लोकेंद्र खूबसूरत और व्यवस्थित खेती का उदाहरण है नरसिंहगढ़ के हर्ष गुप्ता का फार्म। वह खेती के लिए अत्याधुनिक, लेकिन कम लागत की तकनीक का उपयोग करते हैं। जैविक खाद इस्तेमाल करते हैं। इसे तैयार करने की व्यवस्था उन्‍होंने अपने फार्म पर ही कर रखी है। किस पौधे को किस मौसम में लगाना है। पौधों के बीच कितना अंतर होना चाहिए। किस पेड़ से कम समय में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। किस पौधे को कितना और किस पद्धति से पानी देना है। इस तरह की हर छोटी-बड़ी, लेकिन महत्वपूर्ण जानकारी उनके दिमाग में है। जब वह पौधों के पास खड़ा होकर सारी जानकारी देते हैं तो लगता है कि उन्‍होंने जरूर एग्रीकल्चर में पढ़ाई की होगी, लेकिन वास्‍तव में ऐसा है नहीं। हर्ष गुप्ता इंदौर के एक प्राइवेट कॉलेज से फर्स्‍ट क्लास टेक्सटाइल इंजीनियर हैं। उन्‍होंने इंजीनियरिंग जरूर की थी, लेकिन रुझान बिल्कुल भी न था।

पुष्‍यमित्रमैं भागलपुर बोल रहा हूं. आपका अपना शहर भागलपुर. गंगा मैया के दक्षिणी किनारे पर तकरीबन पिछले तीन हजार साल से मेरा अस्तित्व कायम है. लिहाजा आप यह कह सकते हैं कि आपका शहर दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक है. एक ऐसा शहर जिसके जलवे समय-सागर के थपेड़ों से वक्त बेवक्त बेरौनक जरूर हुए पर मिटे नहीं. महलों की रंगीनियां, शासकों की शौर्यगाथाएं और विद्वानों का तेज हमेशा मेरे हिस्से में रहा, पर मेरी असली पहचान हमेशा एक व्यावसायिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में रही.

देश-विदेश के नेताओं की तरफ फेंके गए सभी जूतों को प्रणाम और मायावती की "खडाऊं" को वंदना। मुख्यमंत्री मायावती के जूते एक अफसर ने साफ़ क्या कर दिए मीडिया में हल्ला मच गया। जैसे अफसर ने राजकीय मेहमान कसाब जैसा कोई गुनाह कर दिया। उसकी मज़बूरी तो किसी को दिखाई नहीं दी। नौकरी करनी है तो ऐसा करना ही पड़ता है। सबके सामने जूते पर रुमाल या कपड़ा मार दिया तो अफसाना बन गया, क्या पता पालिश भी करनी उसकी मज़बूरी हो। फिर अफसर ने किसी ऐरेगेरे नत्थू खैरे के जूतों के तो हाथ नहीं लगाया। अफसर का सौभाग्य है कि उसे इस युग में ऐसी महिला के जूते चमकाने का मौका मिला जो देश के दलितों की किस्मत चमकाने के लिए अवतरित हुई हैं।

महिला आयोग, महिला हेल्प लाइन, नारी सशक्तीकरण योजना, नारीवाद इस तरह के शब्द आज भी यह बताने के लिये काफी हैं कि तमाम परिवर्तनों के बावजूद भी हम स्त्रियां पुरुष सत्तात्मक समाज की गुलाम ही हैं. हमारी स्थितियों में कथित सुधार की कोशिश की जा रही है. कुछ अपवाद जरूर मिल जायेंगे. हमे बहलाने, फुसलाने और बरगलाने के लिये ढेर सारे विशेषण और उपमाएं दिये गये हैं. खुद का शोषण और दोहन करते करवाते हुए हम इस तथाकथित सभ्य समाज की संस्कृति के पोषण और संवर्धन का जिम्मा उठाये हुए हैं. सब कुछ सहते-झेलते हुए चुपचाप बनावटी मुस्कान लिये जी लेना ही आज की सुसंस्कृत नारी की पहचान है. समाज में व्यापक पैमाने पर बदलाव आये हैं. हमारा समाज पहले की तुलना में उदार भी हुआ है. सब कुछ होने के बावजूद भी अगर आज नारी निर्णय लेने की कोशिश करती है तो वह पुरुषों को खटक जाती है (अधिकांशतः). हमारे रिवाज, जिसे पोषित करने का जिम्मा हमने उठा रखा है अब तक हमारे लिये बेड़ियां ही सिद्ध हुई हैं.

आइवर हमारे परम्परागत समाज में बड़ों की हमेशा यही इच्छा रहती है कि उनकी अगली पीढ़ी उनसे आगे निकले तथा जीवन में धन व यश अर्जित करने के साथ साथ खूब सफलता भी पाये। परन्तु यह एक सर्वविदित तथ्य है कि जीवन में सफलता पाने की पहली शर्त है कठिन मेहनत करते हुए समय के साथ चलना क्योंकि जो समय के साथ नहीं चल पाता, समय उसकी बाट नहीं जोहता। उसे तो प्रतिपल आगे बढ़ना ही होता है। परिणामस्वरूप ऐसा व्यक्ति ज़िन्दगी की दौड़ में पिछड़कर असफलता के अंधेरों में कही गुम हो जाता है। अतः यह ज़रूरी है कि हमेशा अपनी बुद्धि का सदुपयोग करते हुए चतुर, चुस्त और चौकस रहा जाए ताकि भविष्य में आने वाली किसी भी परिस्थिति का आसानी से सामना करते हुए उससे पार पाया जा सके। यह बात तो आज आम आदमी भी जनता है कि वर्तमान युग विज्ञान का युग है। एक दिन तो क्या, एक पल के लिए भी हम विज्ञान के बिना आज अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते।

अनामी शरणदिल्ली के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को दुर्ज्जन मानने या साबित करने का मेरे पास कोई ठोस तर्क सबूत या पुख्ता आधार नहीं है। सज्जन कुमार से मेरा कोई गहरा या घनिष्ठ सा रिश्ता भी नहीं रहा है। पिछले कई सालों से हमारी मुलाकात भी नहीं है। हो सकता है कि रोजाना सैकड़ों लोगों से मिलने वाले सज्जन कुमार को मेरा चेहरा या नाम भी अब याद ना हो। इसके बावजूद मीडिया मैनेजमेंट की वजह माने या इनके सहायक कैलाश का कमाल की सज्जन कुमार को सामने फोकस किए बगैर वह मीडिया के सैकड़ों लोगों की उम्मीदों पर हमेशा खरा उतरते हुए सज्जन की सज्जन छवि को कायम रखने में सफल है। मीडिया से परहेज करने वाले सज्जन को मीडिया में लोकप्रिय बनाए रखने में भी इसी कैलाश का हाथ रहा है।

शिरीष कुछ बड़ा काम करने के लिए, कुछ हटके करने के लिए एक उद्देश्य होना चाहिए। अगर मकसद सामने हो और फिर उसे पाने के लिए कुछ किया जाये, तो बहुत कुछ मिल जाता है। खुद को भी, दूसरों को भी, समाज को भी। उस राह पर और कदम भी चल पड़ते हैं। धीरे-धीरे एक कारवां बन जाता है। नयी राहों पर चलने वालों का मकसद कारवां बनाना कभी नहीं होता। वह तो खुद-ब-खुद बन जाता है। पर जब वे पीछे मुड़कर देखते हैं, अपने पीछे बढ़े आ रहे बहुत से कदमों को आते देखते हैं, तो उन्हें अपने मकसद और उसकी कामयाबी से भी बड़ा अहसास होता है। शायद संजना सांघी को भी यह अहसास हो। 18 साल की संजना मुंबई की आम जोशीली, चुलबुली किशोरियों की तरह ही दिखती है। पर वह है एकदम अलग।

योगेश शीतलरिलायंस एवं अन्य निजी मोबाइल कम्पनियों के ग्राहकों से अक्सर ये शिकायतें सुनने को मिलती है कि उनकी जानकारी एवं अनुमति के बिना उनके नम्बर पर कोई सेवा शुरु कर दी गई है, जिसका भुगतान ना चाहते हुए भी उन्हें करना पड रहा है। मेरा रूममेट एक निजी कम्पनी में कम्प्यूटर ऑपरेटर है। 12 फरवरी को ऑफिस से खिन्न मन से वह आया और खाना बनाने की बजाय पूरे तैश में रिलायंस कस्टमर केयर को बुरा भला कहने लगा। लगभग दो घंटे तक वह काफी परेशान रहा और आखिर में बिना खाए सो गया। पूछने पर गुस्से में बताया, ‘‘ स्साला डेली दस रूपया काट लेता है!'' मेरा रूममेट देशभर के उन लाखों पीडि़त लोगों में एक है, जो निजी मोबाइल कम्पनियों द्वारा छले जा रहे हैं। 16 फरवरी को भारतीय जनसंचार संस्थान में छुट्टी होने के कारण मैंने सुबह का अलार्म नहीं लगाया, लेकिन मेरे रिलायंस के नम्बर 9555204147 पर 51234 से आए एक एसएमएस ने मेरी नींद खोल दी।

हरिगोविंद अयोध्या में जिस विवादित स्थल को लेकर छह दशक से ज़्यादा समय से देश में सांप्रदायिक दंगे-फ़साद हो रहे हैं, जिनमें लाखों लोग मज़हब के नाम पर अपनी आहुति दे चुके हैं और जिसके चलते आज भी करोड़ों धर्मांध हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हैं, वहां न तो कभी बाबरी मस्जिद नाम की कोई मस्जिद थी न कोई राम मंदिर, जिसे तोड़कर मस्जिद बनवाई गई हो। यह ख़ुलासा आज से दस साल पहले ही हो चुका है और यह किसी ऐरे-ग़ैरे ने नहीं, देश के शीर्षस्थ कालजयी साहित्यकार और साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले उपन्यासकार कमलेश्वर ने दस साल के गहन शोध, अध्ययन और तफ़तीश के बाद लिखे उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ में किया है।

: रेडिएशन के खतरों के बावजूद मोबाइल पर बरस रहा है लोगों का प्यार : यह दौर दरअसल मोबाइल क्रांति का समय है। इसने सूचनाओं और संवेदनाओं दोनों को कानों-कान कर दिया है। अब इसके चलते हमारे कान, मुंह, उंगलियां और दिल सब निशाने पर हैं। मुश्किलें इतनी बतायी जा रही हैं कि मोबाइल डराने लगे हैं। कई का अनुभव है कि मोबाइल बंद होते हैं तो सूकून देते हैं पर क्या हम उन्हें छोड़ पाएगें? मोबाइल फोनों ने किस तरह जिंदगी में जगह बनाई है, वह देखना एक अद्भुत अनुभव है। कैसे कोई चीज जिंदगी की जरूरत बन जाती है- वह मोबाइल के बढ़ते प्रयोगों को देखकर लगता है। वह हमारे होने-जीने में सहायक बन गया है। पुराने लोग बता सकते हैं कि मोबाइल के बिना जिंदगी कैसी रही होगी। आज यही मोबाइल खतरेजान हो गया है। पर क्या मोबाइल के बिना जिंदगी संभव है? जाहिर है जो इसके इस्तेमाल के आदी हो गए हैं, उनके लिए यह एक बड़ा फैसला होगा। मोबाइल ने एक पूरी पीढ़ी की आदतों उसके जिंदगी के तरीके को प्रभावित किया है।

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के हाईस्कूल मैदान, जांजगीर में आयोजित योग शिविर के मुख्य प्रयोजक की भूमिका निभाने वाली वीडियोकान कंपनी के प्रचार-प्रसार को लेकर योग गुरू बाबा रामदेव पत्रकारों के सवालों में घिर गए। उन्होंने पहले तो कंपनी द्वारा जिले में पावर प्लांट लगाने की जानकारी से इनकार किया, लेकिन सवालों में घिरता देख खुद को पाक साबित करने के लिए उन्होंने कहा कि दानदाता की जात-धर्म नहीं देखी जानी चाहिए। दानदाता कोई भी हो सकता है, हर किसी दानदाता की जानकारी बाबा स्वयं तो नहीं रख सकते हैं। योग शिविर में बाबा रामदेव ने लोगों को योग की शिक्षा देने के साथ-साथ वीडियोकान कंपनी का प्रचार भी किया था। कार्यक्रम के शुरुआत से अंत तक कई बार उन्होंने कंपनी तथा कंपनी के डायरेक्टर संदीप कंवर को इस आयोजन के लिए साधुवाद दिया। इस मसले पर पत्रकारों ने बाबा से कई सवाल किए।

: बुजुर्गों की विरासत को भूल गये लोग : जल स्तर गिरने से सूखे कुएं बावड़ी :  कचरा पात्र बने प्राचीन जल स्त्रोत : किसी दौर में एक गाना चला था- 'सुन-सुन रहट की आवाजें यूं लगे कहीं शहनाई बजे, आते ही मस्त बहारों के दुल्हन की तरह हर खेत सजे...' जिस दौर का यह गाना है, उस वक्त गांवों के कुएं, बावड़ियों पर ऐसा ही नजारा होता था। शायद यही नजारा देख गीतकार के मन में यह पंक्तियां लिखने की तमन्ना उठी होगी। लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं, गांवों में पनघटों पर पानी भरने वाली महिलाओं की पदचाप और रहट की शहनाई सी आवाज शांत है, और पनघट पर पसरा सन्नाटा है। लोगों की जीवन रेखा सींचने वाले प्राचीन कुएं, बावड़ियां जो हर मौसम में लोगों की प्यास बुझाते थे, कचरा डालने के काम के हो गये है।

चण्‍डीदत्‍त: `दबंग’ का राजकीय सम्मान? :  विवाद-1 : साल 2002 में बांद्रा, मुंबई स्थित अमेरिकी एक्सप्रेस बेकरी के पास फुटपाथ पर सो रहे लोगों को शराब के नशे में गाड़ी चलाते समय रौंद डाला। घटना में एक की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हो गए। अदालत में सफाई दी- मैं कभी झूठ नहीं बोलता। मैंने शराब नहीं पी रखी थी। सुरक्षा के लिए तैनात एक पुलिस अफसर ने ही बताया कि यह झूठ है।

विवाद-2 : अक्टूबर, 1998 में सैफ़ अली ख़ान, सोनाली बेंद्रे, तब्बू और नीलम के साथ जोधपुर के पास एक गांव में काले हिरनों का शिकार किया।

विवाद-3 : परदे पर शर्ट उतारकर तेवर दिखाना है पसंदीदा शगल।

'शशिजनता द्वारा चुनी सरकार का सबसे अहम दायित्व है कि वह जनता के हितों का संरक्षण करते हुए देश को प्रगति के पथ पर ले जाए एवं जनप्रतिनिधि के रूप में विभिन्न संवैधानिक पदों के माध्यम से जनता का सेवक बन देश में अमन एवं खुशहाली का वातावरण निर्मित करे। लेकिन सब कुछ उलटा-पुलटा हो रहा है, शासन में बैठे जनप्रतिनिधि अपने को राजा एवं जनता को भिखारी समझ रहे हैं। आज सत्ता के मद में ये इतने मदमस्त एवं अहंकारी हो गए हैं कि जिस जनता से भीख में मांगे गए वोट पर राजा बने वही अपने दायित्वों से मुंह-मोड़ न केवल जनता के साथ धोखा कर रहे हैं बल्कि बड़े-बड़े पूंजीपतियों से मिल उन्हें सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर रहे हैं? जिससे चारो ओर हाहाकार मचा हुआ है, आज जनता को ऐसा एहसास हो रहा है कि देश में सरकार नाम की कोई चीज है भी या नहीं? इनकी मक्कारी के नित नए किस्से रोजाना छप रहे हैं, इन्हें देखकर तो ऐसा लगता है कि चोरों का कोई गिरोह सरकार के रूप में कार्य कर रहा है।

सलीमदारूल उलूम देवबंद के नए कुलपति गुलाम मुहम्मद वास्तनवी का विरोध उनके पद ग्रहण करते ही शुरू हो गया था। विरोधियों को उनके तेज विरोध का मौका खुद वास्तवनी ने ही मुहैया कराया। मोदी की तारीफ करना वास्तनवी की भूल थी। अब वह भले ही यह कह रहे हों कि उन्होंने मोदी के विकास की तारीफ की थी, जिसका फायदा हिन्दू को ही नहीं मुसलमानों को भी मिल रहा है, लेकिन जो नुकसान होना था, वह हो गया है। दरअसल, गुजरात के मुख्यमंत्री की किसी भी रूप में तारीफ करना शाहनवाज हुसैन या मुख्तार अब्बास नकवी सरीखे मुसलमानों के अलावा किसी भी मुसलमान को मंजूर नहीं है। भले ही मोदी की तारीफ उनके द्वारा कराए गए विकास की ही क्यों न हो। जब अमिताभ बच्चन ने गुजरात का ब्रांड एम्बेसेडर बनना कबूल किया था, तब उनकी भी जबरदस्त आलोचना हुई थी। क्योंकि अमिताभ की भावुकता रील तक सीमित है, रियल में वे एक विशुद्ध कारोबारी आदमी हैं, इसलिए उन्हें माफ किया जा सकता है।

 अमिताभ ठाकुरहिन्दुस्तान की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री, कौन है आरुषी का असली कातिल?, तलवार दम्पति पर चलेगा मुक़दमा - ये चंद ऐसे शीर्षक हैं जो पिछले दो सालों में लगातार हमारे टीवी स्क्रीनों और अखबारों में लगभग लगातार दिखाई देते रहे हैं, मानो आरुषि कांड हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या हो. जिस देश में ना जाने कितने ही गंभीर अपराध होते रहते हैं, वहां एक दोहरे हत्याकांड को सुर्ख़ियों में ला कर उसे हमारे मन-मस्तिष्क पर पूरी तरह से उतार देना आज की पत्रकारिता का एक बाजारू स्वरुप ही कहा जाएगा. कल इस मामले में सीबीआई कोर्ट का कुछ फैसला आया और उसके बाद से उसे दर्शकों तक पहुंचाने की ऐसी होड़ लगी जिसे देख कर लग रहा था कि यदि इस काण्ड के हर चीथड़े को सबों के सामने ला कर नहीं दिखा दिया गया तो वास्तव में राष्ट्र का भारी नुकसान हो जाएगा.