कितना अजीब है, देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ रही हैं,  जबकि पंजाब की पहली महिला अपर पुलिस अधीक्षक (डीएसपी) राका गेरा भ्रष्टाचार में पूरी तरह से लिप्त हैं। दोनों महिलाएं हैं। दोनों का पंजाब से नाता है, दोनों दबंग हैं। एक पूरी सर्विस के बाद सीना तानकर खड़ी हो सकती है जबकि दूसरी को मुंह छिपाना पड़ रहा है। एक मूल्यों और आदर्शों के लिए खाकी को खूंटी पर टांगने के लिए हमेशा तैयार रही,  जबकि दूसरी ने खाकी पहन काम से ज्यादा उगाही पर ध्यान दिया। कितनी उगाही करेगी पंजाब की यह पहली महिला डीएसपी। दस लाख, बीस लाख ज्यादा की तो पचास लाख लेकिन नहीं कोई सीमा नहीं। हाथों से नोट कौन गिने लिहाजा घर में नोट गिनने की मशीन भी रखवा ली, मशीन ने नोट ओके किए उधर से मामला भी ओके कर दिया।

गिरीश मिश्र : राजदूत बनते तो जान बच जाती : मुंबई 2008 में 26/11 के आतंकी हमले के बाद फिर से पिछली 13 जुलाई को धमाकों की शिकार हुई. 1993 के बाद पांचवीं बार हुई इस आतंकी वारदात में लगभग बीस लोग मारे गए और अनेक घायल हुए. पिछली दो-ढाई साल से शांत मुंबई में ऐसा लग रहा था कि अब आतंक को काबू में कर लिया गया है, लेकिन ऐसा न हो सका. इसके ठीक एक दिन पहले अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई के छोटे भाई अहमद वली करजई की कंदहार में उनके विश्वस्त सुरक्षाकर्मी ने घर पर ही गोली मार कर हत्या कर दी. इसकी जिम्मेदारी तालिबान ने ली. वैसे तो हर आतंकी वारदात न जाने कितनों को बेसहारा छोड़ जाती है, संपत्ति की क्षति और दहशत के आलम के अलावा परिजनों-मित्रों और समाज के भावनात्मक रिश्तों पर जो गहरी चोट लगती है, उसकी भरपाई लंबे समय तक नहीं हो पाती.

विजय सिंह मुंबई. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि राष्ट्रभाषा के बगैर राष्ट्र गूंगा होता है. पर, आजादी के 62 सालों बाद आज भी यह देश गूंगा ही है. सूचना अधिकार (आरटीआई) से मिली जानकारी के अनुसार संविधान में राष्ट्रभाषा का कोई उल्लेख नहीं है. केंद्र की आधिकारिक भाषा हिंदी जरूर है. आरटीआई कार्यकर्ता मनोरंजन रॉय ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से पूछा था कि इस देश की राष्ट्रभाषा क्या है और हिंदी-अंग्रेजी व संस्कृत में से देश की आधिकारिक भाषा क्या है. केंद्रीय गृह मंत्रालय के उपनिदेशक डॉ. सरोज कुमार त्रिपाठी ने रॉय को जो लिखित जवाब भेजा है, उसके अनुसार संविधान में राष्ट्रभाषा का कोई उल्लेख नहीं है. रॉय के दूसरे सवाल के उत्तर में बताया गया है कि भारतीय संविधान की धारा 324 के तहत हिंदी केंद्र सरकार की आधिकारिक भाषा है.

लोकेंद्र मुंबई में बुधवार (१३ जुलाई २०११) को तीन जगह बम विस्फोट हुए। मुंब्रा देवी मंदिर के सामने झवेरी बाजार में। दूसरा ओपेरा हाउस के पास चेंबर प्रसाद में और तीसरा दादर में। तीनों विस्फोट १० मिनट में हुए। इनमें अब ३१ लोगों की मौत हो चुकी है १२० से अधिक गंभीर हालत में अस्पताल में मौत से संघर्ष कर रहे हैं। भारत में यह आश्चर्यजनक घटना नहीं है। इसलिए चौकने की जरूरत नहीं। शर्मनाक जरूर है। दु:खद है। देशवासियों को ऐसे धमाकों की आदत डाल लेनी होगी, क्योंकि जब तक देश की राजनैतिक इच्छाशक्ति गीदड़ों जैसी रहेगी तब तक धमाके यूं ही होते रहेंगे। हमारे (?) नेता गीदड़ भभकियां फुल सीना फुलाकर देते हैं। करते कुछ नहीं। एक तरफ अन्य देश हैं जो करके दिखाते हैं फिर कहते हैं। अमरीका को ही ले लीजिए। उसने देश के नंबर वन दुश्मन को एड़ीचोटी का जोर लगाकर ढूंढ़ा और उसे उसके बिल में घुसकर मार गिराया।

कुमार सौवीर : शाहन के शाह : नबी के खानदान का लड़का जब अछूत अराई जाति के फकीर के चक्‍कर में पड़ा, तो विरोध तो होना ही था। लेकिन लड़के ने साफ ऐलान किया कि अगर किसी ने मुझे सैयद कहा तो वह जहन्‍नुम में जाएगा और अराई कहा तो सीधे स्‍वर्ग में झूला झूलेगा। ''जेहड़ा सानूं सैयद आखें, दोजख मिले सजाइयां। जो कोई सानूं, राई आखें, भिश्ती पींगा पाइयां।'' नतीजा, खानदान से बेदखल कर दिया गया वह। लेकिन उसे इसकी फिक्र ही कहां थी। वह तो अपने गुरू में अपना आशिक, रांझा, साजन ओर मालिक वगैरह सभी कुछ देखता था। बस गुरू के प्रति इसी भक्ति भाव ने उसे इतना महान बना दिया कि आज उनके साढ़े तीन सौ साल बाद भी उनके और उन पर बनाये गये मस्‍त गीत आधुनिक संगीत संग्रह की साइट यू-ट्यूब पर बेहिसाब हैं। पाकिस्‍तान का एक अंधा गायक जब उनके गीत अपने साथियों के साथ पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा और पुराने वाद्य यंत्रों पर नाचते-गाते हैं तो देखने वाले झूम उठते हैं।

सुभाष राय: सुनो भाई साधो- 7 : मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो ना कोई, गाती हुई कब मीरा पगला गयी, उसे पता ही न चला। राजघराने की एक प्रेम छकी जवान लड़की गली-गली गाती, नाचती निकल पड़े तो बात-बात पर तलवार खींच लेने वालों को कैसे बर्दाश्त होगा। पर पागलपन जहर को भी मार सकता है, यह भी तो उन्हेंपता नहीं रहा होगा। उसने तो सूली ऊपर सेज सजा ली, अब क्या मरना, क्या डरना। वह जान गयी थी कि मिलन का एक ही रास्ता बचा है, खुद को मिटाना पड़ेगा। किसी ने नहीं समझा उस प्रेम दीवानी का दरद। हेरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरो दरद न जाने कोय। कहते हैं दर्द जब हद से गुजर जाता है, तो दवा हो जाता है। मीरा का दर्द ही उसका कृष्ण बन गया। वह अपने भीतर ही पा गयी अपने प्रीतम को। कोई और कैसे समझ पाता उसका दर्द। जिसके भीतर उठा हो, वही तो समझेगा। जो पागल हुआ ही नहीं, वह एक पगली की पीड़ा कैसे समझेगा।

सतीश सिंह आज भी भारत में सेक्स को वर्जना की तरह देखा जाता है। जबकि हमारे देश में खजुराहो से लेकर वात्सायन के कामसूत्र जैसी कृतियों में सेक्स के हर पहलू पर रोशनी डाली गई है। स्वस्थ व सुखी जीवन के लिए संयमित सेक्स को उपयोगी बताया गया है। सेक्स का स्थान जीवन में पहला तो नहीं कह सकते हैं। पर इसका स्थान गेहूं के बाद पर गुलाब के साथ जरुर है। सेक्स शरीर की एक जरुरत है और साथ ही इंसान के जीवन चक्र को जारी रखने वाला जरिया भी। आम जीवन में सेक्स को लेकर बहुत सारी भ्रांतियाँ हैं। जानकारी के अभाव में, परिस्थितियों के कारण या फिर मनोविकार के कारण इंसान बलात्कार जैसा घिनौना कृत्य करके सामाजिक बहिष्कार का पात्र बन जाता है। बलात्कार आज भारत में सबसे ज्वलंत मुद्दा है। बावजूद इसके इस समस्या के तह में जाने का कभी प्रयास नहीं किया गया है।

मदनजीदेश के युवराज को किसानों की चिंता सोने नहीं दे रही है। किसानों की समस्या तभी दूर हो सकती है जब यूपी में सरकार बदल जाये और युवराज की पार्टी सत्ता में आ जाये। युवराज बहुत परेशान हैं यूपी की जालिम सरकार से, जिसने बेचारे निहत्थे किसानों पर गोली चलवाई। युवराज की चिंता जायज है, अगर गोली ही चलवानी थी तो अयोध्या में चलवाती, युवराज भी मदद करते सरकार को बचाने में, जैसे युवराज के पिताश्री ने किया था मुलायम को बचाने के लिये। सैकडों लोग जला दिये गए भट्टा परसौल में। जलनेवाले कहां के थे यह सिर्फ़ युवराज को पता है। उधर बेचारा नत्था उर्फ़ भट्टा परसौल अलग परेशान है किसकी सुने किसे भगाये। अगर कोई सबसे बड़ा हमदर्द है भट्टा परसौल का तो वह भाजपा है,  लेकिन ये नत्था समझता हीं नहीं। वह तो बस फ़िदा है कातिल मुस्कान पर। क्या मुस्कुराहट है युवराज की।

वह युवा था। दिल में जोश। मन में अति उल्लास। उमंगें। तरंगें। कुछ करने की। बहुत कुछ कर गुजरने की। हर एक युवा की तरह। वह साईकिल पर चला करता। अपना गृहनगर गृहराज्य छोड़कर एक दूसरे शहर में बसा। साईकिल चला चलाकर इधर-उधर अपने भविष्य को संवारने के लिए तत्पर रहता। अपने आपको स्थापित करने की धुन। और कुछ समय बाद अचानक उसके बारे में सुना जाने लगा कि उसके योग कार्यक्रम से, उसके कपाल भाति, अनुलोम विलोम आदि प्राणायामों से जनता को बहुत फायदा होने लगा है। उसके कार्यक्रमों में भीड़ जुटने लगी। लोग बताने लगे कि उसके द्वारा प्रचारित व सिखाए जा रहे कार्यक्रमों से उन्हें किस कदर फायदा होने लगा है। वह एक युवा आईकॉन की तरह पनपने लगा। उसने अपनी संस्थाएं खोलीं। हाईटेक सिस्टम के साथ उसका कार्यक्रम आगे बढ़ा।

डा. सुभाष राय: सुनो भाई साधो - 6 : केदार जी की एक कविता की कुछ पंक्तियां देखिये... नदी एक नौजवान ढीठ लड़की है/ जो पहाड़ से मैदान में आयी है/ जिसकी जाँघ खुली / और हंसों से भरी है/ जिसने बला की सुंदरता पायी है/ पेड़ हैं कि इसके पास ही रहते हैं/ झुकते, झूमते, चूमते ही रहते हैं/ जैसे बड़े मस्त नौजवान लड़के हैं। नदी और पेड़ को देखने का यह नजरिया कितना खूबसूरत है। प्रकृति सहज ही सुंदर है। पहाड़, झरने, फूल, तितलियां सभी मन को बरबस मुग्ध कर लेते हैं। परंतु यह भी देखने वाले की नजर पर मुनहसर है। कोई अगर फूल को सिर्फ कारोबारी नजरिये से देखे तो उसके लिए उसके सौंदर्य का महत्व थोड़े पैसों से ज्यादा कुछ नहीं है। चट्टानों को काट, तरासकर बेचने वालों के लिए पहाड़ की क्या महत्ता है?

राजेश त्रिपाठी भारत की जीवन रेखा पावन सुरसरि जिन्हें हम श्रद्धा से गंगा मैया कह कर पुकारते हैं, की रक्षा के लिए 115 दिनों से अनशनरत स्वामी निगमानंद की सोमवार 13 जून को कोमा की अवस्था में हुई मौत अपने पीछे कई सवाल छोड़ गयी है। इस गंगा प्रेमी युवा स्वामी का खामोश बलिदान समाज और सत्ता में बढ़ती असंवेदनशीलता की ओर तो प्रश्न उठाता ही है, इससे सरकार की एक संवेदनशील मुद्दे के प्रति उदासीनता भी उजागर होती है। एक तरह से कहें तो इस बलिदानी का उपेक्षित बलिदान उन सबकी ओर उंगली उठाता है,  जिनके हृदय में न इस निस्वार्थ संन्यासी की जिंदगी बचाने की चिंता थी और न ही उसके उस मुद्दे के प्रति गंभीरता से सोचने की,  जिसके लिए उसने अपने प्राणों की आहुति दी।

सुनील अमर प्रिय निगमानंद, पैंतीस साल की उम्र कुछ कम तो नहीं होती! खासकर उस मुल्क में जहाँ के बच्चे इन दिनों पैदा होने के बाद 35 महीने में ही जवान हो जाते हों, तुम बच्चे ही बने रहे? साधु के साधु ही रह गये तुम और उसी निगाह से इस मुल्क के निजाम को भी देखते रहे? क्या तुम्हें वास्तव में यह नहीं पता था कि अब बच्चे तोतली आवाज में ''मैया, मैं तो चन्द्र खिलौना लैहौं''  न गाकर ''माई नेम इज शीला, शीला की जवानी''  और ''मुन्नी बदनाम हुई''  मार्का गाना गाने लगे हैं? इस तरक्कीशुदा देश में बच्चे तक इच्छाधारी होने लगे हैं निगमानंद लेकिन तुम...?

क्या आपने अपने ई-मेल में 'पहला पहला प्यार' वाला पत्र संजो के रखा हें? या किसी के साथ फ्लर्टिंग किये हुए और लव-लेटर वाले ई-मेल संजो के रखे हैं.? तो, शायद आपकी मृत्यु के बाद ये सब गुप्त बातें आपकी पत्नी या परिवारजन जान जायेंगे. क्योंकि इंन्टरनेट वेब मेल सर्विस कंपनियां जैसे कि याहू, गूगल और  हाटमेल अभी तक यह निश्चित नहीं कर सके हैं कि आपकी इन बॉक्‍स का  मृत्यु बाद क्या किया जायेगा? वास्तव में ई-मेल सर्विस प्रयोक्ता गूगल और हाटमेल कंपनी सोच रही हैं कि यूजर की  मृत्यु बाद उसके ई-मेल एकाउन्ट को उपयोगकर्ता यूजर के परिवारजनों को अथवा उसके वारिसदार को सौंप दी जाए.

बेचारी चवन्नी, अब अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर है। उसकी मौत की तारीख रिजर्व बैंक ने तय कर दी और अब उसकी उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। बस कुछ ही घंटे शेष बचे हैं चवन्नी के। इसके बाद भले ही बाजार में वह दिख जाए पर चलेगी नहीं। क्योंकि उसकी डेड लाइन फिक्स कर दी गई है, तीस जून। जिस उम्र को बाल बच्चों का परिवार जमाने की उम्र कहा जाता है, उस उम्र में चवन्नी दिवंगत होने की कगार पर है। चवन्नी सिर्फ 54 साल की उम्र में सबका साथ छोडऩे जा रही है।

शाहिद मायानगरी मुंबई जहां शाम होते ही रंग बिरंगी लाइटों में डूब जाता है यह शहर. यहां की शाम शाम-ए-अवध तो सुबह बनारस से कम नही.हर शाम लाखों लोग अपनी मस्तियों में डूबने के लिए अपनी तनहाई को दूर करने करने के लिए कहीं ना कहीं कोई ना कोई रास्ता निकाल लेते है. डांस बारों के देर रात तक ना खुलने की वजह से लोगों ने मुजरे का सहारा लिया. मुंबई की बच्चू वाडी, जो कि अपने मुजरों की वजह से मशहूर है. यहां कई कोठे हैं जहां कई सालों से मुजरों की महफिलें सजाई जाती है. जहां ना जाने कितने लोग बरबाद हो गए और कितने करोड़पति कोडी कौड़ी के मोहताज हो गए.

बंशीधर मिश्र अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे/ तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सब/ पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार... । गजानन माधव मुक्तिबोध की ये पंक्तियां कई दशक पहले जिन संदर्भों में लिखी गई थीं, भले वे बदल गए हों पर हालात बिलकुल नहीं बदले। भले ही भारतीय संविधान देश के हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता हो पर असल मायने में यह आजादी किताबी सच बनकर रह गई है। संसद से लेकर सड़क तक सच बोलने पर प्रत्यक्ष और परोक्ष तमाम पाबंदियां और अनगिनत खतरे हैं। सच बोलना और लिखना आज भी सलीब पर चढ़ने जैसा है। अमूर्त और अदृश्य व्यवस्था पर पोथियां लिखने वाला कोई व्यक्ति जब गली के किसी गुंडे को टोक देता है, तो उसे गोलियों से भून दिया जाता है। मंत्री के खिलाफ आवाज उठाने वाले की जुबान खींच ली जाती है और नौकरशाह के खिलाफ कुछ लिखने-कहने वाले को जेल में ठूंस दिया जाता है।