आप अकेले है...? मन उदास रहता है...? कोई महिला दोस्त नहीं है....? किसी लड़की को दोस्त बनाना चाहते हैं..? तो देर किस बात की, नीचे लिखे फ़ोन नंबर पर किसी भी उमर के युवक और युवतिया कॉल करें. ऐसे ही तमाम विज्ञापन आपको रोज़ समाचार पत्रों में देखने को मिलेगा. दरअसल ये एक व्यापार है, जो फ़ोन काल करने वाले से उसकी बात करने के दौरान लिये गए काल चार्जेज पर चलता है, इनके द्वारा दिए गए फ़ोन नंबर पर काल करने पर आपको इंटरनेशनल/एसटीडी काल का चार्ज देना पड़ेगा. फ्रेंडशिप क्लब के नाम पर चल रहा ये व्यापार पूरी तरह फ़ोन काल पर ही  निर्भर होता है, लेकिन आज अधिकतर फ्रेंडशिप क्लब इस व्यापार को गलत दिशा में ले जा रहे हैं, जिसे एक तरह से हम टेलीफोनिक वेश्यावृति का भी नाम दे सकते हैं.

मनमोहक आवाज़ और सुरीले शब्दों से अपनी तरफ आकर्षित करने वाला ये एक ऐसा व्यवसाय है, जिसके आधार पर युवा वर्ग को अपनी तरफ खींचने के लिये फ़ोन काल करने और मेम्बर बनाए जाने के एवज में मोटी रकम का भुगतान करने के लिये प्रेरित किया जाता है. यदि आप एक युवक हैं तो आपकी काल को एक युवती द्वारा रिसीव किया जाएगा। किसी युवती ने काल किया तो उसकी काल युवक को ट्रांसफर कर दी जाती है, फिर शुरू होता है बातचीत का दौर। आपसे मनमोहक अंदाज़ में जीवन से जुड़ी हर उस बात का ज़िक्र किया जाता है, जो कहीं न कहीं से पुरुष और महिला के आपसी और करीबी रिश्तों के सम्बंध से मतलब रखता है।

यूँ तो विज्ञापन में सिर्फ दोस्ती करने के इच्छुक युवाओं को आमंत्रित किया जाता है, लेकिन आज न जाने कितने क्लब खुल चुके हैं, जो इसके नाम पर गलत धंधा भी चलाने लगे हैं, जिसे हम टेलीफोनिक वेश्यावृति भी कह सकते हैं, क्यूंकि आज बहुत से ऐसे फ्रेंडशिप क्लब आपस में दोस्ती करवाने के नाम पर लोगो से मेंबरशिप शुल्क भी मांगने लगे है। काल करने वाले को शुल्क जमा करने के लिये एक अकाउंट नंबर दिया जाता है, जिसमे मेंबरशिप शुल्क जमा करने को कहा जाता है। जिसके बदले में आपको युवतियों के फ़ोन नंबर भी उपलब्ध करा दिए जाते हैं या यूँ  कहे कि आपको उस युवती से किसी भी तरह की बात करने की आजादी दी जाती है।

ऐसे क्लबों में युवको को आकर्षित करने के लिये प्यार मोहब्बत के साथ साथ पुरुष-महिला के आपसी संबंधों पर बात करने पर अधिक जोर दिया जाता है। जिससे लोग आकर्षित हो कर दुबारा काल करें। इस प्रकार के क्लबों से युवा पीढ़ी अधिक आकर्षित होकर पुनः काल करती है, जो इन्हें गलत दिशा में ले जाती है. दूसरी तरफ आज हमारे समाज में ऐसे क्लबों द्वारा फैलाये गये वायरस से युवा पीढ़ी पर बुरा असर पड़ा है, जिसकी मिसाल राह चलते फ़ोन पर बात कर रहे युवा-युवती को देखा जा सकता है। दिन हो या रात घर की छतों पर घंटों फ़ोन पर बात करने का नज़ारा देखने को मिल ही जायेगा. वहीं रही सही कसर हमारे मोबाइल कंपनियों ने सस्ती काल कर के पूरी कर दी है. एक दौर था जब लोग सन्देश भेजने के लिये कबूतर उड़ाया करते थे, लेकिन आज सबकुछ बदल गया टेलीकॉम क्षेत्र में इतना बदलाव आ गया कि इसका बुरा असर युवा वर्ग पर कुछ अधिक पड़ा है. बहरहाल सोचना ये है कि क्या समाज में खुले रूप से चल रहे ऐसे क्लबो को आजादी देना उचित है?

लेखक इमरान जहीर रिसर्च ब्‍यूरो समाचार पत्र और जर्नलिस्‍ट टुडे नेटवर्क से जुड़े हुए हैं. साथ ही स्‍वतंत्र लेखन भी करते रहते हैं.