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यूं ही कोई देश महान नहीं बनता

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बंशीधर मिश्र चीन की समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने कोई एक हफ्ते पहले एक खबर जारी की थी। वहां के दो शहरों के डिप्टी मेयरों को फांसी दे दी गई। झोझियांग प्रांत के हांगझोऊ के पूर्व उपमेयर शू मेइयोंग और जियांगशू प्रांत के सुझोउ के पूर्व उप मेयर जियांग रेंजी को भ्रष्टाचार का दोषी पाए जाने पर मौत की सजा सुनाई गई थी। सजा तीन साल पहले सुनाई गई थी। ऊंची अदालतों में अपील पर अंतिम फैसला आने में इतना समय लगा। 19 जुलाई को उन दोनों की सजा पर अमल हुआ। भ्रष्टाचार के आरोप में वहां फांसी की यह कोई पहली घटना नहीं है। करीब तीन साल पहले चीन में एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री को भ्रष्टाचार का दोषी पाए जाने पर शहर के प्रमुख चौराहे पर सरेआम फांसी पर लटका दिया गया। अर्थात चीन के साम्यवादी शासन में सही मायने में कानून का राज है। भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर वहां की राजनीतिक और न्यायिक व्यवस्था इतनी सख्त है जिसकी भारत में कल्पना ही नहीं की जा सकती।

कोई देश यूं ही महान नहीं बन जाता। विदेशी आक्रांता चंगेज खां ने चीन को अफीमचियों का देश कहा था। मध्य युग में चीन अफीम के नशे के लिए कुख्यात था। भारत विजय से लौटते समय चंगेज ने चीन पर टिप्पणी की थी कि यह देश जब भी नशे से जागेगा, दुनिया को कदमों में झुका लेगा। आज वही हो रहा है। 1949 की साम्यवादी क्रांति के बाद आधुनिक चीन की विकास यात्रा शुरू होती है। वह चार दशक पहले से ही दुनिया की तीसरी महाशक्ति बन गया है। वहां की प्रति व्यक्ति आय भारत से कई गुना ज्यादा है। जबकि 1947 की आजादी के बाद भारत आज तक मोबाइल से लेकर परमाणविक साजोसामान के लिए दूसरे देशों का मुंह ताकता है। लेकिन भ्रष्टाचार के क्षेत्र में भारत का नाम दुनिया की अगली पंक्ति के देशों में शुमार है।

आजादी के 64 सालों बाद आज इस बात पर बहस जारी है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगने के लिए लोकपाल विधेयक बने या न बने, बने तो कौन कौन शख्सियत उसके दायरे से बाहर हों। 'कानून के राज'  की दुहाई देने वाले देश की विधायिकाओं में बीस फीसदी हिस्सेदारी आपराधिक इतिहास वाले 'माननीयों'  की है। मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक लाखों करोड़ रुपयों के घोटालों में आरोपित हैं। किसी के विरुद्ध पहाड़ और धरती खोद डालने के सुबूत मिल रहे हैं, तो कोई जानवरों का चारा-भूसा चट कर जाने का इतिहास समेटे हुए है। कोई 'पत्थरों की देवी'  है, तो कोई 'बालू का देवता'। पैसों के लिए कितनी भी जानें ले लेना उनके लिए हंसी खेल है। नैतिकता, कानून और संविधान मनुष्य की रक्तिम महत्वाकांक्षाओं के गुलाम बन चुके हैं। इसमें और कबीलाई समाज में फर्क क्या है?

दरअसल, सत्ता चाहे जिस भी नाम से जानी जाए, उसकी प्रकृति निरंकुश और हिंसक होती है। ये दुर्गुण उन व्यवस्थाओं में और अधिक विकृत हो जाया करते हैं, जो दर्शन और व्यवहार के दोराहे पर खड़े होते हैं। सत्ता का अधिनायकवादी चरित्र चीन में भी है और भारत में भी। चीन के साम्यवादी दर्शन में सर्वहारा तानाशाही का स्पष्ट प्रावधान है। वहां लोकतंत्र की दुहाई नहीं दी जाती। वहां दर्शन और व्यवहार का द्वंद्व नहीं है। पर लोकतंत्र की दुहाई देने वाले भारत में सत्य, न्याय और समता की स्थापना के लिए उठने वाली आवाजों का सत्ता की तरफ से हिंसक प्रतिकार किया जाए, तो व्यवस्था की प्रकृति और उसके चरित्र पर सवाल उठना लाजिमी है। समाजवादी समाज की स्थापना का संकल्प लेने वाले देश में 80 फीसदी जनता महंगाई, अभाव के दलदल में दम तोड़ दे और एक खासा वर्ग समृद्धि के महासमुद्र में गोते लगाए, तो ऐसे लोकतंत्र का आम आदमी से क्या लेना-देना? चीन के पास जितनी राष्ट्रीय संपत्ति है, उससे कहीं ज्यादा भारत के पास है, फिर आदमी भूख से क्यों मरता है, बेरोजगार खुदकुशी क्यों करता है?

भारत लोकतांत्रिक गणराज्य है। यहां समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष तरीके से शासन चलाए जाने का दावा किया जाता है। पर अकल्पनीय धन विदेशी बैंकों में जमा है। देश में बेनामी संपत्ति का सरकार के पास कोई आकलन ही नहीं है। जबकि देश के कई हिस्सों में भूख से मरने एवं आत्महत्या करने वालों की खबरें अब आम होती जा रही हैं। भ्रष्टाचार लौकिक और राजनीतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। अफसर, नेता और व्यापारी अकूत धन के स्वामी हैं। लाखों करोड़ के घोटाले होते हैं। सरकारी गोदामों के अनाज, अस्पतालों में मरीजों के नाम पर आने वाली दवाइयां ठेकेदारों के हवाले हो जाती हैं। आम आदमी की बुनियादी सुविधाएं छीनकर संपत्ति का हैवानी साम्राज्य खड़ा किया जाता है। विरोध करने वाले ईमानदार अधिकारियों और समाजसेवियों को मौत के घाट उतार दिया जाता है। कानून और अन्य निरोधक संस्थाएं उनके सामने बौनी हैं। सीबीआई और आयकर के हाथ केवल वहीं तक पहुंचते हैं, जहां केंद्र का राजनीतिक प्रायोजन उन्हें इजाजत देता है।

यहां सरेआम हत्याएं होती है। दूसरी तरफ, तस्करी, देशद्रोह, आर्थिक भ्रष्टाचार और हत्या जैसे संगीन अपराधों में संलग्न व्यक्ति विधायिकाओं में बैठकर देश के लिए कानून रचते हैं। अब बहस इस बात पर है कि भ्रष्टाचार और कालेधन को रोकना कानून बने या नहीं। बने तो प्रधानमंत्री, न्यायपालिका और नौकरशाही को उससे बाहर रखा जाए। सवाल है कि ऐसा कानून किसे रोकने के लिए गढ़ा जा रहा है क्लर्कों, चपरासियों, छुटभैये नेताओं और व्यापारियों के लिए? सच तो यह है कि न्याय और जनहित के मुद्दों का पैमाना राजनीति की काली कोठरी में अपनी पवित्रता ही खो चुका है। इस काली कोठरी में सभी दल एक जैसे चरित्र के हैं। विरोध की हर आवाज के दमन का वही तरीका अपनाया जाता है, जो गुलाम भारत में अंग्रेजी हुकूमत अख्तियार किया करती थी। लोकशाही में अधिनायकवादी प्रवृत्ति बढ़ रही है। समाज को बांटकर राज करने की फितरत विदेशी है। आजाद भारत में भी यही हो रहा है। इसका समाधान फिल्मी पर्दों पर तो दिखाई पड़ता है, जहां हर समस्या का काल्पनिक समाधान निकालकर दर्शकों के आंसू पोंछ दिए जाते हैं। पर असली जीवन फिल्मी परदा नहीं है। समाज को अपनी मुक्ति का रास्ता खुद तलाशना होगा।

लेखक बंशीधर मिश्र वरिष्‍ठ पत्रकार और डीएलए, झांसी के संपादक हैं. ये बुंदेलखंड विश्‍वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के निदेशक और विभागाध्‍यक्ष भी रह चुके हैं.

Comments
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kya baat hai
pankaj nayak 2011-08-02 19:51:26

sir kya baat kahi yu hi koi desh mahan nahi banta. bilkul sach hai mahan banne ke liye mahanta ke kam karne hote hain. aaj hamara desh chine aur kai vikshit desho se pichda hai. ye sab humse bahut aage hain. hum usi main khush hain jo hamare paas hai.
bahut achha
anoop tripathi 2011-08-05 12:31:14

sir bahut achha likha hai aapne.... sharm aani chahiye desh ki sarkar ko aur desh par sabse adhik samay tak shasan karne vali party ke bade netaon ko jo mahan hone ki bat karte hain... hamare desh ki sarkar jab aatankvadiyon ko bhi saza dene par rajneeti kar rahi hai to aisi bhrasht sarkar se kya ummid ki ja sakti hai
MichaelKors2 2012-06-19 07:18:58

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