गिरीशजीअमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट में विकिलीक्स का ताजा खुलासा प्रकाशित हुआ है कि सीरिया के राष्‍ट्रति बशर अल असद को कुर्सी से हटाने के लिए अमेरिका ने वहां असद विरोधी सशस्त्र प्रदर्शनकारियों को साठ लाख डालर की मदद की है. यही नहीं, लंदन में 2009 में एक नए टीवी चैनल 'बराडा' को भी शुरू कराने में मदद की, जो असद विरोधी खबरों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रसारित करे. वैसे तो ये सब राष्‍ट्रपति बुश के समय से जारी था, लेकिन इसे बराक ओबामा के समय भी जारी रखा गया. यहां दिलचस्प ये है कि एक ओर सीरिया में सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों को वाशिंगटन मदद कर रहा है तो दूसरी ओर वह सीरिया से रिश्ते सुधारने का दिखावा भी कर रहा है.

वैसे तो अमेरिका पहले भी अपने खुद के हितों और पश्चिमेशिया में अपने दरोगा इसराइल के हितों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता था, लेकिन उसकी इन नई चालों का खुलासा चौंकाने वाला है. यही नहीं छह साल बाद सीरिया से रिश्ते सुधारने के लिए वाशिंगटन ने वहां फिर से अपना दूतावास भी खोला है. 2005 में यह बंद हो गया था. लेकिन दमिश्क पर दबाव है कि वो इजराइल, लेबनान और इराक तथा फलस्तीनियों के अतिवादी समूहों से अपने रिश्ते बदले, यानी यथासंभव उन्हें वाशिंगटन के अनुरूप बनाए.

लेकिन इन खुलासों के बीच इससे भी ज्यादा रुचिकर हैं ईरानी राष्‍ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के वे आरोप जो उन्होंने वाशिंगटन पर मढे़ हैं. उन्होंने सोमवार को तेहरान में सैन्य परेड के दौरान खुलेआम कहा कि अब अमेरिका अरब दुनिया में फूट डालने पर आमादा है. वो सिर्फ ईरान को ही अरब राष्‍ट्र से अलग-थलग नहीं करना चाहता, वो शिया- सुन्‍नी- विवाद को भी हवा दे रहा है. अहमदीनेजाद ने पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों की ओर इशारा करते हुए कहा कि अमेरिका किसी का नहीं है. वह अपने खासमखास दोस्तों का भी नहीं है. उसका जिससे मतलब सधता है, वो उसी के साथ है. वैसे तो तेहरान और वाशिंगटन की खटास जगजाहिर है, इसलिए अहमदीनेजाद की बातों को खास तवज्जो नहीं मिलनी चाहिए, लेकिन उनके ऐसा कहने के साथ ही जिस तरह के घटनाक्रम हुए हैं, और जिस तरह से उनके तार आपस में जुडे हुए हैं, उससे इस बयान का महत्व और भी बढ़ जाता है.

दरअसल, हुआ यह कि तेहरान में सऊदी अरब के दूतावास के सामने युवकों ने पिछले दिनों जबरदस्त प्रदर्शन किया. प्रदर्शन विरोध दर्ज कराने के लिए था कि रियाद ने अपनी सेना बहरीन के शिया प्रदर्शनकारियों के शांतिपूर्ण-लोकतांत्रिक जुलूस को कुचलने के लिए क्यों भेजी. जाहिर है कि यह बात सिर्फ युवाओं के प्रदर्शन की ही नहीं थी, ईरान खुद भी सऊदी अरब की इस हरकत से नाराज है, क्योंकि बहरीन की लगभग तीन-चौथाई आबादी शिया है और इत्तफाक से वहां शासक सुन्‍नी हैं. बहरीन में अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा भी है. उसे किसी तरह की कोई क्षति न हो, इसलिए अमेरिकी इशारे पर रियाद के सुन्‍नी शासकों ने बहरीन के शासकों की मदद की और सऊदी अरब के सैनिकों ने शियाओं के लोकतांत्रिक आंदोलन को बेरहमी से कुचला. अनेक का कत्लेआम हुआ. तभी ईरान पर यह आरोप भी लगा कि अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर शिया तबके के बीच अपने नेतृत्व को बरकरार रखने के लिए तेहरान बहरीन की बहुसंख्यक शिया आबादी को सुन्‍नी शासकों के खिलाफ भड़का रहा है. लेकिन यह आरोप बहुत चल नहीं पाया, सिवाय इसके कि उसकी सहानुभूति भी दुनिया के बहुत से लोगों और देशों की तरह बहरीन के प्रदर्शनकारियों के साथ रही.

लेकिन इस बार अहमदीनेजाद ने शिया-सुन्‍नी की बात उठा कर और यह कह कर कि वाशिंगटन, ईरान को अरब दुनिया से काटना चाहता है, वो अरब दुनिया में फूट डालना चाहता है-  एक साथ कई मोर्चों पर वार किया है. अहमदीनेजाद के ऐसा कहने के पहले खाड़ी सहयोग परिषद की बैठक हुई थी. इसके सदस्य देशों में कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, ओमान और कुवैत शामिल हैं. इन देशों को अमेरिका के पसंदीदा-समर्थकों में शुमार किया जाता है. इन देशों के शासक इत्तफाक से सुन्‍नी समुदाय से हैं. इन शासकों ने सामूहिक रूप से राय व्यक्त की, जो कि ईरान पर आरोप के रूप में सामने आया कि तेहरान उनके मामलों में दखलंदाजी कर रहा है. सऊदी अरब ने तो बाकायदा चेतावनी के अंदाज में यहां तक कहा कि तेहरान हमारे दूतावासों को सुरक्षा मुहैया कराए वर्ना हम अपने राजदूतों को वापस बुला लेंगे. सऊदी अरब ने यह बात भले ही पिछले दिनों उसके दूतावास के सामने हुए युवाओं के विरोध प्रदर्शन के संदर्भ में कही हो, लेकिन इसके गहरे निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं.

माना यही जा रहा है कि सऊदी अरब के इस बयान के पीछे ही नहीं, बल्कि खाड़ी सहयोग परिषद के इन छहों देशों के संयुक्त वक्तव्य के पीछे भी अमेरिकी कूटनीति काम कर रही है. अमेरिका मध्यपूर्व में एक ओर ईरान को किसी भी तरह अलग-थलग करना चाहता है, तो उन देशों में जो उसके मनमाफिक नहीं है, वहां जम्हूरी हवा और मानवाधिकार आंदोलन के नाम पर उन्हें अस्थिर करना चाहता है, फिर चाहे वो लीबिया हो, सीरिया हो या फिर ईरान या कोई दूसरा देश. विकिलीक्स के खुलासे भी इसी दिशा में संकेत करते हैं. तो इन हालातों में क्या ये माना जाए कि अहमदीनेजाद के आरोप सही हैं कि वाशिंगटन अरब दुनिया में फूट डालने और मध्यपूर्व में लोकतंत्र के नाम पर आग को भड़का कर अपना उल्लू सीधा करना चाहता है? और क्या इसके लिए वो फिरकापरस्ती पर उतर आया है? और क्या इसीलिए वो लोकतंत्र के नाम पर भ्रष्ट, कथित 'लोकतांत्रिक सरकारों'  को ही गिरा कर मनपसंद राजशाही को मजबूत करना चाहता है?

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका यह लिखा 'लोकमत समाचार' में कल प्रकाशित हो रहा है. गिरीशजी से संपर्क This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.   के जरिए किया जा सकता है.