गिरीशजी: अरब जगत में अमेरिकी स्वार्थ : अरब जगत में बह रही लोकतंत्र, मानवाधिकार और आजादी की हवा के प्रति अमेरिका जैसी बडी ताकतों का रुख सिर्फ जैसे-तैसे अपने हितों को साधने का है या उन्हें वाकई जनता के जम्हूरी हकों को लेकर चिंता है? यह सवाल अहम इसलिए हो जाता है, क्योंकि पिछले दिनों अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने लीबिया में बमबारी रोकने के मोअम्मर गद्दाफी के अनुरोध पर साफ कहा कि अब गद्दाफी को तुरंत सत्ता ही नहीं छोड देनी चाहिए, बल्कि अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर निकल जाना चाहिए. हिलेरी का यह दिलचस्प बयान सिर्फ गद्दाफी के प्रति उनकी मंशा की ही अभिव्यक्ति नहीं है, यह बताता है कि पूरी अरब दुनिया में अमेरिकी अगुवाई में पश्चिमी खेमे का रुख सिर्फ अपने स्वार्थ पर निर्भर है, जिसमें लोकतंत्र, आजादी और मानवाधिकारों की बात तो सिर्फ ऊपरी मुलम्मे के तौर पर है.

यदि ऐसा न होता तो बहरीन में शांत शिया प्रदर्शनकारियों पर सऊदी अरब के सैनिक जाकर गोलीबारी न करते और वहां की सरकार समेत दुनिया तमाशा न देखती. आखिर तब अमेरिकी अगुवाई में नाटो सैनिक कहां थे? इसे भी छोड़ें, क्या किसी दूसरे अरब देश में पश्चिमी ताकतों ने हाल में उस तरह से दखल दिया है, जैसा उन्होंने लीबिया में दिया है? मिस्र के राष्‍ट्रपति हुस्नी मुबारक को तो अंतिम समय तक सत्ता में बनाए रखने के लिए अमेरिकी सरकार जन आक्रोश के बावजूद सारे प्रयास ही नहीं, उनसे बातचीत भी करती रही थी, वो तो सेना ने जब प्रदर्शकारियों पर गोली चलाने से साफ इनकार कर दिया, तब मजबूरी में उन्हें हटाना पड़ा. और, दिलचस्प तो ये है कि मिस्र में अभी भी पहले से लागू इमरजेंसी जारी है. चुनाव आगामी सितंबर में होने हैं. लेकिन सेना इतनी आसानी से चुनाव बाद सत्ता छोड़ देगी, अभी तक का क्षेत्रीय इतिहास ऐसा नहीं बताता.

यही हाल ट्यूनीशिया में है, जहां से इस लोकतांत्रिक आंदोलन की शुरुआत हुई थी. फिर मोरक्को, जार्डन, ओमान, कुवैत, सऊदी अरब, सीरिया जैसे अनेक देशों में प्रदर्शन हुए. सरकारी दमन चक्र भी चले, पर कहीं भी अमेरिकी खेमा इस तरह आगबबूला नहीं हुआ, जैसा लीबिया में देखने को मिला. क्यों? पिछले कई महीनों से आइवरी कोस्ट में चल रहे भारी खूनखराबे पर भी अमेरिका खामोश रहा है. सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं और दमन से त्रस्त लगभग दस लाख लोग आबिदजान से पड़ोस के लाइबेरिया भाग गए हैं. वहां लारेन बैगबो द्वारा लगातार संयुक्त राष्‍ट्र प्रस्तावों के उल्लंघन के बाद भी अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर वो हलचल नहीं है, जो कि लीबिया को लेकर है. क्या यह इसलिए नहीं कि आइवरी कोस्ट में अमेरिका और पश्चिम के हित इस तरह नहीं जुडे़ हैं, जितना कि लीबिया के तेल केंद्रों और उसकी भौगोलिक रणनीतिक स्थिति से जुडे़ हैं? क्या अमेरिका इसलिए भी त्रिपोली को लेकर आगबबूला नहीं कि अगर गद्दाफी लीबिया में शक्ति केंद्र के रूप में बने रह गए तो पड़ोस के मिस्र, ट्यूनीशिया जैसे राजनीतिक नेतृत्व विहीन देशों में भी इसका सीधा असर पडे़गा और दूसरे अरब देशों में पश्चिम को आंख तरेरने वाले मजबूत शख्स के रूप में उनकी छवि बढे़गी, और यह पश्चिम को गवारा नहीं? ऐसे हालात में राष्‍ट्रपति बराक ओबामा गद्दाफी को हटाकर सिर्फ अरब जगत में ही अपनी पकड़ को और मजबूत नहीं करना चाहते हैं, बल्कि लीबिया फतह से अपने देश अमेरिका में भी अपनी घटती लोकप्रियता और गिरती साख पर भी विराम चाहते हैं, लेकिन वो भूल जाते हैं कि इराक और अफगानिस्तान का अनुभव क्या रहा.

दरअसल, वाशिंगटन की इस 'छांटो-बांटो और राज करो' की राजनीति की कलई खुलनी शुरू हो गई है. लीबिया की तरह यमन के कबीलाई समाज में भी विघटन और टूटन के संकेत हैं. वहां भी सत्ता बदल और टूटन के पीछे पश्चिमी मंसूबों के फलने-फूलने के ही संकेत हैं. एक और बात जो खास तौर पर पश्चिमी हितों के संदर्भ में उभरती दिख रही है कि अरब देशों के राष्‍ट्रपतियों की कुर्सी तो खतरे में है, लेकिन राजतंत्रों और उनकी सामंती पकड़ को पश्चिम बनाए रखना चाहता है. वजह ये है कि राजतंत्रों के प्रति जनता की नाराजगी तुलनात्मक रूप से कम है और वे पश्चिम के प्रति ज्यादा निष्ठावान भी हैं. तभी तो बहरीन में अपने पांचवें बेडे़ की सुरक्षा और दूसरे हितों को जरा भी आंच न आए, इसके लिए सऊदी अरब की राजशाही द्वारा अमेरिकी शह पर बहरीन के शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों से निपटने के लिए सैनिकों को भेजा जाता है, और तब पश्चिमी देशों को वहां कोई लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन नहीं दिखाई देता.

मजे की बात यह है कि लीबिया में जिस तरह से सीआईए गद्दाफी विरोधी ताकतों को लोकतंत्र और मानवाधिकार के नाम पर मदद कर रही है, वो ठीक वैसा ही है जैसे कभी उसने अफगानिस्तान में लगभग तीस साल पहले किया था, जब पूर्व सोवियत संघ समर्थित शासक वहां मौजूद थे. उसका नतीजा आज तक वाशिंगटन ही नहीं मजहबी आतंकवाद के नाम पर अनेक देश भुगत रहे हैं. कल को लीबिया से गद्दाफी के हटने के बाद इसी की पुनरावृत्ति वहां भी हो सकती है क्योंकि इस्लामी आतंकी ताकतों का वहां भी पैठ बनाना आसान होगा. इसे अफगानिस्तान ही नहीं, सद्दाम हुसैन के इराक से भी समझा जा सकता है. सद्दाम के बाद के इराक की नजीर लीबिया में भी दुहराई जाए तो कोई ताज्जुब नहीं, क्योंकि बुश का इराक वही है जो आज ओबामा का लीबिया है. ऐसे में लीबिया में भी मजहबी आतंक, भारी हिंसा और विघटन की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. स्वार्थ और हितों की पूर्ति के लिए वाशिंगटन पहले से भी ऐसी हरकतें करके फंसता रहा है. आज की तारीख में पाकिस्तान को सबसे ज्यादा मदद वाशिंगटन से ही मिलती है लेकिन क्या विडंबना है कि पाकिस्तान दुनिया के उन चंद देशों में एक है जहां की अवाम सबसे ज्यादा अमेरिका से ही नफरत करती है. ये अंतर्विरोध बताते हैं कि वाशिंगटन की अगुवाई से पश्चिमी खेमे  की नीतियों से उन्हें तात्कालिक लाभ मिलता हुआ जरूर दिख सकता है, लेकिन दीर्घकालिक स्तर पर प्रायः घाटे का सौदा उनके लिए ही नहीं, अंतर्राष्‍ट्रीय बिरादरी के लिए भी होता रहा है.

आखिर अफगानिस्तान में यही तो हुआ जब अमेरिकी गठबंधन के सहयोगी देश ही वाशिंगटन का साथ छोड़ने लगे और आज स्थिति यह है कि वाशिंगटन खुद किसी तरह अफगानिस्तान से चेहरा छिपा कर निकलना चाहता है. बहरहाल, अब साफ है  अरब जगत की लोकतांत्रिक हवा भी बडे़ देशों की राजनीति की शिकार हो रही है. यदि इस जम्हूरी हवा से उन्हें फायदा है तो वे उसके साथ खडे़ दिखते हैं, और यदि उनका फायदा चहेते देशों के सत्ताधीशों को बनाए रख कर अपना उल्लू सीधा करने में है तो निरपराध-शांतिप्रेमी जनता के कत्लेआम में भी उन्हें कोई परहेज नहीं. लेकिन समझा जाना चाहिए कि 1989 में बर्लिन की दीवार ढहने के बाद लोकतांत्रिक उदारवाद की आंधी ने पूरे पूर्वी यूरोप को ही नहीं, वारसा पैक्ट के मुखिया सोवियत संघ को भी आगोश में ले लिया था, तब उस उदारवादी हवा से अरब जगत के शासक अपने राज को बचाने में सफल हो गए थे. परंतु अब जिस तरह से सोशल नेटवर्किंग की नई तकनीकी क्रांति से फिर से जम्हूरियत की जो हवा बह रही है, उसका भी चरित्र बीस पहले की उदारवादी-लोकतांत्रिक धारा जैसा ही है. समझा जाना चाहिए कि उसे रोक पाना या अपने हितों में ही प्रयोग करना न तब महाशत्ति सोवियत संघ के लिए संभव था और न आज महाशत्ति अमेरिका के लिए.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका यह लिखा 'लोकमत समाचार' में रविवार को प्रकाशित हो चुका है. गिरीशजी से संपर्क This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. के जरिए किया जा सकता है.