पार्टी के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गया कोई वहां गया। ये मुआ चुनाव का सीजन ही ऐसा होता है। एक समय में यह रोग हमारे क्रिकेट खिलाड़ियों में था। वे "क्रीज " आते ही चले जाते थे। ऐसे खिड़लियों को ही नहीं भारतीय क्रिकेट टीम का नाम ही " आया राम - गया राम हो गया था। बहरहाल, अब इस रोग ने भारतीय राजनीति को ही अपनी चपेट में ले लिया है।सिर्फ और सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टियों को छोडकर शायद ही ऐसी कोई पार्टी हो जो इस महामारी से बची हो। जिस तरह साढ़े चार साल तक सभी पार्टियां धर्म और जाति निरपेक्ष होतीं हैं तो इनके नेता पार्टी के अंध'भक्त चुनाव करीब आते ही ये कुलबुलाने लगते हैं। पार्टियां सर्च लाइट (जमाना चिराग का जो नहीं रहा, लेकर " जिताऊ (टिकाऊ) उम्मीदवार तलशने लगतीं हैं और हमारे जनप्रतिनिधि मजबूत पार्टी और सीट की। साढ़े चार साल (इसलिए कि चुनाव पांच साल पर होते हैं) प्रतिद्वंद्वी पार्टी को पानी पी-पीकर कोसने वाले उसी पार्टी में ओलिया जाते हैं।

कमाल कि बात यह है कि सारे के सारे दूसरी पार्टी में जनहित के ओलियाते हैं। शायद ही कोई ऐसा बहादुर नेता/माननीय/नुमाइंदा हो जो यह कहे कि " हम जनहित में नहीं अपने हित के लिए पाला बदल रहे हैं या बदला है। कांग्रेस से जनसंघ में इनके आजा गये थे तो जनहित में गये थे और अब ये भाजपा में जा रहे हैं तो जनहित में। ऐसे तमाम नेता तमाम लोगों की याद में समाये हुए होंगे जो जनहित में कांग्रेस, भाजपा, जपा, सपा, सजपा, लोद-रालोद, जद-जदयू डीएमके-एआईडीएमके की यात्रा कर चुके होंगे। कई तो कई दलों में डुबकी लगाने के बाद उतराये। कुछ तो ऐसे "सूरमा " हैं जो हर दल में मुंह मार आयें है। जब जिसकी सत्ता रही उसमें समा गये।

ऐसे ही एक माननीय हैं उत्तर प्रदेश के बड़े राजघराने के युवराज संजय सिंह कांग्रेस से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की विभिन्न पार्टियों से होते हुए फिर कांग्रेस में आ गये। शायद इन्होंने भी जनहित में कांग्रेस से गये, फिर भाजपा और सपा में वो भी जनहित में फिर वापस कांग्रेस में आ गये । अब जनहित में ही आये होंगे। अब ये सवाल नहीं करूंगा कि जब हर पार्टी में मुंह पिटाकर कांग्रेस में आना ही था तो फिर गये क्यों थे । एक  टीवी के गुरु जी हैं सिद्धू पा-जी। भाजपा से कांग्रेस में आये तो उन्होंने बताया कि वे "पैदायशी" कांग्रेसी हैं। अब वे कांग्रेस के किस कार्यालय में पैदा हुए थे ये नहीं बताया। अगर वे भाजपा से कांग्रेस में आते तो पता ही नही चलता उनकी पैदाइश का। आजकल एक और फैशन हो गया है " घरवापसी " का। चुनावी बयार में तमाम ऐसे नेता टपकेंगे तो टपकते ही कहेंगे कि " मेरी तो घरवापसी " हुई है।

हां तो मैं यह कह रहा था कि पाला बदलने वाले नेता सारी पार्टियां जनहित में बललते हैं। सारे काम जनहित में करते हैं। मुझे लगता हैं कि ये हम बिस्तर होते होंगे तो अपने हित में नहीं जनहित में।
हमारे नेता जनहित में पार्टियां बदलते रहे हैं और बदलते रहेंगे। इसके लिए ये नहीं हम जिम्मेदार हैं। दल बदलने वाले नेता को हम जिताते आयें हैं, जब तक हम ऐसे दलबदलुओं को जिताते रहेंगे तब तक ये दल बदलते रहेंगे। अगर हम ऐसे नेताओं को जिताना बंद करें तो पार्टियां भी इन्हे घास नहीं डालेंगी और अगर हम इन्हें जिताते रहे तो ये कब्र से निकल कर दल बदल लेंगे।
आखिर तीन बार यूपी और एक बार उत्तराखंड के सीएम रह चुके नब्बे सज अधिक उम्र के नारायण दत्त तिवारी अपने जैविक पुत्र को लेकर भाजपा के दरवाजे पर क्यों गये ????????

अरुण श्रीवास्तव
देहरादून
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