शेषजीपाकिस्तान की मदद करके अब अमरीका पछता रहा है. अब अमरीकी अधिकारी वे बातें सार्वजनिक रूप से कहने लगे हैं जो आम तौर पर दोनों देशों के बड़े नेता बंद कमरों में कहा करते थे. मसलन अब अमरीकी फौज के मुखिया ऐलानियाँ कह रहे हैं कि पाकिस्तानी सेना और उसकी संस्था आईएसआई आतंकवाद की प्रायोजक है. अभी पिछले हफ्ते पाकिस्तानी वित्त सचिव हफीज शेख ने कह दिया कि यह सच नहीं है कि उनका देश अमरीकी मदद से फायदा उठा रहा है. अमरीकी अधिकारियों ने फ़ौरन फटकार लगाई कि वित्त सचिव महोदय गलत बयानी कर रहे हैं. अमरीकी सरकार की तरफ से बताया गया कि पिछले दस वर्षों में अमरीका पाकिस्तान को बीस अरब डालर की मदद कर चुका है.

गिरीशजीअमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट में विकिलीक्स का ताजा खुलासा प्रकाशित हुआ है कि सीरिया के राष्‍ट्रति बशर अल असद को कुर्सी से हटाने के लिए अमेरिका ने वहां असद विरोधी सशस्त्र प्रदर्शनकारियों को साठ लाख डालर की मदद की है. यही नहीं, लंदन में 2009 में एक नए टीवी चैनल 'बराडा' को भी शुरू कराने में मदद की, जो असद विरोधी खबरों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रसारित करे. वैसे तो ये सब राष्‍ट्रपति बुश के समय से जारी था, लेकिन इसे बराक ओबामा के समय भी जारी रखा गया. यहां दिलचस्प ये है कि एक ओर सीरिया में सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों को वाशिंगटन मदद कर रहा है तो दूसरी ओर वह सीरिया से रिश्ते सुधारने का दिखावा भी कर रहा है.

शेषजीमिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक की विदाई का वक़्त करीब आ पहुंचा है. लगता है अब वहां ज़ुल्मों-सितम के कोहे गिरां रूई की तरह उड़ जायेंगे. विपक्ष की आवाज़ बन चुके संयुक्त राष्ट्र के पूर्व उच्च अधिकारी मुहम्मद अल बरदेई ने साफ़ कह दिया है कि होस्नी मुबारक को फ़ौरन गद्दी छोड़नी होगी और चुनाव के पहले एक राष्ट्रीय सरकार की स्थापना भी करनी होगी. पिछले तीस साल से अमरीका की कृपा से इस अरब देश में राज कर रहे मुबारक को मुगालता हो गया था कि वह हमेशा के लिए हुकूमत में आ चुके हैं. लेकिन अब अमरीका को भी अंदाज़ लग गया है कि होस्नी मुबारक को मिस्र की जनता अब बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है. तहरीर चौक पर जुट रहे लोगों को अब किसी का डर नहीं है. राष्ट्रपति मुबारक फौज के सहारे राज करते आ रहे हैं, लेकिन लगता है कि अब फौज भी उनके साथ नहीं है. तहरीर चौक में कई बार ऐसा देखा गया कि अवाम फौजी अफसरों को हाथों हाथ ले रही है. यह इस बात का संकेत है कि अब फौज समेत पूरा देश बदलाव चाहता है.

गिरीशजी: अरब जगत में अमेरिकी स्वार्थ : अरब जगत में बह रही लोकतंत्र, मानवाधिकार और आजादी की हवा के प्रति अमेरिका जैसी बडी ताकतों का रुख सिर्फ जैसे-तैसे अपने हितों को साधने का है या उन्हें वाकई जनता के जम्हूरी हकों को लेकर चिंता है? यह सवाल अहम इसलिए हो जाता है, क्योंकि पिछले दिनों अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने लीबिया में बमबारी रोकने के मोअम्मर गद्दाफी के अनुरोध पर साफ कहा कि अब गद्दाफी को तुरंत सत्ता ही नहीं छोड देनी चाहिए, बल्कि अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर निकल जाना चाहिए. हिलेरी का यह दिलचस्प बयान सिर्फ गद्दाफी के प्रति उनकी मंशा की ही अभिव्यक्ति नहीं है, यह बताता है कि पूरी अरब दुनिया में अमेरिकी अगुवाई में पश्चिमी खेमे का रुख सिर्फ अपने स्वार्थ पर निर्भर है, जिसमें लोकतंत्र, आजादी और मानवाधिकारों की बात तो सिर्फ ऊपरी मुलम्मे के तौर पर है.

मदन कुमार तिवारीदुनिया के बहुत सारे मुल्कों में भ्रष्ट सता के खिलाफ़ आंदोलन चल रहा है। चीन के थ्येन आन चौक पर पहली बार हजारों-लाखों नौजवानों की भीड़ प्रजातंत्र की स्थापना के लिये उमड़ी थी, शक्तिशाली चीन ने सैनिक ताकत की बदौलत उसे दबा दिया। सैकड़ों निर्दोष जेल में डाल दिये गये। चीन की बढ़ती सैनिक एवं आर्थिक ताकत के भय से प्रजातंत्र की रहनुमाई करने वाले दुनिया के सभी देशों ने खामोश रहकर या प्रतीकात्मक विरोध दर्ज करा कर चीन के दमन को ताकत प्रदान करने का काम किया। किसी ने भी चीन में स्थित अपने राजदूतावास को बंद करने की हिम्मत नही जुटाई। तर्क था कि यह चीन का घरेलू मामला है, आपके पडोसी के घर में हत्या हो रही हो और आप खामोश रहें क्योंकि पड़ोसी का मामला है। समरथ को नहीं दोष गुसाई- लेकिन चीन में आवाज खामोश नहीं हुई। आज भी हर साल सैकड़ों विद्रोह स्थानीय स्तर पर चीन में हो रहे हैं। थोड़ी देर होगी लेकिन प्रजातंत्र वहां बहाल होगा।

गिरीशजी : दलाई लामा की नैतिक पहल : दलाई लामा सुर्खियों में हैं. लंदन के 'गार्जियन' अखबार में बारबरा ओब्रायन का लेख छपा है. शीर्षक है 'दलाई लामा ने कदम पीछे खींचे हैं, लेकिन हटाए नहीं हैं.' लेख उनका सियासी अवकाश लेने संबंधी उनके बयान के संदर्भ में है. दरअसल तिब्बती विद्रोह की 52वीं वर्षगांठ पर उन्होंने यह कहकर हलचल पैदा कर दी है कि अब निर्वासित तिब्बतियों के राजनीतिक नेतृत्व की व्यवस्था और भी ज्‍यादा लोकतांत्रिक होनी चाहिए और सत्ता या शक्ति का हस्तांतरण प्रवासी तिब्बतियों की संसद, प्रधानमंत्री और अन्य में होनी चाहिए. हालांकि दलाई लामा पहले भी ऐसी बातें कहते रहे हैं. पिछले सितंबर में भी 75 वर्षीय इस तिब्बती नेता ने जब ऐसा कहा था तो खुद तिब्बती समुदाय द्वारा ही विरोध हुआ था.

अंचल सिन्‍हा : मेरी विदेश डायरी 7 : बचने के लिए दी जा रही स्‍थानीय युवती को अपने घर में रखने की सलाह : इस समय पूरे उगांडा में चुनाव का माहौल है और सारे के सारे उम्मीदवार अपने-अपने चुनाव क्षेत्र में डेरा जमाए हुए हैं। लेकिन सबसे ज्यादा भय के माहौल में इस समय यहां रहने वाले तमाम बाहरी लोग हैं, खासतौर से भारतीय। 26 जनवरी को जब कंपाला में भारतीय दूतावास में भारत के उच्चायुक्त नीरज श्रीवास्तव भारतीय ध्वज फहराने के बाद यहां रहने वाले भारतीयों को संबोधित कर रहे थे तब भी उन्होंने बस इतनी जानकारी दी कि पहली बार उगांडा में कंपाला के पास के छोटे से शहर जिंजा में भारतीय सेना के तीन बड़े अधिकारी आए हैं। उन्होंने साफ साफ तो कुछ नहीं कहा, पर बार-बार यह जरुर बताते रहे कि भारत और उगांडा में बहुत अच्छे संबंध हैं और यहां के महामहिम मुसोविनी भारतीयों को पूरी-पूरी सुरक्षा देने का बार-बार आश्वासन देते रहते हैं। पर इसके एक दिन पहले अमरीकी सरकार ने भी अपने लोगों से अपील की थी कि वे फिलहाल उगांडा में घूमने जाने से परहेज करें।

अंचल सिन्‍हा: मेरी विदेश डायरी 8 : दंगा कराने की साजिश रच रहे हैं विरोधी : वैसे तो उगांडा में प्रेसिडेंट का चुनाव हो चुका है और उम्मीद के अनुसार मुसोविनी एक बार फिर अगले पांच बरस के लिए चुन लिए गए हैं। उन्हें 68 फीसदी से ज्यादा वोट मिले और उनके प्रमुख विरोधी डा. बिसिजे को केवल 26 फीसदी। लेकिन सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन विरोधी नेताओं को केवल 1 फीसदी या 0.6 फीसदी वोट मिले वे चार नेता एक मंच पर आकर इस पूरी चुनाव प्रक्रिया को नकार रहे हैं। इन चारों नेताओं के वोट प्रतिशत जोड़ भी दें तो वह 5 फीसदी भी नहीं बनता। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग, न्यायालय और उगांडा की पुलिस ने मिलकर मुसोविनी के पक्ष में काम किया और जोरदार गड़बड़ी की है।

महेंद्र प्रसाद: इंटरव्यू : महेंद्र प्रसाद रूदी रामधनी (सूरीनाम में सूर्य कुंभ आयोजन समिति के अध्‍यक्ष) : दक्षिण अमेरिकी देश सूरीनाम में 14 जनवरी से सूर्य कुंभ पर्व का आयोजन किया जा रहा है। इसका उद्घाटन वहां के राष्ट्रपति देसी बोतरस करेंगे। देश की राजधानी पारामारीबो में सूरीनाम नदी के तट पर आयोजित होने वाले इस कुंभ मेले का समापन 18 फरवरी को होगा। देश के इतिहास में इस प्रकार के मेले का आयोजन पहली बार हो रहा है। इसको लेकर सूरीनाम के अलावा त्रिनिडाड, अमेरिका, नार्वे, फ्लोरिडा, नीदरलैंड आदि देशों के हिंदुओं में काफी उत्साह है। इस पर्व में भारत और सूरीनाम सहित दुनिया के सैंकड़ो विद्वान हिस्सा लेंगे। इस संदर्भ में नई दिल्ली में “विश्व हिंदू वॉयस” न्यूज वेब-पोर्टल से जुड़े पवन कुमार अरविंद ने सूरीनाम में “सूर्य कुंभ पर्व आयोजन समिति” के अध्यक्ष महेंद्र प्रसाद रूदी रामधनी से दूरभाष पर बातचीत की है। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश-

मध्य-पूर्व एशिया के अधिकतर मुस्लिम राष्ट्रों में इस समय तानाशाही के विरोध और लोकशाही के समर्थन में प्रचंड बयार चल रही है. टयूनिशिया और मिस्र में जनता सफलता के झंडे लहरा चुकी है. दोनों देशों के तानाशाहों ने जनाक्रोश के सम्मुख सर झुकाते हुए शासन जनता को सौंप दिया है. जबकि मोरक्को, सूडान, जॉर्डन, लीबिया, बहरीन, यमन और अल्जीरिया आदि में लोकशाही के समर्थन में जनता प्रदर्शन कर रही है. असंतोष की खबरें सउदी अरब से भी आ रही हैं.ये असंतोष किसी त्‍वरित घटना के फलस्वरूप नहीं पैदा हुआ है बल्कि वर्षों से शांत पड़ा ज्वालामुखी था, जो फूट पड़ा.

श्रीराजेशबीते सप्ताह मैं बिहार में था. वहीं मेरे एक अंतरंग मित्र मुझसे मिलने आएं. बातचीत के क्रम में उन्होंने अपने हाल के नेपाल टूर के बारे में बताया और वहां मोबाइल से लिए गए कई फोटोग्राफ्स दिखाए, साथ कुछ वीडियो क्लीप भी दिखाया. मेरे उस मित्र के बदले यदि कोई दूसरा उन फोटोग्राफ्स या वीडियो को दिखाता तो मैं निश्चित तौर पर कहता कि ये सभी फोटोग्राफ्स या वीडियो बिहार के ही किसी गांव के हैं. लेकिन मैं जानता था कि मेरे मित्र वास्तव में नेपाल गए थे और मोबाइल से तस्वीरें लेना उनका शौक है. उसी वीडियो क्लीपिंग में मैंने कुछ महिलाओं को छठ का गीत गाते हुए समूह में बढ़ते देखा. ये दृश्य नेपाल के चितवन जिले के तेजापुर के तालाब के किनारे का था. इसी तरह एक और क्लीपिंग में प्यार हो गइल ओढ़निया वाली से... गीत पर थिरकते नेपाली किशोर दिखे, उन्होंने बताया कि यह दृश्य रौतहट जिले के रघुनाथपुर में एक पान की दुकान के सामने का है. दरअसल, भारत-नेपाल का संबंध सिर्फ एक पड़ोसी मुल्क का ही नहीं है और न ही दोनों देशों में बीच केवल सांस्कृतिक साझापन ही है, बल्कि बहुत कुछ अनकहा, अनदेखा और अनछुए अनुभव, भावनाएं हैं जो दोनों देशों को एकाकार करते हैं. बावजूद इस एकात्मकता के कभी-कभी कुछ अवारा हवाएं बहुत कुछ हिला जाती हैं, लेकिन उखाड़ नहीं पाती.

गिरीशजी: ट्यूनीशिया, मिस्र के बाद अब किसका नंबर : मध्य-पूर्व में लोकतंत्र की आंधी चल रही है. मिस्र और ट्यूनीशिया में सत्ता शिखर के दो टीले ढह चुके हैं, अन्य कई ढहने के कगार पर हैं. जनता उत्साह में है. वो हर हाल में आगे बढना चाहती है- उसे आजादी से कम कुछ भी स्वीकार नहीं. 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ अनेक समाजवादी देशों में भी ऐसी ही जम्हूरी हवा चली थी, जब देखते-देखते काफी कुछ बदल गया था. तब भी जनता इसी तरह खराब आर्थिक व्यवस्था, भ्रष्टाचार-कुशासन-बेरोजगारी की मुखालिफत में और खुली-उदारवादी आजादी की मांग करते हुए सडकों पर उतर गई थी और सारे लौह आवरण छिन्न-भिन्न हो गए थे. सब कुछ ताश के पत्ते की तरह बिखर गया था. तब भी नया उभरता मध्य वर्ग बदहाल जनता का नेतृत्व कर रहा था और आज भी पश्चिमेशिया और उत्तरी अफ्रीका के अरब देशों में यही तबका नेतृत्वकारी भूमिका में है.

नूतन“हाय, बाल-यौन शोषकों. फिर मिलेंगे”- ये शब्द हैं निकोली सरकोजी के. वे आज कल गुस्से में हैं. जी हाँ, इन दिनों उनको बहुत अधिक गुस्सा आ रहा है क्योंकि अपना राज़ खुल जाने या अपनी बात पब्लिक में आ जाने पर गुस्सा करने का हक केवल भारत के नेताओं को नहीं है, फ़्रांस के इस चर्चित राष्ट्रपति को भी है. और स्वाभाविक तौर पर यह गुस्सा उतरता है, सबसे लाचार, सबसे कमजोर और बेचारे पत्रकारों पर- क्योंकि इन पत्रकारों को तो ऐसे “बड़े” लोगों की खबर छापनी ही है, इनकी बात सुननी ही है, इनके प्रेस कांफ्रेंस में शामिल होना ही है. आखिर “बड़े” आदमी हैं- लोग इनके बारे में जानना चाहते हैं और इन्हें कवर करना मजबूरी है. इसके बाद ये लखनऊ में जैसे शाही इमाम ने सरे-आम प्रेस कांफ्रेंस में एक पत्रकार को पीटा वैसे पीटें या जैसा सरकोजी ने खुले-आम गरिआया वैसे गरियायें जायें. तभी तो पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में नाटो (नोर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) की एक मीटिंग में गए सरकोजी ने सीधे-सीधे यह इल्जाम लगा दिया कि पत्रकार “बाल-यौन शोषक” होते हैं. जी हाँ, अब उसी सरकोजी को, जिन्हें कुछ साल पहले इन्हीं बेवकूफ पत्रकारों ने फ़्रांस और दुनिया में परिवर्तन के प्रतीक के रूप में और एक ताज़ी हवा के रूप में हाथों-हाथ लिया था, अब ये पत्रकार बाल-यौन शोषक लगने लगे हैं.

 

शेषजीकाहिरा के तहरीर चौक पर आज लाखों लोग जमा हैं और हर हाल में सत्ता पर कुण्डली मारकर बैठे तानाशाह से पिंड छुडाना चाहते हैं. जहां तक मिस्र की जनता का सवाल है, वह तो अब होस्नी मुबारक को हटाने के पहले चैन से बैठने वाली नहीं है लेकिन अमरीका का रुख अब तक का सबसे बड़ा अड़ंगा माना जा रहा है. बहरहाल अब तस्वीर बदलती नज़र आ रही है. शुरुआती हीला-हवाली के बाद अब अमरीका की समझ में आने लगा है कि मिस्र में जो जनता उठ खड़ी हुई है उसको आगे भी बेवक़ूफ़ नहीं बनाया जा सकता. अब लगने लगा है कि अमरीकी विदेशनीति के प्रबन्धक वहां के तानाशाह होस्नी मुबारक को कंडम करने के बारे में सोचने लगे हैं. यह अलग बात है अभी सोमवार तक विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन इसी चक्कर में थीं कि मिस्र में सत्ता परिवर्तन ही हो. यानी अमरीकी हितों का कोई नया चौकीदार तैनात हो जाए जो होस्नी मुबारक का ही कोई बंदा हो कहीं.

शेषजीआजकल अमरीका से भारत के रिश्ते सुधारने की कोशिश चल रही है. लेकिन ज़रूरी यह है कि इस बात की जानकारी रखी जाय कि अमरीका कभी भी भारत के बुरे वक़्त में काम नहीं आया है. अमरीका की जेएफके लाइब्रेरी में नेहरू-केनेडी पत्र-व्यवहार को सार्वजनिक किये जाने के बाद कुछ ऐसे तथ्य सामने आये हैं जिनसे पता चलता है कि अमरीका ने भारत की मुसीबत के वक़्त कोई मदद नहीं की थी. भारत के ऊपर जब 1962 में चीन का हमला हुआ था तो वह नवस्वतंत्र भारत के लिए सबसे बड़ी मुसीबत थी. उस वक़्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अमरीका से मदद माँगी भी थी, लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति जॉन केनेडी ने कोई भी सहारा नहीं दिया  और नेहरू की चिट्ठियों का जवाब तक नहीं दिया था. इसके बाद इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद लिंडन जॉनसन ने भारत का अमरीकी कूटनीति के हित में इस्तेमाल करने की कोशिश की थी, लेकिन इंदिरा गाँधी ने अपने राष्ट्रहित को महत्व दिया और अमरीका के हित से ज्यादा महत्व अपने हित को दिया और गुट निरपेक्ष आन्दोलन की नेता के रूप में भारत की इज़्ज़त बढ़ाई. हालांकि अमरीका की यह हमेशा से कोशिश रही है कि वह एशिया की राजनीति में भारत का अमरीकी हित में इस्तेमाल करे, लेकिन भारतीय विदेशनीति के नियामक अमरीकी राष्ट्रहित के प्रोजेक्ट में अपने आप को पुर्जा बनाने को तैयार नहीं थे.