-निरंजन परिहार-
शीला दीक्षित ने राहुल गांधी को साफ साफ अपरिपक्व कहने के बाद भले ही अपने शब्दों को तोड़ – मरोड़ कर पेश करने की बात कही हो, लेकिन असल में माना जा रहा है कि शीला दीक्षित ने राहुल गांधी से उस बात का बदला ले लिया है, जिसमें राहुल गांधी ने उन पर सहारा से पैसे लेने का आरोप लगाया था। दरअसल, राहुल गांधी ने लोकसभा में जब भूकंप आने की बात कहकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सहारा से पैसे लेने का आरोप लगाने के सबूत के तौर पर जो कागज दिखाए थे, उनमें शीला दीक्षित का नाम भी था। अब इसे राहुल गांधी का बचपना नहीं तो और क्या कहा जाए कि उन्होंने जो सबूत दिखाए थे वे साफ साफ बताते हैं कि अगर मोदी ने गुजरात के सीएम रहते हुए सहारा से कोई धन लिया था, तो शीला दीक्षित ने भी दिल्ली की सीएम रहते हुए सहारा से करोड़ों रुपए लिए थे। देश में तो कोई भूचाल नहीं आया, लेकिन उल्टे कांग्रेस पर दाग जरूर लग गए।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि शीला दीक्षित ने संभवतया राहुल गांधी के उसी भूचाल लानेवाले बयान से हुई खुद की बदनामी का बदला ले लिया है। बाद में शीला दीक्षित ने कह दिया कि राहुल के अपरिपक्व होने की उनकी बात को गलत तरीके से मीडिया ने पेश किया है, और यह भी कह दिया कि राहुल गांधी बहुत परिपक्व नेता है। मगर देश कैसे माने कि राहुल एक परिपक्व नेता है। क्योंकि जब से उन्होंने कांग्रेस की कमान हाथ में ली है, तब से ही पार्टी रसातल की तरफ बढ़ती जा रही है।

देश देख रहा है कि कांग्रेस का कबाड़ा हो रहा है। सीटें घच रही है, और कांग्रेस की गरिमा भी मिट्टी में मिलती जा रही है। लगातार हार पर हार हो रही है, और राहुल गांधी उसे बचाने में नाकामयाब साबित हो रहे हैं। फरवरी 2017 के शुरू होते ही ओडीशा में कांग्रेस की करारी हार हुई। अब मुंबई में भी बुरी तरह से हार गई, और महाराष्ट्र में तो पूरी तरह से हारी। दस साल पहले जिस मुंबई शहर ने कांग्रेस को अपनी छह में से सभी छहों सीटें लोकसभा में जीत कर दी थीं, उसी मुंबई में महानगर पालिका चुनाव में कांग्रेस  का सूपड़ा साफ हो गया है। महाराष्ट्र में निगम चुनावों में सिर्फ मुंबई को छोड़कर नौ में से आठ प्रमुख नगर पालिकाओं में भी बीजेपी ने कांग्रेस पर जबरदस्त जीत दर्ज की है। मगर, कांग्रेस कहीं नहीं है। सब जगहों पर तीसरे नंबर पर, और कहीं कहीं तो चौथे और पांचवे नंबर पर रही। राहुल गांधी को समझना पड़ेगा। या यूं भी कहा जा सकता है कि राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से समझदार होना पड़ेगा। अगर, नहीं हुए तो कांग्रेस रसातल में चली जाएगी। रसातल के रास्ते की शुरूआत बहुत पहले ही हो चुकी थी। ताजा नतीजे बरबादी के अपने असली मुकाम की तरफ बढ़ने के संकेत दे रहे हैं।

कांग्रेस के लिए यह मुंबई का बदला हुआ मिजाज है। एक जमाना था, जब मुंबई और महाराष्ट्र कांग्रेस के बहुत मजबूत गढ़ था। खासकर मुंबई में काम के लिए अन्य प्रदेशों से आए हुए लोग और मुसलमान कांग्रेस की असली ताकत हुआ करते थे। लेकिन मुसलमानों का एक बहुत बड़ा तबका इस बार कांग्रेस का साथ छोड़कर शिवसेना के साथ हो लिया। मुसलमान बहुल पोलिंग बूथ पर हुए मतदान का गहराई से अध्ययन करें, तो साफ नजर आता है कि जहां पर मुसलमान उम्मीदवार था ही नहीं, या था तो जीतने की हालत में नहीं था, वहां मुसलमानों ने बीजेपी को भी वोट दिया और शिवसेना को भी। मगर कांग्रेस से दूरी बनाए रखी। यहां तक कि कांग्रेस के परंपरागत ईसाई मतदाताओं ने भी शिवसेना को भी वोट दिया और बीजेपी को भी। मगर कांग्रेस की तरफ देखा तक नहीं। मुंबई में एक बहुत बड़ा कांग्रेसी मतदाता पारसी भी है, जो पिछले लोकसभा चुनाव से नरेंद्र मोदी के राजनीतिक उत्थान के साथ ही बीजेपी का दामन थाम लिया था। महाराष्ट्र में कांग्रेस कहीं तीसरे तो कहीं चौथे और पांचने नंबर पर खिसक गई है। ताजा नतीजों से साफ लग रहा है कि महाराष्ट्र में और खासकर मुंबई में कांग्रेस को फिर से उभरने के लिए के लिए कांग्रेस और कांग्रेसियों को बहुत मेहनत करनी होगी। लेकिन कांग्रेस के नेता इस बात को समझे तब न।

मुंबई महानगर पालिका में बीजेपी ने पहली बार अकेले दम पर लड़ते हुए कुल 227 में से 82 सीटें हासिल की हैं। शिवसेना ने 84 सीटें जीती। बीजेपी शिवसेना से सिर्फ दो सीटों से पीछेरही जबकि कांग्रेस को केवल 31 सीटें हासिल हुईं। शर्मनाक हार के बाद मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष संजय निरुपम ने इस्तीफा दे दिया। तो कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने कहा – निरुपम कांग्रेस को जिताना ही नहीं चाहते थे। राणे बोल तो ऐसे रहे थे, जैसे वे ठाणे में कांग्रेस को बहुत इज्जत दिलवाकर लौटे हों। दरअसल, नारायण राणे जिस ठाणे महानगर पालिका चुनाव के प्रभारी थे, वहां तो कांग्रेस की सबसे शर्मनाक हार हुई है। ठाणे की कुल 131 सीटों में से कांग्रेस को केवल 3 सीट ही मिली है। फिर बी राणे निरुपम को गलत छहरा रहे थे। यह कांग्रेस के अंतर्कलह का अलग आईना है। इसी तरह उल्हासनगर महानगरपालिका में भी कुल 78 सीटों में से बीजेपी को 32 और कांग्रेस को केवल 1 सीट पर जीत मिली है। इसी तरह से नागपुर में 151 में से बीजेपी को 108 और कांग्रेस को केवल 29 सीटें ही मिली है। पुणे में तो कांग्रेस की हालत और भी खराब रही। वहां की कुल 162 सीटों में से बीजेपी को 98 सीटें मिलीं, मगर कांग्रेस को सिर्फ 9 सीट पर ही संतोष करना पड़ा है। महाराष्ट्र में बाकी महानगरपालिकाओं के आंकड़े भी कांग्रेस के लिए बहुत शर्मनाक रहे हैं। इसी तरह का कुछ सिर झुका देनेवाला हाल जिला परिषदों में भी रहा है। इससे पहले 14 फरवरी को ओडिशा में स्थानीय निकायों के चुनाव नतीजों में में बीजेपी सत्तारूढ़ बीजू जनता दल के बाद दूसरे नंबर पर आई। बीजेपी ने कांग्रेस को तीसरे नंबर पर धकेल दिया है। जिला परिषद की 188 सीटों के लिए हुए पहले चरण के चुनाव में बीजू जनता दल ने 96 सीटें जीतीं,  जबकि बीजेपी को 71 सीटों पर कामयाबी मिलीं, मगर कांग्रेस को सिर्फ 11 सीटें ही मिल पाईं। बीजेपी ने कालाहांडी जैसे दुरूह इलाके में भी कांग्रेस को धूल चटाते हुए सभी 9 जिला परिषद सीटें जीतीं हैं।

राहुल गांधी से अब और कितनी एवं क्या उम्मीद की जाए। कांग्रेस देश भर में सिमटती जा रही है और वे गठबंधन करके कांग्रेस पार्टी को बढ़ाने की कोशिश में और कमजोर किए जा रहे हैं। यूपी में अगर समाजवादी पार्टी की साइकिल को कांग्रेस का हाथ धक्का नहीं देता, तो कांग्रेस की ताकत दिखती। यूपी का रिजल्ट आएगा, तो देश देखेगा कि समाजवादी पार्टी के सामने कांग्रेस किस दयनीय अवस्था में जीत कर खड़ी है। देश की राजनीति को समझनेवाला कोई अदना सा कार्यकर्ता भी जानता है कि उधार की बैसाखियों पर सवार होकर राजनीति की कोई रेस नहीं जीती जाती। बूढ़ी शीला दीक्षित की बात पर भरोसा करके अगर मान भी लें कि राजनीतिक रूप से राहुल गांधी सचमुच एक परिपक्व व्यक्ति हैं, तो उनको यह समझ में आना चाहिए। लेकिन राहुल गांधी को पता नहीं, राजनीति का यह झमेला समझ में आता भी है या नहीं, इस पर अपन को तो शक है। शायद आप भरोसा करते हों, तो पता नहीं !

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)