बेचारी चवन्नी, अब अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर है। उसकी मौत की तारीख रिजर्व बैंक ने तय कर दी और अब उसकी उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। बस कुछ ही घंटे शेष बचे हैं चवन्नी के। इसके बाद भले ही बाजार में वह दिख जाए पर चलेगी नहीं। क्योंकि उसकी डेड लाइन फिक्स कर दी गई है, तीस जून। जिस उम्र को बाल बच्चों का परिवार जमाने की उम्र कहा जाता है, उस उम्र में चवन्नी दिवंगत होने की कगार पर है। चवन्नी सिर्फ 54 साल की उम्र में सबका साथ छोडऩे जा रही है।

आज की नौजवान पीढ़ी ने भले ही चवन्नी के दर्शन नहीं किए हों (उन्हें तो सौ का नोट भी छोटा दिखता है) इसलिए वे यह भी जानते कि चवन्नी छाप क्या होता है,  पर चवन्नी को जिन्होंने हाथ में लेकर खूब घुमाया फिराया और बाजार में चलाया, उनसे पूछो कि तब चवन्नी की तू-ती कैसे बोलती थी। चवन्नी का सुख भोखने वाले ही जानते है चवन्नी की कद्र। 1957 के वक्त चवन्नी दुनिया देखी, इसके बाद वह देखते ही देखते लोगों की चहेती बन गई। हिस्ट्री ऑफ इंडियंस क्वाइंस के मुताबिक 1957 में दुनिया देखने वाली चवन्नी का तब वजन ढाई ग्राम गोलाई 19 मिलीमीटर थी। नई मुद्रा पुरानी मुद्रा को बाहर कर देती है, यह अर्थशास्र का नियम है। इसलिए बाजार में जमने के साथ ही छोटे सिक्कों की दम फूलने लगी। उनकी इज्जत कम होने लगी और बाजार में उनका भाव नहीं रह गया।

बाजार में चवन्नी के छा जाने से पहले एक पैसे, दो पैसे, पांच पैसे, दस पैसे और बीस पैसे (तब बीस पैसे का सिक्का पीतल का भी होता था और उस पर कमल बना रहता था) का जलवा था। इन छोटी मुद्राओं में वह सब कुछ आता जो बच्चों को ललचाता था। खूब याद है दस पैसे के राजगिर की तीन लड्डू मिलते थे, वो भी शक्कर के। गुड़ के तो चार भी मिल जाते थे। गटागट की बीस गोलियां मिलती थीं। बेर इतने मिलते थे कि खा-खाकर अघा जाओ पर बेर खत्म नहीं होंगे। संतरे की गोलियां भी स्कूल जाते वक्त खरीदते थे और स्कूल से लौटते वक्त भी साथ में रहती थीं। यदि क्लास में नहीं खाईं तो। एक-दो और पांच पैसे भी बाजार में खूब चलते थे। भिखारियों के दान देने की प्रवृति रखने वाले घर से बाहर निकलते वक्त इन छोटे सिक्कों को जेब में डालना नहीं भूलते थे। ऐसे में अगर भिखारी को किसी ने दान में चवन्नी दे दी तो भिखारी इतना आशीर्वाद देता कि मानों अब अमर हो गए।

ज्यादा पुरानी बात नहीं है यह सब 1972-73 की हैं। जब पैसों का मोल समझा तो चवन्नी की बाजार में चलने की ठसक भी देखी। स्कूल में पढ़ता था तब। पढ़ाई का ककहरा सीख रहा था। खूब याद है जब ताऊ-फूफा मुझे उनके पांव, पांव खूंदने के ऐवज में खुश होकर जेब से चवन्नी निकालकर ऐसे देते थे कि मानों अपनी दौलत का एक बड़ा हिस्सा मुझे यूं ही दे रहे हों और चवन्नी हाथ में आते ही मुझे भी ऐसा लगता था कि मानों कुबेर की दौलत हाथ लग गई। इसे खर्च करने का तरीका तुरंत तलाशने लगता था कि इसमें कौन-कौन से अरमान पूरे करने हैं। किराने की दुकान पर पहुंचकर जब चवन्नी दुकानदार की ओर बढ़ाकर मनचाही चीज मांगता था तो दुकानदार भी चवन्नी हाथ में लेते हुए काफी पहले से दुकान पर पांच-दस पैसे हाथ में लिए खड़े हम उम्र बच्चों से कह देता था, ठहरो, क्या मेरे दस-बीस हाथ हैं। एक-एक करके ही तो सभी की सुनूंगा। पहले इसकी तो सुन लूं। दुकानदार चवन्नी धारकों को भाव देता था।

तब चवन्नी का यह जलवा था लेकिन फिर इसके दिन फिरते समय नहीं लगा। अर्श से फर्श पर आ गई चवन्नी, बाप अठन्नी जो आ गई और इसके साथ ही चवन्नी के साथ जुमला चिपक गया चवन्नी छाप का। कई फिल्मों ने यह जुमला सुना गया है। लोगों ने भी इसे अपनी जुबान पर बैठा लिया। बातों ही बातों में लोग लोगों की बात पसंद न आने पर कहा करते थे, क्या चवन्नी छाप बातें कर रहे हो। देखो, वह आ गया चवन्नी छाप, अब भेजा खाएगा। तब चवन्नी हेय हो चली थी और चवन्नी छाप पूरे देश में चलने लगा था। धीरे-धीरे चवन्नी की सांस फूलने लगी और लोग इसे अपनी जेब पर बोझ मानने लगे। भिखारी चवन्नी देने वालों को अपने बराबर का समझने लगे और मांग करने लगे अठन्नी की। चवन्नी जिसे चार आना भी कहा जाता था से कभी एक समय घर में पकाने लायक आलू-टमाटर मिलते थे, उससे सब्‍जी बेचने वाले कभी फोकट में मिलनी वाली धनिया भी देने से कतराने लगे।

महंगाई बढऩे लगी और आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया आम हो गया। हालांकि खूब कोशिशें हुईं कि चवन्नी को जिंदा रखा जाए। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने उसका आकार बदलने को कोशिश भी खूब की। उसका आकार इतना छोटा कर दिया, जितना कभी दो पैसे का होता था, लेकिन तमाम कोशिशें बेकार गईं। चवन्नी को परमगति को प्राप्त होना था और वह परमगति को कब प्राप्त होगी,  इस पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इस साल के शुरुआत में मुहर लगाते हुए तीस जून को उसे खत्म करने का डेथ वांरट जारी कर दिया।

लेखक प्रफुल्‍ल नायक मध्‍य प्रदेश के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.