बहुत मुश्किल है। समझ नहीं आ रहा है कि क्या करूं। इधर कई बार कुछ लिखने की कोशिश की लेकिन जब तक एक विषय पर लिखने का मन बनाया तब तक कोई दूसरी घटना हो जाती, जो पहली से बड़ी लगती। जब तक उस पर सोचा तब तक उससे बड़ी बात हो जाती। यही करते-करते एक माह से अधिक बीत गया। अब लगने लगा है कि  जिस तरह खबरों का सिलसिला लगातार जारी रहता है और एंकर बाद में कह जाता है कि आप देखते रहिए, उसी तरह आप देश को और उसकी हालात को देखते रहिए। आपके टीवी बंद कर देने से यह क्रम टूटेगा नहीं। इस देश की क्या हालत हो गई है। किस पर भरोसा करूं। देश भ्रष्टाचार में आकंठ डूब चुका है। अभी बहुत समय नहीं बीता जब राजनीति बहुत नेक पेशा माना जाता था। बल्कि इसे तो पेशा माना ही नहीं जाता था। यह तो समाज सेवा का एक माध्यम था। इसमें भी बहुत समय नहीं बीता जब हर तरह के भ्रष्टाचार में, घपलों में, घोटालों में किसी न किसी नेता की ही संलिप्तता पाई जाने लगी। इसके बाद नेता का मतलब बहुत ही तुच्छ व्यक्ति हो गया। लोग नेता शब्द से ही घृणा करने लगे।

दीपक जानी मानी पत्रकार मृणाल पांडे भारतीय मीडिया जगत की एक बड़ी शख्सियत हैं, लेकिन उनका एक और परिचय है, वह है अपने दौर की मशहूर साहित्यकार रहीं शिवानी की बेटी के रूप में। पर इधर मृणाल पांडे, अपनी मां शिवानी को अपने कुछ अनुभवों को लेकर उन्हें ज्योतिषी घोषित करने पर तुली हुई हैं। राष्‍ट्रीय सहारा के रविवासरीय उमंग नाम के परिशिष्ट में मृणाल के हवाले से उनके कुछ अनुभवों को आलेख की शक्ल में दर्ज किया गया है। मां के साथ अपने अनुभवों के आधार पर मृणाल, शिवानी की दिव्य दृष्टि का हवाला देते हुए उन्हें भविष्यवक्ता बता रहीं हैं। आलेख में मृणाल कहतीं, ‘आह! देखने में कितना सुन्दर और स्वस्थ लड़का है, कौन कह सकता है, लेकिन विधाता की लेखनी को कौन बदल सकता है?' यह शब्द बोलकर मां शिवानी चुप हो गई। मैंने उनसे पूछा, ‘आप इस तरह क्यों कह रही हैं, इस प्रश्न पर मां ने अपनी जीभ काटी और बोली कि मुझे तो इसके स्वास्थ्य में कुछ गड़बड़ नजर आती है।’ मैं सहम कर बोली, ‘मां ऐसा मत कहो’, लेकिन मै अपनी मां की दिव्य दृष्टि से परिचित थी। ऐसे अनके वाकये हुए, जब उन्होंने किसी व्यक्ति से पहली बार मिलते ही कुछ महसूस किया, देखा और भविष्यवाणी कर दी। उनकी लेखनी पर जहां सरस्वती विराजती थी, वहीं उनकी वाणी पर भी भगवान की कृपा थी।

भूपेन्‍द्र भाई संपादक जी आप महान हैं, आप का अखबार, चैनल और पोर्टल ब्रम्हाण्ड का नम्बर-1। इसे तीनों लोक के सुर-असुर, नर-मुनि, देव सभी पढ़ते हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि आप ने मेरे लेख रूपी भड़ास को प्रकाशित किया। यदि आप ऐसा न करते तो मेरा बीपी बढ़ जाता और मैं इहलोक से गमन कर जाता। आप के मीडिया डॉट काम का टीआरपी अधिक है, क्यों न हो। वो क्या है कि आप मोबाइल एडिटर हैं- कंप्यूटर की जानकारी रखते हैं सो बना डाला एक ‘पोर्टल’ और पब्लिसिटी करके इसे नम्बर 1 का स्वयं कहने लगे। एक बात तो है डियर स्पूनिंग करने वाले छपास रोगियों की कमी नहीं है। जब तुम लिखते हो तो इतने ‘कमेण्ट्स’ मिलते हैं गोया स्वयं ‘वेदव्यास’ ने अवतार लेकर कलयुग में कुछ लिखा हो या फिर कालीदास, गोस्वामी तुलसी दास-एक्सेट्रा...एक्सेट्रा।

मीडिया के बढ़ते कदमो ने कई बदलाव लायें हैं. लेकिन कुछ बदलाव तो ऐसे हैं जिनके बारे में आमतौर पर सोचा नहीं जा सकता है. अब गालियों को ही ले लीजिये. गालियों में कितना कुछ बदल गया है. नयी-नयी तरह की गालियां आ गयी हैं. जिन्हें सुनकर आप अपने को आनंदित महसूस करते हैं. गालियों के साथ सबसे बड़ी खासियत ये है कि किसको कौन सी गाली कब लग जाएगी, यह आप पहले से नहीं तय कर सकते. कोई साले से ही बिदक जाता है और कोई माँ-बहन करने पर भी नहीं संभलता. ये गाली की माया है. देश के जाने-माने सहित्यकार काशीनाथ सिंह ने इन गालियों को अपनी किताब में भी बेधड़क प्रयोग किया है. किताब के पन्नों पर आने के बाद इन गालियों ने ऐसा चोला बदला कि सामाजिक परिवेश इनके बिना अधूरा लगेगा. ये है गालियों की विशेषता. लेकिन आजकल यही गालियां अपने मौलिक स्वरुप को बचाने के लिए गुहार लगा रहीं हैं. वह चाह रहीं हैं कि लोग इन गालियों का सही उच्चारण शुरू करें ताकि इनका आस्तित्व बना रहे.

शेषजीजब 2004 में मुंबई में जाकर काम करने का प्रस्ताव मिला तो मेरी माँ दिल्ली में ही थीं. घर आकर मैं बताया कि नयी नौकरी मुंबई में मिल रही है. माताजी बहुत खुश हो गयीं और कहा कि भइया चले जाओ, मुंबई लक्ष्मी का नइहर है. सारा दलेद्दर भाग जाएगा. मुंबई चला गया, करीब दो साल तक ठोकर खाने के बाद पता चला कि जिस प्रोजेक्ट के लिए हमें लाया गया था उसे टाल दिया गया है. बहुत बड़ी कंपनी थी लेकिन काम के बिना कोई पैसा नहीं देता. बहरहाल वहां से थके-हारे लौट कर फिर दिल्ली आ गए और अपनी दिल्ली में ही रोजी रोटी की तलाश में लग गए. लेकिन अपनी माई की बात मुझे हमेशा झकझोरती रहती थी. अगर मुंबई लक्ष्मी का नइहर है तो मैं क्यों बैरंग लौटा.

मानवीय स्वभाव को समझना आसान नहीं है. इसे जितनी गहराई से समझने का प्रयास करते हैं, उसी अनुपात में और उलझता चला जाता है, लेकिन पिछले दिनों एक ऐसी घटना घटी कि इस मानवीय स्वभाव को समझने का एक और अवसर मिल गया. दोपहर के लगभग तीन बजे से लेकर रात्रि के 8 बजे तक (अयोध्या मामले की रिपोर्ट देखने के लिए) टीवी सेट पर नजरें चस्पा किए रहने के बाद, मन में सूरत- ए – हाल दिल्ली को देखने की जिज्ञासा हुई. मयूर विहार फेज 2 से बदरपुर (जहां मेरे भैया रहते हैं) जाने के लिए रुट संख्या 534 की बस से महारानी बाग पहुंचा. तकरीबन रात्रि के साढे आठ बज रहे होंगे. सड़क पर चहल-पहल वैसी न थी, जैसा अमूमन हुआ करता है. एक विरानी.. सुस्ताई सड़क. जिस बस में बैठा था बमुश्किल 10-12 लोग रहे होंगे. रास्ते में दुकानें खुली नजर आ रही थीं, मगर खरीदार नदारद थे. कारण स्पष्ट था, 60 साल पुराने अयोध्या मसले पर फैसले का दिन जो था. हालांकि उस समय तक फैसला आ चुका था. न किसी की हार हुई थी और न ही कोई जीता था.

नवम्बर का महीना यातायात का महीना है. पुलिस यातायात के नियम और कानून जनता को बताती है. लोगों को जागरूक करती है ताकि लोग गाड़ियों को ठीक ढंग से चलायें, जिससे होने वाली दुर्घटना से बच सकें. पुलिस ने ये सारी कवायद को पूरा भी किया, मगर कैसे? आइये हम आपको दिखाते हैं. जनपद सोनभद्र में यातायात माह के दौरान पुलिस ने एक समारोह के माध्यम से लोगो को यातायात के नियमों के बारे में जागरूक कर रही है. तैयारी एक जलसे के जैसा. मुख्य अतिथि सोनभद्र के पुलिस कप्तान डॉ. प्रीतिंदर सिंह और जिलाधिकारी पन्धारी यादव और भी जनपद के वरिष्ठ अधिकारी समारोह में शामिल हुए उन्होंने लोगो को जागरूक भी किया, लेकिन खुद और अपनी पुलिस को जागरूकता का पाठ नहीं पढ़ पाए.