कुमार सौवीर: शाहन के शाह : दोनों हाथों में जलती लकडि़यां लेकर चिंघाड़ते दरवेश को देख लोगबाग परेशान हो गये। दरवेश चिल्‍ला रहा था- आज तो मैं जन्‍नत और दोजख, दोनों को ही फूंक डालूंगा। बेहाल लोगों ने सबब पूछा, तो दरवेश का जवाब था- ताकि लोग बिना सबब या चाहत-लालच के अल्‍लाह की इबादत कर सकें। शिबली बोले कि इबादत में लालच किस बात का। मगर लोग या तो दोजख में जाने से बचने के लिए इबादत में मशगूल रहते हैं या फिर जन्‍नत हासिल करने के लिए। जबकि होना तो यह चाहिए कि लोगों का मकसद दोजख-जन्‍नत को झटककर केवल अल्‍लाह के पास जाने की जुगत में रहें। शिबली बोले- लालच में किये गये किसी भी काम का अंजाम हमेशा ही खराब निकलता है।

जाहिर है कि लोगों ने दरवेश को सिरफिरा समझा, कुछ ने पत्‍थर भी फेंके और आगे बढ़ गये, लेकिन दरवेश ने अपना अंदाज जारी रखा और वह शिबली, यानी शेर का बच्‍चा हो गया। दरवेश का कहना था कि शेर तो अल्‍लाह ही है, मैं तो उसका बच्‍चा हूं। और यही वजह है कि उन्‍हें दुत्‍कारने वालो का आज नामोनिशान तक नहीं है, जबकि  दरवेश ने अपने आध्‍यात्मिक दर्शन का इतना ज्‍यादा विकास कर लिया कि वे अजर-अमर हो गये। और इस अमरत्‍व का रास्‍ता था- अल्‍लाह से बिना किसी लालच के मिलने की अदम्‍य और उत्‍कट लालसा। अपना शरीर छोड़ते वक्‍त इस दरवेश ने साफ कहा कि वह अब अपने महबूब में विलीन होने निकल रहा है।

यह शिबली थे। दरवेश शिबली। ऐसा संत जिसने खलीफा की अमीरी को लात मार दी। शिबली ने जीवन-मृत्‍यु, इंसान और अल्‍लाह की निहायत उम्‍दा व्‍याख्‍या की। हालांकि शिबली के बारे में साहित्‍यकार और इतिहासकार बहुत ज्‍यादा बताने से गुरेज करते हैं, लेकिन सूफी परम्‍परा में शिबली का नाम अमिट और सर्वाधिक सम्‍मानितों में से है। हो सकता है कि इतिहासकारों ने तब के माहौल को देखते हुए शिबली को तवज्‍जो देने की हिम्‍मत न दिखायी हो, लेकिन शिबली की राह कौन रोक सकता था। यह राह तो तब ही खुल गयी थी जब अपने दरबारियों को खिलअत यानी तोहफा बांटते वक्‍त एक दरबारी को छींक आ गयी और उसने उसी खिलअत से अपनी नाक साफ कर ली। खलीफा यह देखकर गुस्‍सा हो गया और उस दरबारी से खिलअत छीन कर उसे दरबार से निकाल बाहर कर दिया। शिबली भी दरबारी ही थे, लेकिन खलीफा की यह हरकत सहन नहीं कर सके और बोल ही पड़े- तू मूर्ख है जो अपनी खिलअत की बेअदबी बर्दाश्‍त नहीं कर पाया। तब जरा सोच तो उस दोनों जहान के मालिक ने जो खिलअत अदा फरमाई है, उसे मैं तेरी चाकरी करके क्‍यों तबाह होने दूं। बस, फिर क्‍या था। खलीफा की खिलअत उसके मुंह पर फेंक कर शिबली निकल पड़े अल्‍लाह को खोजने की उस राह पर जो आज सूफी परंपरा के निहायत मजबूत राजमार्ग तक पहुंच चुकी है।

दरअसल, अल्‍लाह से प्रेम तो शिबली को शुरू से ही था। वे अल्‍लाह का नाम लेने वालों को मिस्री बांटा करते थे। कुछ समय बाद तो वे अल्‍लाह का नाम लेने वाले का अशर्फी तक बांटने लगे। बच्‍चों और फकीरों की भीड़ अल्‍लाह का नाम लेकर उनके पास जमा रहती थी। लेकिन निसाज और जुनैद नामक संतों की सोहबत का असर यह हुआ कि उनका दर्शन-ज्ञान चरम तक पहुंचने लगा। इन संतों ने शिबली को ज्ञान-मार्ग पर लाने के लिए पहले तो उनसे भीख मंगवाई, फिर वापस उनके गृहनगर निहाबंद भेज कर वहां के हर एक शख्‍स से अपने गुनाहों की माफी मांगने को कहा। सबसे माफी मांगने के बावजूद एक शख्‍स के बाहर होने के चलते शिबली उससे मिल नहीं सके तो एक लाख दिरहम उसके परिवार को दे आये। जुनैद को पता चला तो शिबली को जमकर धिक्‍कारा कि अभी तक तुम्‍हारे सिर से अमीरी का भूत नहीं उतरा और अब तुम अपनी दौलत से अल्‍लाह की राह खरीदोगे। बात समझ में आ गयी और अगले एक साल तक प्रायश्चित करते हुए शिबली ने फिर भीख मांगी। लेकिन अब तक तो सोना तप चुका था।

बाद के दौर में तो एक बार वे तलवार लेकर उन लोगों को दौड़ा लेते जो उनके सामने अल्‍लाह का नाम लेते थे। सबब पूछा गया तो शिबली बोले- पहले मैं समझता था कि यह लोग अल्‍लाह का नाम मोहब्‍बत में लेते हैं और हकीकत तथा साधन एकसाथ जिन्‍दा हैं। लेकिन अब समझ में आ गया है कि यह लोग उसका नाम अपनी काहिली और लालच में लेते हैं। उन्‍हें इसकी लत लग गयी है और मैं यह अब हर्गिज बर्दाश्‍त नहीं कर सकता कि उस पाक नाम का इस तरह बेजा इस्‍तेमाल हो। लेकिन अल्‍लाह तो शिबली का साध्‍य था। वे जहां भी अल्‍लाह लिखा देखते उसे चूमते थे, लेकिन एक दिन जुनैद ने टोक दिया कि इस नाम में मशगूल रहने के बजाय अब तू सीधे उस नाम वाले को ही तलब कर ले। सामने उफनाती नदी बह रही थी, शिबली उसी में कूद पड़े। लेकिन कमाल यह कि बेअंदाज उछलती लहरों ने उन्‍हें सुरक्षित वापस किनारे पर पहुंचा दिया।

शिबली का कहना था कि सूफी तो वह है जो अपनी चोटों से चमकता है और दुनिया की चोटों से चुटहिल होकर तीर की तरह सीधे उस अल्‍लाह की राह में चला जाता है जो सर्व-दुख-भंजन है। सादगी के प्रतीक शिबली मानते हैं कि अल्‍लाह को याद करने में उन्‍हें महारत नहीं है, लेकिन मैं उसे अपनी कल्‍पनाओं में मानता हूं और वह हकीकत में मेरी ओर नजर डाल लेता है। शिबली अपने ही अनोखे तर्क पर अडिग रहे। एक बार तो उन्‍होंने अपने सारे कपड़े उतार कर आग के हवाले कर दिये। सवाल उठा कि शरीयत में माल को बिलावजह जाया करना पाप है, तो जवाब मिला- मैं उन कपड़ों पर आसक्‍त होता जा रहा था और कुरआन कहता है कि जिस पर भी तेरी आसक्ति होगी, उसे मैं तेरे साथ ही भस्‍म कर दूंगा। तो यहां-वहां खुद को जलाने से बेहतर है कि कपड़ों को यही जला दिया जाए। उनकी बेखुदी और बाखुदी लाजवाब है। भक्ति का बयान जरा शिबली के शब्‍दों मे सुन लीजिए- असली भक्‍त तो वह है जिसमें अपने बदन से एक मच्‍छर तक हटाने की ताब न रखे, लेकिन सातों आसमान और जमीनों को वह अपनी पलकों पर उठा सके।

शिबली कहते हैं कि दुनिया नाचीज है इसलिए उसकी ओर बेपरवाह होना सबसे सच्‍चा त्‍याग है। मगर जो इस दुनिया को छोड़ने की कोशिश करते हैं, वे जाहिल हैं। क्‍योंकि इस तरह वे इस नाचीज दुनिया को चीज मानने की गलती कर बैठते हैं। शिबली का एक दर्शन और देखिये। जुनैद ने कहा- शिबली तुम अपना काम अल्‍लाह पर छोड़ दो, तो तुम्‍हें सुकून मिल जाए। शिबली ने जवाब दिया- सुकून तो मुझे तब मिलेगा, जब अल्‍लाह मेरा काम मुझ पर छोड़ देगा। शिबली को तो एक बार शैतान से रश्‍क हो गया। उनका कहना था कि शैतान पर अल्‍लाह ने लानत भेजी थी। माना कि वह लानत ही थी, लेकिन दी तो अल्‍लाह ने ही। अब अल्‍लाह की यह खिलत शैतान ले जाए, यह बात शिबली को बर्दाश्‍त नहीं हो रही थी। यानी अल्‍लाह उन्‍हें कुछ तो देता, भले ही वह लानत ही क्‍यों न हो।

शिबली का आखिरी वक्‍त देखकर लोगबाग उनका नमाजेजनाजा पढ़ने आ गये। शिबली बोल पड़े कि कमाल तो देखिये कि जिंदा शख्‍स की नमाजेजनाजा पढ़ने के लिए मुर्दों का गिरोह आ टपका है। मृत्‍युशैय्या पर लेटे शिबली से लोगों ने कहा कि ला इला इल्लिल्‍लाह बोलिये। यानी नहीं है कोई अल्‍लाह के सिवा। शिबली ने इनकार कर दिया और बोले कि जब कोई गैर है ही नहीं तो मैं किसे घटा दूं। लोगों ने जोर दिया कि शरीयत के मुताबिक आपको कलमा पढ़ना ही चाहिए, मगर शिबली ने साफ इनकार कर दिया कि वे रिश्‍वत न देंगे और न लेंगे। अल्‍लाह की राह में कोई शर्त नहीं। और एक जिन्‍दा इंसान को नसीहत देने की कोशिशें कम से कम आप जैसे मुर्दा लोग मत करें। मैं तो चला अपने महबूब की मोहब्‍बत में वासिल होने। और इसी के साथ ही अपने दौर का यह महान संत खामोश हो गया, लेकिन आज की सूफी परम्‍परा में उसी के बोल लगातार ऊंचे ही होते दीखते हों, तो इसमें आश्‍चर्य क्‍या है?

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.