जिस दिन से नोटबंदी की घोषणा मोदी जी ने की है एकाएक देशभक्तों के साथ ईमानदारों की फौज सोशल मीडिया पर नमूदार हो गई है। हालांकि ये फौज पहले से ही सक्रिय है और हर मुद्दे को देशहित से जोड़कर सवाल पूछने वालों को देशद्रोही और कालेधन का समर्थक बताया जाने लगा है। इन पाखंडियों से यह पूछा जाना चाहिए कि 8 दिसम्बर के बाद ही उनको हरीशचन्द्र की सवारी कैसे आने लगी..? मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसे तमाम लोगों को जानता हूं जो कालेधन पर ही फलते-फूलते रहे और आज भी उनके पाखंड की पोलपट्टी बखूबी खोल सकता हूँ। सवाल यह नहीं है कि मैं खुद को ईमानदार या हरीशचन्द्र बताने का प्रयास कर रहा हूं, मगर इतना तो तय है कि मैं पाखंडी भी नहीं हूं...  अभी कई लोग बड़ी शान से ये दावा कर रहे हैं कि जिन्हें मोदी जी के फैसले से परेशानी हो वे अपने पुराने नोट नहीं बदलवाएं या यह भी कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार की समाप्ति के इस महायज्ञ में वे अपनी आहूति देने को तत्पर हैं और जिन लोगों को कतार में खड़े होने में परेशानी हो रही है उस सूची से भी खुद को अलग मानते हैं।

मेरा सवाल ऐसे लोगों से दो टूक यह है कि उन्होंने इस पुनित कार्य के लिए 8 दिसम्बर तक का इंतजार क्यों किया..?   क्या वे इसके पहले कालेधन का एक गिलास पानी भी नहीं पीते थे और अपनी शत-प्रतिशत कमाई एक नम्बर में ही करते रहे..? इनमें डॉक्टर, इंजीनियर, अभिभाषक, मीडिया से लेकर अन्य वर्गों के साथ-साथ राजनीति से जुड़े लोग भी शामिल हैं। मुझे तो इनकी प्रतिक्रियाएं पढ़कर हंसी भी आती है कि ये कितना अच्छा अभिनय कर लेते हैं। इसमें कोई दो मत नहीं  कि समाज में 100 प्रतिशत ईमानदार लोग भी मौजूद हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार एक आदत के साथ प्रवत्ति का भी नाम है। यही कारण है कि इस कालेधन के महाऑपरेशन के बावजूद अहमदाबाद, भोपाल, उज्जैन में रिश्वत लिए जाने के मामले सामने आए हैं, जबकि भक्तगण यह दावे करते रहे कि 8 नवम्बर के बाद यह पहले ऐसे 10 दिन निकले, जिसमें पूरे देश में किसी ने रिश्वत नहीं ली।

सवाल सीधा और स्पष्ट है कि कालाधन और भ्रष्टाचार समाप्त होना चाहिए और इससे असहमत कतई नहीं हुआ जा सकता, मगर आज  कतार में लगे आम आदमी का मजाक बनाते हुए जो बातें पोस्ट की जा रही है उनको करने वाले खुद कितने दूध के धुले हैं पहले इस सच्चाई को भी जान और समझ लें। मेरा तो यह भी विनम्र निवेदन है कि ऐसे ईमानदार और देशभक्त अपना पूरा लेखा-जोखा भी पोस्ट के साथ संलग्न कर दें। वे बता दें कि आज तक उन्होंने जो चल-अचल सम्पत्ति अर्जित की वह पूरी तरह से एक नम्बर की है और इसका वे शत-प्रतिशत आयकर चुकाते आए हैं। ज्यादा नहीं तो अपनी पिछली तीन साल की आयकर विवरणी ही पोस्ट कर दें।

मुझे पता है इस टिप्पणी के बाद भी ऐसे पाखंडी बाज नहीं आएंगे। हालांकि मेरा अभिप्राय सभी को लेकर नहीं है, उनमें कई वाकई ईमानदार और देशभक्त भी हैं। अभी तो भाजपा और उससे जुड़े संगठन के लोग कूद-कूदकर बता रहे हैं कि उनसे बड़ा कोई ईमानदार है ही नहीं और जो इस मुहिम का विरोध करता है यह सवाल भी पूछ रहा है वह कालेधन का सबसे बड़ा हिमायती है। ममता बनर्जी, अरविन्द केजरीवाल या अन्य जो भी आम आदमी की परेशानी उठा रहे हैं उन्हें भी भ्रष्टों का समर्थक बताया जा रहा है। हालांकि राजनीति में सब जायज है और अगर कांग्रेस की सरकार नोटबंदी का यह निर्णय लेती, तब आप कल्पना कीजिए  कि आज जो लोग इसे देशभक्ति से जोड़ रहे हैं वे खुद छाती-माथा कूटते सड़क से संसद तक नजर आते। इसके प्रमाण में भाजपा की ही नेत्री मिनाक्षी लेखी का वीडिया सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसमें उन्होंने बकायदा पार्टी की प्रवक्ता की अधिवक्ता के रूप में बड़े नोटों का यह कहकर विरोध किया कि इससे आम आदमी परेशान होगा।

अब उसी आम आदमी की बात करने पर भाजपा और उससे जुड़े संगठन के लोग आग-बबूला होने लगते हैं। क्या भाजपा ने अभी तक जितने भी चुनाव लड़े वह 100 प्रतिशत खरी कमाई के बलबूते पर ही लड़े गए..? मैंने तो फेसबुक पर यह सवाल भी पूछा था कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपना खुद का लोकसभा चुनाव और बतौर प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी के जो धुआंधार प्रचार-प्रसार देशभर में किया, उसमें जो करोड़ों रुपए खर्च हुए क्या वे सब सफेद धन के रूप में ही पार्टी को मिले..? आजाद भारत के इतिहास में भाजपा ने पिछला लोकसभा चुनाव सबसे महंगा लड़ा। यह बात जगजाहिर भी है। क्यों नहीं भाजपा आज यह घोषणा करती है कि वह अब एक रुपया भी कालेधन का चंदे के रूप में नहीं लेगी और पाई-पाई का हिसाब जनता-जनार्दन को बताएगी? कालेधन पर रोक लगाने और हजार-पांच सौ के नोट बंद करने की घोषणा के साथ भाजपा को इस आशय की भी घोषणा कर देना थी और खुद को सूचना के अधिकार  अधिनियम के तहत भी लाना चाहिए, ताकि कोई भी आम आदमी पार्टी को मिले चंदे का हिसाब-किताब पूछ सके। कुल मिलाकर बात नो सौ चूंहे खाकर बिल्ली हज को चली वाली ही है। इसमें कम से कम आम आदमी की परेशानी को गम्भीरता से समझा जाए और उसका मजाक न उड़ाएं और आम आदमी की इन परेशानियों से जुड़े सवालों को पूछने वालों को कम से कम कालेधन का समर्थक तो न बताया जाए।

राजेश ज्वेल
वरिष्ठ पत्रकार
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