ज्ञान और कल्याण के प्रतीक बाबा साहब अंबेडकर... बाबा साहब अंबेडकर जैसे महापुरूष की जयंती मनाने से अपने आप में गर्वबोध महसूस होता है। अंबेडकर जयंती मनाने में हमें एकदम से डूबना नहीं है, बल्कि बाबा साहब द्वारा बताए गए मार्ग को अनुसरण करना है और उनकी विचारधारा को अनुसरण करने लिए आह्वान करना है। डॉ.अंबेडकर के आदर्शों को आत्मसात करने की जरूरत है। वर्तमान परिवेश में उनका जीवन, विचार और आदर्श अतिप्रासंगिक है। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का जन्म मध्य प्रदेश के महू छावनी कस्बे में 14 अप्रैल,1891 को भीमा बाई तथा रामजी की संतान के रूप में हुआ। वे दलित परिवार के महार जाति में जन्म लिए थे। यह वह समय था जब भारतीय समाज पूरी तरह से वर्ण-व्यवस्था के चंगुल में फंसा हुआ था ऐसी स्थिति में एक दलित बालक का संविधान निर्माता बनना तो दूर, पढ़ना और काबिलियत के बल पर अपने लिए एक नई राह का निर्माण किया।

बालक भीम के बचपन के नायक कबीर थे। कबीर पंथी परिवार होने के कारण कबीर के दोहे, पद और गीत भीम को घुट्टी में मिले थे। उनके पिता धार्मिक और अनुशासन प्रिय व्यक्ति थें, दैनिक उपासना करते थे। पिता रामजी सकपाल का यह प्रभाव बालक भीम पर भी पड़ा। रामजी सकपाल पहले रामानंदी वैष्णव थें बाद में कबीर–पंथी हो गएं। अंबेडकर ने जीवन में स्वयं को कबीर की तरह एक विद्रोही नायक के रूप में पाया। इसका प्रमाण जानने के लिए हमें उनके द्वारा दिए गए मई 1956 के भाषण को पढ़ना चाहिए। अछूत परिवारों में वर्ण-व्यवस्था की पोल खोलने वाले कबीर से बड़ा नायक कौन हो सकता है? सन् 1907 में जब तरुण भीमराव ने मैट्रिक की परीक्षा पास की तब यह किसी अछूत समुदाय से आने वाले युवक के लिये यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी। उस मौके पर मराठी लेखक और समाज सुधारक दादा कृष्णाजी ने भीम राव के पुस्तक प्रेम को देखते हुए उन्हें गौतम बुद्ध पर आधारित मराठी पुस्तक ‘गौतम बुद्ध का जीवन’ की प्रति भेंट की, नि:संदेह युवा अंबेडकर पर बुद्ध का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने पाली की किताबें उन्हीं दिनों पढ़ डाली थीं। उन दिनों बौद्ध धर्म सामाजिक अधिक था धार्मिक कम। बाबा साहब ने अंत में अपनी अंतिम पुस्तक की रचना ‘द बुद्धा एंड हिज धम्म’ को उसी ज्ञान का आधार बनाया। राजकुमार सिद्धार्थ की तरह उनके मन में भी बहुत सारे प्रश्न घुमते रहे, अंततः उन्हें बौद्ध धर्म में जीवन की अंतिम गति दिखाई देती है।

डॉ.अंबेडकर कबीर, रैदास, दादू, नानक, चोखामेला, सहजोबाई आदि से प्रेरित हुए। आधुनिक युग में ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, रामास्वामी नायकर पेरियार, नारायण गुरु, छ्त्रपति शाहूजी महाराज, गोविन्द रानाडे आदि ने सामाजिक न्याय को मजबूती के साथ स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ.अंबेडकर ने कबीर और ज्योतिबा फुले को अपना गुरु बताया और अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'हू वेयर दी शुद्राज' फुले जी को समर्पित किया। अपने समर्पण में 10 अक्टूवर 1946 को डॉ.अंबेडकर में लिखा है कि 'जिन्होंने हिन्दू समाज की छोटी जातियों से लेकर उच्च वर्णों के प्रति उनकी गुलामी की भावना के सम्बन्ध में जागृत किया। विदेशी शासन से मुक्ति पाने में सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना अधिक महत्वपूर्ण है, इस सिद्धांत की स्थापना उस आधुनिक भारत के महान ‘राष्ट्रपिता’ ज्योतिराव फुले ने की।' डॉ.अंबेडकर यह मानते थे कि फुले के जीवन दर्शन से प्रेरणा लेकर ही वंचित समाज मुक्ति पा सकता है।

जॉन ड्युई डॉ.अंबेडकर के अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्राध्यापक थे। ड्युई के साधनावाद के ज्ञान (philosophy of instrumentation) का प्रभाव डॉ.अंबेडकर पर था। ड्युई ने पुराने आदर्शवाद के दर्शन का टीकात्मक विश्लेषण किया है, इसी प्रकार डॉ.अंबेडकर ने भी भारत के धार्मिक दर्शन पर टीका किया। ड्युई के अनुसार शिक्षा विश्व के परिवर्तन का साधन है। इसी तरह जान स्टुअर्ट मिल के विचारों का डॉ.अंबेडकर पर बहुत प्रभाव पड़ा। श्रमिकों के हित की दृष्टि से कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत विचारों का प्रभाव उनपर था। लेकिन मार्क्स तथा डॉ.अंबेडकर के विचारों का मूल अंतर यह था कि शोषण केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक भी होता रहता है। बाबा साहब अंबेडकर अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, शिक्षाशास्त्र तथा कानून के विशेषज्ञ तथा विद्वान थे। उनके ज्ञान और परिश्रम के कारण समाजशास्त्री से लेकर अर्थशास्त्री तक हर कोई कायल था। जब 1920 में डॉ.अंबेडकर कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहें थें, तो अर्थशास्त्री एडविन आर सेलिगमेन ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एल. एस. ई.) में पढ़ाने वाले प्रोफेसर हार्बर्ट फॉक्सवेल को पत्र लिखकर अंबेडकर की पढ़ाई में मदद करने को कहा था।

डॉ.अंबेडकर ने विभिन्न देशों के संविधान का अध्ययन करने के बाद लोकतंत्र की मजबूती के लिए एक ऐसे संविधान का निर्माण किया, जिसमें समाज के सभी लोगों को अधिकार दिए गए। वे केवल दलितों, आदिवासियों या पीछड़ों के मसीहा नहीं हैं, बाबा साहब का संपूर्ण जीवन गरीबों तथा भारतीय समाज विशेषकर हाशिए में जी रहे शोषित वर्ग (स्त्री, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा पीछड़ा वर्ग) के उत्थान, कल्याण और विकास के लिए समर्पित था। डॉ.अंबेडकर की सामाजिक और राजनैतिक सुधार की विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। बाबा साहब ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आज भारत की सोच को प्रभावित किया है। उनकी सोच आज की सामाजिक, आर्थिक नीतियों, शिक्षा, कानून तथा सकारात्मक कार्यवाही के माध्यम से प्रदर्शित होती है।

भारत के भावी भविष्य के लिए शासन-प्रणाली व संविधान के बारे में रूप-रेखा तय करने के उद्देश्य से ब्रिटिश ने साइमन कमीशन की सिफारिश पर गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया। यह सम्मेलन लंदन में 12 नवंबर 1930 को शुरू हुआ। इस सम्मेलन से ब्रिटिश सरकार और भारतवासियों के 89 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। डॉ. अंबेडकर ने इसमें अछूत लोगों के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। यह एक ऐसा समागम था, जिसमें मुख्य विषयों पर अपने विचार प्रकट करने थे और वे नोट किए जाने थे। डॉ.अंबेडकर ने अपनी प्रभावशाली आवाज से अपने भाषण के शुरू में ही कहा कि 'वह ब्रिटिश-भारत की जनसंख्या के पाँचवें भाग का, जो कि इंग्लैण्ड या आयरलैण्ड और स्कॉटलैण्ड की जनसंख्या से भी अधिक है, दृष्टिकोण प्रस्तुत का रहे हैं। इन लोगों की दशा पशुओं से भी गई-गुजरी है।' इंग्लैण्ड के समाचार पत्रों पर भी डॉ.अंबेडकर के भाषण का बहुत प्रभाव पड़ा।

'दि इंडियन डेली मेल’ ने तो यहीं तक प्रशंसा की कि समूची कॉन्फ्रेंस में डॉ.अंबेडकर का भाषण सर्वोत्तम भाषण था। उस भाषण का प्रभाव तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री मिस्टर रैमजे मैकडोनाल्ड पर भी अच्छा पड़ा। अब समाचार पत्रों और राजनीतिज्ञों ने दलित वर्ग और डॉ.अंबेडकर की ओर अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया। डॉ.अंबेडकर ने इस गोलमेज कॉन्फ्रेंस की अवधि के दौरान लन्दन में रहते हुए मौके का भरपूर सदुपयोग किया। उन्होंने समाचार पत्रों को लेख भेजे, सभाएं की व प्रमुख ब्रिटिश नेताओं से मिले। बाबा साहब के कठोर परिश्रम का फल यह निकला कि समस्त विश्व को ज्ञात हुआ कि भारत के अछूतों की दशा वास्तव में बहुत चिंतनीय है। कई अंग्रेज नेताओं का ह्रदय भी पिघल गया। लॉर्ड सेंकी ने वायदा किया कि दलित वर्गों को भारत के अन्य निवासियों के समान रखा जाएगा। डॉ.अंबेडकर ने मांग की कि दलित वर्गों को दूसरे नागरिकों के समान नागरिक अधिकार दिए जाएं, कानून में प्रत्येक प्रकार का भेदभाव व उच्च-नीच एकदम समाप्त किए जाएं। दलित वर्गो को विधानसभाओं में अपने प्रतिनिधि अपने लोगों द्वारा स्वयं चुनने की छूट हो और दलित वर्गों को सरकारी नौकरियों में पूर्ण प्रतिनिधित्व दिया जाए और कर्मचारियों की भर्ती और नियंत्रण के लिए सार्वजनिक सेवा आयोग स्थापित किए जाएं। गोलमेज सम्मेलन मे डॉ.अंबेडकर ने जो भाषण दिए व अपनी मांगें रखीं, भारत मे उनकी प्रतिक्रिया होने लगी। इसके पश्चात् ही सरकार ने पुलिस विभाग में दलित वर्गों के लिए भर्ती खोल दी।

दलितों के धर्मांतरण को लेकर अंबेडकर और गाँधीजी के बीच तो तीखा मतभेद था उसके मूल में थी इन दोनों महापुरूषों की अपनी-अपनी प्राथमिक प्रतिबद्धताओं की पारस्परिक टकराहट। गाँधीजी हिंदू धर्म में रहकर जातिगत भेदभाव मिटाना चाहते थे पर वर्ण-व्यवस्था खत्म नहीं करना चाहते थे। वे जाति-व्यवस्था को पारंपरिक व्यवस्था और कार्य पद्धति से जोड़ कर देखते थे। गाँधीजी चाहे स्वयं को संपूर्ण भारत का प्रतिनिधि कहते थे किंतु अंबेडकर उन्हें दलितों का प्रतिनिधि मानने के लिए तैयार नहीं थे। वे उन्हें शंकराचार्य के बाद दूसरा सबसे बड़ा हिंदू हित रक्षक बताते थे। और आगे चलकर दलितों के पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के मुद्दे पर अंबेडकर ही सही साबित हुए क्योंकि गाँधीजी अछूतों को किसी भी कीमत पर भी हिंदू धर्म में पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के रूप में किसी प्रकार का विभाजन नहीं देख सकते थे। दलितों के लिए अंग्रेज सरकार द्वारा प्रस्तावित पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के खिलाफ ब्रिटिश प्रधानमंत्री को आमरन अनशन के अपनी निर्णयगत अडिगता की सूचना देते हुए गाँधीजी कठोर चेतावनी देते हैं कि 'आप बाहर के आदमी हैं अत: हिंदुओं में फूट डालने वाले ऐसे किसी भी मसले में कोई हस्तक्षेप न करें। दलित वर्गों के लिए यदि किसी पृथक निर्वाचन मंडल का गठन किया जाना है तो वह मुझे ज़हर का ऐसा इंजेक्शकन दिख पड़ता है, जो हिंदू धर्म को तो नष्ट करेगा ही, साथ ही उससे दलित वर्ग का भी रंचमात्र हित नहीं होगा। आप मुझे यह कहने की अनुमति देंगे कि भले ही आप कितनी भी सहानुभूति रखते हों, पर आप संबद्ध पक्षों के लिए ऐसे अति महत्वपूर्ण तथा धार्मिक महत्व के मामले पर कोई ठीक निर्णय नहीं ले सकते।’ स्पष्ट है कि गाँधीजी के लिए दलितों का हित दूसरे स्थान पर था, उनकी पहली प्राथमिकता थी हिंदू धर्म को तथाकथित सर्वनाश से बचाना जबकि अंबेडकर अपना पहला दायित्व दलितों का कल्याण और उत्थान चाहते थे। उन्हें हिंदू धर्म की वर्ण-व्यवस्था को खत्म करना था जोकि सामाजिक असमानता का मूल कारण है। अंबेडकर हिंदू जाति-व्यवस्था द्वारा दलितों पर लादे अलगाव को और तदजन्य हीन भावना से दलितों को छुटकारा दिलवाने का एक मात्र रास्ता धर्म परिवर्तन को पाते थे बशर्तें कि अपनाया जाने वाला नया धर्म दलितों के साथ हिंदू धर्म में जारी तमाम प्रकार के बहिष्कार, बेरूखी और पूर्वाग्रहों से मुक्त हो।

पुरूष सत्तात्मक समाज ने सबसे ज्यादा कठोर, उत्पीड़नकारी, शोषणकारी और अन्यायपूर्ण रहा है क्योंकि यह नारी को सभी मूलभूत अधिकारों से वंचित कर उसे नारकीय जीवन जीने पर मजबूर करता है जबकि आर्यों के समाज में स्त्री और शूद्रों को एक ही स्थिति में रखा जाता था। शिक्षा के अधिकार से भी उन्हें वंचित रखा जाता था। परिवर्तनवादी समाज व्यवस्था के प्रणेता डॉ.अंबेडकर ने देश का क़ानून मंत्री रहते हुए स्त्री-शिक्षा और समान अधिकार को समाज में स्थापित करने के लिए विधिवत हर संभव प्रयास किया। वे नारी शिक्षा, स्वतंत्रता, समानता तथा अस्मिता के प्रबल समर्थक थे। जोतिबा फुले की ही तरह इन्होंने सबसे अधिक जोर स्त्री-शिक्षा पर दिया क्योंकि शिक्षा ही वह रास्ता है जिससे होकर अपने अधिकारों को पाया जा सकता है और पितृ सत्तात्मक व्यवस्था तथा संस्था से मुक्ति भी पाया जा सकता है। स्त्री की दशा ही किसी देश की दशा, प्रगति और उन्नति निर्धारित करती है। अतः डॉ.अंबेडकर का मानना था कि शिक्षा ही प्रगति और उन्नति का मार्ग खोल सकती है, शिक्षा ही सामाजिक क्रान्ति का पहला कदम है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय  भी स्त्रियों की दशा काफी दयनीय थी। संपत्ति में उनका कोई अधिकार नहीं था, बहुपत्नी विवाह स्त्रियों को नारकीय जीवन जीने पर बाध्य करता था, पति द्वारा परित्याग कर दिए जाने पर उसके गुजर-बसर का कोई साधन न होता था। डॉ.अंबेडकर भारतीय स्त्रियों की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक स्थिति में परिवर्तन चाहते थे। वो एक ऐसा क़ानून बनाना चाहते थे जो स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक और कानूनी स्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन कर सके। इसलिए उन्होंने स्त्रियों के अधिकार के लिए ‘हिन्दू कोड बिल’ बनाया, जिसके कारण कई बार उन्हें व्यक्तिगत रूप से अपमानित भी होना पड़ा। स्त्रियों की प्रगति के लिए उठाए गए इस कदम को विरोधों का सामना करना पडा। इस बिल में आठ अधिनियम बनाए गए थे जो इस प्रकार हैं-'1.हिन्दू विवाह अधिनियम 2.विशेष विवाह अधिनियम 3.गोद लेना दत्तक ग्रहण अल्पायु संरक्षता अधिनियम 4.निर्बल तथा साधनहीन परिवार के भरण-पोषण अधिनियम 5.हिन्दू उत्तराधिकारी अधिनियम 6.अप्राप्त व्यय संरक्षण सम्बन्धी अधिनियम 7.उत्तराधिकारी अधिनियम और विधवा विवाह को पुनर्विवाह अधिनियम 8.पिता की संपत्ति में अधिकार अधिनियम।' संविधान ने स्त्रियों को हर वो अधिकार दिया जिससे मनुवादियों ने उसे वंचित रखा। पुरूष प्रधान भारतीय समाज पर आघात करते हुए यह बिल भारतीय महिलाओं को पुरूषों के बराबार कानूनी और सामाजिक अधिकार के मांग पर आधारित था।

हिन्दू कोड बिल के तहत किसी भी जाति की लड़की या लड़के का विवाह होना अवैध नहीं था। इस कोड के अनुसार पति और पत्नी एक समय में एक ही विवाह कर सकते है। कोई भी पति पहली पत्नी के और कोई भी पत्नी पहले पति के रहते दूसरा विवाह अगर करे तो दंडनीय अपराध माना जाएगा, पति के गुजर जाने पर पत्नी को उसकी संपत्ति में संतान के बराबर हिस्सा मिलेगा, पिता की संपत्ति में पुत्रियों को भी पुत्रों के समान अधिकार दिया जाएगा। विधवाओं के लिए दूसरे विवाह का प्रावधान, पति के अत्याचार से पीड़ित पत्नी के लिए तलाक का प्रावधान, और तलाक देने की स्थिति में पति को पत्नी के गुजारा भत्ता देने का प्रावधान, महिलाओं को बच्चे न होने पर अपनी मर्जी से बच्चा गोद लेने का प्रावधान इत्यादि परन्तु दुर्भाग्यवश कुछ कट्टरपंथियों के कारण यह बिल संसद में पारित न हो सका और डॉ.अंबेडकर ने क़ानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। वर्तमान समय में महिलाओं को पुरूषों के समान जो शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक और समस्त अधिकार प्राप्त हैं इसका श्रेय ‘हिन्दू कोड बिल को जाता है क्योंकि बाद में हिन्दू कोड बिल कई हिस्सों में बंटकर संसद में धीरे-धीरे पारित होने लगा। इस बिल के कई प्रावधानों को संसद में दूसरी सरकारों ने पास कराकर अपना वोट बैंक बनाया। सदियों से जिस अधिकार से स्त्रियाँ अछूती थीं, उससे संविधान ने ही अवगत कराया। नारी स्वतंत्रता, अस्मिता और सम्मान के लिए बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में कई प्रावधानों को सुनिश्चित किया। डॉ.अंबेडकर की ही देन है कि भारतीय क़ानून का प्रारूप बदला और उसमें मानवीयता प्रसार हो पाया।    

लेखक आनन्द दास वर्तमान में ए.जे.सी. बोस कॉलेज, कोलकाता में अतिथि प्रवक्ता हैं। कोलकाता से प्रकाशित होने वाली 'अग्निगर्भा पत्रिका' के सहायक संपादक हैं। आनन्द दास की हिन्दी में 'मणिकर्णिका' का समाजशास्त्रीय अनुशीलन पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। साथ ही हिन्दी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आनन्द दास की रचनाएं निरन्तर प्रकाशित होती हैं।
संपर्क- 4 मुरारी पुकुर लेन, कोलकाता-700067, ई-मेल- This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it., 7003871776, 9804551685