शेषजीओसामा बिन लादेन के मर जाने के बाद पूरी दुनिया से तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. अमरीका में वहां के राष्ट्रपति की लोकप्रियता में 11 प्रतिशत की  बढ़ोतरी हुई है, यूरोप वाले पाकिस्तान को घेरने की कोशिश कर रहे हैं. पाकिस्तानी फौज और आईएसआई के चेहरे खिसियाहट में तरह-तरह के रंग बदल रहे हैं, पाकिस्तानी हुकूमत की बेचारगी छुपाये नहीं छुप रही है. पाकिस्तानी अवाम को साफ लगने लगा है कि भारत से पाकिस्तानी शासकों ने जिस तरह की दुश्मनी कर रखी है, उसके नतीजे बहुत भयानक हो सकते हैं. आग में घी डालते हुए भारत के सेना प्रमुख ने बयान दे दिया है कि भारतीय सेना अमरीकी कार्रवाई जैसे आपरेशन को अंजाम दे सकती है. आतंक के कारोबार में लगे पाकिस्तानी नेता सड़कों पर रो रहे हैं और अपने लोगों को समझा नहीं पा रहे हैं कि उनके तरीके को लोग क्यों सही मानें. जब उनके सबसे बड़े आका को ही उसके घर में घुसकर अमरीकी मार सकते हैं तो यह बेचारे किस खेल की मूली हैं.

अमिताभ मेरी पत्नी नूतन दो-चार दिन पहले अमेरिका से आई है, जहां वह अमेरिकी सरकार और अमेरिकी संस्थाओं में ट्रांसपरेंसी (अर्थात पारदर्शिता) को नजदीक से देखने और समझने के लिए बनाए गए टूर का हिस्सा थी. लौटने के बाद मुझ में और उसमें लोकपाल बिल और लोकपाल संस्था को ले कर कई बार बहस और चर्चा होती रही है, जिस में हम दोनों को ही परस्पर एक सम्यक दृष्टिकोण बनाने में मदद मिली है. नूतन ने जो मुख्य बात वहाँ समझी वह यह कि अमेरिका के पूरी शासन-प्रशासन व्यवस्था (गवर्नेंस) में किसी भी एक संस्था का वर्चस्व नहीं है. बल्कि डेमोक्रेसी के मूलभूत सिद्धांत 'सेपरेशन ऑफ पावर' (सत्ता का अलगाव) पर ही पूरी अमेरिकी व्यवस्था आधारित दिखती है. यही कारण है कि वहाँ एक से एक वाचडॉग (नियंत्रण संस्थाएं) हैं जो अपनी-अपनी हैसियत और क्षमता के अनुसार बड़े करीब से समस्त अमेरिकी संस्थाओं पर निगाह रखती हैं.

सतीश सिंहभारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने अपने ताजा बयान में बैंकिंग सेवाओं का लाइसेंस लेने के लिए इच्छुक औद्योगिक घरानों को कहा है कि उन्हें कमजोर वर्गों तक बैंकिंग की हर सुविधा मुहैया करवाने के शर्त पर ही लाइसेंस मिल पाएगा। उन्होंने यह भी कहा है कि यदि विदेशी बैंक भारत में अपना विस्तार करना चाहते हैं तो उन्हें इसके लिए भारत में सहायक बैंकों की स्थापना करनी होगी। तत्पश्‍चात उन्हें गरीबों के बैंक की तरह काम करना होगा। अर्थात उन्हें ऐसे लोगों को बैंकिंग सुविधा देनी होगी, जिनसे वे मुनाफा नहीं कमा सकेंगे। इस संदर्भ में ‘वित्तीय समग्रता’ की संकल्पना ऐसा ही एक सिंद्धात है।

संजीव चौहान: बेतुकी बात : गुरु घंटाल, चेला महा-काल : आजकल 'मीडिया'  में (अखबार, न्यूज चैनल) रिपोर्टर बनने और रिपोर्टर बनाने वालों की भीड़ है। एक के पीछे दस-दस। क्राइम रिपोर्टर बनने के शौकीनों पर आगे चर्चा कर लेंगे। पहले क्राइम-रिपोर्टर बनाने वालों का गुणगान कर लिया जाये। क्राइम रिपोर्टर बनाने वाले कुछ मठाधीश कई अखबार और न्यूज-चैनलों के दफ्तर में या फिर दफ्तरों के बाहर गुमटियों पर मुंह में तम्बाकू, पान चबाते, यहां-वहां भटकते मिल जायेंगे। कुछ श्रीमान क्राइम रिपोर्टर बनने के इच्छुकों को प्रेस-क्लब में या उसके बाहर बुला लेते हैं। दिल्ली में आईएनएस बिल्डिंग के नीचे या फिर हाईटेक सिटी नोएडा में स्थित फिल्म सिटी में चैनल के दफ्तरों के बाहर चाय-पान के ठीये (अड्डे) भी क्राइम-रिपोर्टर बनाने के अड्डे के रुप में बदनाम हैं। अगर कहीं नहीं तो फिर अपने कार्यालय के ही बाहर ही सही।

कौशल किशोर इतिहास अपने को दोहराता है। ऐसा ही हुआ है।1983 के बाद 2011। हम फिर क्रिकेट विश्व चैम्पियन बने। यह एक बड़ी उपलब्धि है। जो हमारे गुरू थे, जिन्होंने हमें गुलाम बनाया और यह खेल सिखाया, उन्हें बहुत पीछे छोड़ दूसरी बार हमने यह जीत हासिल की है। यह ऐसी जीत है जो मन को रोमांचित कर दे। हमारे खिलाड़ी निःसन्देह बधाई के पात्र हैं। हम जोश से भरे हैं। लेकिन ऐसा जोश भी ठीक नहीं जिसमें हम होश खो दें। हम खेल का भरपूर आनन्द उठायें, जीत पर खुशियाँ मनायें, खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करें, एक दूसरे को बधाइयाँ दें पर यह भी जरूरी है कि खेल से जुड़े मुद्दों पर चर्चा भी हो।

राहुल : अन्ना हजारे की मुहिम अंजाम तक पहुंच पाएगी : गांधीवादी अन्ना हजारे देश में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के नए नायक बनकर उभरे हैं। उन्होंने 96 घंटों के आमरण अनशन में ही केन्द्र सरकार को बैकफुट पर ला खड़ा किया। सरकार ने लोकपाल विधेयक बनाने के लिए अन्ना की शर्तो को मान लिया है। केन्द्र ने वित्त मंत्री की अध्यक्षता वाली एक कमेटी गठित करके उसे नोटिफाई कर दिया है। जिसमें पांच सरकार और पांच ही सिविल सोसाएटी के नुमाइंदे शामिल हैं। यह कमेटी लोकपाल बिल के मसौदे का ब्लूप्रिंट तैयार करेगी। जिसे मनमोहन सिंह सरकार कैबिनेट के सामने रखने के बाद आगामी मानसून सत्र में बिल को लोकसभा में लाऐगी।

विनय बिहारी सिंहएक लेखक हैं जोसेफ लेलीवेल्ड। इन्होंने एक पुस्तक लिखी है- महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया। जोसेफ साहब पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके हैं। गुजरात में इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। मैंने यह पुस्तक पढ़ी नहीं है। लेकिन इस पुस्तक को लेकर जो बवेला मचा है, उसके आधार पर मैं यह टिप्पणी कर रहा हूं। कहा जा रहा है कि इस पुस्तक में कोई भ्रामक हवाला देकर महात्मा गांधी को समलैंगिक कहा गया है। अगर लेखक महोदय ने यह टिप्पणी की है तो यह घोर आपत्तिजनक है। सनसनी फैला कर बेस्ट सेलर का खिताब पाने का यह तिकड़म पहले भी लोग कर चुके हैं। किसी दिवंगत महान नेता के चरित्र पर अनर्गल बातें लिख कर बाजार में बेस्ट सेलर बनने की यह तथाकथित चालाकी कोई नई नहीं है।

संजीव चौहानमैं अब तक मुंबई सिर्फ एक बार गया हूं। बिहार को भारत के नक्शे पर और टीवी में देखा है। अखबार, किताब और इतिहास में बिहार को पढ़ा है। इसके अलावा बिहार के बारे में थोड़ा-बहुत कागजी ज्ञान मुझे हो सकता है। मेरे इस कागजी ज्ञान या टूटी-फूटी जानकारी को बिहार पर या बिहार के बारे में मेरी 'विशेष-योग्यता' भी समझने की गलती मत कर बैठिये। कहने का मतलब साफ है, कि मुंबई और बिहार से मेरा कोई खास ताल्लुक या वास्ता नहीं रहा है। या यूं समझिये की न मैं 'बिहारी'  हूं न 'महाराष्ट्रीयन'। वैसे भी क्षेत्रवाद, भाषावाद की राजनीति में मेरा ज्ञान शून्य है। अब आइये मुद्दे की बात पर। आखिर मैंने ऊपर सिर्फ बिहार-मुंबई को लेकर ही क्यों लिख दीं इतनी लाइनें ? मैंने इन लाइनों को लिखने में समय खराब किया और आपने पढ़ने में। नहीं ऐसा बिलकुल मत सोचिये। हर लिखे का कोई मायने होता है।

गिरीशजी: जल-जंगल-जमीन संघर्ष को लोकतांत्रिक होना ही होगा : पिछले दिनों वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में ’उग्र वामपंथञ पर दो दिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्ठी हुई. देश के विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों ने इसमें भाग लिया. चर्चा में अनेक मुद्दे बहस के विषय रहे. यहां उग्र वामपंथ से तात्पर्य नक्सलवाद से ही रहा और चिंता यही रही कि देश के 15 राज्यों के दो सौ जिलों में फैले नक्सली नेटवर्क की हिंसा बंद होनी चाहिए, और संघर्ष का रूप जम्हूरी होना चाहिए. लेकिन इस चिंता से ज्यादा नाराजगी का स्वर सरकारी हिंसा, आदिवासियों के भू-विस्थापन, उनके लगातार हो रहे शोषण पर ढुलमुल रवैये और शासन की उदासीनता, जल-जंगल-जमीन के लिए आंदोलनरत समाज की मांगों को अनसुना करके बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों और कारपोरेट तबकों को बढ़ावा देने पर था.

पदमजीभारत के हाथों विश्व कप सेमीफ़ाइनल में हारने के बाद स्वदेश पहुंचने पर मीडिया से घिरे पाकिस्तानी कप्तान शाहिद आफरीदी ने कराची हवाई अड्डे पर अपने वतन के लोगों से जब यह सवाल किया, ''वे क्यों हिंदुस्तान से नफ़रत करते हैं जबकि हम सारी रवायतें, यानी शादी-व्याह आदि उनकी तरह से करते हैं, अपने ड्राइंग रूम में भारतीय फिल्में देखते हैं और हिंदी गाने हमारी हर गली हर कूचे में बजते रहते हैं, तब क्यों नहीं वे इंडिया से दुश्मनी की बात सोचते, वे क्यों क्रिकेट मैच को आम मैच की तरह न लेकर जंग की तरह लेते हैं?''

गोविंदजीकमाल है, खेल-खेल में भारत एकता के सूत्र में बंध गया। क्रिकेट ने वह कर दिखाया जो राजनेताओं की अपील, धर्मगुरुओं के उपदेश, टीचर्स की क्लास नहीं कर सकी। देश के कण-कण से एक ही स्वर सुनाई दे रहा था, हम जीत गए। भारत विजयी हुआ। जाति, धर्म, समाज, पंथ सब गौण हो गए। रह गया तो भारत और उसकी पाक पर विजय का उल्लास। दिन के समय किसी काले पीले तूफान के कारण गहराती शाम का दृश्य तो याद है। लेकिन आधी रात को दिन जैसा मंजर पहली बार देखा। 1983 में भी हमारी टीम रात को ही वर्ल्ड कप जीती थी। ऐसा कोलाहल तो तब भी नहीं दिखाई, सुनाई दिया।

सचिनबगावत के तेवर लिए बागियों की मिट्टी में जन्में आलोक तोमर कुल-कुनबे से कम... कारनामों से ठाकुर ज्यादा थे... बंदूक उठाकर जंगलों का रुख करने वालों की धरती से वो कलम उठाकर पत्रकारों की दुनिया में आए... सोच और तरीके का ये फासला भी उनका मजहब नहीं बदल पाया... संघर्ष का धर्म उनके जीने की वजह रहा और जाने की भी... समाज में फैले कैंसर ने शरीर पर घात लगाकर दुश्मनी निभाई... आलोक इसके लिए तैयार नहीं थे... होते भी तो खुद के लिए सबसे बाद में लड़ने की उनकी शपथ अपने लिए कुछ करने नहीं देती... सरोकारों के लिए चौकन्ने... अपने-पराए और खुद से भी हमेशा भिड़ने को तैयार.

पदमजी: मोहाली में फिर वही क्रिकेट कूटनीति का खेल : अरसे बाद होली बनारस में मनी. क्या आनंद मिला होगा, इसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता. धूलि वंदन की शाम लगा मित्रों का जमघट और उन्हीं में एक ने गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगौर के काव्य संकलन ``कथा ओ काहिनी'' की एक कविता `होरी खेला' सुनाई जिसका हिन्दी में अनुवाद इस प्रकार है, ''पठान केसर खां को राजपुताना घराने की एक रानी ने केतुं नगरी से पत्र लिखा, ''युद्ध करते-करते बुझी आस, थक गए हैं. मै देख रही हूँ वसंत बीता जा रहा है. आप अपनी पठानी सेना लेकर आओ. हम आपके साथ राजपूतानी होली खेलेंगे.'' केसर खान आया. खूब आवाभगत हुई. राजपूत सेना ने राजपूतानी बन कर शमशेरी होली खेली और केसर खां (मार डाला) थैंक यू मेंशन नाट हो गए.

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : वो फकीर ही क्‍या जो मंदिर और मस्जिद में फर्क करे। किसी भी पूजा या उपासना स्‍थल पर फकीर को सिर्फ और सिर्फ एक ही शान दिखायी पड़नी चाहिए। इसके अलावा अगर उसे कुछ और दिखने लगेगा तो फिर वह फकीर कैसा। अपने खुदा पर भरोसा रखो, उसके अलावा किसी और के सामने हाथ क्‍या फैलाना। जब ऊपर वाला ही नहीं चाहेगा तो किसी की क्‍या मजाल जो वह किसी को कुछ दे सके। अरे फकीरी करनी है तो कफन पहनो और दीन-दुनिया से मुक्‍त हो जाओ। न किसी से मांगो और ना किसी को कुछ दो। भले ही वह दुआ हो, बद्दुआ। दुआ और बद्दुआ देने का काम फकीर का नहीं। यह काम वे करते हैं जिनके मन में या तो लालच होता है या ईर्ष्‍या। कुल मिला कर यह, कि फकीर सवाली नहीं हो सकता।

शेषजीनौकरशाही ने जनाकांक्षाओं को काबू करने की एक और राजनीतिक कोशिश पर बाबूतंत्र की लगाम कस दी है. ग्रामीण विकास मंत्रालय की योजनाओं के ऊपर नज़र रखने की गरज से राजनीतिक स्तर पर तय किया गया था कि पूरे देश में ग्रामीण विकास की सभी योजनाओं की मानिटरिंग ऐसे लोगों से करवाई जायेगी, जो सरकार का हिस्सा न हों. वे ग्रामीण इलाकों का दौरा करेंगे और अगर कहीं कोई कमी पायी गयी तो उसकी जानकारी केंद्र सरकार को देंगे, जिसके बाद उसे दुरुस्त करने के लिए ज़रूरी क़दम उठाये जा सकें. इन लोगों को राष्ट्रीय स्तर का मॉनिटर (एनएलएम) का नाम दिया गया है. राजनीतिक इच्छा यह थी कि बाबूतंत्र के बाहर के लोगों के इनपुट की मदद से ग्रामीण विकास की योजनाओं को और बेहतर बनाया जाएगा. लेकिन नौकरशाही ने इस योजना को अवकाश प्राप्त मातहत अफसरों के पुनर्वास के लिए इस्तेमाल करने की चाल चल दी.

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : बारह साल का अध्‍ययन केवल तीन साल में पूरा कर पांच साल का बालक जब वापस घर लौटा, तो सहसा किसी को यकीन नहीं हुआ। पिता की म़त्‍यु पहले ही हो चुकी थी। घर की इकलौती संतान। मां बूढी और अशक्‍त। गांव की महिलाओं के साथ मां भी प्रात: स्‍नान और पूजा-अर्चना के लिए गांव से काफी दूर बहने वाली पूर्णा नदी तक जाती थीं। एक दिन मां रास्‍ते में बेहोश हो गयीं तो बालक का मन आर्तनाद कर उठा। एक ऐसा संकल्‍प ले लिया गया जिसे सुनकर ही रोंगटे खडे हो जाएं। उसने अपने हमउम्र दोस्‍तों को तैयार किया। मकसद था- पूर्णा नदी का मार्ग बदल कर उसे गांव तक ले आना।