डा. नूतन ठाकुर आजकल नेताओं को गाली देने का फैशन सा चल गया है और ऐसा करने वालों में ज्यादातर लोग वे हैं जो कथित सिविल सोसायटी से ताल्लुख रखते हैं. पूरे देश में एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि ये सिविल सोसायटी वाले आज के आधुनिक तारणहार हैं और शेष सारा देश भ्रष्ट है. खासकर नेता लोग तो देश को दिन-रात बेचे ही जा रहे हैं. यह एक ऐसा बिंदु है जिस पर हमें खास ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि इस तरह की बातें हमारे देश की मूलभूत प्रजातांत्रिक स्थितियों पर ही प्रत्यक्ष और परोक्ष ढंग से हमला हैं और कहीं ना कहीं अधिनायकवाद की ओर अग्रसर होती दिखाई देती हैं.

हम सभी देखते हैं कि आजकल अपनी कंपनी या फिर विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल आम चलन हो गया है. अक्सर ऐसे अनजाने नम्बरों से आये संदेशों को मैं बिना पढ़े ही डिलीट कर दिया करती हूँ और मैं ही क्यों हममें से कई लोग ऐसे अनचाहे संदेशो से छुटकारा पाने के लिए ऐसा ही करते होंगे. अपने विचारों को आमजन तक पहुँचाने के लिए कुछ इसी प्रकार के तरीकों का इस्तेमाल बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन से सम्बन्धित लोग भी लगातार सन्देश और एसएमएस के जरिये कर रहे हैं. इन में से ज्यादातर संदेशों में बिना लोकपाल बिल के पास हुए भ्रष्टाचार से नहीं लड़ा जा सकता हैं इसलिए लोकपाल की मांग को लेकर होने वाले आंदोलन में हिस्सा लेने सम्बन्धी बातें होती थी. या फिर ये बातें कि कैसे देश के बाहर से काला धन आएगा और देश अकस्मात लहलहा उठेगा.

पर इसके विपरीत सिर्फ मैं ही नहीं और भी कई सारे ऐसे लोग होंगे जो इस बात से इतेफाक नहीं रखते होंगे कि भ्रष्टाचार से तभी लड़ा जा सकता है, जब लोकपाल बिल पास हो या फिर भ्रष्टाचार जैसी समस्या का निदान बिना लोकपाल के हो ही नहीं सकता. जहाँ तक मेरा सवाल है तो मैं दिल से यही महसूस करती हूँ कि भ्रष्टाचार को खत्म करने या उससे लड़ने के लिए किसी लोकपाल की नहीं बल्कि हमारी और हमारे सरकार की इच्छाशक्ति की जरुरत है. नियम-कानूनों की तो वैसे भी हमारे देश में कोई कमी नही है जरुरत है तो उसे सही ढंग से लागू करने की और हमारी न्याय-प्रक्रिया को तीव्र गति प्रदान करने की. अपने छोटे-छोटे लाभ के लिए रिश्वत देने की जगह उसका खुल कर विरोध करने और अपने वाजिब हक के लिए आवाज उठाने की तथा नियमों को अपने देश की जनता के अनुरूप बनाने और उसे सरलीकृत करने की ताकि अपने छोटे-छोटे कामों के लिए भी हमें सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़े.

अभी हालत यह है कि अगर कोई व्यक्ति अपना छोटा-मोटा व्यवसाय भी करना चाहे तो उस व्यवसाय को शुरू करने से पहले ही उसे न जाने कितने सरकारी दफ्तरों से गुजरना पड़ता है. अपनी जीविका चलाने के लिए कोई व्यवसाय करने से पहले उसे कई सारे सरकारी विभागों से अनुमति प्राप्त करनी पड़ती है और कई बार तो उसे न चाहते हुए भी सिर्फ इस बात के लिए रिश्वत देनी पड़ती है कि उसका काम जल्दी हो जाए. यदि अपने देश के अस्सी प्रतिशत जनता की आर्थिक और सामाजिक हालातों को ध्यान में रख कर नियम बनाये जाए और लाइसेंस प्रणाली को न सिर्फ शिथिल कर दिया जाए बल्कि शासन स्तर पर पूरी पारदर्शिता अपनाई जाए तो लोकपाल के होने या ना होने के अंतर के बगैर ही काफी हद तक भ्रष्टाचार कम हो सकता है. और वैसे भी लोकपाल कोई बाहर से तो आयेगा नहीं बल्कि वह हमारे बीच का ही कोई व्यक्ति होगा जिसमे अच्छी और बुरी दोनों ही प्रकार की मानवीय कमजोरियां होंगी. फिर जब लोकपाल भी इसी व्यवस्था और समाज का एक अंग होगा तो फिर वह पहले से चल रही व्यवस्था से बिलकुल अलग ढंग से काम कर पायेगा, इस बात की सम्भावना तो मुझे कम ही दिखती है.

इसका यह अर्थ बिलकुल नहीं है कि मैं किसी भी प्रकार से लोकपाल के खिलाफ हूँ. पर इसके बनने मात्र से ही भ्रष्टाचार बिलकुल ही मिट जायेगा इस अतिवादी कल्पना को मैं चाह कर भी नहीं मान पाती हूँ. परन्तु कई बार जब पढ़े-लिखे लोगों को भी इस तरह की अतिवादी बातें करते देखती हूँ तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि कहने को तो हम शिक्षित हैं, पर हमारी दशा भी उन भेड़-बकरियों से कम नहीं जिसे थोडे़ से सब्ज-बाग दिखा कर जिधर चाहो उधर मोड़ दो. पहले तो इस तरह के सब्ज-बाग हमारे नेता ही हमें दिखाया करते थे, पर अब कुछ-कुछ ऐसा लगने लगा है कि अब आम जनता की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले भी ठीक उसी तरह से हमें सब्जबाग और झूठे आश्वासन दिखा कर गुमराह कर रहे हैं, जैसा कभी राम मंदिर बनाने के नाम पर किया गया था. तब भी ठीक इसी तरह से दूरसंचार माध्यमो का इस्तेमाल हमारी भावनाओं को उकसाने के लिए किया गया था, जिस तरह से आज बाबा रामदेव के समर्थक कर रहे हैं.

भ्रष्टाचार से आज हम सब पीड़ित है और इससे निजात भी पाना चाहते हैं. पर अपनी लोकतान्त्रिक व्यवस्था को तहस-नहस कर के क्या यह संभव हो पायेगा. आज हमारे पास कम से कम यह उपाय तो है कि हर पांच साल पर हम अपना नेता चुन सकते है. पर इस व्यवस्था को गाली दे कर या इसके विरुद्ध सामानांतर सत्ता खड़ी कर क्या हम अपने लोकतंत्र को मजबूत कर पाएंगे. जिस तरह से बाबा रामदेव रोज-रोज पुलिस के खिलाफ एक नया आरोप लगा रहे हैं  और अपने ऊपर हुए अन्याय का विरोध करते हुए अपनी एक सेना बनाने की बात कह रहे है,  उससे तो यही लगता है कि कहीं हमारे देश में एक नये किस्म की बाजीगरी तो नहीं आने वाली है. फिर वे जिस तरह से बाबा के काले धन को वापस लाने की मुहिम से हमें और हमारे देश को होने वाले फ़ायदों को बता रहे है वह निश्चित ही भोले-भाले लोगों को गुमराह करने के लिए काफी है. पहले वे एएएमएस के जरिये यह सवाल पूछते हैं कि बाबा रामदेव कहते हैं - काला धन वापस लाओ. क्या आप जानते हैं चार सौ लाख करोड़ अगर वापस आएगा तो क्या होगा? फिर इसके वापस आने के फायदे गिनाते हुए दुनिया भर के सब्ज़-बाग दिखाते हैं.

वैसे मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ पर इतना जानती हूँ कि बाबा रामदेव और अन्ना हजारे भी अर्थशास्त्री नहीं हैं. लेकिन जिस तरह से आधी-अधूरी सूचनाओं और सीमित विषयगत जानकारी के आधार पर ये लोग लगातार तमाम बातें कहते जा रहे हैं वह अपने आप में भयावह प्रतीत होता है. कारण यह कि इस तरह की बातें बेहद लोक-लुभावन होती हैं. कोई भी व्यक्ति यह चाहेगा कि उसके देश में बाहर रखा तमाम काला धन चला आये और इसके बाद तो फिर मजे ही मजे. बिना एक हाथ उठाये सब कुछ मिलता रहेगा. लेकिन सत्यता यह है कि देश की आर्थिक संरचना और देश का अर्थशास्त्र कुछ निश्चित नियमों से संचालित होता है, जिस में अत्यंत दुष्कर आर्थिक सिद्धांत और नीतियां अपनी भूमिका निभाती हैं. जिस तरह से बाबा रामदेव बता रहे हैं कि इतने करोड़ रुपये आ गये और देश के एकाउंट में जुड गये तो फिर बल्ले-बल्ले, अर्थशास्त्र इतना सरल होता तो अमेरिका में 1929 में आया ग्रेट डिप्रेशन कभी नहीं आया होता, जिस समय अमेरिका में रिकॉर्ड उत्पादन हो रहा था. मैं इस बात को इतनी गंभीरता से इसीलिए कह रही हूँ कि दुष्कर और अकादमिक विषयों पर अधकचरा ज्ञान का इस्तेमाल करना मेरी निगाह में सर्वथा अनुचित है. वह भी मात्र अपने-आप को स्थापित करने अथवा अपनी स्थिति मजबूत करने और अपनी ताकत एवं महत्ता को बनाने के लिए.

इससे कोई बहुत दूसरी स्थिति लोकपाल बिल की भी नहीं है. शांति भूषण और प्रशांत भूषण को ले कर जो आरोप मिडिया में आये थे वे समय के साथ कुछ ओझल से हो गये हैं, पर इसका यह मतलब नहीं कि उनके सम्यक समाधान हमें किसी समय मिल सके थे. लेकिन हम सभी जानते हैं कि उन आरोपों के आने के बाद आज की कथित 'टीम अन्ना' (जैसा पहले 'टीम इंडिया' हुआ करती थी)  ने किस तरह से इन आरोपों को जांच से पहले ही ख़ारिज कर दिया था. साथ ही शांति भूषण और प्रशांत भूषण ने इतने छोटे से पद को छोड़ने से साफ़ इनकार कर दिया था. मैं समझती हूँ कि जब आरोप लगने के बाद अभी से इतने बड़े-बड़े लोगों ने इस तरह की प्रतिक्रियाएं व्यक्त की तो जो आदमी किसी तरह से लोकपाल हो जाएगा, उस पर लगे आरोपों की स्थिति में वह कैसा आचरण करेगा. वह भी तो एक सिरे से इन्हें बेबुनियाद, मनगढंत और दुष्प्रेरित कह देगा जैसा आज से कुछ समय पहले तक कनिमोझी कह रही थीं.

तात्पर्य यह कि जहां हम इन महानुभावों के इस बात के लिए आभारी हैं कि इन लोगों ने भ्रष्टाचार का मुद्दा सामने रखा वहीँ मैं किसी भी स्थिति में उनकी अंध-भक्ति करने अथवा उनके हर समाधान को सही मानने के पक्ष में नहीं हूँ. इस विषय में हमें सतत सक्रियता बनाये रखने और अपनी बुद्धि को लगातार खुला रख कर सोचने की जरूरत है, ना कि आँख मूँद कर किसी भी बात को अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार कर लेने की.

डॉ. नूतन ठाकुर

सचिव, आईआरडीएस