पदम‍पति शर्मा महान सिकंदर जब भारत आया तब उसने यहाँ की प्रकृति, समाज और जीवन शैली देख कर अपने सेनापति से कहा, `` सचमुच सेल्युकश..क्या विचित्र है यह देश...! इस बात को हजारों साल बीत गए, मगर वही आश्चर्य आज भी हमारे-आपके सामने है. हम भारतीयों को हर समय एक अवतार की आवश्यकता पड़ती है. क्योंकि दिमाग में घुसी हुई है गीता की वाणी,'' यदा-यदा ही धर्मस्य.`` हाल के दिनों की घटनाएं उसी सत्य का बयान करती हैं. हमने माननीय अन्ना हजारे, बाबा रामदेव या श्री श्री रविशंकर में अवतरित सत्ता की खोज शुरू कर दी है. देश में महामारी की तरह फैले भ्रष्टाचार और काले धन के रक्त बीज को ये नव अवतार समाप्त करेंगे और हम दर्शक दीर्घा में बैठ कर सिर्फ ताली पीटने का ही काम करेंगे?

जयशंकर मौत का एक दिन तो हर एक के लिए मुअय्यन होता होता है. भारत के पिकासो कहे जाने वाले मकबूल फिदा हुसैन भी इस मामले में किसी से अलहदा नहीं थे. लेकिन ९५ वर्ष की उम्र में भी जवां दिल हुसैन इस मौत के हकदार कतई नहीं थे. भारतीय चित्रकला के इस महान चितेरे को दफ्न होने के लिए अपने वतन में दो गज जमीन भी मयस्सर नहीं हो सकी. वह लंदन में मरे और वहीं दफ्न हो गए. उनकी इस हालत पर दिल्ली सल्तनत के आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर याद आती है जिनका इंतकाल म्यामां (तत्कालीन बर्मा) की राजधानी यंगून (तब रंगून) की जेल में बनी काल कोठरी में हुआ था. अपनी बेदिनी और बेवतनी पर जफर ने एक गजल लिखी थी जिसका अंतिम अशआर कुछ इस तरह था, ङङ्गङङ्गहै कितना बदनसीब जफर दफ्न के लिए, दो गज जमीं भी मिल ना सकी कुए यार में.''

सांप्रदायिक एवं निर्देशित हिंसा रोकथाम विधेयक, 2011 बिल स्वयं अपने आप में साम्प्रदायिकता  के दलदल में धसी हुई नज़र आती है। अब जब भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता का भाव बढ़ रहा है तब बिल काल के रुप में सामने आयी है। यह बिल समाज को कई भागो में बाटने की कोशिश है। निम्नलिखित प्रश्नो के आधार यह बिल अपने आप में सांप्रदायिक प्रतीत होती है:- क्या साम्प्रदायिक दंगा सिर्फ हिन्दुओं या बहुसंख्यकों के द्वारा ही होता है? क्या NAC द्वारा बिल की ड्राफ्टिंग गैर संवैधानिक प्रक्रिया नहीं है? क्या बिल की प्रकृति स्वयं में ही साम्प्रदायिक नहीं है? देश में कई ऐसी जगह है जहां हिन्दू भी अलपसंख्य हैं या जब एक अलसंख्यक बर्ग दूसरे अलपसंख्यक बर्ग के खिलाफ इस प्रकार कोई कृत करता है तो उस स्थित में क्या होगा? क्या यह बिल संघीय प्रणाली की घोतक नहीं है? क्या यह बिल सिर्फ वोट बैंक राजनीति का परिणाम नहीं है?

डा. नूतन ठाकुर आजकल नेताओं को गाली देने का फैशन सा चल गया है और ऐसा करने वालों में ज्यादातर लोग वे हैं जो कथित सिविल सोसायटी से ताल्लुख रखते हैं. पूरे देश में एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि ये सिविल सोसायटी वाले आज के आधुनिक तारणहार हैं और शेष सारा देश भ्रष्ट है. खासकर नेता लोग तो देश को दिन-रात बेचे ही जा रहे हैं. यह एक ऐसा बिंदु है जिस पर हमें खास ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि इस तरह की बातें हमारे देश की मूलभूत प्रजातांत्रिक स्थितियों पर ही प्रत्यक्ष और परोक्ष ढंग से हमला हैं और कहीं ना कहीं अधिनायकवाद की ओर अग्रसर होती दिखाई देती हैं.

महाभारत में प्रसंग आता है कि एकलव्य धनुर्विद्या सीखने के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास गया तो गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया.  जब एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य कि मूर्ति के सम्मुख स्वयं के अभ्यास से धनुर्विद्या में प्रवीणता हासिल कर ली तो गुरु द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिना के बदले एकलव्य का अंगूठा मांग लिया. ताकि भविष्य में एकलव्य कभी भी राजकुमार अर्जुन को चुनौती न दे सके और राजकुमार अर्जुन विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बन सके. भोला एकलव्य इस चाल को न समझा और उसने अपना अंगूठा तुरंत काट कर गुरु द्रोणाचार्य को भेंट कर दिया. भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है. बस एकलव्य, अर्जुन और द्रोणाचार्य बदल गए है. भारत की आम जनता एकलव्य हो गयी है, तो भ्रष्टाचारी लोग राजकुमार अर्जुन बन बैठे है. इनकी रक्षा गुरु  द्रोणाचार्य की भूमिका में भ्रष्ट राजनेता कर रहे हैं.

 

राजेश मिश्र : प्रधानमंत्री को राष्ट्रधर्म सिखाने चले थे, खुद भूल बैठे राष्ट्रधर्म : बाबा रामदेव नयी दिल्ली के रामलीला मैदान गये तो थे भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध लड़ने पर युद्धक्षेत्र से जिस तरह भागे उससे आज उनकी जम कर आलोचना हो रही है। उनके विश्वास में उनके अनुयायी भी वहां गये थे जो पुलिस कार्रवाई में चोट खा बैठे, लेकिन रामदेव गिरफ्तारी का साहस भी नहीं जुटा सके। वे तो अपने वहां से भागने को तर्कसंगत बताने के लिए तरह-तरह की कहानियां गढ़ रहे हैं, उनका कहना है कि उनका एनकाउंटर किया जाने वाला था। अब यह तो वही जानते होंगे कि भला उन जैसे योगी और साधुपुरुष का एनकाउंटर कोई क्यों करना चाहेगा। दरअसल रामलीला मैदान से चुपाचाप निकल भागने का कोई ठोस कारण वे पेश करना चाहते हैं, जिससे उनके मैदान छोड़ने को सही और समझदारी का काम साबित किया जा सके।

पदमपति शर्माआखिर, भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने सरकार के सामने घुटने टेक ही दिए और घोषित महा भ्रष्ट (मैच फिक्सर) मोहम्मद अज़हरुद्दीन को महिमामंडित कर दिया. बताने की जरूरत नहीं कि एक के बाद एक महाघोटालों में फंसी केंद्र सरकार का पाखण्ड इसी बात से समझ में आता है कि एक ओर तो वो देश के साथ गद्दारी करने वाले को, जिसने पैसे की खातिर अपना ईमान बेच दिया और कई मौकों पर भारतीय टीम की हार सुनिश्चित की, वोटों की गणित के चलते सांसद बनाती है और दूसरी ओर लोकपाल बिल ३० जून तक तैयार करने का दम भरती है. देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने सरकार पर से रहा सहा भरोसा भी अज़हर को बीसीसीआई द्वारा टीम इंडिया के विश्व कप जीतने के उपलक्ष्य में आयोजित सम्मान समारोह के लिए न्योता भेज कर खो दिया है.

देशपाल सिंह पंवार तू खड़ा होके कहां मांग रहा है रोटी, ये सियासत का नगर सिर्फ दगा देता है (गोपाल दास नीरज)। फिलहाल सियासत से अपने वास्ते तो बाबा ने नहीं मांगी थी रोटी। हां जिनकी नीयत और नीत है खोटी। सोच है छोटी, काली कमाई कर चुके हैं मोटी-वे कैसे छीनने देते अपनी बोटी- शातिर दिमाग से चल डाली गोटी। अब चाहे गालियां पड़ रही हों कोटि- कोटि, पर वे तो मस्ती में काट रहे हैं चिकोटी। सबसे बड़े लोकतंत्र की मान मर्यादा, इस देश की आन-बान-शान पर दाग के गान चाहे आज सारी दुनिया में गूंज रहे हों पर परवाह किसे है? कम से कम उन नेताओं को तो नहीं जिनके हाथों में ताकत है। अपने तरीके से सियासत की पारी खेलने वालों की चाहत कब आम आदमी के लिए राहत की बारी आने देती है। हमेशा की आफत-बदतर हालत- गरीब की शामत-नसीब की गारत गाथा ही तो लिखती आई है।

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : शेख फरीद : हम तो उस उसके बंदे हैं जो देता है, मगर एहसान नहीं जताता : फकीर ने ठुकरा दिये सुल्‍तान बलबन के सोने-चांदी का टोकरे : यह कहानी है उस फकीर की जिसने सुल्‍तान बलबन को टका सा जवाब दे दिया और बलबन ने आजीवन उसके आगे शीश झुका दिया। धर्म को बिलकुल नये अंदाज में दिखाने वाले ने अद्वैत की वकालत की और भगवान और अल्‍लाह को एक ही बताया। अपनी दरियादिली और बेलौस बात कहने के लिए उन्‍होंने शेर और पदों का सहारा लिया। सन 1188 में मुल्‍तान के कोठेवाल गांव में जन्‍मा इस फकीर का यह तरीका इतना नायाब और असरदार निकला कि उनके 400 साल बाद सिखों के आदिगुरूग्रंथ साहिब में उसे शामिल कर लिया गया।

राजेश त्रिपाठी चार-पांच जून की दरम्यानी रात को नयी दिल्ली में जो कुछ हुआ उसे किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। शासन-प्रशासन में बढ़ते भ्रष्टाचार के खिलाफ और विदेशों में जमा भारतीयों के काला धन को देश में वापस लाकर राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने व ऐसी ही कई अन्य उचित और अनिवार्य मांगों पर बाबा रामदेव अपने समर्थकों के साथ सत्याग्रह-अनशन कर रहे थे। आधी रात को उनके निहत्थे समर्थकों पर लाठी बरसा कर, टीयर गैस चला कर उस आंदोलन को खत्म करने का जघन्य कार्य आखिर केंद्र सरकार ने क्यों किया। बाबा रामदेव आज जो मांग कर रहे हैं वह मांग हर सच्चे भारतीय की है। बाबा तो एक प्रतीक हैं उनके मुंह से भारत की जनता बोल रही है जो चाहती है कि उसके पुण्य देश भारत की सत्ता और प्रशासन पुनीत और जन हितैषी बने।

‘वरिष्ठ लेखक व साहित्यकार शंकर पुणताम्बेकर की एक लघु कथा हैं- ‘नाव चली जा रही थी। मझदार में नाविक ने कहा- नाव में बोझ ज्यादा है। कोई एक आदमी कम हो जाए तो अच्छा। नहीं तो नाव डूब जाएगी। अब कम हो जाए तो कौन हो जाए, कई लोग तो तैरना नहीं जानते थे। जो जानते थे। उसके लिए भी परले जाना खेल नहीं था। नाव में सभी प्रकार के लोग थे। डाक्टर, अफसर, वकील, व्यापारी, उद्योगपति, पुजारी, नेता के अलावा एक आम आदमी भी। डाक्टर, वकील, व्यापारी ये सभी चाहते थे कि आम आदमी पानी में कूद जाए। वह तैरकर पार जा सकता है, हम नहीं। उन्होंने आम आदमी से कूद जाने को कहा, तो उसने मना कर दिया।

आलोक कुमारकिसी अपराध में सोनिया गांधी का नाम लेने से क्यों हिचकते हैं लोग? मेरे आग्रह भरे सवाल पर आप कह सकते हैं कि अपराध में संलिप्तता का पता ही नहीं लगता इसलिए सोनिया गांधी का नाम नहीं लेते लोग। लेकिन लंबे समय से अपराध की रिपोर्टिंग करने की वजह से अंदर ही अंदर लगता है कि अपराध के बाद अपराध के लाभान्वितों का शक के तौर पर भी तो नाम लेने की स्थापित परंपरा है। इस परंपरा के निर्वाह का अक्सर फायदा होता है। शक की अंगुली उठाई जाती है। जांच की जाती है। जांच के नतीजों के आधार पर दोषी या बरी करने का फैसला लिया जाता है। लेकिन कमाल है। यूपीए के सात सालों के शासन में नहीं के बराबर सुना है कि किसी मसले पर सोनिया गांधी पर अंगुली उठाई गई हो।

हिन्दुस्तान की सियासत ने फिर करवट ली है, लेकिन इसके लिए इस चुनावी जंग में जीतने वाले सिर्फ बधाई के पात्र नहीं है, पर इसके लिए वे जिम्मेदार हैं, जो भले ही चुनाव न लड़ रहे हों, लेकिन जीतने वालों को इन महानुभावों को दिल खोलकर धन्यवाद देना चाहिए। पश्चिम बंगाल में बुद्वदेव भट्टाचार्य क्या इस प्रकार मुंह की खाते अगर प्रकाश करात कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्ससिस्ट) के महासचिव नहीं होते। प्रकाश कारत में ही यह साहस था कि वह लोकसभा के स्पीकर सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाल सके। इससे यह साफ हो गया कि प्रकाश कारत भले ही वृंदा करात के पति हों, किंतु उनमें प्रबल इच्छाशक्ति है। अगर वह फुटबाल के खिलाड़ी होते तो अपनी टीम पर भी गोले दागते। इसलिए हे ममतामयी, ममता बनर्जी! अपनी जीत पर आप खुशी से फूली न समाएं, आपकी चुनावी सफलता के पीछे बहादुर एवं सिद्वांतवादी प्रकाश करात का हाथ है। वैसे भी कांग्रेस का पंजा भी अब आपकी गिरफ्त में है।

योगी से बने सत्याग्रही स्वामी रामदेव के सत्याग्रह ने उस इतिहास को दोहरा दिया जब बापू ने स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजी सरकार के खिलाफ अपना सत्याग्रह शुरू किया था। समय के साथ परिस्थितिया बदली साथ ही बदल गई सत्याग्रह का वह स्वरूप। यह सत्याग्रह ना अंग्रेजो के खिलाफ है और ना ही स्वतंत्रता के लिए। यह तो स्वतंत्रता के साथ मिली लोकतंत्र के लिए सत्याग्रह है। जिसे पाना हर भारतीय का संवैधानिक अधिकार है। परंतु जिस तरह से वर्तमान सरकार ने सत्याग्रहियों के उपर लाठियां चलाईं व अनुचित कार्रवाई की उससे स्पष्‍ट हो गया है कि सरकार ने लोकतांत्रिक मांगों के आगे घुटना टेक दिया है। साथ ही लोकतंत्र का गला घोटने का काम भी किया है। उसने काले धन को प्रत्यक्ष ना करने की प्रमाणिकता को जाहिर किया।

सलीम अख्तर सिद्दीकीमहेंद्र सिंह टिकैत का किसान नेता के रूप उभार अस्सी के दशक के अंत की अभूतपूर्व घटना थी। मेरठ के लिए वे सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल के तौर पर भी याद किए जाएंगे। मेरठ में 1987 में भयंकर सांप्रदायिक दंगा हो चुका था। सूबे में कांगे्रस की सरकार थी। मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह थे। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास की काली छाया हटने का नाम नहीं ले रही थी। मुसलमान वीरबहादुर सिंह से सख्त खफा थे। फरवरी 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत किसानों की मांगों को लेकर मेरठ कमिश्नरी पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए थे। धरने को सभी वर्गों का भरपूर समर्थन मिला था। मुसलमानों ने इस धरने में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था।

जगमोहनसन '90 में 'जागरण' शुरू हुआ दिल्ली से. अगले ही साल चुनाव आ गया. मैं पंजाब, हरियाणा, हिमाचल का ब्यूरो देखता था. पिछले, '87 के चुनाव में 90 में से 85 सीटें जीती थी ताऊ देवीलाल की पार्टी. वो कितना भी बुरा प्रदर्शन करती तो भी कितनी सीटें कम हो जाती उसकी? मगर 'जागरण' ने एक बड़ी भूमिका निभाई. सरकार बन गई और भजन लाल मुख्यमंत्री. मेरी उनसे पहली मुलाक़ात इस के भी कोई दो हफ्ते बाद हुई. दरअसल उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी अपने आफिस में. कह गए कि छह महीने में एसवाईएल बनवा दूंगा. सब चले गए. मैं पीछे था. मैंने पूछ लिया कि मीडिया तो आज से कैलेण्डर पे टिक करना शुरू कर देगा. न बनवा पाए नहर तो बख्शेगा नहीं. उन्हें लगा बात में दम है. मेरा नाम पूछा. बताया तो गले लगा लिया. बोले, आपके नाम से खबरें पढ़ता था. बहुत मदद की आपने. अगले दिन फिर प्रेस कांफ्रेंस बुलाई. कहा,छह महीने में नहर बनवा देने की बात पे कायम हूँ. मगर ये नहीं कहा कि वो छह महीने शुरू कब होंगे.