पिछले ढाई दशकों से भारत में जिस ‘वाद’ ने द्रुत गति से समाज परिवर्तनकामी तमाम ‘वादों’ को प्रायः हाशिये पर धकेल कर रख दिया है,उसका नाम आंबेडकरवाद है.इसके उत्तरोत्तर बढ़ते प्रभाव से देश में जो वाद सर्वाधिक क्षतिग्रस्त हुआ है,वह है ,मार्क्सवाद .कांशीराम के उभार के साथ –साथ तेजी से विस्तारलाभ किये आंबेडकरवाद के उदय के पूर्व सवर्ण तो सवर्ण,सामाजिक बदलाव के प्रति समर्पित अधिकांश दलित –पिछड़े भी मार्क्सवाद से चिपके हुए थे.पर, अब वे इससे प्रायः मोहमुक्त हो चले हैं.मार्क्सवाद के प्रति सम्मोहन के पीछे लोगों का यह दृढ़ विश्वास क्रियाशील रहा है कि मार्क्स पहला विचारक  था जिसने आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी,जोकि मानवजाति की सबसे बड़ी समस्या है, का हल निकालने का वैज्ञानिक ढंग निकाला;इस रोग का बारीकी के साथ निदान किया और उसकी औषधि को भी परख कर देखा.किन्तु आंबेडकरवाद के उदय के पूर्व मार्क्स को सर्वश्रेष्ठ विचारक माननेवालों ने कभी उनकी सीमाबद्धता को परखने की कोशिश नहीं की.

मार्क्स ने जिस गैर-बराबरी के खात्मे का वैज्ञानिक सूत्र दिया उसकी उत्पत्ति साइंस और टेक्नालोजी के कारणों से होती रही है.उसने जन्मगत कारणों से उपजी शोषण और विषमता की समस्या को समझा ही नहीं.जबकि सचाई यह है कि मानव-सभ्यता के विकास की शुरुआत से ही मुख्यतः जन्मगत कारणों से ही सारी दुनिया में विषमता का साम्राज्य कायम रहा जो आज भी काफी हद तक अटूट है.इस कारण ही सारी दुनिया में महिला अशक्तिकरण एवं नीग्रो जाति का पशुवत इस्तेमाल हुआ .इस कारण ही भारत के दलित-पिछड़े हजारों साल से शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक)से लगभग पूरी तरह बहिष्कृत रहे.

दरअसल तत्कालीन यूरोप में औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप पूंजीवाद के विस्तार ने वहां के बहुसंख्यक लोगों के समक्ष इतना भयावह आर्थिक संकट खड़ा कर दिया कि मार्क्स पूंजीवाद का ध्वंस और समाजवाद की स्थापना को अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बनाये बिना नहीं रह सके.इस कार्य में वे जूनून की हद तक इस कदर डूबे कि जन्मगत आधार पर शोषण,जिसका चरम प्रतिबिम्बन भारत की जाति-भेद और अमेरिका-दक्षिण अफ्रीका की नस्ल-भेद व्यवस्था में हुआ,शिद्दत के साथ महसूस न कर सके.पूंजीवादी व्यवस्था में जहाँ मुट्ठी भर धनपति शोषक की भूमिका में उभरता है वहीँ जाति और नस्लभेद व्यवस्था में एक पूरा का पूरा समाज शोषक तो दूसरा शोषित के रूप में नज़र आते हैं.पूंजीपति तो सिर्फ सभ्यतर तरीके से आर्थिक शोषण करते रहे हैं,जबकि जाति और रंगभेद व्यवस्था के शोषक अकल्पनीय निर्ममता से आर्थिक शोषण करने के साथ ही शोषितों की मानवीय सत्ता को पशुतुल्य मानने की मानसिकता से पुष्ट रहे.खैर! जन्मगत आधार पर शोषण से उपजी विषमता के खात्मे का जो सूत्र न मार्क्स न दे सके ,इतिहास ने वह बोझ डॉ.आंबेडकर के कन्धों पर डाल दिया,जिसका उन्होंने नायकोचित अंदाज़ में निर्वहन किया         

भारत में सहस्रों वर्षों से आर्थिक और सामाजिक विषमता के मूल में रही है सिर्फ और सिर्फ वर्ण-व्यवस्था.इसमें अध्ययन-अध्यापन,पौरोहित्य,राज्य संचालन में मंत्रणादान,राज्य-संचालन,सैन्य वृति,व्यवसाय-वाणिज्य इत्यादि के अधिकार सिर्फ ब्राह्मण-क्षत्रिय और वैश्यों से युक्त सवर्णों के हिस्से में रहे .चूँकि इस व्यवस्था में ये सारे अधिकार जाति/वर्ण सूत्र से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते रहे इसलिए वर्ण-व्यवस्था ने एक आरक्षण –व्यवस्था का रूप ले लिया,जिसे हिंदू आरक्षण-व्यवस्था का नाम दिया जा सकता है.इस हिंदू आरक्षण में दलित-पिछडों के साथ खुद सवर्णों की महिलाएं तक शक्ति के सभी स्रोतों से पूरी तरह दूर रखीं गयीं.हिंदू आरक्षण के वंचितों में अस्पृश्यों की स्थिति मार्क्स के सर्वहाराओं से भी बहुत बदतर थी.मार्क्स के सर्वहारा सिर्फ आर्थिक दृष्टि से विपन्न थे,पर राजनीतिक,आर्थिक और धार्मिक क्रियाकलाप उनके लिए मुक्त थे.विपरीत उनके भारत के दलित सर्वस्वहारा थे जिनके लिए आर्थिक,राजनीतिक के साथ ही धार्मिक और शैक्षणिक गतिविधियां भी धर्मादेशों से पूरी तरह निषिद्ध रहीं.यही नहीं लोग उनकी छाया तक से दूर रहते थे.ऐसी स्थिति दुनिया के किसी भी मानव समुदाय की कभी नहीं रही.यूरोप के कई देशों की मिलित आबादी और संयुक्त राज्य अमेरिका के समपरिमाण संख्यक सम्पूर्ण अधिकारविहीन इन्ही मानवेतरों की जिंदगी में सुखद बदलाव लाने का असंभव सा संकल्प लिया था डॉ.आंबेडकर ने.किस तरह तमाम प्रतिकूलताओं से जूझते हुए दलित मुक्ति का सुनहला अध्याय रचा,वह एक इतिहास है जिससे हमसब भलीभांति वाकिफ हैं.

डॉ.आंबेडकर ने मानवेतरों की दशा बदलने के लिए किया क्या?उन्होंने हिंदू आरक्षण के सर्वस्वहाराओं को संविधान में आरक्षण के सहारे शक्ति के कुछ स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक) में संख्यानुपात में हिस्सेदारी सुनिश्चित कराया.परिणाम चमत्कारिक रहा.जिन दलितों के लिए  कल्पना करना दुष्कर था,वे झुन्ड के झुण्ड एमएलए,एमपी,आईएएस,पीसीएस,डाक्टर,इंजीनियर इत्यादि बनकर राष्ट्र की मुख्यधारा जुड़ने लगे.दलितों की तरह ही दुनिया के दूसरे जन्मजात सर्वहाराओं -अश्वेतों,महिलाओं इत्यादि-को जबरन शक्ति के स्रोतों दूर रखा गया था.भारत में अंबेडकरी आरक्षण के,आंशिक रूप से ही सही,सफल प्रयोग ने दूसरे देशों के सर्वहाराओं के लिए मुक्ति के द्वार खोल दिए.आंबेडकरी प्रतिनिधित्व(आरक्षण)का प्रयोग अमेरिका,इंग्लैण्ड,आस्ट्रेलिया,न्यूजीलैंड,मलेशिया,आयरलैंड ने अपने –अपने देश के जन्मजात वंचितों को शक्ति के स्रोतों में उनकी वाजिब हिस्सेदारी दिलाने के लिए किया.

यह सही है कि सम्पूर्ण विश्व में ही आंबेडकरी आरक्षण ने जन्मजात सर्वस्वहाराओं के जीवन में भारी बदलाव लाया है.पर, अभी भी इस दिशा में बहुत कुछ करना बाकी है ,विशेषकर भारत में.अमेरका ,दाक्षिण अफ्रीका इत्यादि देशों में जिस तरह आंबेडकरी प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के जरिये वहां के जन्मजात सर्वहाराओं –महिलाओं और अश्वेतों-को सत्ता की सभी संस्थाओं,उद्योग-व्यापार,फिल्म-मीडिया इत्यादि तमाम क्षेत्रों में ही वाजिब भागीदारी मिली,वैसे ही यदि भारत के जन्मजात वंचितों को शक्ति के सभी स्रोतों में न्यायोचित हिस्सेदारी मिल जाती है,फिर तो मार्क्सवाद सिर्फ सवर्णों तक सिमट कर रह जायेगा. किन्तु मार्क्सवादी चाहें तो लम्बे समय तक राहत की सांस ले सकते हैं.कारण, शासन-प्रशासन ,उद्योग-व्यापार,फिल्म-मीडिया इत्यादि में वर्ण-व्यवस्था के वंचितों की वाजिब हिस्सेदारी की सम्भावना अंततः निकट भविष्य में तो नजर नहीं आ रही है.क्योंकि जिनका केन्द्रीय सत्ता पर कब्ज़ा है,वे समग्र-वर्ग की चेतना से दरिद्र हैं,लिहाजा वे भागीदारी के मार्ग में विघ्न सृष्टि करने के सिवाय कुछ कर ही नहीं सकते .दूसरी ओर जिस बहुजन नेतृत्व को वंचित समाज ने अपने विपुल समर्थन से ताकतवर बनाया है,उनमें सामाजिक न्याय के प्रति पहले जैसी आग ही नहीं रही.जहां तक सामाजिक अन्याय के शिकार तबकों के बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों का प्रश्न है,वे बाबासाहेब की इस बात को मूलमंत्र नहीं बना पाए हैं कि मानव जाति का मुख्य भौतिक लक्ष्य होता है सामाजिक उपभोग के साधनों पर अधिकार करना.उनमें अबतक साधनों पर अधिकार जमाने की आकांक्षा ही नहीं पनप पाई है,इसलिए वे अपनी अधिकतम उर्जा ब्राह्मणवाद विरोध और हिन्दू धर्म का विकल्प तलाशने जैसे अमूर्त मुद्दों में खर्च कर रहे हैं.अगर उनमें अधिकार जमाने के कीटाणु कुलबुलाते रहते तो 2002 में जारी डाइवर्सिटी केन्द्रित भोपाल घोषणापत्र के बाद बहुजनों की स्थिति में भारी परिवर्तन आ गया होता.

स्मरण रहे जनवरी 2002 में डाइवर्सिटी केन्द्रित ‘भोपाल घोषणापत्र’ जारी होने के बाद जब मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह 27 अगस्त 2002 को अपने राज्य के समाज कल्याण विभाग की खरीदारी में एससी/एसटी के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण लागू किया ,देश भर के बहुजनों में सप्लाई ,डीलरशिप,ठेकों इत्यादि सहित विभिन्न आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी की तीव्र ललक पैदा हुई.किन्तु यह ललक सोडा वाटरी उफान साबित हुई और थोड़े ही दिनों बाद वे अपनी पुरानी मांद में घुस कर ब्राह्मणवाद विरोध में डूब गए.लेकिन कुछ बहुजन बुद्धिजीवी और संगठन उद्योग-व्यापार में भागीदारी के मोर्चे पर धैर्य के साथ डटे रहे और सत्ता उनकी लम्बे समय तक अनदेखी न कर सकी.परिणामस्वरूप जहां कई राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में वंचितों में उद्यमशीलता को बढ़ावा देने का जिक्र हुआ,वहीँ कुछ सरकारों ने ठेकों ,सप्लाई इत्यादि में अवसर सुनिश्चित कराया.इस दिशा में हाल ही में एक नया अध्याय उत्तराखंड में जुड़ा है.वहां लम्बे समय से देश की हर ईंट में भागीदारी की मांग बुलंद कर रहीं दलित एक्टिविस्ट विद्या गौतम के नेतृत्व में अखिल भारतीय आंबेडकर महासभा ने जो संघर्ष चलाया उसके फलस्वरूप रावत सरकार ने उनकी कई महत्वपूर्ण मांगे मानने के साथ सरकारी ठेकों में दलित,आदिवासी और पिछड़ों के आरक्षण पर मोहर लगा दी है.अगर विद्या गौतम जैसे दस-बीस और आंबेडकरवादियों का उदय हो जाय तो आंबेडकरवाद के समक्ष मार्क्सवाद के पूरी तरह म्लान होते देर नहीं लगेगी.              

लेखक h.l. Dusadh बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. संपर्क : मोबाइल-9654816191 मेल This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.