सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय का सिद्धांत ही मायावती के लिए सुखमयकारी, राजनीतिक शक्ति हासिल करने क लिए अच्छा रहेगा। मनुवाद का अत्यधिक रक्तरंजित विरोध नुकसानकुन है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि रक्तरंजित हिन्दू विरोध से भी मायावती नुकसान में ही रहेगी। इसलिए कि दलित और पिछडों की अधिकतर जातियां और लोग हिन्दुत्व से आज भी जुडे हुए हैं। अत्यधिक और रक्तरंजित हिन्दू विरोध से अगडी और वैश्य जातियां ऐसे भी मायावती के विरोधी रही हैं। मायावती को अब हिन्दुत्व आधारित रक्तरंजित विरोध की राजनीति छोडनी चाहिए।

विष्णुगुप्त

कोई एक जाति के भरोसे सत्ता हासिल नहीं कर सकता है, कोई एक समूह के बल पर सत्ता हासिल नहीं कर सकता है, कोई एक जाति और एक समूह के बीच उफान पैदा कर  व रक्तरंजित घृणा फैला कर सत्ता हासिल नहीं कर सकता है, सत्ता हासिल करने के लिए दूसरी जाति और दूसरे समूहों के बीच से समर्थन हासिल करना जरूरी है। यह बात और यह समीकरण बार-बार चुनावों में साबित हो रहे हैं पर भारतीय राजनीति में अभी कुछ ऐसे राजनीतिज्ञ है और कुछ ऐसी राजनीतिक पार्टियां जो बार-बार मात खाने के बाद भी समझने के लिए तैयार नहीं है। उदाहरण के लिए मायावती को लिया जा सकता है, मायावती को इस कसौटी पर देखा जा सकता है।

अभी-अभी उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में मायावती को भारी हार मिली है, मायावती की सारी खुशफहमियां जमींदोज हो गयी, दलित और मुस्लिम वोट बैंक के सहारे सत्ता पर फिर हासिल करने के उसके सपने टूट गये हैं। फिर भी मायावती वास्तविकता को समझने और अपनी राजनीतिक प्रवृतियों को बदलने के लिए तैयार नहीं है, सही रूप सर्वजन शक्ति को वह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। भडकाउ वयान देना, जनमत की कसौटी को नकारना उसकी एक ऐसी प्रवृति है जो कभी रूकती नहीं है बल्कि आत्मघाती बन कर मायावती पर ही कहर बरपाती है। क्या यह सही नहीं है कि मायावती अपनी हार को स्वीकार करने की जगह इबीयम को दोष मढ रही है? क्या यह नहीं है इबीएम आधारित वोट पर ही मायावती 2007 में सत्ता हासिल की थी? लोकतंत्र में हार को भी शालिनता के साथ स्वीकार करने की परमपरा रही है। पिछला लोकसभा चुनाव परिणाम भी एक संदेश था, एक सबक था फिर मायावती ने उस संदेश को न सुनने का काम किया और न समझने की गलती दोहरायी। आपको याद होना चाहिए कि पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मायावती को एक भी सीट नही मिली थी, लोकसभा में मायावती की पार्टी का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। अगर मायावती ने लोकसभा चुनावों के परिणामों को देख कर नयी रणनीतियां बनाती और उफानवाली मनुवाद विरोध का झुनझुना बजाने की जगह वास्तविक रूप से दलितों की भलाई करने वाली रणनीतियां आगे रखती तो शायद मायावती चुनौतीपूर्ण राजनीतिक शक्ति निर्मित कर सकती थी।

समाज में उफान पैदा करना आसान है,समाज में वैचारिक आग लगना आसान है, समाज को हिंसक बनाना आसान है, समाज में घृणा पैदा करना आसान है, समाज में वैचारिक आग लगा, घृणा पैदा कर प्रचार तो पाया जा सकता है और राजनीतिक रोटियां तो सेकी जा सकती है, पर निर्णायक और अपराजित शक्ति नहीं बनायी जा सकती है। यह सही है कि दलितों का जितना उत्पीडन हुआ है, दलितों पर जितना अत्याचार हुआ है, दलितों का जितना अपमान हुआ है उसकी कोई सीमा नहीं बतायी जा सकती है, दलित आज भी किसी न किसी रूप में अपमानित हो रहे हैं और हाशिये पर ही खडे हैं। पर यह कहना भी सही नहीं है कि भारतीय समाज बदला नहीं है, दलितों के प्रति सोच नहीं बदली है? भारतीय समाज बदला है, दलितों के प्रति सोच में बदलाव आया है, पुरानी रूढियां टूट रही हैं, आर्थिक शक्ति भी एक यक्ष प्रश्न रहा है। आरक्षण और राजनीतिक शक्ति के कारण दलितों के प्रति सोच बदली है। आरक्षण के कारण दलित भी संपन्न हुए हैं, ताकतवर हुए हैं और राजनीतिक शक्ति निर्मित होने के कारण भी दलित ताकतवर हुए हैं, दलितों के खिलाफ होने वाले अपराधों में इसी दृष्टिकोण से कमी आयी है। इस सच्चाई को स्वीकार किया जाना चाहिए। पर मायावती जैसी मानसिकता इस सच्चाई को कभी स्वीकार करती ही नहीं है। यह भी सही है कि राजनीतिक शक्ति से और आरक्षण की शक्ति से सभी दलितों को लाभ नहीं हुआ है, दलितों का बहुत बडा भाग आरक्षण और राजनीतिक शक्ति से मिलने वाले लाभ से वंचित हैं। बहस इस बात पर हो सकती है। पर इस प्रश्न पर बहस होती नहीं। अगर बहस होगी तो दलितों का एक हिस्सा जो अधिकतर दिलतों के अधिकार मार कर बैठा है वह बेपर्द हो जायेगा।

प्रमाणित और निर्णायक तौर पर मायावती न तो काशी राम हैं और न ही भीमराव अबेडकर हैं। काशी राम और भीम राव अंबेडकर को दौलत नहीं चाहिए थे, संपत्ति से इन्हें कोई मोह नहीं था। इनकी केवल इच्छा दलितों की उन्नति और उत्थान था,  जिनके लिए ये लडे। काशी राम पार्टी और संगठन में आये पैसे कार्यकर्ताओं के बीच वितरित करते थे। इसलिए काशी राम के प्रति दलितों का सम्मान जारी है। अबेडकर कहा करते थे कि सिर्फ उफान पैदा करने से और गाली देने से मात्र से दलितों का उत्थान नहीं होगा, उन्नति नहीं होगी। वे रचनात्मक कार्य पर ज्यादा केन्द्रित थे। पढने-लिखने और योग्य बनने की शिक्षा अंबेडकर देते थे। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि दलितो के अंदर की रूढियों पर भी अंबेडकर चोट करते थे। दलित में सिर्फ मायावती की ही जाति नहीं है, दलितों के अंदर में कई जातियां है। निर्णायक और प्रमाणित तौर कहा जा सकता है कि दलित की सभी जातियों में कोई विशेष परस्पर संबंघ नहीं है, शादियां तक नही होतीं हैं। दलित की कई जातियां एक-दूसरे को कमतर और अक्षूत मानती हैं। यह विसंगतियां और असमानता राजनीतिक शक्ति से दूर नहीं हो सकती है बल्कि इसके लिए अबेंडकर जैसी रचनात्मक सक्रियतां से दूर हो सकती है। दलितों के बीच आज रचनात्मक कार्य कहा हो हो रहा है। सिर्फ और सिर्फ दलितों को उकसा कर राजनीतिक रोटियां सेकी जा रही हैं। दलितों को अगडों और पिछडों से लडाने का राजनीति कार्य जारी है। बदले की भावना कितना मूर्खतापूर्ण कार्य है यह कौन नहीं जानता है।

मात्र मनुवाद रक्तरंजित विरोध से मायावती को कभी सत्ता हासिल नहीं हो सकती है। मायावती ने कभी खुद यह स्वीकार कर लिया है पर फिर भी वह मनुवाद विराध मात्र पर अडिग रहती है। 2007 में मायावती को जो सत्ता मिली थी वह सत्ता सर्वजन सुखाय और सर्वजन हिताय के सिद्धांत पर मिली थी। विकल्प का भी अभाव था। मुलायम की सत्ता तब अराजक थी और भाजपा खुद कमजोर थी। तब मायावती ने मुस्लिम, दलित और ब्राम्हण गठजोड के बल पर सत्ता हासिल की थी। उस समय मायावती के पास पूरा बहूमत था। उसकी सरकार पांच सालों तक चली थी। उसकी कोई लंगडी सरकार नहीं थी। इस लिए कोई बहाना नहीं था कि उसके पास पूर्ण बहूमत नहीं था और उसकी सरकार लगडी थी। इसलिए काम करने का अवसर नहीं मिला। वह चाहती तो दलितों की तस्वीर बदल सकती थी। दलित अपना उत्थान कर सकते थे और अपने आप को शक्तिशाली बना सकते थे। दलितों के नाम और दलितों की शक्ति पर राजनीति करने वाली और सत्ता में बैठने वाली मायावती ने अपने पांच साल के शासनकाल में कुछ विशेष नहीं किया था। सरकारी नौकरियों में जो दलितों की नौकरियां खाली थी उसको भी भरने का कार्य नहीं हुआ था। अगर मायावती ने सरकारी नौकरियों में खाली जगहों पर दलितों की नियुक्तियां करा दी होती तो आज दलित शक्तिशाली होते। पर मायावती भी दलितों पर राजनीति करती है। मायावती भी यह नहीं चाहती है कि दलित भी शक्तिशाली बनें। अगर दलित भी शक्तिशाली बन गये और पूर्ण रूप से जागरूक हो गये तो फिर मायावती की दौरतवादी मानसिकता भी संज्ञान में आ जायेगा। मायावती भी इसी कारण दलितों को पिछडा देखना चाहती है और उत्पीडित होते हुए देखना चाहती है।

सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय का सिद्धांत ही मायावती के लिए सुखमयकारी, राजनीतिक शक्ति हासिल करने क लिए अच्छा रहेगा। मनुवाद का अत्यधिक रक्तरंजित विरोध नुकसानकुन है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि रक्तरंजित हिन्दू विरोध से भी मायावती नुकसान में ही रहेगी। इसलिए कि दलित और पिछडों की अधिकतर जातियां और लोग हिन्दुत्व से आज भी जुडे हुए हैं। अत्यधिक और रक्तरंजित हिन्दू विरोध से अगडी और वैश्य जातियां ऐसे भी मायावती के विरोधी रही हैं। मायावती को अब हिन्दुत्व आधारित रक्तरंजित विरोध की राजनीति छोडनी चाहिए।

विष्णुगुप्त
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