सचिनआज के हिंदुस्तान टाइम्स में खबर है कि दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी में एक नया ट्रेंड दिख रहा है. स्टूडेंट्स बड़ी-बड़ी कम्पनियों के मोटे-मोटे प्लेसमेंट ठुकराकर अपनी रूचि के मुताबिक अपने खुद के व्यवसाय शुरू करने को प्राथमिकता दे रहे हैं. स्टूडेंट्स को लुभाने के लिए कम्पनियों की ओर से मोटी रकम का चुग्गा डाला जा रहा है, लेकिन तमाम स्टूडेंट्स ऐसे हैं जो इस चुग्गे को चुगने के लिए तैयार नहीं. वो अपने सपनों की दुनिया अपने हिसाब से बुनना चाहते हैं. वो किसी के सिस्टम में बंधकर खुद को बंधुआ नहीं बनाना चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि वे नाकारा बनकर रहना चाहते हैं. लेकिन कॉर्पोरेट जगत में चल रही मोटे-मोटे पैकजों की दौड़ में वो शामिल नहीं होना चाहते. सपने उनकी आँखों में भी हैं लेकिन उन सपनों को पूरा करने के लिए उन्होंने ऐसे लोगों का साथ चुना है जो उनको सबसे अच्छी तरह से समझते हैं, यानी उनके अपने दोस्त. दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी के ये नए और जवाँ इंजीनियर अपने दोस्तों संग खुद का बिजनेस शुरू करने की दिशा में कदम बढा रहे हैं. कुछ ऐसा नया काम जो परंपरागत काम से कहीं ज्यादा रोचक हो, क्रिएटिव हो और मन को सुकून देने वाला हो. जहाँ न टार्गेट का टंटा हो और न बॉस का डंडा. जिस काम को करने के बाद जीविकोपार्जन के साथ-साथ जीवन की सार्थकता भी नज़र आये.

एक व्यक्ति दिमागी दिवालियेपन की किस सीमा तक पहुँच सकता है इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं दिग्विजय सिंह जी. लगातार आ रहे उनके वक्तव्य कोई राजनीतिक एजेंडा है या गाँधी-व्याप्त समाज में अपनी एक छवि बनाने की अभिलाषा? इस बात से परिचित होने के बाद कि कांग्रेस में गाँधी परिवार के लिए ही प्रधानमंत्री का पद आरक्षित है, वे अपनी एक स्वतंत्र छवि उभारने में लग गए हैं. दिग्विजय सिंह जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिटलर की तानाशानी से तुलना करके ये साबित करना चाह रहे हैं कि वे “राष्ट्रवाद” और “आतंकवाद” के बीच की असमानता से अनजान और अज्ञान हैं. कांग्रेस सरकार द्वारा किये गए कई घोटालो को भगवा आतंकवाद की चादर ओढ़ाने का यह प्रयास सदैव निष्फल होगा. संपूर्ण देश में चहुंओर चर्चा हो रही है कि दिग्विजय जी अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं, पर शायद ये कहना गलत होगा. मेरा मानना है कि यह एक सोची समझी राजनीति है, देश को दो गुटों में विभाजित करने की.

भोपालदिसंबर 1984 की काली रात. हजारों बेगुनाहों को मिक गैस ने अपना शिकार बनाया. आज 26 साल पूरे हो गए इस घटना को. लेकिन आज बात एंडरसन की नहीं. अपने लोगों की. उन जख्मों की, जो भोपाल पीडितों को अपनों ने दिए. मुकेश अंबानी से ले कर रतन टाटा, पृथ्वीराज चौहान, चिदंबरम, कमलनाथ, रोनेन सेन, जयराम रमेश तक. लंबी फेहरिश्त. बात इनके लिखे पत्रों की. जिसके एक-एक शब्द डाओ के समर्थन और भोपाल पीडितों के खिलाफ हैं. आरटीआई के जरिए निकाले गए ये सारे पत्र इन महानुभावों की पोल खोल रही हैं.

क्रिसमस क्रिसमस शब्‍द का जन्‍म क्राईस्‍टेस माइसे अथवा ‘क्राइस्‍टस् मास’ शब्‍द से हुआ है। ऐसा अनुमान है कि पहला क्रिसमस रोम में 336 ई. में मनाया गया था। यह प्रभु के पुत्र जीसस क्राइस्‍ट के जन्‍म दिन को याद करने के लिए पूरे विश्‍व में 25 दिसम्‍बर को मनाया जाता है। यह ईसाइयों के सबसे महत्‍वपूर्ण त्‍यौहारों में से एक है। इस दिन भारत व अधिकांश अन्‍य देशों में सार्वजनिक अवकाश रहता है। क्राइस्‍ट के जन्‍म के संबंध में नए टेस्‍टामेंट के अनुसार व्‍यापक रूप से स्‍वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा है। इस कथा के अनुसार प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा। गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्‍म देगी तथा बच्‍चे का नाम जीसस रखा जाएगा। व‍ह बड़ा होकर राजा बनेगा, तथा उसके राज्‍य की कोई सीमाएं नहीं होंगी। देवदूत गैब्रियल, जोसफ के पास भी गया और उसे बताया कि मैरी एक बच्‍चे को जन्‍म देगी, और उसे सलाह दी कि वह मैरी की देखभाल करे व उसका परित्‍याग न करे।

पंजाब के पुलिस महानिदेशक चंद्रशेखर (रेलवे) की पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में दाखिल स्टेट्स रिपोर्ट बताती है कि पंजाब में सोसाइटियों के नाम पर राजनीतिक और प्रभावशाली लोग पर्दे के पीछे बड़ा खेल कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी कई सोसाइटियों में नेताओं के अलावा आईएएस और आईपीएस अधिकारी भी शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक सोसाइटियों का गठन जिस उद्देश्य को लेकर किया गया था वह अब नहीं रहा है। रियल एस्टेट में पिछले एक दशक में आई तेजी से पंजाब भी अछूता नहीं रहा है। चंडीगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में कीमतें दस गुना से ज्यादा बढ़ी हैं। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है पंजाबी को-आपरेटिव बिल्डिंग सोसाइटी ने चंडीगढ़ के पास 21.2 एकड़ जमीन वर्ष 2003 में 8 करोड़ 19 लाख में खरीदी, जिसे वर्ष 2006 में टाटा हाउसिंग डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड को 96 करोड़ 59 लाख में बेच दिया। चार साल में दस गुना से ज्यादा का लाभ हुआ। योजना के मुताबिक सोसाइटी सदस्यों को फ्लैट भी मुहैया कराए जाने है।

गोपाल अग्रवालईष्‍या :  मैं ईष्‍या नहीं करता, सुन्दर मुखड़े कोमल काया देख कर मैंने कभी नहीं सोचा कि भगवान ने मुझे ऐसा क्यों नहीं बनाया। धनवानों के ठाठ-बाठ मुझे कभी आकर्षित नहीं कर पाये। परन्तु, जब कभी किसी सैनिक को राष्ट्र पर कुर्बान होते देखता हूँ या सुनता हूँ तो मन विह्वल हो उठता है। मैं सैनिक क्यों नहीं बना, शायद यही मेरे मन की ईष्‍या है, हे शहीदों तुम्हें सलाम! 

व्यवस्था : व्यवस्था पालक नदी पर पुल बँधा देता है जिससे कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी पुल पर चढ़ कर पार जा सके। मजबूत शासक सुदृढ़ व्यवस्था देते हैं। इसी प्रकार राष्ट्र की प्राकृतिक, भौगोलिक वस्तुओं व मानवीय क्षमताओं को बुद्धि, विवेक व श्रम से जोड़ कर जनहित उपयोगी बनाना ही राष्ट्रीय व्यवस्था है। यह शासन का कर्तव्य है। साधनों का बहाव प्रचुरता से रिक्तता की ओर चले, बाढ़ को सूखे से मिलाएं, नहरों को खेतों से जोड़ें। उन्‍मादी-उदंडी को सजा, विजय के लिए नैतिकता, असहाय को सहारा यही उत्तम व्यवस्था का सिद्धान्त है। घाटे की रेलवे लाइनों का निजीकरण सरकारी कुव्यवस्था की कहानी अपनी ही जुबानी है। तमाम सरकारी विशेषाधिकारों के चलते घाटे के सौदे निजी हाथों में आते ही सोना उगलने लगते हैं। या तो निजी हाथों में पारस है या सरकार अपनी नीयत के प्रति गम्भीर नहीं है।

पंकजराष्ट्रमंडल खेलों के बाद अब एशियाड भी समाप्त हो गया। भारत को इस बार छठा स्थान प्राप्त हुआ। इस बार भी कई ऐसे खिलाडिय़ों ने भारत को गौरवांवित कराया, जिन्हें देश तो क्या उनके मोहल्ले के लोग ही नहीं जानते थे। अब साबित हो गया है कि राष्ट्रमंडल खेलों में मिली सफलता कोई तुक्का नहीं थी और न ही यह इसलिए मिली कि खिलाड़ी अपनी जमीन पर खेल रहे थे। कुल मिलाकर उन्होंने कड़ी मेहनत की और अच्छा प्रदर्शन किया जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें सफलता मिली। राष्‍ट्रमंडल खेलों की समाप्ति पर कई विशेषज्ञ इस बात पर चिंता जाहिर कर रहे थे कि क्या इतनी जल्दी हमारे खिलाड़ी फिर से अपने आप को तैयार करके वैसा ही प्रदर्शन दोहरा पाएंगे, जैसा उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में किया। खिलाडिय़ों ने हाल के दिनों में अपने आप को मिले दो मौकों पर साबित कर दिया है और आगे भी अगर मौका मिलेगा तो वे किसी से पीछे नहीं रहेंगे और साबित कर देंगे। अब सरकार की बारी है कि वह इन नये सितारों को दिशा दे जिससे यह और ऊंचाईयों को छू सकें।

पवनदेखो भई, जब भ्रष्टाचार करना हो तो कम से कम गांधी टोपी को उतार दिया करो। गांधी टोपी को पहन कर ही ऊल-जुलूल हरकतें करना और नीयत में खोट लाना, गांधी को गाली देने के ही बराबर है। यह सरासर अनुचित है। आखिर देश के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गांधी से भ्रष्टाचारियों का क्या सम्बंध है? समझ में नहीं आता कि गांधी के नाम की टोपी को बार-बार भ्रष्टाचार की काली करतूतों के पीछे क्यों घसीटा जाता है। जब किसी भ्रष्टाचारी नेता का कार्टून बनाना हो, कांग्रेस के विरोध में किसी नेता का पुलता फूंकना हो और ऐसे ही अन्य मौकों पर गांधी टोपी का प्रयोग जरूर किया जाता है। आखिर ऐसा क्यों है? हालांकि ऐसा सभी कार्टूनों में नहीं होता। फिर भी ज्यादातर भ्रष्टाचारी नेताओं के कार्टूनों में गांधी टोपी का प्रयोग किया जाता है। ऐसा करना उनके विचारों को चिढ़ाने वाला ही प्रतीत होता है। क्या गांधी जी और भष्टाचार को आप एक ही सिक्के के दो पहलू मानते हैं? गांधी जी ने जीवन भर आत्मपरिष्कार और सुचिता पर विशेष ध्यान दिया और त्याग, सत्य व अंहिसा का अनूठा उदाहरण समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया। फिर भी उनकी टोपी को सरेआम क्यों नीलाम किया जा रहा है। यह किसी के भी समझ से परे है।

हर वर्ष 14 नवंबर को नेहरू जी की याद के साथ ही प्रगति मैदान में महाफेयर का उद्घाटन किया जाता है। जिसे देश-विदेश के लोग देखने के लिये उत्सुक रहते हैं। इस बार के 30 वें ट्रेडफेयर का भी सभी को बेसब्री से इंतजार था, लेकिन आम जनता को करना पड़ा पांच दिन का इंतजार। चलिए देर आए, दुरूस्त आए। अगर पिछले पांच दिनों का लेखा-जोखा मिलाएं तो कुछ ऐसा होगा कि कई मुद्दे सामने आये हैं - जैसे कि पहले तो टिकटों की कहानी। अधिकारियों की माने तो एक दिन में टिकटों की बिक्री कम से कम तीन से चार हजार के बीच की है, लेकिन रोजाना 45 से 80 हजार भीड़ के दर्शन हो रहे हैं तो आंकड़ों का मेल कुछ सही नहीं बैठता। दूसरी ओर अधिकारी बताते है कि इस बार मुफ्त पास में कटौती कर दी गई है। साथ ही पवेलियन में स्टाल कर्मचारियों को भी इस बार मुफ्त पास उपलब्ध नहीं करवाये गये। तो यदि ऐसा सब कुछ है जो कागजों में नजर आ रहा है तो इतनी भीड़ को बुलावा किसने दिया। वक्त के अनुसार पहले पांच दिन बिजनेस को ध्यान में रखकर ही अलग रखे गये थे, लेकिन छोटे-छोटे बच्चे व युगलों का जोड़ा कौन सा बिजनेस प्रजेंटेशन देने के लिये वहां पर आये थे, जरा इसका जवाब भी दीजिए।

सिवनी : आगामी 24 दिसम्बर को राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस मनाकर उपभोक्ता हितों के संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने वाला सरकारी महकमा और उपभोक्ता हितों के नाम पर कार्य करने वाले संगठन उपभोक्ता दिवस मनाकर रस्म अदायगी करेंगे. इनके द्वारा उपभोक्ता हितों का कितना ध्यान रखा जाता है। यह इस बात से ही स्पष्ट होता हैं कि उपभोक्ताओं के साथ अनेक उत्पाद कंपनियां और प्रतिष्ठानों में उपभोक्ताओं के साथ खुली धोखाधड़ी होते रहती है और उपभोक्ता के हितों पर उक्त सरकारी महकमा कोई ध्यान नहीं देता, बल्कि धोखाधड़ी करने वालों के साथ सांठ-गांठ किया हुआ दिखाई देता है. यही हाल उपभोक्ता संगठनों का भी है, जिसके पदाधिकारी उपभोक्ता हितों में कोई सार्थक पहल करते हुए नहीं देखे गये हैं. अपने से जुड़े या सगे व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने तक ही इन उपभोक्ता संगठनों का कार्य क्षेत्र सीमित है. सारे शहर में मिलावट वाली अनेक सामग्रियों की बिक्री, तौल में गड़बड़ी करके और उत्पाद घटिया गुणवत्ता के उपभोक्ताओं को सौंपकर व्यापारी वर्ग उन्हें लूट रहा है. पानी मिला हुआ दूध का विक्रय होने के साथ ही अनेक रसायनों युक्त दूध के नाम पर जहर का विक्रय भी शहर में बड़े कारोबार का रूप ले चुका है, परंतु न तो खाद्य विभाग ने उपभोक्ताओं के हितो में ऐसे दूध विक्रय करने वालों पर कोई कार्रवाई की है और न ही उपभोक्ता संगठनों द्वारा इस प्रकार के दूध विक्रय करने की मांग की गई है. हर वर्ष उपभोक्ता दिवस पर कार्यक्रम आयोजित कर रस्म अदायगी कर ली जाती है.

रिजवानवैसे तो सारे कुओं में ही भांग पड़ी हुई है इसलिए किसी एक पेशे को क्या गरियाना, मगर चिकित्सा क्षेत्र में हद तक आई गिरावट से अब ज्यादातर लोगों का विश्‍वास दिनोदिन डाक्टरों पर से उठता जा रहा है। अभी मेरे एक परिचित के साथ डॉक्टरों द्वारा किया गया कारनामा हतप्रभ कर बैठा। हुआ यूं कि चार बेटियों के बाप साथी ने पत्नी का गर्भ ठहरने पर दो जगह अलग-अलग डाक्टरों से सोनोग्राफी कराई, दोनो ही जगह उन्हें बेटी होने का संकेत दिया गया। अन्ततः पत्नी को एबार्शन की सलाह दी, वह नहीं राजी हुई। समय गुजरा और हुआ बेटा। सारे परिवार के लोग यही कहते दिखे ये भगवान नहीं बल्कि शैतान हैं। हाल ही में एक खबर पढ़ने को मिली महाराष्ट्र के एक छोटे अस्पताल में डॉक्टर के पास एक गर्भवती स्त्री को लाया गया, उसे दो बेटियों के बाद बेटा हुआ था लेकिन ससुराल वालों को विश्वास नहीं हुआ कि उसे लड़का हुआ है। वजह यह थी कि उस औरत की भी उसके पति ने सोनोग्राफी करवाई थी और उसे बताया गया था कि उसके गर्भ में बेटी है। खैर एक डॉक्टर ने माना भी तथा नाम न छापने का अनुरोध कर बताया कि औरत के गर्भ मे पल रहे बच्चे के बारे में गलत सूचना इसलिए दी जाती है ताकि गर्भपात कराने से डाक्टरों की आमदनी हो सके। और तो और खुद महिला डाक्टर ही जब शिकार हो जाये और जंग छेड दे तो ज्यादा कुछ कहना लाजिमी नही है।

प्रदीपधार्मिक ग्रन्थ कुरान की सबसे छोटी मुद्रित प्रति महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले में रहने वाले साधारण परिवार के अलिमोदीन काजी साहब के पास है. जिनको यह प्रति उनके पर दादा से मिली थी, जो हैदराबाद के निजाम के यहाँ काम करते थे. बताते हैं कि कुरान कि यह प्रति लगभग ईसा पूर्व 610 से 632 के बीच है. जिसकी लम्बाई 2.5 सेंटी मीटर एवम चौड़ाई 1 .7 सेंटी मीटर है. जिस सफ़ेद कागज पर कुरान कि आयते छपी हैं.  उसकी मोटाई 0.6 सेंटी मीटर है. अलिमोदीन के अनुसार इस छोटे से कागज पर कुरान कि आयते लिखी गयी है वह 1.9 सेंटी मीटर ऊंचाई एवं 1.3 सेंटीमीटर चौड़ाई का भाग है. जिसमे सभी सुरह एवं आयतें छपी हैं, मसलन सभी 114 सुराहा एवं 30 आयतें.

उत्‍तमायह गलियां जनजातियों की बसावट वाली है। गंदी और सामान्य जन सुविधाओं के अभाव से त्रस्त इन गलियों की कला अलग पहचान है। कला और इन जनजातियों के बीच सनातन सम्बन्ध है। पुरातन कला की जब भी बात होती है तो जनजातियों का जिक्र जरूर आता है। और तो और... भारत की सांस्कृतिक धरोहरों का उल्लेख हो और जनजातियों की भूमिका न देखी जाए, यह भी संभव नहीं। अंधाधुंध आधुनिकीकरण के दौर में आज भी इन जनजातियों की कला जीवित है। समृद्ध भारतीय संस्कृति में इन जनजातियों की बड़ी भूमिका है। मैंने जनजातियों की कलात्मक पहचान पर एक शोध किया है। करीब ढाई साल की अवधि में हुए इस शोध के दौरान मैंने उन तमाम शहरों का दौरा किया जहां जनजातियां रहती हैं और जीवन-यापन के लिए ही सही, कला सृजन में जुटी हैं। इन जनजातियों के रहन-सहन देखकर प्रतीत होता है कि भारत कला के मामले में उससे ज्यादा समृद्ध है जितना नजर आता है। इन जनजातियों की रग-रग में कला है। त्यौहारों और सामाजिक समारोहों में यह जो कला रचते हैं, वह भारत की पुरातन कलाओं में से एक है।

निरंकुशजब कोई कहता है कि वह 25 वर्ष का हो गया तो इसका सही अर्थ होता है-उसने अपने जीवन को 25 वर्ष जी लिया है या वह 25 वर्ष मर चुका है। क्योंकि जीवन के साथ ही साथ मृत्यु का भी प्रारम्भ है। मृत्यु से कम्पन या भय उसी दशा में है, जबकि हमने जो जीवन गुजार दिया या जिसे हम गुजार रहे हैं, उसमें कहीं कमी रह गयी है। प्रकृति के नियम के अनुसार तो जीवन जी लेने के आनन्द के बाद तो सन्तोष होना चाहिये। जीवन को जी लेने के बाद तो आनन्द की अनुभूति होनी चाहिये और शनै-शनै, जीवन का मृत्यु से साक्षात्कार होता जाता है। ऐसे में मृत्यु ये भय कैसा? मृत्यु और जीवन का साथ तो दिन और रात्रि की भांति है। सदैव दोनों का अस्तित्व है, लेकिन दोनों एक साथ दिखाई नहीं देते। इस कारण हमें केवल जीवन का ही अहसास रहता है और जीवित रहते हुए हम जिन स्वजनों को शरीर त्यागते हुए देखते हैं, उसे मृत्यु का अन्तिम सत्य मानकर, हम मृत्यु से घबरा जाते हैं। जबकि सच तो यही है कि प्रत्येक क्षण हम जो जीवन जी रहे हैं, अगले ही क्षण, पिछले क्षण को सदा-सदा के लिये समाप्त कर (गंवा) चुके होते हैं।

जिंदगी संघर्षो का नाम है। इसी जिंदगी में कई बार ऐसे पड़ाव आते हैं, जहां सब कुछ रुका-रुका सा लगता है। लेकिन यदि खुद में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, कुछ कर दिखाने का जुनून हो तो सारी परेशानी अपने आप ही दूर हो जाती है। सारी परेशानी उस साहस के आगे बौनी नजर आती है। ऐसी ही शख्सियत हैं भोपाल की क्षमा कुलश्रेष्ठ। जिन्‍होंने 18 वर्ष की उम्र में एक्सीडेंट की त्रासदी झेली। रीढ़ की हड्डी टूटी, पैरो में एहसास का भाव नही रहा। लेकिन लगन थी काम की, विश्‍वास था खुद पर, आस्था थी ईश्‍वर पर। इसी का नतीजा है कि आज क्षमा न केवल बैठ सकती हैं बल्कि चल भी सकती हैं। पेंटिंग में नेशनल अवार्ड से सम्मानित हो चुकी क्षमा दुर्घटना से ग्रसित और अपाहिज बच्चों के लिए एक प्रेरणास्रोत हैं। भोपाल के गोविंदपुरा में रहने वाले केके कुलश्रेष्ठ आज एक रिटायर टीचर हैं।

संदीपकहने को तो देश में भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने की हर स्तर पर कोशिश की जा रही है, लेकिन ये प्रयास महज भाषणों और कागजी कार्रवाई तक ही सीमित है। भ्रष्टाचार के चलते देश की लगभग 462 अरब डालर की राशि स्विस बैंकों में जमा है। इस बढ़ते भ्रष्टाचार का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि देश के गरीबों को बुनियादी सुविधाएं देने के नाम हमारे मंत्री, नेता, प्रशासनिक अमला और समाज सेवी मिलकर हर साल उनसे करीब 900 करोड़ रुपए की रिश्वत हथिया लेते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह रिश्वत की कमाई सीधे स्विस बैंकों में चली जाती है। विभिन्न देशों में व्याप्त भ्रष्टाचार का अध्ययन करने वाले अंतराष्ट्रीय संगठन ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की भारत में कार्यकारी निदेशक अनुपमा झा का इस बारे में कहना है कि देश में भ्रष्टाचार ऊपरी स्तर से निचले स्तर की ओर फैल रहा है। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि भारत में भ्रष्टाचार एक कारोबार की तरह चल रहा है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की भ्रष्ट देशों की हालिया सूची में भारत को 87वें स्थान पर रखा गया है।