दिल्ली में, जहाँ मैं रहता हूँ उसके आस-पास अंग्रेज़ी पुस्तकों की तो दर्जनों दुकाने हैं, हिंदी की एक भी नहीं। हक़ीक़त तो यह है कि दिल्ली में मुश्किल से ही हिंदी पुस्तकों की कोई दुकान मिलेगी। टाइम्स आफ इंडिया समूह के समाचार पत्र नवभारत टाइम्स की प्रसार संख्या कहीं ज़्यादा होने के बावजूद भी विज्ञापन दरें अंग्रेज़ी अख़बारों के मुकाबले अत्यंत कम हैं। इन तथ्यों के उल्लेख का एक विशेष कारण है। हिंदी दुनिया में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली पाँच भाषाओं में से एक है। जबकि भारत में बमुश्किल पाँच प्रतिशत लोग अंग्रेज़ी समझते हैं।

मुझे जीवन में करीब पांच साल शिक्षक के रूप में काम करने का मौक़ा मिला. पहली बार 1973 में जब मैं एक डिग्री कालेज में इतिहास का मास्टर था. दो साल बाद निराश होकर वहां से भाग खड़ा हुआ. वहां बीए के बच्चों को इतिहास पढ़ाया था मैंने. वे बच्चे मेरी ही उम्र के थे. कुछ उम्र के लिहाज़ से मेरे सीनियर भी रहे होंगे. लेकिन आज तक हर साल 5 सितम्बर के दिन वे बच्चे मुझे याद करते हैं. कुछ तो टेलीफोन भी कर देते हैं. दुबारा 2005 में फिर एक बार शिक्षक बना. इस बार पत्रकारिता पढ़ाता था. तीन बैच के बच्चे मेरे विद्यार्थी हुए. यह दौर मेरे लिए बहुत उपयोगी था. पत्रकारिता का जो सैद्धांतिक पक्ष है उसके बारे में बहुत जानकारी मुझको मिली. अपने विद्यार्थियों के साथ-साथ मैं भी नई बातें सीखता रहा. तीन साल बाद नौकरी से अलग  हो गया. शायद वहां मेरा काम पूरा हो चुका था. लेकिन इन वर्षों में मैं ने जिन बच्चों को पढ़ाया उन पर मुझे गर्व है.

हम आजाद हैं। पूरी तरह आजाद। कुछ भी करने के लिए आजाद। कुछ भी कहने के लिए आजाद। काम करने के लिए और काम न करने के लिए भी। भद्र भाषा के इस्तेमाल के लिए और अभद्रभाषा के प्रयोग के लिए भी। रिश्वत खिलाने के लिए और रिश्वत खाने के लिए भी। हमने जब से आजादी पायी है, उसके भरपूर दोहन में लगे हैं। जो कुछ भी किया आजादी से। भ्रष्टाचार हो या अनाचार या दुराचार, हम हर मामले में आजाद हैं। हमारी जितनी समस्याएं हैं, हमें पता है, वे सभी हमारी आजादी का सुफल है। कई बार हम इसीलिए अंग्रेजों को याद करते हैं और कहते हैं कि इससे तो अच्छे वो दिन थे। एक रुपये में एक किलो घी मिलता था। पांच रुपये में घर-गृहस्थी का महीने भर का सामान आ जाता था। जिन्हें महीने के दो सौ रुपये की तनख्वाह मिलती थी, वे ठाट से जिंदगी गुजारते थे।

भ्रष्ट सरकार की जड़ों में मट्ठा भरने वाले और उसे आकाश से रसातल में लाने वाले अन्ना हजारे एक पखवाड़े तक अख़बारों और चैनलों की 'हेडिंग' बने रहे. अन्ना रोज अख़बारों के कई-कई पन्ने देशभक्ति के रंग में रंगवाते और चैनलों पर घंटों जनतंत्र की शक्ति दिखाते दिखे. पुंछ से कन्याकुमारी और तिनसुकिया (असम) से पोरबंदर तक सभी प्रमुख शहरों में लगी 'अन्नामयीं होर्डिंगें' युवाओं में जोशोखरोश पैदा करती रहीं. तो पानी को मम बोलने वाले बच्चे से लेकर बोलने को तरसने वाले बुजुर्ग तक की जुबान पर 'अन्ना हजारे' और सिर पर 'मैं अन्ना हूँ' की टोपी छाई रही. पूरे देश में लाखों मोमबत्तियों ने देशहित में क़ुरबानी दी. वहीं दक्षिणपंथियों, चरमपंथियों और सेकुलरों ने सुर में सुर मिलाये.

: वीर दुर्गादास जयन्ती पर विशेष : ख्यातो में दुर्गादास मारवाड़ के रक्षक की उपाधि से विभूषित राष्ट्रीय वीर दुर्गादास राठौड़ का व्यक्त्वि कृतित्व ना केवल ऐतिहासिक दृष्टि से उल्लेखनीय है बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अभिनन्दनीय है। वीर दुर्गादास इस जिले के गौरव पुरुष है। जिन्होने इतिहास रचा। मुगलों के दमन चक्र को कुचल कर मारवाड़ राजघराने का अस्तित्व बनाए रखा। वीर दुर्गादास की कर्मभूमि के रुप में कोरना में (कनाना) का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। सौभाग्य से कनाना बाड़मेर जिले का हिस्सा है। बाड़मेर जिले में जन्म लेकर वीर दुर्गादास ने बाड़मेर की धरा पर उपकार किया। 13 अगस्त 1638 को सालवा कला में द्वितीय सावन सुदी 14 वि.स. 1695 में उनका जन्म आसकारण जी के परिवार में हुआ। जोधपुर नरेश जसंवतसिंह के सामान्त एवं सेना नायक का पुत्र होने को गौरव उनके साथ था। सादगी पसन्द दुर्गादास बचपन से निडर थे।

कारपोरेट्स घरानों को बैंकिग लाइसेंस देने का रास्ता अब साफ हो गया है। इनको लाइसेंस देने के लिए जरुरी कवायद तकरीबन छह माह से किया जा रहा था। वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में घोषणा कि थी कि चालू वित्तीय वर्ष यानी 2011-12 के अंत तक बैंकिंग लाइसेंस देने के नियमों की घोषणा कर दी जाएगी। गौरतलब है कि बैंकिंग लाइसेंस हासिल करने के लिए कारोबारी घराने लाबीइंग के जरिए सरकार को अपने पक्ष में करने की कोशिश कई सालों से कर रहे थे।इस परिप्रेक्ष्य में 29 अगस्त, 2011 को भारतीय रिजर्व बैंक ने नये बैंकिंग लाइसेंस से संबंधित मसौदे के दिशा-निर्देश को जारी किया।

: 12 अगस्‍त पर विशेष : वैसे तो साल के हर दिन और हर माह आजादी कि जंग के गवाह हैं लेकिन अगस्त के महीने का १२ तारीख क्रांतिवीरों की शहादत की गाथा को इतिहास के पन्नों में लिखे अक्षरों को कुछ ज्यादा ही चमकदार बना दिया है.  फ़रवरी १९४२ में जब गान्धी जी ने आजादी की अंतिम लडाई के लिए हुंकार भरी तो क्रांतिवीरों का खून अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खौल उठा. फ़रवरी १९४२ से जुलाई १९४२ तक इन ५ महीनों में जंगे आजादी की धार को तेज करने कि रणनीति बनायीं गयी. अंग्रेजी हुक्मरानों को जब गांधी जी की इस योजना की जानकारी हुयी तो वह आन्दोलन को नष्‍ट करने के लिए देश के हर हिस्से से छोटे-बड़े नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया. नेताओं कि गिरफ्तारी ने हिन्दुस्तान के युवाओं की रग़ में बह रहे खून की गति को बढ़ा दिया.  १२ अगस्त १९४२ के दिन  युवाओं के निशाने पर आ गए सरकारी भवनों पर फहर रहे अंग्रेजी यूनियन जैक.

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र आज ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां लोकतंत्र की मर्यादा और लोक हक सब कुछ दांव पर लगा है। किसी भी लोकतन्त्र के लिए इस से बुरा किया होगा कि लोक के द्वारा चुनी गई सरकार सर से लेकर पांव तक भ्रष्टाचार में डूबी हो, जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त हो और विपक्ष सत्ता पाने के दिव्य स्वप्न देखने में व्यस्त रहे। विपक्ष सरकार के जनविरोधी नीतियों पर घेर कर जवाब तलब करने की बजाय सरकार की दुर्दशा का जश्न मना रही है,  क्योंकि उनको लगता है कि इसके बाद सत्ता उनके हाथ आने वाली है और परम आनंदित विपक्ष विरोध के नाम पर मीडिया के सामने महज शब्द वीरता दिखा रहा है। एक समय था जब विपक्ष सरकार के घोटाले को उजागर करता था और उसके बाद अखबारों की सुर्खियाँ बनती थी,  लेकिन आज विपक्ष का काम मीडिया आरटीआई कार्यकर्ता व समाज सेवी संस्था करती है।

कौन याद रखता है अंधेरे वक्त के साथियों को सुबह होते ही चिरागों को बुझा देते हैं। आज 10 अगस्त के बेशर्म सन्नाटे के गुजरने के बाद यह शब्द श्रद्धांजलि समर्पित है एक ऐसे जाबांज शहीद को जो नामचीन नहीं है लेकिन शहादत के रिवाज में वह अगड़ा है, पर अफसोस हमे मालूम नहीं। अपने बुड्ढ़े व लाचार मां बाप के सपनों को देश के लिए स्वाहा करने वाले मध्यम वर्गीय परिवेश के इस शहीद की शहादत की याद देश को कराना इसलिए जरूरी है कि करो या मरो के आन्दोलन में यह देश का पहला बलिदान था। पर अफसोस कि हमें मालूम नहीं कि वह भी सन 1942 की 10 अगस्त थी।

भले ही पूरा देश अण्णा के साथ हो और देशभर में इस आन्दोलन को फैलाने का जज्बा रखता हो लेकिन उघोग जगत जिसे इंडिया इंक के नाम से जाना जाता है सरदार मनमोहन की कृपा से इस बार अण्णा हजारे के साथ नहीं है। पांच माह पहले जब अण्णा ने पहली बार भूख हड़ताल की थी, तब पूरा उघोग जगत उनके साथ था, जिसे सरदार जी ने अपने दबाब में लेकर अपने साथ कर लिया। देश के दो सबसे बड़े और प्रमुख उघोग चेम्बर फिक्की और सीआईआई ने अण्णा की गिरफ्तारी पर सरकार समर्थित बयान जारी किया। ये दोनों संगठन इस वजह से भी नाराज हो गये, क्योंकि अण्णा हजारे ने 15 अगस्त के संवाददाता सम्मेलन में कई बार कहा कि यह सरकार उघोगपतियों की है और उद्योगपतियों के इशारे पर आम आदमी को नुकसान पहुंचा रही है। एक प्रमुख उद्योगपति ने कहा भी कि अण्णा का बयान 1960 और 1970 के दशक की याद दिला गया जब देश में हर गडबड़ी के लिए उघोग जगत को दोषी ठहराया जाता था।

जीवन में जो आज है ज़रूरी नहीं वह कल भी रहे. जो संगी साथी आज हैं वह कल बिछड़ भी सकते हैं. जो दौलत का अम्बार है जो साज़ो सामान है वह कल रहे न रहे कौन कह सकता है. जापान में आई सुनामी में किसका क्या बचा किसका क्या रहा कोई सोच सकता है. इसी प्रकार माता पिता, भाई बहन रिश्तेदार कब तक आप का साथ देंगे किसे मालूम है. इसी लिए हर इन्सान डरा सहमा सा रहता है कि कहीं यह सब चला न जाये. अंत तक लड़ता है अपना सब कुछ बचाने के लिए. और जब कुछ खो जाता है तो परेशान हो जाता है. वह यह नहीं सोचता कि आख़िर पीर फ़क़ीर पैग़म्बर, संत और इश्वर के दूत यह सब त्याग कैसे देते हैं. उनकी ज़रूरतें इतनी कम क्यों हैं. जीवन को चलाने के लिए कितना चाहिए.. आज तो स्थिति यह हो गयी है कि और.. और... और... और...की आवाज़ ने सब को प्रक्रति से दूर कर दिया है.

ऐसा नहीं है कि हर कोई अन्ना हजारे के आंदोलन का समर्थन कर रहा है बहुत से लोग उसका विरोध भी कर रहे हैं. मगर विरोध में कोई भी ऐसा तर्क सामने नहीं आ रहा है,  जिसका समर्थन वास्तव में किया जाये. यह रहा उन तर्कों का जबाब जो आंदोलन के विरोध में दिए जा रहें हैं-  पहली बात कानून बनाने का काम संसद का है और कोई भी उसको चुनौती नहीं दे सकता है:-  यह तर्क सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है मगर यह सत्य नहीं है. सबसे पहली बात अगर हम संविधान को पढ़े तो उस में सबसे पहले यही लिखा है कि 'हम भारत के लोग आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान सभा में इस संविधान को अंगीकृत पारित एवं स्वयं को समर्पित करते हैं'  इन पंक्तियों से ही स्पष्ट है कि हमारा संविधान हमारे ( भारत की जनता ) द्वारा लिखा गया है. इसमें कहीं यह नहीं लिखा है कि हम भारत के नेता या चुने हुए जनप्रतिनिधि यह संविधान बना रहे हैं. हालाँकि इसमें यह नहीं लिखा है कि जनता ही इसमें संशोधन कर सकती है ( यह अधिकार जनप्रतिनिधियों को दिया गया है. मगर उन्हें भी हम ही चुनते हैं) अतः स्पष्ट है कि जनता सर्वोच्च है न कि जनप्रतिनिधि.

बंशीधर मिश्र चीन की समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने कोई एक हफ्ते पहले एक खबर जारी की थी। वहां के दो शहरों के डिप्टी मेयरों को फांसी दे दी गई। झोझियांग प्रांत के हांगझोऊ के पूर्व उपमेयर शू मेइयोंग और जियांगशू प्रांत के सुझोउ के पूर्व उप मेयर जियांग रेंजी को भ्रष्टाचार का दोषी पाए जाने पर मौत की सजा सुनाई गई थी। सजा तीन साल पहले सुनाई गई थी। ऊंची अदालतों में अपील पर अंतिम फैसला आने में इतना समय लगा। 19 जुलाई को उन दोनों की सजा पर अमल हुआ। भ्रष्टाचार के आरोप में वहां फांसी की यह कोई पहली घटना नहीं है। करीब तीन साल पहले चीन में एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री को भ्रष्टाचार का दोषी पाए जाने पर शहर के प्रमुख चौराहे पर सरेआम फांसी पर लटका दिया गया। अर्थात चीन के साम्यवादी शासन में सही मायने में कानून का राज है। भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर वहां की राजनीतिक और न्यायिक व्यवस्था इतनी सख्त है जिसकी भारत में कल्पना ही नहीं की जा सकती।

मूर्तिपूजकों के इस समाज को एक नयी मूर्ति मिल गयी है- अन्ना हजारे. दकदक सफ़ेद कुरता-धोती पहने और सिर पर टोपी रखे अन्ना हजारे इस समय उस प्रत्येक मानवीय श्रेष्ठता की निशानी माने जा रहे हैं जो हम पूजनीय मानते हैं. वे अद्भुत हैं, वे श्रद्धेय हैं, वे महान हैं, वे परम राष्ट्रभक्त हैं, वे गज़ब के ईमानदार हैं, वे युगद्रष्टा हैं, युगप्रवर्तक और एक नए युग के रचयिया के रूप में सामने आये हैं. वे इस देश की नयी रोशनी हैं, वे इस देश और इसके देश्वासियों के नए रखवाले हैं, वे हम सभी का उद्धार करने आये हैं. उनके असीम बुद्धि और विवेक है. वे जो कुछ भी कह देते हैं वह अंतिम सत्य होता है, आदि-आदि.

सतीश सिंह कांग्रेसनीत सरकार की आलाकमान सोनिया गाँधी के चुनाव क्षेत्र रायबरेली के खीरो ब्लॉक का कन्हामऊ गाँव सालों से फ्लोरोसिस नामक जलजनित बीमारी से जूझ रहा है। ढाई सौ घरों वाले इस गाँव में एक हजार की आबादी है। यहाँ बच्चों के स्वस्थ जन्म लेने की संभावना जरुर रहती है। लेकिन उनकी मौत विकलांग की अवस्था में होना तय माना जाता है। दरअसल, इस गाँव के आसपास के इलाके के भूजल में फ्लोराइड की मात्रा निश्चित मानक से बहुत ज्यादा पाई जाती है।

: शिवाला युद्ध के दो सौ तीस साल : घोड़े पर हौदा-हाथी पर जीन/ चुपके से भागा वारेन हेस्टिंग. यह कहावत आज भी बनारस (काशी या फिर वाराणसी के नाम से जानते हैं) क़ी गलियों में पुराने लोगों के बीच लोकप्रिय है. इसके पीछे एक कहानी है. कहते हैं कि आज से लगभग दो सौ तीस साल पहले काशी राज्य क़ी तुलना देश क़ी बड़ी रियासतों में क़ी जाती थी. भौगोलिक दृष्टिकोण से काशी राज्य भारत का ह्रदय प्रदेश था. जिसे देखते हुए उन दिनों ब्रिटिश संसद में यह बात उठाई गई थी कि यदि काशी राज्य ब्रिटिश हुकूमत के हाथ आ जाये तो उनकी अर्थ व्यवस्था तथा व्यापार का काफी विकास होगा.