प्रधानमंत्री जी, ये सब लोग जो काम धंधे छोड़ कर लम्बी लम्बी लाइनों में लगे हैं, चुप चाप सब सह रहे हैं, वो इसलिए कर रहे हैं क्यूँकि उन्हें भारत के प्रधानमंत्री के नाम की संस्था पर विश्वास है। लेकिन आप क्या कर रहे हैं। आप उनके विश्वास से खेल रहे हैं । आप पूरे देश को लाइन में खड़ा कर के music कॉन्सर्ट में चुटकुले सुना रहे हैं, रैलियॉ कर रहे हैं। आप लगातार कह रहे हैं, आप के मंत्री कह रहे हैं कि कैश नहीं, कार्ड से पेमेंट करो। जाओ और कार्ड से ख़रीदारी करो । लेकिन कार्ड स्वीकार करने की सुविधा किसके पास है । पूरे देश में छः करोड़ छोटे दुकानदार हैं, रहड़ी वाले हैं, पटरी वाले हैं, घर घर जा कर दूध और सब्ज़ी बेचने वाले हैं। वो तो कार्ड नहीं ले सकते। आपने एक ही झटके में पूरे देश को मजबूर कर दिया है कि समान बड़ी बड़ी दुकानों से, शोरूम से, शॉपिंग माल से ही सब ख़रीदारी हो । माना अडानी, अम्बानी, रामदेव, बिग बाज़ार जैसे बड़े बड़े पूँजीपति आप के सगे हैं, आपका दिल उन्हीं के लिए धड़कता है, लेकिन ये अधिकार आप को किसने दिया कि ग़रीब दुकानदारों के पेट पर लात मार कर उनके ग्राहक अमीरों को सौंप दें । भारत का प्रधानमंत्री पूँजीपतियों का एजेंट नहीं हो सकता ।

भारत गाँवों में बसता है, शहरी बस्तियों में रहता है। व्यापार करता है । भारत का आम आदमी मेहनत से कमाता है और इज़्ज़त से जीना चाहता है। उसके पास तो काला धन नहीं था । उसके पास अपनी मेहनत का पैसा है । कैश में था क्यूँकि कैश में खर्च करना न तो ग़ैर क़ानूनी था, न ही मना था। लेकिन आप ने एक झटके में उन सबको बेईमान मान लिया । आज सब भाग भाग कर तीस प्रतिशत से पचास प्रतिशत रेट पर अपने पुराने नोट बदल रहे हैं। खुले आम बदल रहे हैं । हर आदमी की कमाई का तीस से पचास प्रतिशत पैसा काले धन में बदल रहा है । इस नए काले धन को अब सफ़ेद बनाने का रास्ता भी दे दिया है, लेकिन आप लोगों को समझा रहे हैं कि काला धन ख़त्म हो रहा है! ख़त्म नहीं हो रहा है , आपने आम आदमी को भ्रष्टाचार करने पर मजबूर कर दिया है । और इस पर कोई रोक भी आप नहीं लगा रहे हैं । आख़िर क्यूँ? क्या आप की मंशा सिर्फ़ हंगामा खड़ा करने की है, हालात बदलने की नहीं है?

और ये पैसा जमा कहाँ हो रहा है? जो बारह या तेरह लाख करोड़ रुपया बैंकों में जमा होगा, बैंक उस पर ब्याज कैसे देंगे? ज़ाहिर है कि बैंक रातों रात तो इस पैसे को निवेश नहीं कर देंगे । नए प्रोजेक्ट बनने में, पारित होने में सालों नहीं तो महीनों का वक़्त तो लगेगा। तब तक बैंक इस पैसे से कोई कमाई नहीं कर पाएँगे। क्या बैंकों की आर्थिक हालत और क्षमता बचत के इस भारी भरकम बोझ को सहने में समर्थ होगी? कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि बैंकों को बचाने के लिए सरकार को आदेश देना पड़े कि इस बचत पर ब्याज नहीं मिलेगा? क्या सरकार देश को आश्वासन देगी कि चाहे जो हो, लोगों की इस जमा पूँजी पर ब्याज पर कोई ख़तरा नहीं है ?

प्रधानमंत्री जी ख़ुद कह रहे हैं कि इस पैसे से बैंक नए प्रोजेक्ट फ़ाइनैन्स कर सकेंगे । इस पर कोई मतभेद हो ही नहीं सकता । शक इस नीति पर नहीं है, नीयत पर है । क्या देश को बताया जाएगा कि इस नयी जमापूँजी से अडानी, अम्बानी के प्रोजेक्टों को कितना मिलेगा । पाँच सौ करोड़ होगा, हज़ार करोड़ होगा, दस हज़ार करोड़ होगा या एक लाख करोड़ होगा । देश को ये जानने का हक़ है कि आपके सगे साथी पूँजीपतियों को बैंक से मिलने वाले धन की अधिकतम सीमा क्या होगी, क्यूँकि ये पैसा देश के लोगों की पाई पाई से जुड़ कर जमा हुआ है । ये सरकार का पैसा नहीं है, आम जनता का पैसा है । अभी पिछले हफ़्ते ही आपने स्टेट बैंक औफ इंडिया से आपने अडानी की कम्पनी को साढ़े छः हज़ार रुपए से ज़्यादा का क़र्ज़ दिया है । जनता को ये बताना चाहिए कि जब ये पैसा बैंक उन्हें और दूसरे बड़े बड़े पूँजीपतियों को देंगे तो ये डूबेगा नहीं, तो ये NPA नहीं होगा या NPA बना कर माफ़ नहीं होगा । बैंक अगर डूबते हैं तो लोगों की पीढ़ियों की कमाई डूब जाती है। दुनिया ने आठ साल पहले देखा था कि कैसे अमरीका, यूरोप में लोग रातों रात ग़रीब हो गए थे, कैसे उनकी प्रॉपर्टी, उनकी ज़मीन जायदाद कौड़ियों के भाव रह गयी थी । इसलिए सरकार की ये ज़िम्मेदारी है कि देश को गारंटी दे कि जो पैसा उनसे लोगों से लिया है, नोटबंदी के नाम पर जमा किया है, वो सुरक्षित है, कि जब वो निवेश होगा तो डूबेगा नहीं, NPA नहीं होगा और मंदी की चपेट से बचा रहेगा ।

और मंदी का ख़तरा दिखायी दे रहा है । आज पूरे देश में आपने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं, कि तमाम ख़रीदारी ठप्प है । लोगों को बैंकों से जो रुपए मिल भी रहे हैं, लोग उन्हें ख़र्च नहीं रहे हैं, बचा कर रख रहे हैं। कोई भी ग़ैर ज़रूरी चीज़ें नहीं ख़रीद रहा है । बिक्री बंद है । समान बिके का नहीं तो नया समान बनेगा कैसे। और नया सामान बनेगा नहीं तो मज़दूरों की, कारीगरों की, ट्रांसपोर्टरों की, व्यवसायियों की ज़िंदगी रुक जाएगी। आज पूरे देश में उत्पादन चैन बंद होने का ख़तरा है । डेली वेज वाले मज़दूर और कारीगर ख़ाली बैठे हैं । होल्सेलर और रीटेलर किसी के पास काम नहीं है । और एक बार अगर उत्पादन चेन रुक जाती है, तो अर्थव्यवस्था पर उसका दूर तक असर आता है । आपके मंत्री कहते हैं कि ये मंदी सिर्फ़ तीन महीनों की है, अर्थशास्त्री कह रहे है कि ऐसी अव्यवस्था कभी देखने को ही नहीं मिली और असर सालों तक  रह सकता है ।

यही नहीं, आज किसान ख़ाली बैठा है। उपज है तो बिक्री नहीं है। खेती तैयार है तो कटाई के लिए, ट्रान्स्पोर्ट के लिए पैसे नहीं हैं । ज़मीन बुवाई के लिए तैयार है तो बीज और खाद का कहाँ से ख़रीदें? सत्तर साल लगे इस देश को पूरी दुनिया में खेती में टाप पर पहुँचने में और आपने एक हो झटके में सब रोक दिया? क्या कोई रीसर्च की थी, क्या कोई आकलन किया था कि खेती पर और किसानों पर अभी क्या असर होगा और लम्बे समय में क्या असर होगा। अगर किया है तो वो रिपोर्ट देश के सामने रखें । इस देश में सूचना का अधिकार है । लोगों को बताइए कि आपने क्या नोटबंदी के असर का क्या आकलन किया था । और अगर नहीं किया था, तक क्या बिना सोचे समझे ही देश भर की किसानों को, मज़दूरों को, व्यापारियों को एक अनजाने रास्ते पर धकेल दिया है। ऐसे रास्ते पर, जो कहाँ ले जाए उसका आपको भी पता नहीं है, बस क़िस्मत के भरोसे चल दिए। आपके मन में ख़याल आया, आपको अच्छा लगा और पूरा देश उसमें झोंक दिया।

पूरे देश में अफ़रातफ़री मची है । नोट छपे नहीं हैं। छपे हैं तो बैंकों तक, Atm तक पहुँच नहीं रहे हैं। नोटों का साइज़ बदल दिया और ATM में उसकी व्यवस्था तक नहीं की । पूरे देश में पाँच सौ ग्रामीण ब्लाक मैं किसी बैंक की कोई ब्रांच ही नहीं है । पूरे देश में ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ़ दो हज़ार के क़रीब ATM हैं। जिन सहकारी बैंकों या फ़ाइनैन्स कम्पनियों की पहुँच गाँवों में है, उनपर आपने बैन लगा दिया है। उनमें लोगों का जो पैसा है, लोग ख़ुद ही नहीं निकल सकते। हर दिन कई कई बार वित्त मंत्रालय के निर्देश बदल बदल कर आ रहे हैं। कोई तैयारी नहीं है। कोई प्लान नहीं है। जब जिस घड़ी जो ख़याल किसी ऑफ़िसर के मन में आ रहा है, वही एक नया प्रयोग बन रहा है, लोगों के साथ, उनकी रोज़ी रोटी के साथ, उनके जीवन के साथ बदल बदल कर इक्स्पेरिमेंट हो रहे हैं। क्या देश ऐसे चलते हैं? क्या इसी को व्यवस्था कहते हैं? क्या ये अराजकता नहीं है? देश ने आपको देश चलाने के लिए प्रधानमंत्री चुना था, अराजकता फैलाने के लिए नहीं। लोगों के विश्वास की क़ीमत उनकी बर्बादी नहीं होनी चाहिए । देश के दुश्मनों के ख़िलाफ़ आप कार्यवाही करते हैं तो पूरा देश साथ देता है, लेकिन यहाँ तो दुश्मनों के साथ साथ हर देशवासी को आपने लाइनहाज़िर कर दिया है। हर वो मेहनतकश आदमी, ईमानदार आदमी, जिसने आपको सिर आँखों पर बैठाया था आज पूछ रहा है:

वो तो रक़ीब थे, माना मगर
हम क्यूँ लुटे, जो तेरे अज़ीज़ थे?

छोटे छोटे व्यवसायी भाग भाग कर Paytm में रेजिस्ट्रेशन कर रही है । Paytm जो निजी कम्पनी है, जिसमें चालीस प्रतिशत चीन की कम्पनी अलीबाबा की हिस्सेदारी है । Paytm जिसने नोटबंदी की घोषणा होते ही प्रधानमंत्री की तस्वीर की साथ विज्ञापन छापा था। उस Paytm के क़ब्ज़े में देश के व्यवसाय का कितना हिस्सा जाएगा । और अगर इस क़ब्ज़े के चलते भविष्य में Paytm अपनी सेवाओं के बदले कोई फ़ीस लेने लगे, एक से पाँच प्रतिशत चार्ज लगाने लगे, तो क्या उसे देना सभी लोगों की मज़बूरी नहीं हो जाएगी? चीन के निवेश वाली कम्पनी के हाथों देश की आर्थिक आज़ादी गिरवी रखने की ये कौन से योजना है ? चीन के सवाल पर देशभक्ति के टेस्ट की हुंकार भरने वाले इस पर ख़ामोश क्यूँ है?

आप कह रहे है कि cashless economy बनानी है । यही वक़्त की माँग है । इससे इंकार किसको है । पिछले दस पंद्रह साल में इस दिशा में कितना कुछ हुआ भी है। बैंक, सरकारी विभाग, प्राइवेट कम्पनीयॉ, स्कूल, शोरूम, टैक्स सिस्टम कितना कुछ ऑनलाइन हुआ है, होता जा रहा था। इतना बड़ा मुल्क है, तकनीक भी लगातार विकसित हो रही है, वक़्त लगता है। लेकिन आप एक झटके में करना चाहते हैं। करिए, ज़रूर करिए। लेकिन यह भी बताइए की कार्ड चलाने वाली मशीन POS मशीन कम से कम छः करोड़ दुकानदारों को चाहिए। कितना वक़्त लगेगा इसमें। कब तक छः करोड़ मशीन बन कर लोगों तक पहुँचेंगी । इतने कनेक्शन के लिए बैंकों की क्या तैयारी है। उनका इन्फ़्रस्ट्रक्चर क्या इस लोड के लिए बिलकुल रेडी है? देश को बताइए कि अगले पचास दिन में सब को आप ये दे पाएँगे? अगर नहीं तो बिना तैयारी के क्यूँ यह अराजकता फैलायी?

बताइए। योजना बताइए, तैयारी बताइए, बताइए कि इकॉनमी कहाँ पहुँचेगी कुछ महीनों में, लोगों का क्या हाल होगा आने वाले समय में। GDP में कितनी गिरावट सरकार को मंज़ूर होगी, आधा पर्सेंट , एक पर्सेंट, दो पर्सेंट या और ज़्यादा? बताइए कि आपके इस बिना तैयारी के फ़ैसले की कितनी क़ीमत आपको मंज़ूर होगी? कितने लोगों की मौत के बाद आप विचलित होंगे कि शायद कुछ ग़लत निर्णय हो गया? बताइए, क्यूँकि देश सिर्फ़ बातों से नहीं चलता। बातों से चुनाव जीते जा सकते हैं, बातों से लोगों को जोश दिलाया जा सकता है, बातों से उनके भड़काया भी जा सकता है, लेकिन देश योजना से चलता है। देश सिर्फ़ ख़याली विचार से नहीं, ठोस प्लानिंग से चलता है। देश का प्रशासन किसी मुंगेरीलाल के हसीन सपनों की प्रयोगशाला नहीं है ! देश पर राज करना है तो गम्भीरता से करिए, पढ़े लिखे लोगों को साथ ले कर करिए, अपनी और अपनी मंडली की खामख़याली की क़ीमत देशवासियों पर थोप कर ये मत समझाइए कि बर्बादी का ये रास्ता एक सुनहरी डगर है । सुनिए कि लोग कहने लगे है:

हम एक उम्र से वाक़िफ़ हैं अब न समझाओ
के लुत्फ़ क्या है मेरे मेहरबाँ,और सितम क्या है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.