डा. निरंकुशबाबा रामदेव ने योग के नाम पर इस देश के लोगों के दिलों में स्थान बनाया. लोगों के स्वास्थ्य के लिये बाबा ने बहुत बड़ा काम किया. लोगों को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाया. कुछ समय बाद "राजीव दीक्षित" नाम के एक विद्वान व्यक्ति को साथ में लेकर अपने मंच से और आस्था चैनल के माध्यम से तथ्यों तथा आंकड़ों के आधार पर घर-घर में जानकारी दी गयी कि देश के राजनेता न मात्र भ्रष्ट हैं, बल्कि ऐसी व्यवस्था को देश में लागू किया जा रहा है कि जिसके चलते देश को लूटकर विदेशी कम्पनियॉं भारत के धन को विदेशों में ले जा रही हैं.

जब श्री दीक्षित जी बाबा रामदेव के मंच से आँकड़ों सहित यह जानकारी देते तो लोगों का तालियों के रूप में अपार समर्थन मिलता था, लेकिन ये क्या जो बाबा रामदेव लाखों लोगों के हृदय रोग का सफलतापूर्वक उपचार करने का दावा करते रहते हैं, उन्हीं का अनुयाई, उन्हीं का एक मजबूत साथी पचास साल की आयु पूर्ण करने से पहले ही हृदयाघात के चलते असमय काल के गाल में समा गया. जिसका दाह संस्कार करने में साथ जाने वालों का आरोप है कि मृतक को हृदयाघात नहीं हुआ, बल्कि उसे कथित रूप से जहर दिया गया था, क्योंकि उसका शव नीला पड़ गया था.

कौन था यह इंसान? जो बाबा रामदेव का इतना करीबी होते हुए भी हृदयाघात का शिकार हो गया और जिसका शव नीला पड़ जाने पर भी, जिसका पोस्टमार्टम तक नहीं करवाया गया? वो दुर्भाग्यशाली व्यक्ति राजीव दीक्षित ही था. जो बाबा के अभियान के लिये रात-दिन एक करके तथ्य और आँकड़े जुटा कर बाबा के लिये राजनैतिक भूमि तैयार कर रहा था, जिसे कथित रूप से इस बात का इनाम मिला कि वह बाबा के मंच से बाबा से अधिक पापुलर (लोकप्रिय) होता जा रहा था. बाबा से ज्यादा लोग राजीव दीक्षित को सुनना पसन्द करने लगे थे. राजीव दीक्षित के चले जाने के बाद अनेक कथित हिन्दू सन्तों का आरोप है कि राजीव दीक्षित की मौत नहीं हुई, बल्कि उसकी हत्या करवाई गयी. जिसमें बाबा रामदेव सहित, उनके कुछ बेहद करीबी लोगों पर सन्देह है. इस प्रकार बाबा रामदेव का आन्दोलन योग से, स्वदेशी और राजीव दीक्षित के अवसान के रास्ते चलता हुआ ''भारत स्वाभिमान'' की यात्रा पर निकल पड़ा है.

देशभर में अनेकों लोगों द्वारा बाबा पर बार-बार आरोप लगाये जाते रहे हैं कि उनका असली या छुपा हुआ ऐजेण्डा हिन्दुत्वादी ताकतों और संघ सहित भाजपा को लाभ पहुँचाना है, लेकिन बाबा की ओर से इन बातों का बार-बार खण्डन किया जाता रहा है. यद्यपि सूचना अधिकार कानून के जरिये यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि देश के लोगों से राष्ट्र के उत्थान के नाम पर लिए गए चंदे में से बाबा के ट्रस्ट से भारतीय जनता पार्टी को चुनावी खर्चे के लिये लाखों रुपये तो चेक से ही दिये गये. बिना चेक नगद कितने दिये गये होंगे, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है. इस प्रकार बाबा का असली ''संघी'' चेहरा जनता के सामने आने लगा है.

''भारत स्वाभिमान''  के समर्थकों की ओर से जनता को बेशक बेवकूफ बनाया जाता हो कि बाबा का संघ या भाजपा या नरेन्द्र मोदी के मकसदों को पूरा करने से कोई वास्ता नहीं है, लेकिन कथित राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के प्रखर समर्थक लेखक सुरेश चिपलूनकर जी, जो अनेक मंचों पर संघ, हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद, संस्कृति, रामदेव और भारत स्वाभिमान के बारे में अधिकारपूर्वक लम्बे समय से लिखते रहे हैं. जिनके बारे में कहा जाता है कि वे तथ्यों और सबूतों के आधार पर ही अपनी बात कहना पसन्द करते हैं. यही नहीं, इनके लिखे का आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद् और भाजपा से जुड़े हुए तथा कथित राष्ट्रवाद, हिन्दुत्व और भारतीय संस्कृति के समर्थक लेखक, विचारक तथा टिप्पणीकार आँख बंद करके समर्थन भी करते रहे हैं. ऐसे विद्वान समझे जाने वाले संघ, नरेन्द्र मोदी, भाजपा और बाबा रामदेव के पक्के समर्थक लेखक सुरेश चिपलूनकर ''रामदेव बनाम अण्णा = भगवा बनाम गॉंधीटोपी सेकुलरिज़्म?? (भाग-२)''  शीर्षक से लिखे गए और प्रवक्ता डाट कॉम पर 27 अप्रैल, 11 को प्रकाशित अपने एक लेख में साफ शब्दों में लिखते हैं कि-

''......बाबा रामदेव देश भर में घूम-घूमकर कांग्रेस, सोनिया और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ माहौल तैयार कर रहे थे, सभाएं ले रहे थे, भारत स्वाभिमान नामक संगठन बनाकर, मजबूती से राजनैतिक अखाड़े में संविधान के तहत चुनाव लड़ने के लिये कमर कस रहे थे, मीडिया लगातार 2जी और कलमाड़ी की खबरें दिखा रहा था, देश में कांग्रेस के खिलाफ़ जोरदार माहौल तैयार हो रहा था, जिसका नेतृत्व एक भगवा वस्त्रधारी (बाबा रामेदव) कर रहा था, आगे चलकर इस अभियान में नरेन्द्र मोदी और संघ का भी जुड़ना अवश्यंभावी था. और अब पिछले 15-20 दिनों में माहौल ने कैसी पलटी खाई है नेतृत्व और मीडिया कवरेज अचानक एक गॉंधी टोपीधारी व्यक्ति (अन्ना हजारे) के पास चला गया है, उसे घेरे हुए जो टोली (भूषण, हेगड़े, केजड़ीवाल आदि) काम कर रही है, वह धुर हिन्दुत्व विरोधी एवं नरेन्द्र मोदी से घृणा करने वालों से भरी हुई है....''

इसी लेख में अपनी मनसा को जाहिर करते हुए उक्त लेखक लिखते हैं कि- ''...........मुख्य बात तो यह है कि जनता को क्या चाहिये- १) एक फ़र्जी और कठपुतली टाइप का जन-लोकपाल देश के अधिक हित में है, जिसके लिये अण्णा मण्डली काम कर रही है अथवा २) कांग्रेस जैसी पार्टी को कम से कम 10-15 साल के लिये सत्ता से बेदखल कर देना, जिसके लिये नरेन्द्र मोदी, रामदेव, सुब्रह्मण्यम स्वामी, गोविन्दाचार्य जैसे लोग काम कर रहे हैं? कम से कम मैं तो दूसरा विकल्प चुनना ही पसन्द करूंगा....''

इसी लेख के अंत में निष्कर्ष के रूप में अपने इरादों को जाहिर करते हुए उक्त लेखक सुरेश चिपलूणकर जी लिखते हैं कि- ''....हम जैसे अनसिविलाइज़्ड आम आदमी की सोसायटी का भी एक लक्ष्य है, देश में सनातन धर्म की विजय पताका पुनः फ़हराना, सेकुलर कीट-पतंगों एवं भारतीय संस्कृति के विरोधियों को परास्त करना रामदेव बाबा-नरेन्द्र मोदी सरीखे लोगों को उच्चतम स्तर पर ले जाना, और इनसे भी अधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य है, कांग्रेस जैसी पार्टी को नेस्तनाबूद करना.''

सुरेश चिपलूनकर जी द्वारा लिखे गए उपरोक्त विवरण से इस देश के लोगों को बाबा रामदेव के असल मकसद को समझने में किसी प्रकार का शक-सुबहा नहीं होना चाहिए. ''भारत स्वाभिमान'' के नाम पर बाबा रामदेव इस देश में गुजरात में धर्म विशेष के लोगों के सामूहिक नरसंहार के आरोपी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हिन्दुत्व के नाम पर मनुस्मृति को लागू करवाना चाहते हैं.  मुठ्ठीभर आर्यों की मौलिक संस्कृति के अन्धभक्त दो प्रतिशत लोगों के आपराधिक षड़यन्त्रों को सनातन धर्म, हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति के नाम पर 98 फीसदी लोगों पर थोपना चाहते हैं. जबकि इनकी सनातन धर्म, हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की परिभाषा वही है जो मनुस्मृति आदि ब्राह्मण ग्रंथों में लिखी गयी है. जिसके चलते आर्य संस्कृति मानव जाति के सिरमौर और स्वयं को भू-देव (इस पृथ्वी के साक्षात देवता) कहलाने वाले ब्राह्मण, अपनी पत्नी, बेटी और पत्नी तक को समानता और स्वतंत्रता का हक़ देना धर्म और संस्कृति के खिलाफ करार देते रहे हैं.

जिसके चलते विधवा विवाह को भी निन्दनीय करार देकर, अमानवीय और आपराधिक ''सतीप्रथा'' का खुला समर्थन करते रहे हैं और किन्हीं कारणों से ''सती''  नहीं हो सकने वाली स्त्रियों को सम्पूर्ण जीवन विधवा के रूप में गुजारते हुए ''नियोग'' नामक धार्मिक ढाल के रूप में अपनाये जाने वाले बलात्कार के लाइसेंस के जरिये ''नियोग' के लिये सर्वोत्कृष्ट प्रथम पात्र ''ब्राह्मणों'' को आजीवन असंख्य विधवा स्त्रियों के साथ ''नियोग'' के बहाने बलात्कार करते रहने को भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म के अनुकूल और पवित्र मानते रहे हैं.

जिसका अकाट्य प्रमाण है, महा भारत काल के सबसे कुरूप पुरुष और नाजायज माता-पिता की औलाद (जिसके माता-पिता, विवाहित पति-पत्नी नहीं, बल्कि आपस में कथित रूप से पिता-पुत्री थे) वेदव्यास को केवल ब्राह्मण ऋषि पाराशर का पुत्र होने के कारण विचित्रवीर्य की दो पत्नियों के साथ ''नियोग'' के बहाने गर्भाधान (बलात्कार) करने के लिये बुलाया गया.  परिणामस्वरूप तथाथित एवं आर्यधर्म नीति के अनुसार ''नियोग'' हेतु सर्वोत्कृष्ट प्रथम पात्र ''ब्राह्मण''  वेदव्यास द्वारा किये गये संभोग (जो हकीकत में बलात्कार था) और उनके कथित उत्तम वीर्य से नपुंसक पाण्डू और अन्धे धृतराष्ट्र का जन्म हुआ.

इन सब बातों से यह बात पुख्ता तौर पर प्रमाणित हो रही है कि बाबा रामदेव का अभियान, जिसे उन्होंने ''भारत स्वाभिमान''  का नाम दिया है, संघ स्वाभिमान और आर्यों की मूल क्रूरतम और घातक नीतियों की पुनर्स्थापना का एक मात्र अभियान है, जो अगले चुनाव में या तो भाजपा में विलीन हो जायेगा या साध्वी राजनेत्री उमा भारती की पार्टी की तरह से इसका भी सूपड़ा साफ हो जायेगा. ऐसी क्रूर और अमानवीय आर्य संस्कृति के संवाहकों की स्त्री, दमित, दलित, आदिवासी और पिछड़ों के बारे में क्या सोच है, इसे सारा संसार जानता है. ये लोग स्त्री, दमित, दलित, आदिवासी और पिछड़ों को तो इंसान तक मानने को तैयार नहीं हैं.

लेकिन मुसलमानों से या ईसाईयों से हिन्दुओं को लड़ाने की जब-जब बात आती है तो इन्हें सबसे बलवान हिन्दू केवल और केवल दलित, आदिवासी और पिछड़ों में ही नज़र आते हैं. आखिर क्यों यह भी हर दलित, आदिवासी और पिछड़े हिन्दू के लिये विचारणीय है. यदि फिर भी समझ में नहीं आता है तो गुजरात में जाकर देखें. गुजरात में मुसलामनों के नरसंहार के आरोपियों में जितने हिन्दुओं पर मुकदमे चलाये जा रहे हैं या जितनों को सजा हुई है, उनकी हकीकत जानी जा सकती है. यहॉं तक कि मरने वाले हिन्दुओं में भी अधिकतर दलित, आदिवासी और पिछड़े ही थे.

उपरोक्त लेख में चाहे-अनचाहे प्रकट जानकारी से यह तो साफ़ हो ही गया है कि ''भारत स्वाभिमान''  के नाम से बाबा रामदेव के मार्फ़त नरेन्द्र मोदी, संघ और अनार्यों तथा गैर-हिन्दुओं के विरुद्ध षड़यंत्र रचने में माहिर लोगों द्वारा अध्यात्मवाद, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर चलाया जा रहा नाटकीय अभियान ''भारत स्वाभिमान''  हिन्दुअनार्यों को हिन्दुत्व की एकता और अस्मिता की रक्षा के मोहपाश में फंसाकर, हिन्दुअनार्यों और गैर हिन्दुओं को फिर से मूल आर्यों की क्रूरता के शिकंजे में फंसाने हेतु संचालित किया जा रहा है.

जिससे इस देश के हर अनार्य को ही नहीं, बल्कि आर्य स्त्रियों, आर्य आम गरीब और पिछड़े लोगों (गरीब, तंगहाली, शोषण, अत्याचार, भेदभाव, मिलावट, कालाबाजारी आदि के शिकार ब्राह्मण, बनिया और क्षत्रियों) को सजग तथा सतर्क रहने की बेहद जरूरत है.  क्योंकि भारत स्वाभिमान के नाम पर जिस मानसिकता के लोगों द्वारा यह नाटकीय अभियान मुखौटे लगाकर चलाया जा रहा है, उनकी मानसिकता इतिहास में कैसी रही है? इसे जानने के लिये इतना सा जान लेना पर्याप्त होगा कि मूल आर्यों के अपने रक्षक के रूप में साथ आये, आर्य मूल के क्षत्रियों तक को इन्होंने नहीं छोड़ा और जिन आर्यों के द्वारा भारत भूमि को एक बार नहीं, बल्कि अनेकों बार क्षत्रिय विहीन कर दिया गया हो और क्षत्रियों के क्रूरतम हत्यारे ''परसुराम'' की पूजा करने में गौरव का अनुभव करते हों, क्रूरतम हत्यारे ''परसुराम''  की जयन्ती मनाते हों और क्रूरतम हत्यारे ''परसुराम'' की जयन्ती को सरकार के मार्फत सार्वजनिक अवकाश घोषित करने के लिये लगातार प्रयास कर रहे हों, उन पर भी यदि कोई व्यक्ति विश्वास करता है तो उसको बचाने वाला इस संसार में कोई नहीं है?

लेकिन सुखद अनुभव करने वाली बात यह है कि इस देश के अनार्यों को ही नहीं, बल्कि आर्य स्त्रियों और आर्य आम लोगों (ब्राह्मण-बनिया को भी) तथा अनार्य क्षत्रियों को अब क्रूर मूल आर्य मानसिकता से ग्रस्त, घृणित-अमानवीय लोगों के मुखौटों के पीछे छिपी असली और षड़यन्त्रकारी आपराधिक चेहरे दिखने लगे हैं और अब बहुत कुछ समझ में भी आने लगा है.

जिसके चलते यह बात पुख्ता तौर पर प्रमाणित हो रही है कि बाबा रामदेव का अभियान, जिसे उन्होंने ''भारत स्वाभिमान''  का नाम दिया है, संघ स्वाभिमान और मूल आर्यों की क्रूरतम और घातक नीतियों की पुनर्स्थापना का अभियान मात्र है, जो अगले चुनाव में या तो भाजपा में विलीन हो जायेगा या उमा भारती की पार्टी की तरह से इसका भी सूपड़ा साफ होना तय है.  लेकिन फिर भी इन षड़यन्त्रकारियों के षड्यंतों के शिकार बहुसंख्यक भारतीयों को हर कदम पर सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि इन षड़यन्त्रकारियों के पास अपार धन, गुण्डातन्त्र और बौद्धिक बल की ताकत है, जिसे आने वाले लोकसभा चुनावों में झोंक देने के लिये इन्होंने कमर कस ली है. यदि इस देश की 98 फीसदी आबादी आपने स्वाभिमान को जिन्दा रखना चाहती है, तो मूल आर्यों की क्रूरतम नीतियों की मानसिकता से ग्रस्त लोगों का अभी से उपचार करना शुरू कर दें. लोक सभा के चुनाव तक केवल मानसिकता शेष रहेगी.

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' होम्योपैथ चिकित्सक तथा मानव व्यवहारशास्त्री, विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।