का भी निर्देश दिया कि वो पता लगाए कि पाकिस्तान को दी गई आर्थिक सहायता का कितना वांछित और उचित उपयोग किया गया है. आयोग से कहा गया कि वो देखे कि पाकिस्तान ने आर्थिक मदद का प्रयोग आतंकवाद को मदद पहुंचाने जैसे कायरों में तो नहीं किया है. इस संदर्भ में ध्यान देने की बात ये है कि पूर्व राष्‍ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने 2009 में बीबीसी से बात करते हुए कहा था कि हम पाकिस्तान को मिलने वाली मदद की जरूरत पड़ने पर तालिबान, अलकायदा जैसे संगठनों के खिलाफ और पड़ोसी भारत के खिलाफ भी प्रयोग करते हैं.

दरअसल ये सारा मामला पिछले दिनों तसव्वुर हुसैन राणा और डेविड कोलमॅन हेडली के बयानों के बाद खास तौर पर उछला. ये दोनों 26/11 के मुंबई हमलों के प्रमुख सूत्रधार हैं लेकिन इन्हें एक डेनिश अखबार पर हमले की योजना बनाते हुए पकड़ा गया और इस समय वे शिकागो जेल में हैं और अमेरिकी सरकार इन पर मुकदमा चला रही है. इन्होंने कहा है कि उन्होंने मुंबई हमलों में जो कुछ किया वो पाकिस्तान सरकार और उसके खुफिया संगठन आईएसआई के कहने पर किया. यानी कि उसने एजेंट के तौर पर न कि अलकायदा या किसी दूसरे आतंकी संगठन के कहने पर. कहने वाले तर्क दे रहे हैं कि ऐसा बयान दोनों ने खुद को बचाने के लिए दिया है. क्योंकि अमेरिका-कनाडा में ऐसा कानून है कि दूसरे संप्रभु देश के एजेंट या प्रतिनिधि पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता और उसे कूटनीतिक नियमों के तहत उसके देश वापस कर दिया जाता है.

इसी बीच हुआ ये कि पाकिस्तान के सीआईए कांटनेक्टर रेमंड डेविस द्वारा की गई गोलीबारी का मामला उछल गया जिसमें दो पाकिस्तानियों की मौत हो गई. फिर डेविस की गिरफ्तारी और पूछताछ के दौरान 47 दिनों तक पाकिस्तान में माहौल गर्म रहा और अमेरिका के खिलाफ प्रदर्शन भी हुए. लेकिन फिर मुआवजे के 23 लाख डालर पीडितों को दिलाकर डेविस को छोड दिया गया. लेकिन पाकिस्तान ने पहले डेविस को न छोड़ने का मन बनाया था, जिससे कि कट्टरपंथी- तालिबानियों को खुश किया जा सके और दूसरी ओर अमेरिका को भी दबाव में लाया जा सके. बहरहाल, डेविस की रिहाई के साथ ही वजीरिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्र में डनेन हमले में काफी लोग मारे गए. यह घटना आग में घी की तरह थी. तभी तो पाक सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक कियानी और प्रधानमंत्री गिलानी ने खुलेआम इसे 'मानवाधिकार का हनन'  और 'अविवेकपूर्ण'  बताया. इसी के ठीक बाद पाकिस्तान से सैकड़ों अमेरिकी कर्मचारियों को निष्कासित करने की कार्रवाई शुरू हो गई. तभी आईएसआई प्रमुख पाशा बातचीत के लिए अमेरिका गए लेकिन शिकागो में राणा और हेडली के चौंकाने वाले बयान के बाद वे तुरंत मुंह छुपा के वापस आ गए.

पिछले दिनों तक चली घटनाओं की इस पृष्ठभूमि में अब हालात ये है कि अमेरिकी डनेन हमले जारी हैं, इन्हें रोकने की पाकिस्तान की मांग ठुकरा दी गई है. अफगानिस्तान में शांति वार्ता की प्रक्रिया में वाशिंगटन अब किन तालिबानी गुटों से क्या बातचीत कर रहा है, इसकी जानकारी वो इस्लामाबाद को नहीं दे रहा है. वाशिंगटन अब खुफिया जानकारियां भी 'डबल गेम'  खेलने वाले आईएसआई से आदान-प्रदान नहीं कर रहा है. ऊपर से यूरोपीय देशों का रवैया भी इस्लामाबाद के प्रति सख्त हो गया है. दूसरी ओर, पाकिस्तान की चिंता और परेशानी ये है कि वो अलग-थलग पड़ रहा है. लेकिन पाक अधिकारी और राजनेता अभी भी ये कहने से नहीं चूक रहे कि वाशिंगटन बिना हमसे - रणनीतिक समन्वय किए यदि ये सोचता है कि वो अफगानिस्तान में बडे़ हमले करके अफगानियों को शांति के लिए घुटने टेकने पर मजबूर कर देगा, तो यह उसकी गलतफहमी है. अभी तक वे अफगानिस्तान के इतिहास की बात उठा कर पाकिस्तान अपनी बात साबित करना चाहता है, लेकिन वाशिंगटन अब पाकिस्तान के 'डबल गेम'  को खत्म करने पर आमादा दिखता है. पूरी संभावना है कि उसे इस रणनीतिक मुहिम में भारत की मदद की जरूरत पडे़.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका यह लिखा 'लोकमत समाचार' में कल प्रकाशित हो रहा है. गिरीशजी से संपर्क This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.  के जरिए किया जा सकता है.