स्वच्छ भारत का एक महानगर। पूरी तरह स्मार्ट सिटी। जगह-जगह कचरे के ढेर। जगह-जगह बन्द शौचालय, जिनके आसपास भयानक दुर्गन्ध। खुले में शौच करने की कोई सुविधा नहीं। दूर-दूर तक कोई फलदार वृक्ष नहीं।  प्यासों को पीने के लिए मुफ्त पानी कहीं उपलब्ध नहीं। न मनुष्यों के लिए, न पशु-पक्षियों के लिए। शहर केेेे हर इलाके में खुले गन्दे नाले बह रहे हैं। पशु-पक्षी बेहाल होने पर इन्हीं नालों के पानी से प्यास बुझा लेते हैं। गॉंव से पलायन कर शहरी जीवन का लुत्फ उठाने आयेे काक-कोकिला एक सूखे वृक्ष की डाल पर मायूस बैठे हैं। रुऑंसे काक-कोकिला के बीच हँसी-मजाक चल रहा है।

महाराजा अग्रसेन की जन्म जयन्ती 1 अक्टूबर, 2016

-ललित गर्ग-

कुशल शासकों की कीर्ति किसी एक युग तक सीमित नहीं रहती। उनका लोकहितकारी चिन्तन कालजयी होता है और युग-युगों तक समाज का मार्गदर्शन करता है। ऐसे शासकों से न केवल जनता बल्कि सभ्यता और संस्कृति भी समृद्ध और शक्तिशाली बनती है। ऐसे शासकों की दृष्टि में सर्वोपरि हित सत्ता का न होकर समाज एवं मानवता होता है। ऐसे ही महान् शासक  थे महाराजा अग्रसेन। वे कर्मयोगी लोकनायक तो थे ही, संतुलित एवं आदर्श समाजवादी व्यवस्था के निर्माता भी थे। वे समाजवाद के प्रणेता, गणतंत्र के संस्थापक, अहिंसा के पुजारी व शांति के दूत थे। सचमुच उनका युग रामराज्य की एक साकार संरचना था जिसमें उन्होंने अपने आदर्श जीवन कर्म से, सकल मानव समाज को महानता का जीवन-पथ दर्शाया। उस युग में न लोग बुरे थे, न विचार बुरे थे और न कर्म बुरे थे। राजा और प्रजा के बीच विश्वास जुड़ा था। वे एक प्रकाश स्तंभ थे, अपने समय के सूर्य थे जिनकी जन्म जयन्ती इस वर्ष 1 अक्टूबर 2016 को  मनाई जा रही है।

By Justice Katju

I had said in my earlier posts that our national aim must be to make India a modern, highly industrialized, prosperous country in which all our citizens, not just a small minority, are getting decent lives and enjoying a high standard of living ( see my two articles ' Our National Aim ' on my blog justicekatju.blogspot.in ). I also said that this is only possible by a revolution, not reforms. Our state institutions ( Parliament, the judiciary,... bureaucracy, etc ) have largely become hollow and empty shells, and the Constitution, which did serve a useful purpose for some time, has now exhausted itself ( see my article ' A French Revolution is coming in India' on my blog ).. No amount of tinkering with the present system in India will do. The solution to our massive problems lie outside the system, not within it.

मिर्जा गालिब कितने महान शायर हैं यह जानने के लिए-- या यह मानने के लिए कि वह कितनी गहरी समझ और गहरी अभिव्यक्ति के शायर हैं, उनकी सम्पूर्ण रचनावली से गुजरने की जरूरत नहीं है। इसके लिए उनका कोई एक शेर ही काफी है। आज अपने घर के ऊपर और आसपास छायी बदली को बार-बार कातर दृष्टि से देख रहा हूँ और मिर्जा गालिब के इस शेर का अर्थ समझने की कोशिश कर रहा हूँ--

गालिब छुटी शराब पर अब भी कभी
पीता हूँ रोज-ए-अब्र ओ शबे-माहताब में 

: गोनू झा कहिन (दो) : एक दिन भरी दोहपर में ही गोनू झा अपना पोथी-पत्रा का भंडार खोल कर सड़क के बीच में ही बैठ गए. जनता परेशान कि उनको अचानक क्या हो गया. आखिर में गाँव के सरपंच से रहा नहीं गया. उसने जाकर पूछ ही लिया कि पंडित जी ये क्या कर रहे हैं. बस क्या था! गोनू झा भड़क गए और सरपंच को ही दो-चार सुना डाली और साथ ही यह भी कहने से नहीं चूके कि उन्होंने अपनी पत्नी से दस साल पहले जो वादा किया था उसको पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. मगर उनकी फरमाइश क्या थी वही एक कागज़ में लिखा था, जिसको वो बेसब्री से तलाश कर रहे थे. कहीं, वो कागज़ मिल गया जिसमे ये लिखा था कि:-

स्व-जागृति : बीती सदियों में इंसान सार्थक ज्ञान के सन्निकट पहुँच जाता था तो वह संसारिक झंझावातों से दूर हटकर स्वयं में लीन हो जाता था। इसे सनातन धर्म में समाधि, जैन धर्म में कैवल्य और बौद्ध धर्म में निर्वाण कहा जाता है। मुख्यतः यह योग का अन्तिम पड़ाव होता है जिसमें इंसान परम-जागृत यानी परम-स्थिर हो जाता है। इसे हम आधुनिक भाषा में परम स्वतंत्र अतिमानव या सुपरमैन भी कहते हैं। संस्कृत में भी कहा गया है -

"तदेवार्थ मात्र निर्भासं स्वरूप शून्यमिव समाधि।।
न गंध न रसं रूपं न च स्पर्श न नि:स्वनम्।
नात्मानं न परस्यं च योगी युक्त: समाधिना।।"

आशय यह है कि ध्यान का अभ्यास करते-करते साधक ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है कि उसे स्वयं का ज्ञान नहीं रह जाता और केवल ध्येय मात्र रह जाता है, तो उस अवस्था को समाधि कहते हैं।

यह सुखद संयोग है। एक तरफ मोहन, दूसरी तरफ माया। यह जगत इन्हीं दोनों की परमलीला का सुघड़ मंच है। युग का तेवर बदल गया है। अब दोनों अपनी-अपनी सत्ता के लिए संघर्षरत है। मोहन वैसे तो महान है, लीलामय हैं पर अहोरूपम् अहोध्वनि: की आकर्षक ध्वनि-प्रतिध्वनि के जाल में घिरे हैं। सभी आत्मरति के, आत्मसम्मोह के शिकार हैं। सबको प्रशंसा चाहिए। गणेश परिक्रमातुर चाटुकार अपने-अपने झाल-मजीरे लेकर प्रशस्तिगायन में जुटे हैं। मोहन मंडली का गुणगान ही परमभक्ति है। चतुर भक्त जानता है किस देवता को कैसे प्रसन्न करना है, वरदान और अभयदान कैसे प्राप्त करना है।

गुजरात के ऊना में गो हत्या के आरोप में दलितों के साथ मारपीट अक्ष्म्य है। महाराष्ट्र में दलित बालिका से दुराचार अमानवीय है। सिर्फ 15 रूपये के लिए दलित दंपत्ति की हत्या क्रूरतम है। लेकिन इन सबके बीच ‘बिना आमदनी वाले साधन के करोड़ों में खेलने’ और ‘टिकट बेचने की बेहतरीन व्यापारिक प्रतिभा’ के हर आरोप से खुद को दलित की बेटी कहकर बचा लेने के फन में माहिर उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती पर भाजपा नेता दयाशंकर सिंह का बयान देश के बुद्धिवादियों की बैठकों और जाति निरपेक्ष चैनलों के कैमरों के सामने दलित विमर्श के दायरे में कैसे आ गया। मान लिया कि विमर्श भी अपनी सुविधा और सरलता के अनुसार किये जाते हैं तो कभी ‘सवर्ण महिला की इज्जत’ को भी ‘इज्जत’ समझकर ही जोरदार विमर्श में शामिल कर लेने की सुविधा और सरलता की ओर कदम बढ़ाने की जरूरत फिलहाल कब समझी जाएगी।

सुबह होना जितना जरूरी है अखबार होना भी उतना ही जरूरी है। सुबह यदि अखबार नहीं तो लगता ही नहीं की सुबह हो गई। तड़के अखबार का आ जाना बड़ा सुकून देता है पढ़े भले कभी भी मगर अखबार का सुबह होना जरूरी। नेता हो, अभिनेता हो, पत्रकार, पाठक, लेखक, कलाकार, व्यापारी, उद्योगपति, मंत्री, संत्री, अफसर सब के घर सुबह का अखबार होना जरूरी। समाचारों में कुछ हो या न हो मगर अखबार की सुर्खियों के साथ चाय-पान का आनन्द ही कुछ और है और यदि अखबार में अपनी तारीफ या विरोधी के घर छापा पड़ने का समाचार हो तो क्या कहना। बाछें खिल जाती है। चेहरे पर मधुर मुस्कान छा जाती है। चिड़ियों की चहचहाट और भी मधुर लगने लग जाती है। लेकिन समय बदल गया है। अखबार बदल गये है। आप कहेंगे अखबारो में होता क्या है? हत्या, बलात्कार, चोरी, चेन खींचने की घटनाओं के अलावा।

सन्तोष देव गिरि

कहते है राजनीत जो ना करा दे। राजनीत में कब क्या हो जाए कहा नहीं जा सकता है। जैसा कि इन दिनों उत्तर प्रदेश में हो रहा है। एक नारी जो अपने को ‘‘देवी’’ कहने से भी गुरेज नहीं करती है। उन पर एक भाजपा नेता की टिप्पणी ने ऐसा तुफान खड़ा किया कि न केवन उन जनाब को अपनी ही पार्टी से बाहर का रास्ता दिखला दिया गया, बल्कि उन्हें भूमिगत भी होना पड़ गया है। तुफान यहीं खत्म नहीं होता है अब देखिए इसी देवी के अनुयायी (पार्टी के कार्यकर्ता) सूबे की राजधानी में भारी संख्या में जुटते है और सभा के बहाने नारी अपमान का बदला नारी का अपमान करते हुए लेते है। वह भी चिल्ला-चिल्ला कर एक के बदले पूरे परिवार..... का नाम लेते हुए।

नेट पर लन्दन से एक लेखिका की लिखी रिपोर्ट ने वास्तव में भारतीय होने पर शर्मिंदगी का भाव पैदा किया है. उस रिपोर्ट के अनुसार लन्दन में अभी ओलम्पिक गेम होने में करीब साल भर का समय शेष है लेकिन उस आयोजन की लगभग सारी तैयारियां पूरी हो चुकी है. स्टेडियम बनकर तैयार हैं. बस अन्दर की कुछ सजावट बाकी है जो जल्दी ही पूरी कर ली जाएगी. और ये स्टेडियम इंतज़ार करेगा 1 साल ओलम्पिक के शुभारम्भ का, जिसमें पूरी दुनिया के 205 देशों के 14,700 प्रतिभागी हिस्सा लेने वाले हैं. अब इस खबर के बरक्श भारत में आयोजित हुए राष्ट्रकुल खेलों को याद कर लें. ‘अभी भी हम लन्दन के गुलाम ही हैं’ ऐसा याद दिलाने वाले इस खेल में हमने अपने महारानी के देश से ही कोई सबक नहीं लिया! इस गरीब देश का पैसा गंदे पानी की तरह बहाने के बावजूद उस खेल के नाम पर भारत में कितने ‘खेल’ हो गए यह सबको पता है.

इंद्र भूषण सिंह

भारत के मुख्य न्यायाधिपति महोदय,

माननीय उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की केंद्र सरकार द्वारा नियुक्ति न किए जाने के दुःख से आप की आंखों में आंसू आ गए, यह देख कर हम सभी अधिवक्ताओं को भी अति दुःख हुआ और हमारे भी आंखों में आंसू आ गए परंतु माननीय न्यायालयों से आम जनता को न्याय न मिल पाने के कारण भी क्या आप की आंखों में कभी आंसू आए? क्या आप को यह लगता है कि आप के सभी न्यायाधीश बहुत ही ईमानदार व योग्य है? क्या कारण है कि सालों साल बीत जाने के बावजूद भी, एक भी न्यायाधीश, चाहे वो अधीनस्थ न्यायालय या उच्च न्यायालय का हो, उन पर भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़ कर, उन के ऊपर कोई मुक़दमा नहीं चलाया जाता।  इतने बड़े न्यायपालिका में बस चंद ऊंगलियों पर गिनने लायक ही उदहारण हैं, बाक़ी क्या सब ईमानदार हैं?

स्त्री वामा है, अर्धांगिनी है, श्रेष्ठा है। वह कमला भी है शक्ति भी है और दुर्गा भी है, वह कुलटा, हरजाई और भोग्या भी है। ये सारे नाम समय-समय पर उसे पुरुषों ने दिये। जब जैसा स्वार्थ जगा तब वैसी पुकार लगायी। कभी उसके सौंदर्य और शक्ति को सराहा तो कभी अपनी गलतियां छिपाने के लिए उसे दुत्कारा, लांछित भी किया। अपनी भीरुता, कापुरुषता के क्षणों में स्त्री की जरूरत पड़ी तो उसे दुर्गा कहा, अपने अहंकार को छिपाकर सामाजिक स्वीकृति के विस्तार की आकांक्षा हुई तो वामा कहा। लगाम अपने हाथ में रहे, लगातार ऐसी कोशिश की। वह भोग्या और जननी के रुप में स्वीकार की गयी पर जब कभी उसने अपने सपने की, अपनी आकांक्षाओं की बात की तो उसे दुत्कारने, दंडित करने में पुरुष को तनिक देर नहीं लगी।

तरुण वत्स

टीवी और कॉमेडी का चर्चित चेहरा कपिल शर्मा ऐसा नाम है जिसे हर घर में जाना पहचाना जा रहा है। कुछ समय पहले ही साहब एक मोबाइल कंपनी के एड में हिंदी के प्रचार प्रसार के बहाने इसकी ब्रांडिंग करते नज़र आये थे जिस पर काफी हो हल्ला हुआ था लेकिन 16 जुलाई को अपने कार्यक्रम ‘द कपिल शर्मा शो’ में ग्रेट ग्रैंड मस्ती के अभिनेताओं के साथ खुद ही हिंदी का मज़ाक उड़ाते नज़र आये।

यह दुनिया है और दुनिया भी कैसी कि यहाँ आँख खोलने के बाद इन्सान रोना शुरू कर देता है... और अगर रोए नहीं तो उसको रुलाया जाता है... क्योंकि यहाँ आकर जो नहीं रोया तो वह ज़िन्दा नहीं समझा जाता... कभी हस्पताल जाकर देखा करो जब तक नया जीवन आते के साथ ही रोता नहीं है तो माता पिता के चहरे नहीं खिलते... है न कमाल... इन्सान आता है तो रोता है और जाता है तो रुलाता है... जो सत्य की खोज में रहते हैं वह तो इसी आने-जाने को लेकर चिंतन करें तो उन्हें कहीं और जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी...यह बिलकुल ऐसा ही है कि खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आने... दुनिया में आये... इधर उधर घूमे फिरे... यहाँ वहाँ देखा.. मगर जाते समय पता चला कि कुछ देखा ही नहीं ...जो देखा था वह तो सिर्फ एक मृग तृष्णा भर है... प्यास ऐसी है कि सागर पी जाने को दिल मचलने लगे.

A fb message from Imran Khan. He has permitted me to mention his name :

Sir,

Pakka Muslim wo hai jo terrorism ke khilaf hai, aur un logon ke bhi khilaf hai jo dharm ke nam pe terrorism phaila rahe hain, kyoki ISLAM kabhi terrorism nahi sikhata, ye sab jaante hain.