होली अंक के लिए व्यंग्य  ...

एक भइया था । उसकी एक मइया थी, इसीलिए सब लोग उसे मइया वाला भइया पुकारते थे । मइया को अपना भइया बहुत प्यारा था । उसे सदैव अपने आंचल में छुपाये रखना चाहती थी । मगर भइया था बहुत चंचल । घर में तनिक टिकता ही न था । जब मर्जी आती फॉरेन ट्रिप मार आता । मइया वाला भइया था नटखट । साइकिल देख उसका मन मचल उठा । बोला- मइया, साइकिल चाहिये । मैं भी गद्दी पर बैठूंगा । बेटा लॉलीपॉप मांगता तो मां दिला भी देती, साइकिल कहां से  दिलाती । मइया समझाती रही मगर वो न माना । बालहठ ... मइया हो गई मजबूर।

उधर, एक भइया था । उसके पास मइया न थी, एक साइकिल थी । साइकिल में थे दो पहिये इसलिए सभी उसे कहते पहिया वाला भइया । उसे यह नाम बहुत पसंद था । जब भी कोई उसे इस नाम से बुलाता वह खुश हो जाता । उछल कर गद्दी पर बैठ जाता और साइकिल की घंटी बजाने लगता । इधर-उधर साइकिल दौड़ाया करता ।

एक दिन किसी शरारती ने उसकी साइकिल में छेड़छाड़ कर दी । पहिया वाला भइया सहम गया- कहीं कोई उसकी साइकिल हथिया न ले । उसे यह डर सताने लगा । पहिया वाला भइया चिंतित हो उठा ।
पहिया वाले भइया के कान में किसी ने मंत्र फूंक दिया-- एक मइया वाला भइया भी है जो बिल्कुल तुम्हारी तरह की सपने देखता रहता है । रंगीन और खुशनुमा सपने । गद्दी पर बैठने के सपने पर उसके पास साइकिल नहीं है । अपनी मइया से रोज ज़िद करता रहता है- गद्दी पर बैठने की।

पहिया वाला भइया था चतुर । साइकिल पंक्चर होने का था डर । सोचा- एक से दो भले, दोस्ती कुछ काम आयेगी, साइकिल पंक्चर होने से बच जाएगी । उठा लिया मोबाइल, मइया वाले भइया से बतियाने लगा । ये सिलसिला चल निकला । मइया वाले भइया को गद्दी चाहिये थी और पहिया वाले भइया को साइकिल में धक्का लगाने वाला एक बंदा ।

दोनों में दोस्ती हो गई  जैसे एक वीरू और दूसरा जय । दोनों साथ मिल कर राग छेड़ने को तैयार हो गये । बोल थे अनमोल मगर धुन थी बेसुरी । मइया वाले भइया ने एक म्यूजिक मास्टर ढूंढ लिया । भइया की मइया ने थैली खोल दी, बोली- कोई अच्छी धुन बनाओ । ऐसा गीत बनाओ कि देश-प्रदेश में भइया के जयकारे गूंज उठें । मइया ने सालों तक जयकारे सुने थे । सन्नाटा उसे खाता था, जयकारा सुनना बहुत भाता था । म्यूजिक मास्टर जुट गया । छक के पी और पी के एक धुन बना दी । मइया खुश हो गई, चलो लड़का कुछ काम से तो लगा ।

काम चल निकला मगर पहिया वाले भइया का बप्पा बिगड़ गया । बोला- ये क्या किया नालायक । मैं जिंदगी भर उसके खानदान को कोसता रहा, गरियाता रहा । तभी जोड़-जाड़ कर ये साइकिल बन पायी । आज जिस पर तू इठलाता है, गद्दी पर बैठ कर मौज उड़ाता है । क्यों उससे दोस्ती की पेंग बढ़ा रहा है, मेरी इज्जत पर धब्बा लगा रहा है । अब अगर तू थामेगा किसी दूसरे का हाथ तो फिर मैं नहीं दूंगा तेरा साथ । ला, मेरी साइकिल मुझे लौटा दे ।

पहिया वाला भइया हो गया था सयाना । अपने ही बप्पा की शिकायत थानेदार से कर दी । थानेदार था ज्ञानी । जानता था जिसके पास पहिया होता है, साइकिल भी उसी की होती है । उसने साइकिल भइया को सौंप दी ।

दोनो भइया साइकिल की सवारी को तैयार हो गये । मइया वाले भइया ने पहिया वाले भइया से ऐंठ कर कहा- एक पहिया मेरा । पहिया वाला भइया भी अकड़ गया- ये नहीं हो सकता । इधर खींचतान होने लगी, उधर बैकग्राउंड म्यूजिक बजने लगा - ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे ... । दोस्ती टूटते-टूटते बची ।

अब मइया वाले भइया का हाथ था हैंडिल पर और पहिया वाले भइया का पैर था पैडल पर । दोनों साथ-साथ घूमने लगे । दोनों भइया गा रहे थे-  बात बन गई बात भइया, बात बन गई बात । जनता में लाखों-करोड़ों मइया और भइया हैं । जनता जानती है - ये दोस्ती जय-वीरू वाली दोस्ती नहीं है, ये तो गद्दी-गद्दी का खेल है । जनता ने मार दी लात, साइकिल गिरी धड़ाम, एक इधर गिरा - दूसरा उधर । ये तो होना ही था ।  

Dhiraj Singh
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