एएन शिबलीभारत की सबसे बड़ी और विश्व की कुछ बड़ी इस्लामी शिक्षण संस्थाओं में शामिल दारुल उलूम देवबंद की खबरें हिन्दी और अंग्रेज़ी मीडिया में आम तौर पर नहीं के बराबर छपती हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस संस्था में हिन्दी और अंग्रेज़ी के अखबार जाते ही नहीं। यहाँ की खबरें तभी प्रकाशित होती हैं जब चुनाव के समय मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए कोई नेता इस संस्था का दौरा करता है या फिर जब यहाँ से कोई फतवा जारी होता है। इन दिनों दारूल उलूम एक बार फिर फिर सुर्खियों में है। यह सही है की उर्दू के अखबारों की तरह दारुल उलूम की खबरें अंग्रेज़ी या हिन्दी के अखबारों में ज्यादा नहीं छप रहीं हैं, मगर इस बार छप ज़रूर रहीं हैं। इसकी एक बड़ी वजह है इस संस्था के नए वीसी मौलाना ग़ुलाम वास्तनवी के मुंह से गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ। मगर हिन्दी और अंग्रेज़ी के अखबारों में एक जैसी ही खबर आ रही है। चूंकि नए वीसी ने गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी की तारीफ की इसलिए उनको हटाने की मांग हो रही है। मगर सही खबर कुछ और ही है।

रेल यात्रामैंने अपने चारों ओर नजर घुमा के देखा तो पाया कि ट्रेन के हर कोने में पसरी हुई थी एक चुटकी जिंदगी. हर वो चुटकी भर जिंदगी अपने आप में खास थी. किसी के पूरे संसार की आस थी वो चुटकी भर जिंदगी. रात के 12:30 बजे थे. हमारी ट्रेन ग्वालियर से बीकानेर जा रही थी. जब मैं भरतपुर से ट्रेन में चढ़ी तो भगवान को लाख-लाख धन्यवाद किया कि इतनी विकट परिस्थिति में मुझे एक आरामदेह सीट नसीब हुई. मैं एक लड़की थी इसलिये या मेरी किस्मत अच्‍छी थी. मैंने ऐसा इसलिये कहा क्योंकि अगले दिन राजस्थान में पुलिस भर्ती की परीक्षा थी.

आशीष बहुत लोगों को देखा साल के पहले दिन बनारस के संकट मोचन मंदिर के बाहर अपना सिर पटक रहे थे. ठण्ड से परेशान भगवान से चीख-चीख कर कह रहे थे कि आज साल का पहला दिन है. हम आपके दर्शन करने आयें हैं. हमारा पूरा साल अब आप के जिम्मे है. हम चाहे जो करें, हमारा कुछ बिगड़ना नहीं चाहिए. कुछ बिगड़ा तो आप समझिएगा. उसके बाद मंदिर नहीं आयेंगे. भक्तो की प्रार्थना में भाव ऐसा कि वो प्रार्थना कम और मांग ज्यादा लग रही थी. गोया भगवान को भगवान उन्होंने ही बनाया हो, जैसा हर पांच साल में वोट देकर एक भगवान चुनते हैं. खैर भगवान को इन सब बातों की आदत हो चली है. लेकिन एक बात उन्हें परेशान कर गयी. संकट मोचन भगवान सोचने लगे कि आखिर यह साल नया कैसे हो गया. यह संवत बदला कब. कानों कान ख़बर तक नहीं हुयी. लेकिन अब इतने लोग बाहर जमा हैं तो सचमुच साल बदल ही गया होगा. फिर भी तसल्ली करने के लिए भगवान ने अपने एक सेवक को बाहर भेजा कि पता लगा कर आओ कि माजरा क्या है? सेवक ने क्या बताया यह आपको उसके लौट कर आने के बाद पता चलेगा. तब तक आपको एक और दृश्य सुनाता हूँ.

मदनजीबिहार के विधायक राज किशोर केसरी की हत्या के बाद बिहार के उपमुख्य मंत्री सुशील मोदी के बयान से उठे विवाद ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। 15 जनवरी को हत्या की अभियुक्त तथा बलात्कार की शिकार रुपम पाठक की मां ने पटना में एक संवाददाता सम्मेलन में यह खुलासा किया कि एक कद्दावर भाजपा नेता के दबाव में रुपम पाठक ने न्यायालय में धारा 164 के तहत बदला हुआ बयान दिया था। रुपम पाठक के साथ हुये बलात्कार की जांच भी सीबीआई से करवाने की मांग की गई है तथा हत्या के बाद उपमुख्य मंत्री की बार-बार पूर्णिया जाने पर भी सवाल खडे किये गये हैं। संवाददाता सम्मेलन में रुपम पाठक की मां ने यह भी खुलासा किया कि रुपम के बैंक एकाउंट में जमा पैसे लोन तथा रुपम के पति के हैं और उसकी जांच से भी उन्हें परहेज नहीं है। जेल में रुपम पाठक के साथ बेहतर तरीके से मिलने नहीं देने का आरोप भी रुपम पाठक की मां कुमुद मिश्रा ने लगाया है।

अमिताभ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या विकराल और अनियंत्रित स्वरुप ले सकती है, यह इन्टरनेट के आने से सभी जगह देखा जा सकता है. इन दिनों फेसबुक पर एक ग्रुप दिख रहा है “आई हेट गाँधी”. वर्तमान में 2484 लोग इसके समर्थक के रूप में जुड़े दिखते हैं. इसमें चार ऐसे भी लोग हैं जो फेसबुक पर मेरे साथी हैं. इस ग्रुप के इन्फोर्मेशन पेज पर कुछ भी नहीं लिखा हुआ है. इस ग्रुप को देखने से दिख जाता है कि इसमें वे लोग हैं जो सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, महाराणा प्रताप, शिवाजी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल जैसे लोगों को पसंद करने वाले लोगों का समूह है. साथ ही ये सारे लोग तीव्रता से महात्मा गाँधी के प्रति नफरत और घृणा का भाव रखते हैं. पेज देखने से दिखता है कि इन लोगों के अनुसार महात्मा गाँधी खिलाफत आन्दोलन की गड़बडि़यों, मोप्ला दंगों, सुभाष बोस को कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाने, पंडित नेहरु को प्रधानमन्त्री बनाने, सरदार पटेल को उनके रास्ते से हटाने, भगत सिंह की फांसी की सजा के प्रति गलत प्रतिक्रिया करने, देश के बंटवारे, पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये दिलवाने जैसे सभी कार्यों के लिए व्यक्तिगत तौर पर दोषी हैं.

श्वेता तिवारी के बिग बॉस सीजन चार जीतने के बाद एडमॉल के बिग बॉस - बिगर तमाशा का अंत हुआ। श्वेता के हिस्से एक करोड़ रुपए आए और बाकी बचे लोग जो बिग बॉस के घर का हिस्सा बने थे, उन्हें भी पहचान और पैसा मिला। एक प्रतिभागी ने कैमरे के सामने स्वीकार किया। पहले जो लोग मिलने को भी तैयार नहीं थे, बिग बॉस में आने के बाद पहचानने लगे हैं। भाव देते हैं। इस रियलिटी शो को देखने के दौरान इसकी रियलिटी पर हो सकता है कि कोई सवाल ना उठाए लेकिन शो में शामिल घर वालों को घर से अंदर बाहर करने में दर्शकों का रोल कहीं नजर नहीं आया। बिग बॉस के घर से किसे निकालना है, इसका रिमोट दर्शकों के हाथ में नहीं बल्कि कार्यक्रम के प्रबंधकों के हाथ में था। वरना श्वेता तिवारी के नाम की घोषणा के साथ बिग बॉस को इस बात का भी ऐलान करना चाहिए कि यदि श्वेता द ग्रेट खली के मुकाबले विजयी हुईं हैं तो उसकी जीत के लिए तय पैमाने क्या थे? यदि उन्हें दर्शकों ने अपने वोट से जिताया है तो दर्शकों को यह जानने का पूरा हक है कि उनकी चहेती श्वेता तिवारी कितने मतों से विजयी हुई हैं। दूसरी तरफ खली द ग्रेट के प्रशंसकों को भी यह जानने का पूरा हक है कि यदि उनके प्रिय खली नहीं जीते तो इसके पीछे उनसे कहां चूक हुई? लेकिन बिग बॉस ने इसकी परवाह नहीं की।

वर्ष 2010 को विदा करने के साथ-साथ नये वर्ष का आगाज हो चुका है। नई उम्मीदों, नये सपनों को लेकर साल 2011 हमारे सामने है। अब बीते एक वर्ष के समीक्षा कर नये समय के लिए ठोस योजना बनाने का समय है। पर जब समीक्षा करनी हो तो सिर्फ एक साल की क्यों नवोदित राज्य उत्तराखण्ड के दस साला जीवन की क्यो न हो। बीते दस वर्षों में उत्तराखण्ड ने काफी उथल-पुथल देखी। राज्य की स्थापना के पीछे पहाड़ की अस्मिता को बचाने की सोच थी। पहाड़ के संसाधनों का दोहन यहां के समुचित विकास के लिए हो, जल, जंगल, जमीन, पर स्थानीय जनता का हक कायम रहे। सरकारी नीतियां सरल व सहज हों। आम आदमी को राजकीय कार्यों में सहजता लगे। पलायन कम हो रोजगार के अवसरों में वृद्धि हो। हाशिये पर जी रहे समुदायों को उचित अवसर मिले। आदि कई मुद्दे थे जिनके आधार पर 2000 में उत्तराखण्ड का गठन किया गया। आन्दोलनकारियों की शहादत और राज्य निर्माण के सपने कहीं धूमिल से हो गये। बीते एक दशक में भाजपा, कांग्रेस, यूकेडी की खुली लूट ने आम आदमी को हतप्रभ सा कर दिया। बेतहाशा गति से पदों की बंदरबांट, जमीनों का सौदा, माफियाओं को संरक्षण, ठेकेदारी और कमिशनखोरी जैसी गतिविधियों ने उत्तराखण्ड को आन्तरिक तौर पर झकझोर दिया।

शेषजीकांग्रेस पार्टी के एक प्रवक्ता ने आरएसएस पर प्रतिबन्ध की मांग की है. उन्होंने पत्रकारों से बताया कि सरकार को चाहिए कि आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाने पर विचार करे. कांग्रेस का यह बहुत ही गैर-ज़िम्मेदार और अनुचित प्रस्ताव है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में सब को संगठित होने का अधिकार है. आरएसएस भी एक संगठन है उसके पास भी उतना ही अधिकार है जितना किसी अन्य जमात को. पिछले कुछ वर्षों से आरएसएस से जुड़े लोगों को आतंकवादी घटनाओं में पुलिस वाले पकड़ रहे हैं.. हालांकि मामला अभी पूरी तरह से जांच के स्तर पर ही है, लेकिन आरोप इतने संगीन हैं उनका जवाब आना ज़रूरी है. ज़ाहिर है कि आरएसएस से जुड़े लोगों को तब तक निर्दोष माना जाएगा जब तक वह भारतीय दंड संहिता की किसी धारा के अंतर्गत दोषी न मान लिया जाए. यह तो हुई कानून की बात लेकिन उसको प्रतिबंधित कर देना पूरी तरह से तानाशाही की बात होगी. उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार कांग्रेस के इस अहमकाना सुझाव पर ध्यान नहीं देगी.

दिमाग पर थोड़ा जोर दें तो आपको बचपन के वे दिन याद आ जायेंगे जब गुणा बाबा या गुदरिया बाबा को देखते ही आप मचल उठते थे। उससे भी पहले छुटपन में जब आप सोने में आना-कानी करते थे तो आपकी मां गुदरिया बाबा का नाम लेकर आपको डराया करती थी। सारंगी की तान छेड़ते ये घुम्मकड़ बाबा नाथ संप्रदाय से ताल्लुक रखते हैं। भले ही आज का बचपन इन्हें बिसरा रहा है, हर दरवाजे पर दस्तक देते नाथ-पंथियों की यात्रा बदस्तूर जारी है। कुछ सौ साल पहले देश में जब भक्ति मार्ग का चलन बढ़ा तो शैव आस्था से प्रभावित एक वर्ग ने नई राह पकड़ी। गोरखनाथ इनके अराध्य-पुरुष हुए। ये ब्राह्मण-धर्म की जटिलताओं को नहीं मानते और न ही भेद-भाव पर यकीन करते हैं। भक्ति के सहारे परम शक्ति से एकाकार हो जाना ही इनका मकसद है। एक अनुमान के मुताबिक देश भर में इस संप्रदाय के साठ हजार सदस्य हैं। गोरखपुर इनके लिए तीर्थ-स्थल जैसा ही है।

आरपीराष्ट्रव्यापी भ्रष्टाचार के हो रहे नित नये खुलासों से न सिर्फ भारतीय गणतंत्र बेपर्द हुआ है, बल्कि तंत्र की अव्यवस्था भी पूरे राष्ट्र के समक्ष उजागर हो गयी है। हालांकि सियासी चाल चल रहे शातिर व बेशर्म नेताओं के लिए यह कोई बड़ी परेशानी की बात नहीं है। लंपट पूंजी का वर्चस्व जब तक देश पर है तब तक इनके कृत्य इसी तरह लोकतंत्र की अस्मत तार-तार करते रहेंगे। इनके सत्ता-शतरंज का घिनौना खेल भी योंही चलता रहेगा, और भ्रष्टाचार के उजागर होने पर राजनेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप मढ़ते रहेंगे। पक्ष-विपक्ष आपस में टकरायेंगे। कदाचार को ले थोड़े समय के लिए जनता में भी उबाल आता रहेगा। हम अर्से से यह खेल देख रहे हैं। देश की जनता यह समझती है कि हमारा मीडिया बखूबी अपना धर्म निभा रहा है। दरअसल बात ऐसी नहीं है। भ्रष्टाचार की जो थोड़ी-बहुत सूचनाएं लोगों तक पहुंचती हैं, उसे खुद तंत्र ही उजागर कर देता है। इसके भी अपने निहितार्थ हैं। नेताओं, कालाबाजारियों, नौकरशाहों, संवाद माध्यमों, लाबीस्ट-बिचौलियों, उद्योगपतियों, कॉरपोरेट घरानों के चरम द्बन्द्ब-संघात के ही ये परिणम हैं। अब तो स्थिति यह है कि देश के अंदरूनी मामलों में कॉरपोरेट लॉबीस्ट निर्णायक साबित हो रहे हैं। यहां चिंता की बात तो यह कि कॉरपोरेट घरानों के हित में वे सरकार की नीतियों को प्रभावित करने लगे हैं।

गए साल को अलविदा कहना और नए साल का स्वागत कुछ-कुछ ऐसा होता है, जैसे एक ही दिन और एक ही समय आप रेलवे स्टेशन पर जाएं, किसी को सी-ऑफ करें और किसी को रिसीव कर घर ले आएं। किसी के जाने का गम है, लेकिन नए मेहमान के आने की खुशी भी है। लेकिन इस बार नए साल को विदा करते हुए बोझ-सा महसूस कर रहा हूं। पूरे साल का तख्मीना लगाता हूं तो लगता है कि यह साल वेवजह-सा निकल गया। कुछ कांक्रीट नहीं किया। कई दोस्तों से बात की, सबकी इसी तरह की फीलिंग रही। यार यह साल तो बेकार गया।  अपनी इस सोच को राष्ट्रीय राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य पर आरोपित करता हूं तो लगता है कि कुछ एक मामलों को छोड़ दिया जाए तो पूरा साल उपलब्धिविहीन रहा। अलबत्ता घपलों-घोटालों, महंगाई, नक्सलवाद-आतंकवाद ने पूरे साल को मथे रखा।

It was midnight. Fr Jose George could not sleep because there was no fan in his room. Jose knocked on Anna Jacob’s door. When she opened it, he told her he could not sleep. She invited him inside, because there was a fan. Jose had met Anna while conducting a retreat at Kottayam. “Why don’t you come home, have dinner, and stay the night?” Anna said. She lived with her mother-in-law, while her husband worked in Dubai. Jose accepted the offer. When Jose entered the bedroom, Anna’s mother-in-law noticed. “She prayed till morning,” says Fr K P Shibu Kalamparambil. “She cannot speak about this incident to her son, because that will destroy the marriage. Then society will ask questions about why it happened. That would affect the family’s social standing.” So she kept quiet. But the secret came out when she told Shibu at the confessional. (Every Sunday, Catholics can confess their sins to the priest before Mass. They communicate through a grid or lattice).

अविनाश पहला चित्र : नये साल की बधाई पर एक बात तो सोचें कि नये साल में नया क्‍या है, भ्रष्‍टाचार वही पुराना है, घोटालों का पुराना तराना है। नेताओं की करतूतें वही हैं, दुर्घटनाएं भी वैसी ही हैं, कोहरा भी हवाई उड़ानों को रोकता हुआ – मतलब, तो सब वही पुराना है। बस संख्‍या ही तो आगे बढ़ गई है, फिर भी बधाई। संख्‍या तो रोज ही आगे बढ़ता है बल्कि प्रति सप्‍ताह, दिनों के साथ सप्‍ताह और महीने में एक माह आगे बढ़ जाता है। अगर नये की बधाई दी जानी चाहिए तो रोज बधाई क्‍यों नहीं देते हैं हम। और तो और सूरज वही पुराना है। उसमें तनिक सा बदलाव नहीं है। वही सूरज जो बादलों के आगे आने से मुंह छिपा लेता है। जब वैसा ही सूरज आज भी है तो फिर नये साल में नया क्‍या है। नौकरियां और धंधे वही पुराने हैं। पद वही हैं, प्रतिष्‍ठाएं वही हैं। ऐसा भी तो नहीं है कि जो जीएम है वो चेयरमैन बन गया हो। चपरासी बन गया हो हेडक्‍लर्क। रिसेप्‍शनिस्‍ट बन गई हो एयर होस्‍टेस।

शेषजीदिल्ली में नौंवें प्रवासी भारतीय दिवस का उदघाटन हुआ. इस अवसर पर भारत की ताक़त की हनक नज़र आई. शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल ने साफ़ कहा कि अब उद्योग और व्यापार और उस से जुड़ी चीज़ों के अवसर भारत में ही हैं, इसलिए भारतीय मूल के लोगों को नयी हालात में अपनी बात कहने की आदत डालनी पड़ेगी. उन्होंने कहा कि भारत में जो लोग भी आ रहे हैं वे यहाँ बेहतर अवसर की तलाश में आ रहे हैं. इस अवसर पर शिक्षा के क्षेत्र में निवेश की संभावनाओं पर भी एक सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसमें मुख्य वक्तव्य प्रधानमंत्री के सलाहकार सैम पित्रोदा ने दिया. उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में नयी टेक्नालॉजी का रोल बहुत ही महत्वपूर्ण है. लेकिन शिक्षा का महत्व सही अर्थों में समझना होगा. ज़रूरत इस बात की है कि शिक्षा में सुधार को एक राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में विकसित किया जाए. कोशिश की जानी चाहिए कि भारतीय मूल के साढ़े बारह करोड़ लोग जो विदेशों में बसे हैं, उन्हें भारत में काम करने के लिए प्रेरणा दी जा सके.

हनीबदायूं। कंप्यूटराइज्ड हो चुकी इस दुनिया में अब इंसान का दिमाग भी सुपर कंप्यूटर जैसा ही होने लगा है। विश्वास नहीं हो रहा, पर यह एक दम सच है। इंसान भी वयस्क नहीं, बल्कि छोटे-छोटे बच्चे हैं, जो विश्व कीर्तिमान बनाने की राह पर बड़ी तेजी से अग्रसर हैं।  जी, हां! पांच वर्षीय हनी नाम के जैसी जितनी मासूम है, उसमें उतनी ही तीव्र बुद्धि भी है। पीलीभीत जनपद के कस्बा बीसलपुर में मोहल्ला पटेल नगर निवासी निजी शिक्षक दिग्विजय सिंह व एडवोकेट सीमा कुमारी की होनहार बेटी ने छोटी सी उम्र में ही विशेष ख्याति अर्जित कर ली है। वह बरेली के राधा माधव स्कूल में क्लास केजीसी की छात्रा है। हनी को अब तक के समस्त राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्य सरकारें और उनके मुख्यमंत्री के साथ राजनीति जगत की अन्य जानकारियां व खेल जगत, अर्थ जगत एवं सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी बेहद जरूरी जानकारियां कंठस्थ हैं। एक हजार से भी अधिक सवालों के जवाब वह मात्र पैंतालीस मिनट में आश्चर्यजनक रूप से दे देती है। उसका व उसके माता-पिता का सपना है कि हनी का नाम गिनीज बुक में दर्ज हो।

पुष्‍पेंद्र कौन किससे फ़रियाद करे, क्योंकि कलयुग है राम राज्य नहीं रहा कि राजा से फ़रियाद करके अपना दुखड़ा दूर करने का प्रयास किया जाए. पूरे देश को जिस तरह महंगाई की मार झेलनी पड़ रही है उसे देख कर लगता है कि वर्तमान शासक दोनों आँखों का अंधा और दोनों कानों से बहरा साथ में पत्थर दिल इंशान है, जो ना किसी को देख सकता है ना किसी कि सुन सकता है ना किसी के ह्रदय की पीड़ा समझ सकता है. दूध ननमुहों से दूर हो गया, शिक्षा का स्वरुप बदल गया, रोटी भी अब सोचकर खानी पड़ रही है, सब कुछ उलटा हो गया हमारे महान भारत को पता नहीं किसकी नजर लग गयी जो इस देश के अस्सी करोड़ लोग हाय-हाय कर रहें हैं. देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी किसी की क़त्ल होने की जांच नहीं कर पाती, दोनों हाँथ खड़े कर कहती है कि आई एम सॉरी. इस एजेंसी को किस बात की तनख्वाह दी जा रही है यहाँ भी कलयुग झलकता है.