गुजरात के ऊना में गो हत्या के आरोप में दलितों के साथ मारपीट अक्ष्म्य है। महाराष्ट्र में दलित बालिका से दुराचार अमानवीय है। सिर्फ 15 रूपये के लिए दलित दंपत्ति की हत्या क्रूरतम है। लेकिन इन सबके बीच ‘बिना आमदनी वाले साधन के करोड़ों में खेलने’ और ‘टिकट बेचने की बेहतरीन व्यापारिक प्रतिभा’ के हर आरोप से खुद को दलित की बेटी कहकर बचा लेने के फन में माहिर उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती पर भाजपा नेता दयाशंकर सिंह का बयान देश के बुद्धिवादियों की बैठकों और जाति निरपेक्ष चैनलों के कैमरों के सामने दलित विमर्श के दायरे में कैसे आ गया। मान लिया कि विमर्श भी अपनी सुविधा और सरलता के अनुसार किये जाते हैं तो कभी ‘सवर्ण महिला की इज्जत’ को भी ‘इज्जत’ समझकर ही जोरदार विमर्श में शामिल कर लेने की सुविधा और सरलता की ओर कदम बढ़ाने की जरूरत फिलहाल कब समझी जाएगी।
यह विषय इसलिए भी जरूरी हो जाता है कि दयाशंकर सिंह द्वारा मायावती पर बेहूदा बयान देने की संसद से लेकर सड़क तक भरपूर भर्त्सना के बाद लखनऊ में बसपाइयों ने दयाशंकर की मां, बहन व बेटियों की भरपूर लार टपकाऊ डिमांड की थी। सरलता व सुविधाजनक विमर्श की पत्रकारीय और राजनीतिक परिभाषा के अनुसार ‘दयाशंकर सिंह ने जो कहा वह ‘दलित ऊपर से स्त्री’ मतलब दो मानवीय स्तंभों के आत्म सम्मान पर क्रूरतम अत्याचार था, लेकिन बसपाइयों ने जो किया वह ‘सवर्ण ऊपर से पापी’ मतलब दोहरे अराजक तत्व के निजी परिवार के लिए चेतावनी मात्र थी इसलिए इस पक्ष के लिए संसद से सड़क तक आवाज उठाने की कोई खास जरूरत नहीं। ये प़क्ष अपनी लड़ाई बिना बुद्धिजीवियों के विमर्श के खुद लड़े।

सार निकला कि ‘दलित ऊपर से स्त्री’ की रक्षा संसद, राजनीति और मीडिया सभी करेंगे जबकि ‘सवर्ण ऊपर से अत्याचारी’ की मां, बहन व बेटियां अपनी रक्षा खुद करें। चूंकि वे सवर्ण हैं इसलिए संसद, राजनीति और प्रेस उनकी बर्बादी की जिम्मेदारी कदापि नहीं लेगी। पिछले दिनों की घटनाओं से कुछ अनिवार्य विमर्श निकलकर आयेः

पहला विमर्शः भाषा में अविधा, व्यंजना और लक्षणा का प्रयोग सिर्फ बसपा प्रमुख कर सकती हैं जबकि उन्हें इनसे अलग व ऊपर रखा जाना अनिवार्य है। अब विरोधियों के लिए मायावती जी की भाषा में शालीनता, सभ्यता, भद्रता की शैली व शब्द जो भी खोज सके वह हाथ उठाये।

दूसरा विमर्शः दलित महिला के साथ बलात्कार का कोई बहुत बड़ा और भयावह अर्थ होता है अगर सामने सवर्ण महिला के साथ बलात्कार की घटना खड़ी हो।  दोनों महिलाओं के मन में बलात्कार की पीड़ा भले समान हो लेकिन ‘दलित महिला से बलात्कार’ शीर्षक लगाकर अखबार घटना का वजन बढ़ाते हैं या बिरादरी का खुलासा कर बेइज्जत करते हैं।

तीसरा विमर्शः 15 रूपये के लिए दंपति की कुल्हाड़ी से हत्या राजनीति, प्रेस और संसद के लिए इसलिए क्रूरतम नहीं है कि वह वीभत्स हत्या है बल्कि इसलिए क्रूरतम है कि मृतक दलित हैं। यहां विचार करने की जरूरत खत्म हो गई कि दुकानदार ने हत्या दंपति के दलित होने के कारण की या उससे उधार लेकर चुकाने में आनाकानी कर दूसरी दुकान से उसके सामने ही नगद लेकर उसे चिढ़ाने की मनोविकृति में की। इन हत्याओं के पीछे दलित होना बजह है भी कि नहीं। दलित दुकानदार अगर अन्य जाति के ग्राहक को पीट दे तो सामान्य बात मानी जानी चाहिये। इससे उलट स्थिति ही निंदा व चिंता योग्य मानी जाएगी।

चौथा विमर्शः बलात्कार और अत्याचार को विमर्श योग्य तभी माना जाएगा जब वह दलित पर हो। दलित जातियों के साथ घटनाओं को अत्याचार माना जाएगा जबकि अन्य जातियों पर अत्याचार को आपराधिक घटना और अगर घटना सवर्ण के साथ हो तो उसे ‘बदला’ मान लेने में भी कोई हर्ज नहीं।

अंतिम विमर्शः यहां एक ध्वनि और भी है कि अत्याचार भी जाति और समुदाय के हिसाब से ही भर्त्सना योग्य, क्षम्य और अक्षम्य की श्रेणी में रखे जाएंगे और इन पर उसी हिसाब से विमर्श होगा।

suneel samvedi
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