कुमार सौवीर: शाहन के शाह : चलिए, आप दोनों महानुभाव भोजन ग्रहण कर लीजिए। यह सुनते ही पूरा वातावरण स्‍तब्‍ध हो गया। सुई भी गिरती तो लोग जान जाते। श्‍मशान सी चुप्‍पी छा गयी पूरे शास्‍त्रार्थ स्‍थल पर। वहां उपस्थित विद्वान लोग अब इस बात की प्रतीक्षा कर रहे थे, कि अब आगे क्‍या होगा। लेकिन भारती उठ खड़ी हो गयीं और पूरे सम्‍मान के साथ दोनों को भोजन के आसन की ओर आमंत्रित करने लगीं। उनका चेहरा विषाद रहित और प्रशांत था। बस यही बात तो लोगों को बेचैन किये जा रही थी, लेकिन भारती निस्‍पृह भाव से अपने काम में जुट गयीं। यह जानते हुए भी कि अगर वे चाहतीं तो अपने पति को इस शास्‍त्रार्थ में पराजित होने से बचा सकती थीं, ऐसा न भी करतीं तो कोई न कोई कारण बता कर पूरा शास्‍त्रार्थ स्‍थगित भी करने का अधिकार था उन्‍हें। लेकिन भारती पर न्‍याय का दायित्‍व था।

अब आखिर वह अपने इस दायित्‍व के निर्वहन करने से कैसे मुकर या उसे उपेक्षित कर सकती थीं। वे जानती थीं कि आखिर वे पत्‍नी तो रहेंगी ही, चाहे उनके पति हारें या जीतें। इससे उनके दाम्‍पत्‍य जीवन पर तो कोई असर पड़ने नहीं जा रहा था। और अगर ऐसी आशंका होती भी तो उनकी चेतना उन्‍हें न्‍यायाधीश के दायित्‍व की अवहेलना करने की इजाजत हर्गिज नहीं देती। तो हो गया फैसला। उनकी न्‍याय-घोषणा से उनके पति खुद ही भौंचक्‍के रह गये। एक तो यह फैसला और ऊपर से शास्‍त्रार्थ में मिली करारी हार। उधर जीता हुए व्‍यक्ति भी खुद को असहज महसूस कर रहा था। नतीजा- वह भी अपने आसन से हिलने की हिम्‍मत नहीं जुटा पा रहा था।

आखिर, पराजय का बोध तो किसी को भी क्षण भर के लिए ही सही, मगर हताश तो कर ही देता है। लेकिन यहां तो और भी बुरी हालत थी। अपनी ही पत्‍नी के हाथों से वह शख्‍स सार्वजनिक तौर पर परास्‍त घोषित करार दिया जा चुका था, जिसका नाम अब तक आर्यावर्त में अपनी विद्वता के चलते मशहूर हो चुका था। सन 816 के आसपास हुई थी यह स्‍तब्‍धकारी घटना, जिसने समाज में तब तक व्‍याप्‍त पत्‍नी की भूमिका और दायित्‍वों की प्रचलित परम्‍परा को एक झटके के साथ धूल चटा दी थी। अब तक तो यही माना जाता था कि पत्‍नी तो पुरूष की अनुगामिनी होती है और पुरूष उस पर शासन करता है। बोलने की आजादी तो पत्‍नी के खाते में तब क्‍या, आज तक नहीं है। लेकिन तेरह सौ साल पहले की हालत की कल्‍पना आसानी से की जा सकती है।

बहरहाल, यह न्‍यायाधीश थीं भारती, और जीते थे आदि आचार्य शंकर, जिन्‍हें शंकराचार्य भी कहा जाता है। जबकि करारी हार का मुंह देखना पड़ा था भारती के पति मंडन मिश्र को। माना जाता है कि यह शास्‍त्रार्थ हुआ था मिथिला में, लेकिन कुछ लोगों के अनुसार यह घटना सहरसा की है तो कुछ लोग इसे मध्‍यप्रदेश के किसी इलाके में हुई बताते हैं। लेकिन घटना की प्रमाणिकता निशंक है। हालांकि इस घटना के तथ्‍य पूरे तौर पर इतिहास में दर्ज नहीं हैं। यह भी वजह हो सकती है कि तब का समाज भारती यानी एक महिला यानी एक पत्‍नी को महिमामंडित करने को तैयार ही नहीं हुआ होगा। शायद तब के इतिहासकारों को यह भय रहा हो, कि इससे सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है। सम्‍भवत- यही कारण रहा कि यह घटना स्‍त्री-सशक्तिकरण में कभी भी मील का पत्‍थर बन ही नहीं पायी। लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद इसे आज तक झुठलाया नहीं जा सका है।

कहने की जरूरत नहीं कि आचार्य शंकराचार्य ने हिन्‍दू समाज को तब के अराजक महौल से निकाल कर उसे धर्म का रक्षा-सूत्र पहनाने के लिए उन्‍होंने न केवल पूरे भारत की दो बार पैदल परिक्रमा की, बल्कि आज भी सर्वोच्‍च मानी जाने वालीं चार पीठों की स्‍थापना भी की। लेकिन अपनी इस धर्म विजय यात्रा के दौरान वे मंडन मिश्र के पास शास्‍त्रार्थ करने पहुंचे थे। शुरुआत बहुत अपमानजनक हालातों में हुई। लेकिन आखिरकार मंडन मिश्र इसके लिए तैयार हो गये। चूंकि इन महान विद्वानों की बातचीत का फैसला करने का साहस किसी में नहीं था, इसीलिए तब की महानतम विदुषी मानी जाने वालीं और मंडन मिश्र की पत्‍नी भारती को निर्णायक बनाया गया। 16 दिनों तक शास्‍त्रार्थ चला, हारजीत का फैसला ही नहीं हो पा रहा था। आखिरी समय में तो मंडन मिश्र का पलड़ा हल्‍का होते देख भारती भी अन्‍यमनस्‍क हो गयी थीं।

अचानक उन्‍होंने एक फैसला किया। 17 वें दिन उन्‍होंने दोनों विद्वानों के गले में ताजा फूलों की माला डाल दी और किसी आवश्‍यक काम से चली गयीं। मगर लौटते ही शंकराचार्य की जीत का फैसला सुना दिया। हालांकि भारती ने कहा तो कुछ नहीं, सिवाय इसके कि पहले तो वे अपने पति को भोजन करने को कहती थीं, जबकि शंकराचार्य से बोलती थीं कि महोदय, चल कर भिक्षा ग्रहण कर लीजिए। लेकिन आज उन्‍होंने दोनों से ही भोजन ग्रहण करने का निवेदन कर दिया। समझदार को इशारा काफी था। लोग भी समझ गये कि मंडन मिश्र हार चुके हैं। कुछ जिज्ञासु लोगों ने पूछ भी लिया कि आपने किस आधार पर फैसला किया। तो भारती ने बेहिचक जवाब दिया कि मंडन मिश्र के गले की माला उनके क्रोध और पराजयबोध के चलते मुरझा गयी थी, जबकि शंकराचार्य की माला के फूल लगातार दमक रहे थे।

और इसके बाद शुरू होती है समाज में महिलाओं की वह हालत, जो आज भी शायद ठीक वैसी ही है, जैसी पहले थी। तो झुकना भारती को ही पड़ा। षडयंत्रकारी विद्वानों को तरकीब खोजते देर न लगी। बोले, पत्‍नी तो पति का अभिन्‍न अंग है, तो किसी भी हारजीत का फैसला करने से पहले पत्‍नी को जब तक न हाराया जाए, उसे हार नहीं कहा जाता। भारती हालांकि इसकी विरोधी थी, लेकिन सामाजिक दवाब आड़े आ गया। सिर झुका कर भारती ने शंकराचार्य से शास्‍त्रार्थ करना मंजूर कर लिया। इसके साथ ही वह दौर भी शुरू हो गया, जिसमें औरतों को हर हाल में पति की श्रेष्‍ठता के लिए उपयोग करना जन्‍मसिद्ध अधिकार है। तो शुरू हो गया भारती का शंकराचार्य से शास्‍त्रार्थ। लेकिन यह नया दौर चालाकी भरा था। इस चालाकी को तानाबाना बुना था उन विद्वानों ने जो हर हाल में शंकराचार्य को हारते देखना चाहते थे।

तो पहला ही सवाल काम-कला पर हो गया। शंकराचार्य ने सिर झुका लिया। सोचने लगे कि जवाब कैसे दिया जाए। सवाल उठा कि क्‍या इस चुप्‍पी को पराजय समझ लिया जाए। नहीं। शंकराचार्य ने विनम्रता से जवाब दिया, लेकिन साथ ही कहा कि चूंकि इस विषय पर न तो उन्‍हें ज्ञान है और न ही यह शास्‍त्रार्थ का विषय है। फिर भी उन्‍हें इसके अध्‍ययन के लिए एक पखवाड़े का समय चाहिए। इसके बाद शुरू होता है किंवदंतियों का सिलसिला। कहा जाता है कि उन्‍होंने एक मृत राजा की देह में प्रवेश और उसका उपभोग किया। इसे परकाया प्रवेश का नाम दिया गया। कुछ भी हो, समय-सीमा में ही लौटकर आचार्य शंकर फिर भारती के सामने उपस्थित हुए। सवालों का दौर शुरू हुआ और भारती ने आखिरकार सिर झुका‍ लिया। लेकिन इस जीत को न तो आचार्य शंकर ने माना और न ही भारती की पराजय। भारती तो पहले ही जीत चुकी थी। इसलिए जय-पराजय का कोई सवाल ही नहीं उठता था। आचार्य शंकर तो पहले ही जीत चुके थे, यह भ्रम तो इस पूरी कहानी में शुरू से ही बना हुआ है।

लेकिन जो तनिक भी गंभीरता से इस पूरे मामले को देख सकते हैं, वे पायेंगे कि जीत तो दरअसल भारती की हुई थी, जिसने परम्‍पराओं के खिलाफ धर्म को जीता, जिसने एक महान योगी को विजयी घोषित किया- अपने ही पति के विरूद्ध फैसला देकर। यह आज मुमकिन नहीं, लेकिन उस काल में तो सर्वथा नामुमकिन ही था। इसे तो कोई भी समझ सकता है। इसके बाद क्‍या हुआ, इतिहासकार कुछ नहीं बताते, लेकिन तर्क बताते हैं कि इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब निर्णायक होते भी जीत का सेहरा केवल और केवल भारती के ही सिर पर बांधा गया। क्‍या पता कि आने वाले वक्‍त में महिला सशक्तिकरण की सड़क भारती के ही चरण-चिन्‍हों पर ही चलती दिखाई पड़ने लगे।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.