कुमार सौवीर: शाहन के शाह : यह दुर्भाग्‍य ही तो है कि भोजन को सुस्‍वादु और पौष्टिक बनाने की क्षमता रखने वाली चटनी को हमारे देश में उपहास का पात्र बना दिया गया। इतना ही नहीं, उस पर माखौल के हिंसक हमले किये गये और प्रस्‍तुतिकरण कुछ ऐसा किया गया कि लोगबाग उसके नाम से कांप उठें। लेकिन कण्‍व ऋषि के आश्रम से शुरू हुई उस घटना पर एक नजर डाल लीजिए, जिसका अंत भारत नाम के शिशु के रूप में पूरे आर्यावर्त में एक तेजस्‍वी उत्‍तराधिकारी के तौर पर सामने आया। इस पूरे काण्‍ड में शिक्षाओं को इतनी खूबसूरती से एक सूत्र में पिरोया गया है कि प्रसंग भी हो गया और एक पूरा का पूरा शिक्षासत्र भी संचालित हो गया।

कहने की जरूरत नहीं कि किसी भी कन्‍या के लिए इससे अच्‍छे शैक्षणिक सत्र की नजीर किसी भी साहित्‍य में नहीं दिखायी देती है। लेकिन हैरत की बात है कि पुराण और महाभारत में इनके प्रसंग बेहिसाब होने के बावजूद नृ-वंश ने कभी भी इनके नाम का प्रयोग अपनी संततियों में नहीं किया।

तो आज बात दुर्वासा ॠषि पर। अपने पूरे व्‍यक्तित्‍व में दुर्वासा किंवदंतियों तक ही सिमटे दिखायी देते हैं। जाहिर है कि उनका जन्‍म भी एक किंवदंती ही बन कर रह गया। कहानियों के मुताबिक ब्रह्मा के पुत्र अत्रि ने ऋष्यमूक पर्वत पर पत्नी अनुसूया के साथ तपस्या की। नतीजा, उनके तीन पुत्रों में से एक दुर्वासा हुए। उन्‍हें शिव-अंश माना जाता है। कठोर तप और हठयोग से अप्रतिम सिद्धि पाये दुर्वासा प्रारंभ से ही क्रोधी थे। एक दिन उपवास के बाद पारण यानी भोजन करने को तैयार अंबरीश नामक एक राजा को देखकर दुर्वासा को लगा कि उनका अपमान हो गया है। वे क्रुद्ध हो गये। अनेक राक्षसी क्रियाएं भी कीं। लेकिन अंबरीश की सहनशक्ति के सामने आखिरकार उन्‍हें तत्‍वज्ञान हुआ और उन्‍होंने अपनी प्रवृत्ति को बदल दिया। अब वे ब्रह्मज्ञान और अष्टांग योग आदि की अपेक्षा शुद्ध भक्तिमार्ग के रास्‍ते पर आ गये।

जाहिर है कि यहीं से शुरू हुआ दुर्वासा का एक नया चरित्र जो हमें कण्‍व ऋषि के आश्रम तक पहुंचा कर उपसंहार कराता है। सामान्‍य तौर पर दुर्वासा क्रोध के लिए मशहूर हैं। वे सतयुग, त्रेता और द्वापर में भी जहां-तहां दिखलायी पड़ते हैं। उनमें अकारण ही भयंकर क्रोध भी दिखायी देता है और मान्‍यता है कि वे सब प्रकार के लौकिक वरदान देने में समर्थ हैं। सामान्‍य तौर पर माना जाता है कि उनका आश्रम ब्रज के निकट ईशापुर में है,  जिसका पुनर्निर्माण त्रिदण्डि स्वामी श्रीमद्भक्ति वेदान्त गोस्वामी ने कराया। इस आश्रम की देखभाल आज सन्त रास बिहारी दास कर रहे हैं। आज भी यहां खूब भीड़ जुटती है।

महाभारत की एक बड़ी घटना में दुर्वासा मुनि अपने दस हज़ार शिष्यों के साथ दुर्योधन के यहाँ पहुंचे। कूटनीतिक चाल के तहत दुर्योधन ने उन्हें प्रसन्न कर वरदान मांगा कि वे अपने शिष्यों सहित बनवासी युधिष्ठिर का भी आतिथ्य ग्रहण करें। विपन्‍नअवस्‍था से जूझते पांडव ऐसा कर पाने में असमर्थ थे। समय तय हुआ दोपहर के भोजन के बाद का। दुर्योधन जानता था कि तब पांडवों की बटलोई में कुछ भी शेष न होगा, और अंतत: दुर्वासा उसे शाप देंगे। दुर्वासा शिष्यों सहित पांडवों के पास पहुंचे तथा उन्हें रसोई बनाने का आदेश दे नदी में स्नान करने निकल पड़े। धर्मसंकटग्रस्‍त द्रौपदी ने कृष्ण की गुहार लगायी। कृष्ण ने बटलोई में चिपके साग के एक टुकड़े को खा लिया और उधर स्‍नान करते शिष्‍यों समेत दुर्वासा का पेट भर गया। वे भाग खड़े हुए। यहां दुर्वासा एक मजाक के तौर पर दिखायी देते हैं। लेकिन आचार्य श्रीकृष्‍ण सिंघल जी इसकी दूसरी ही व्‍याख्‍या करते हैं। श्री सिंघल मानते हैं कि यह परिस्थितिजन्‍य घटना थी जिसमें पांडवों को उनकी क्षमताओं की पहचान कराना ही दुर्वासा का मकसद था।

एक अन्‍य घटना में दुर्वासा, यह कहकर कि वे अत्यंत क्रोधी हैं,  कौन उनका आतिथ्य करेगा, नगर में चक्कर लगाने लगे। उनके वस्त्र फटे और गंदे थे। लेकिन कृष्ण ने उन्हें आमन्त्रित कर लिया। दुर्वासा ने कृष्‍ण के धैर्य की हर तरह से परीक्षा ली। जितना हो सकता था, तांडव किया। और एक बार तो उसी उद्दंड अवस्‍था में भागने भी लगे। लेकिन कृष्ण कहां मानने वाले थे। वे भी पीछे भागे। अपनी सरलता से वे दुर्वासा को मना लाये, तब मिला आशीर्वाद कि जब तक इस सृष्टि का और जितना अनुराग अन्न में होगा, उतना ही तुममें भी रहेगा। और एक बड़ा वर्ग मानता है कि इसके बाद ही कृष्‍ण की सहजता के चलते महाभारत सम्‍पन्‍न हो पाया। द्रौपदी की उपरोक्‍त घटना से भिन्‍न एक और घटना पर नजर डालिये। द्रौपदी नदी में स्नान कर रही थी। कुछ दूर पर दुर्वासा भी थे। दुर्वासा की लंगोटी अचानक बह गयी। वे अब निकलें कैसे। द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनको दिया। और दुर्वासा ने आशीर्वाद दिया कि उसकी लज्जा पर कभी आंच नहीं आयेगी। इसका अंत द्रौपदी चीर-हरण में देख लीजिए।

लेकिन दुर्वासा का सबसे सुंदर प्रकरण तो कण्‍व ऋषि के आश्रम का ही है, जहां शकुंतला और दुष्‍यंत ने प्रेम विवाह किया। कुछ लोग दुर्वासा के क्रोध से जन्‍मी घटना मानते हैं। जबकि कुछ लोगों की निगाह में यहां एक श्रेष्‍ठ शिक्षक की भूमिका निभायी दुर्वासा ने। वे यहां शील के सम्‍मान की बात करते दिखायी पड़ते हैं। यह प्रकरण आज भी उतना ही महत्‍वपूर्ण है। जीवन-साथी के चयन में संयम, बुद्धि आदि की जरूरत का इससे बड़ा हितोपदेश क्‍या कहीं और इतने रोचक ढंग से हो सकता है ? यह पूरी कहानी प्रमाणित करती है कि जीवन में सुखद संयोग हो तो सकते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि ऐसे संयोग हमेशा और हर व्‍यक्ति के साथ होते ही रहें। और यदि सुखद संयोग नहीं हुए तो स्थिति भयावह हो जाती है। यह शिक्षक-धर्म नहीं तो फिर और क्‍या है?

दरअसल, दुर्वासा ने ईश्‍वर की उपासना के लिए उस ईश्‍वरीय तत्‍व को ही चुना, जो सामान्‍य तौर पर हेय समझा जाता है। लेकिन उनका भक्ति-मार्ग क्रोध पर केंद्रित है। उनका तर्क है कि मैं ईश्‍वरीय तत्‍व के क्रोध पक्ष की उपासना करता हूं। आचार्य सिंघल कहते हैं कि क्रोध की मनो-सामाजिक अवस्‍था का इतना सुंदर और सजीव-जीवंत चरित्र और कहीं नहीं दिखायी पड़ता है। बात सही भी है। क्रोध हेय तो है, लेकिन वह अनिवार्य भी तो है। और दुर्वासा ने यही बताने के लिए क्रोध की आग में खुद को भस्‍मीभूत कर दिया।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.