शेर आया... शेर आया ये सुनकर लोग भागने लगे, ये तो आप सभी ने सुना ही होगा... आख़िर जान जो बचानी है, ऐसे में न दिमाग ने काम किया, न किसी ने दिमाग चलाने की कोशिश ही की... अक्सर ऐसा ही होता है जन सैलाब के साथ एक निर्देशक और बाकी सभी अनुयायी होते हैं... अनुयायी जो साथ देते हैं, हल्ला करते हैं, नारे लगाते हैं और निर्देशक को हीरो बना देते हैं... अब बात करते हैं अनशन की क्या अनशन भी 'शेर आया शेर आया' जैसी कहावत को सार्थक करता है, जिसमें आयी भीड़ बस एक दिशा में भाग रही है जिसे ये भी नहीं पता कि वो किस लिये भाग रही है... अपने लिए?  देश के लिए? या फिर जिसे हीरो बनाया है उसके लिए? दरअसल अनशन आज भेड़चाल में तब्दील हो गया है, लेकिन इसका अंतर हमें ख़ुद ही करना होगा.

जहां बाबा राम देव के साथ उनके अनशन में शामिल होने के लिये जनसैलाब उमड़ पड़ता है वहीं देश का दुर्भाग्य है कि देश के लिए अनशन की भेड़चाल में शामिल हुए लोग इरोम शर्मिला को नहीं जानते... बताना चाहुंगी कि इरोम शर्मिला - सुरक्षा बलों द्वारा मणिपुर में मानवाधिकारों के हनन के विरोध में पिछले 10 सालों से अनशन पर हैं, उन्होंने पिछले 10 सालों से कुछ नहीं खाया, जानकर हैरानी होगी कि देश और समाज के लिए ऐसा क़दम उठाने वाली इस साहसी महिला के इस अनशन को आत्महत्या के प्रयास का नाम देकर कई बार गिरफ्तार किया जा चुका है.

यहां तक कि उसके अनशन को तोड़ने के लिये उसे ज़बरदस्ती नाक के रास्ते से भोजन दिया जाता है। अदालत रिहा करती है, वह फ़िर अनशन पर बैठती है और उसे फ़िर गिरफ़्तार कर लिया जाता है उसके नाक के रास्ते एक पाइप लगा दिया गया है... अस्पताल, जेल और यातना भरी इस प्रक्रिया को 10 वर्ष होचुके हैं... 30 वर्ष की आयु से जारी अनशन ने शर्मिला के शरीर को कमज़ोरकर दिया है, लेकिन उसके इरादे आज भी फ़ौलाद की तरह मज़बू्त है... मगर उसके इस संघर्ष में उसके साथ कितने लोग हैं... जवाब आपको देना है क्या आप हैं? अब आप ही निर्णय लें कि किसे आप अनशन का नाम देंगे और किसे भेड़चाल का? किस अनशन के साथ आप चलेंगे और किस भेड़चाल का हिस्सा बनेंगे?

लेखिक बबिता अस्‍थाना सीवीबी न्‍यूज से जुड़ी हुई हैं.