नूतन ठाकुरजिस तरह से एकजुट होकर किसान भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं उसे देख कर तो यही लगता है कि जल्द ही अगर इस कानून में बदलाव नहीं लाया गया और किसानो के हितों की और अनदेखी की गई तो आगे चल कर निश्चित रूप इसके दुष्परिणाम किसान विद्रोह के रूप में हमारे सामने आयेंगे. अधिग्रहण को ले कर उत्तर प्रदेश के भट्टा-परसौल के किसानो के आंदोलन की यादे अभी धुंधली भी नहीं पड़ी हैं कि मध्यप्रदेश के छिंदवाडा जिले के चौरई ब्लाक के चौसरा, भुलामोहगांव, हिवरखेडी, धनौरा, डागावानी, पिपरिया तथा टेकाथावरी आदि गांव के किसान भी इसी राह पर निकल पड़े हैं.

समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरों से लगता है कि किसान बगावत पर उतारू हैं। वे देश के औद्योगिक विकास के लिए अपनी जमीन देना नहीं चाहते। यह औद्योगिक नजरिया है, जो सरकारी नजरिए के साथ मिल कर सहज ही राष्ट्रीय नजरिया बन जाता है। राष्ट्रीय नजरिया यानी उनका नजरिया जो इस समय राष्ट्र का संचालन कर रहे हैं। इन्हीं लोगों में वह मध्य वर्ग भी है, जो अपना भविष्य भारी पूंजी के औद्योगिक विकास में देखता है। यहीं उसका भविष्य है भी, क्योंकि उसका प्रशिक्षण नए औद्योगिक रोजगारों के लिए ही हुआ है। आइआइटी और आइआइएम से पास हो कर निकलने वाली युवा पीढ़ी को कोई और काम करना नहीं आता। जिन्होंने टेक्नोलॉजी पढ़ी है, उनका इस्तेमाल आधुनिक ढंग के कारखानों में ही हो सकता है। जिन्होंने मैंनेजमेंट पढ़ा है, उनका इस्तेमाल आधुनिक ढंग के कार्यालयों में ही हो सकता है।

कुमार सौवीर : कर्म और भक्ति का समवेत भाव खोजा सिद्धा ने : यह ना तो द्रोपदी थी और ना ही राधा। हां, तुलना मीरा से जरूर की जा सकती है। इसका ताल्‍लुक ना तो ब्रज से रहा और ना ही वृन्‍दावन से। मीरा की तरह राजस्‍थान के किसी राजपरिवार से भी यह सम्‍बन्धित नहीं रही। लेकिन कुल मिलाकर यह कहानी कृष्‍ण के ही इर्दगिर्द घूमती रही और इस तरह मीरा की ही तरह की वंश-परंपरा में इस महिला का नाम अमिट हो गया। मीरा जैसी यह महिला भी अपना सर्वस्‍व कृष्‍ण के चरणों में न्‍योछावर कर भक्ति-इतिहास में अपना  नाम स्‍वर्णाक्षरों में दर्ज करा गयी। नाम था सिद्धा परमेश्‍वरी बाई जिसका प्रताप आज भी ब्रज की कुंज गलियों में ही नहीं, आसपास फैले गांवों और घोर जंगलों तक में व्‍याप्‍त है। तभी तो इस इलाके में राधा-कृष्‍ण के जयनाद के साथ सिद्धा परमेश्‍वरी बाई के जयकारे भी खूब गूंजते हैं।

: सीतापुर में रामगुनी की मौत पर क्यों बरपा है हंगामा : पिपली लाइव में नत्था ने मरने की घौषणा की थी तो शासन से लेकर प्रशासन ही नहीं मीडिया का ऐसा जमावड़ा लगा था कि गांव में मेले जैसा दृश्य दिखने लगा था। मगर सीतापुर जनपद के थाना पिसांवा के बबुर्दीपुर गांव में नत्था नहीं रामगुनी की मौत पर बरपा है हंगामा। यह हंगामा  सिस्टम पर है, यह हंगामा गरीब की मौत पर रोटी सेंकने के लिए है या फिर यह हंगामा एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में है। पिपली लाइव के नत्था को तो लालबहादुर (हैण्डपम्प का ऊपरी हिस्सा) सिर्फ मौत की घोषणा के  बाद मिल गया था मगर रामगुनी के पास एक नहीं कई-कई लालबहादुर थे। मगर लालबहादुर (सरकारी योजना) भी उसे जीने का रास्ता नहीं दिखा सकी।

मनोज कुमारअन्ना हजारे ने बेइमानों के खिलाफ हल्ला बोल दिया है। देखते ही देखते सैकड़ों लोग उनके मुरीद हो गये हैं। अपनी बात कहने के पहले अन्ना हजारे को मेरा सलाम। इस मुहिम से जुड़े कितने लोगों का यह मालूम है कि वास्तव में भ्रष्‍टाचार होता क्या है? पहली बात तो यह कि जो लोग अन्ना हजारे के साथ बेइमानों के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं अथवा हो गये हैं, उनमें से ऐसे कितने लोग हैं जो राशनकार्ड बनवाने, रेल में आरक्षण पाने, टेलीफोन के बिल पटाने में बचने की कोशिश, बिजली की चोरी या ऐसे ही रोजमर्रा की जरूरत को जल्द से जल्द निपटा लेने के लिये रिश्‍वत नहीं दिया है?

आज घर बैठे पैसे कमाने का दौर चल पड़ा है और इस दौर को हवा दे रही हैं आज की कुछ ऑनलाइन कम्पनियाँ. बेरोजगार युवाओं को घर बैठे पैसा कमाने का लालच दे कर उनके भविष्य को अंधकार में ले जाकर ऐसी कम्पनियाँ धमाल मचा रही हैं. जो व्यक्ति पूरे महीने मेहनत करके 3000 रुपये कमा कर लाता था उसे घर बैठे हफ्ते में एक दिन काम करने के बदले 4000 से 9000 रुपये कमाने का प्रलोभन दे कर उनके साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. ऐसी कंपनिया कब भाग जायें, कुछ पता नहीं. लेकिन इन बातों से बेखबर आज के नौजवान इस दलदल में पड़ कर अपने पैसों को खोने का पूरा प्रयास कर रहे.

मनोज कुमारअन्ना हजारे ने बेइमानों के खिलाफ हल्ला बोल दिया है। देखते ही देखते सैकड़ों लोग उनके मुरीद हो गये हैं। अपनी बात कहने के पहले अन्ना हजारे को मेरा सलाम। इस मुहिम से जुड़े कितने लोगों का यह मालूम है कि वास्तव में भ्रष्‍टाचार होता क्या है? पहली बात तो यह कि जो लोग अन्ना हजारे के साथ बेइमानों के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं अथवा हो गये हैं, उनमें से ऐसे कितने लोग हैं जो राशनकार्ड बनवाने, रेल में आरक्षण पाने, टेलीफोन के बिल पटाने में बचने की कोशिश, बिजली की चोरी या ऐसे ही रोजमर्रा की जरूरत को जल्द से जल्द निपटा लेने के लिये रिश्‍वत नहीं दिया है?

पूर्वांचल के लिए खुशखबरी है। हर वर्ष मौत बनकर कहर बरपाने वाली जापानी इंसेफलाइटिस की रोकथाम के लिए केन्द्र एंव प्रदेश की सरकारें 33 वर्षों बाद एकमत होकर खड़ी हुई हैं और तो और इस वर्ष यह बीमारी कहर बनकर टूटे इससे पहले ही शासन -प्रशासन की तरफ से बचाव के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। गांवों में साफ-सफाई के लिए जहां ग्राम प्रधानों को जबाबदेह और जिम्मेदार बनाया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ मंडलायुक्त ने इस बारे में खुद निगरानी शुरू कर दी है । इन सब के बावजूद पिछले पांच वर्षों से इंसेफलाइटिस उन्मूलन के लिए अभियान चला रहे डा. आरएन सिंह ने इन प्रयासों को नाकाफी बताया और राष्‍ट्रव्यापी बन चुकी इस बीमारी के समूलनाश के लिए इसे बारहवीं पंचवर्षीय योजना में शामिल करने की मांग उठाकर गंभीर बहस छेड़ दिया है। इंसेफलाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कैम्पेनर डा.आरएन सिंह ने बातचीत में उल्टे सवाल किया कि जिस बीमारी ने पिछले 33 वर्षों में पूर्वांचल में पचास हजार मासूमों की जान ली हो और उससे कई गुना बच्चों को विकलांग बना दिया हो तथा देश के 21 प्रदेशों में इसका प्रकोप हो क्या इसे अगली पंचवर्षीय योजना का हिस्सा नहीं होना चाहिए? भारत के भविष्य मासूमों की मौत से बड़ा कोई और पहलू है नीति निर्धारकों के लिए?

Mira Road has many surprising elements.Some times she becomes headlines of Newspapers and TV Channels but less being talked on her good parts.Mira road is known for all bad things like Pakistan supported Terrorists were arrested from here...it is Bar-Bala's hub and getting famous for Prostitution and all unsocial activities but hardly we hear from media on it's good part. Mira Road is shelter of most of journalists and film and television personalities. Shooting of films and Television serials are being done from here from last -6 years...etc...but most important is Mira Road having some One-Man NGOs who should be icon and ideal for youths but Social activities of Aabid Surati ,Rajesh Jha and others are not becoming newspaper and TV news's articles  of publication to inspire materialistic youth of our society.

डा. नूतन ठाकुरकई बार मुख्य मुद्दा पीछे रह जाता है और उससे ज्यादा महत्वपूर्ण लड़ाई रह जाती है. कई बार यह लड़ाई हक की होती है और वह हक सिर्फ उस व्यक्ति का हक नहीं हो कर समाज के लिए व्यापक रूप में एक दिशा देने में सहायक हो सकता है. ऐसी स्थितियों में हार और जीत का भी मतलब कई बार खत्म हो जाता है और सिर्फ उस पूरी प्रक्रिया से वास्ता बच जाता है. मैं ऐसे सभी मामलों को बहुत महत्वपूर्ण मानती हूँ जिसमे आदमी लड़ाई लड़ता है, क्योंकि मैं अपने आस-पास देख रही हूँ कि हम लोगों में लड़ने की आदत छूटती जा रही है. यह स्थिति चाहे समाज में हो या राजनीति में, हर जगह सुविधापरस्ती का माहौल अधिक दिख पड़ता है. यानी किसी तरह अपना काम हो जाए, बाकी दुनिया भाड़ में जाए. जिसे आम तौर पर 'चलता है' की भारतीय प्रवृत्ति भी कह सकते हैं.

: दलित मुद्दे को हथियाने का सार्थक सवर्ण प्रयास : तो दलित नाट्य समारोह सम्पन्न हो गया और इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया कि कई बार मंचित हो चुके नाटक, जो कभी दलित नाटकों के रूप में प्रचारित नहीं किए गए थे, पुनः मंचित किए गए और उत्तर प्रदेश में दलित नाट्य समारोह के प्रथम आयोजक के रूप में 'अलग दुनिया' का नाम 'स्वर्णाक्षरों'  में अंकित हो गया। नाट्य समारोह के तीनों नाटक अपने कथ्य को सम्प्रेषित करे में सफल रहे। छोटी मोटी चूक जो कि सदा होती है, जिन पर नियन्त्रण हो ही नहीं सकता, को छोड़ दिया जाय तो नाटक यदि 10 नहीं तो कम से कम 9 भाषणों के बराबर प्रभाव तो छोड़ ही गए। दूसरी कमी रही नगर के नाट्य कर्मियों का असहयोग,  केवल एक ही विचार धारा के लोग ही नज़र आए। यह नाट्य कर्मियों की अतिव्यस्तता या राजनीति के कारण भी हो सकता है।

मंजू मनु शुक्‍लाआधुनिक परिवेश में अगर देखा जाये तो नारी स्वतंत्रता एक प्रश्न चिन्ह है! कारण अभिनेत्री खुशबू से जुड़े लिविंग रिलेशनशिप पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आये कुछ समय ही गुजरा था कि पत्रकार निरुपमा पाठक की हत्या या आत्महत्या का मामला सुर्ख़ियों में आ गया. फिर लखनऊ में एक महिला को तीन मंजिला इमारत से नीचे फेंक दिया, उसकी हालत बता रही थी कि लोग उससे दुराचार करना चाहते थे फिर देहरादून का एक किस्सा आया कि एक युवती की उसके ही प्रेमी ने चाक़ू मारकर हत्या कर दी फिर दूसरी न्यूज़ आती है कि मेरठ में एक पिता ने अपनी पुत्री को छत से नीचे फेंक दिया. ऐसी अनगिनत घटनाएं अखबार और न्यूज़ चैनल की सुर्ख़ियों में बनी रहती हैं. ये सारी घटनाएं नारी सुरक्षा पर एक सवालिया निशान लगा रही हैं कि क्या नारी आज के परिवेश में स्वतंत्र और सुरक्षित है?

 

प्रयास कार्यालय में अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में सर्वप्रथम संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को माल्यार्पण कर विचार-विमर्श प्रारम्भ हुआ। प्रारम्भ में हिंदी साहित्य के समालोचक और कवि डॉ. एसएन व्यास ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि देश में वर्णाश्रम व्यवस्था ही छूआछूत की जड़ है इसे नष्ट करने पर ही देश में समतामूलक समाज का विकास और असल रूप में राष्ट्र का विकास सम्भव है। डॉ. व्यास ने कहा कि मैं अम्बेडकर को कई मायनों में महात्मा गांधी से भी बड़ा मानता हूं। हिन्दू धर्म के बहुत से ग्रंथों का सांगोपांग अध्ययन करने के बाद ये पाया कि मनुस्मृति और गीता भी प्रमाणिकता की दृष्टि से संदिग्ध है।

डा. निरंकुशबाबा रामदेव ने योग के नाम पर इस देश के लोगों के दिलों में स्थान बनाया. लोगों के स्वास्थ्य के लिये बाबा ने बहुत बड़ा काम किया. लोगों को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाया. कुछ समय बाद "राजीव दीक्षित" नाम के एक विद्वान व्यक्ति को साथ में लेकर अपने मंच से और आस्था चैनल के माध्यम से तथ्यों तथा आंकड़ों के आधार पर घर-घर में जानकारी दी गयी कि देश के राजनेता न मात्र भ्रष्ट हैं, बल्कि ऐसी व्यवस्था को देश में लागू किया जा रहा है कि जिसके चलते देश को लूटकर विदेशी कम्पनियॉं भारत के धन को विदेशों में ले जा रही हैं.

जनलोक पाल विधेयक के मुद्दे पर देश में तहलका मचा देने वाले अन्ना हजारे को अनोखे अन्दाज में अपना समर्थन देते हुए शिक्षक गुलाम हसनैन ने अपने नवजात शिशु का नाम अन्ना रख डाला। बाराबंकी के सिद्घौर क्षेत्र में इस अनोखे समर्थन का आम लोगों ने दिल से स्वागत किया है। समाज सेवी अन्ना हजारे की लोकप्रियता इतनी बढ़ चली है कि लोग अब अपने बेटों का नाम उनके नाम पर रखना शुरू कर दिये है। इसी क्रम में आज सिद्घौर क्षेत्र के ग्राम सराय सालिम, पो. जरगवां निवासी सैय्यद गुलाम हसनैन ने अनोखा काम कर डाला। दरअसल ग्राम देरी स्कूल में शिक्षक हसनैन के घर में आज एक बेटे का जन्म हुआ जिस पर खुश शिक्षक ने आज अपने बेटे का नाम हसन मसीहा उर्फ अन्ना रख डाला।

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : ऐसे थे देवरहवा बाबा : प्रधानमंत्री राजीव गांधी को मथुरा के माठ इलाके में यमुना के किनारे एक साधु के दर्शन करने आना था। एसपीजी के साथ जिला और प्रदेश का सुरक्षा बल तैनात हो गया। प्रधानमंत्री के आगमन और यात्रा के लिए इलाके की मार्किंग कर ली गयी। आला सुरक्षा अफसरों ने हेलीपैड बनाने के लिए वहां लगे एक बबूल के पेड की डाल छांटने के निर्देश दिये। भनक लगते ही साधु ने एक बडे पुलिस अफसर को बुलाया और पूछ लिया- यह पेड क्‍यों छांटोगे। जवाब मिला- पीएम की सुरक्षा के लिए जरूरी है। बाबा- तुम यहां अपने पीएम को लाओगे और प्रशंसा पाओगे, पीएम का भी नाम होगा कि वह साधु-संतों के पास जाता है। लेकिन इसका दंड तो इस बेचारे पेड़ को ही भुगतना होगा। वह मुझसे इस बारे में पूछेगा तो मैं उसे क्‍या जवाब दूंगा। नहीं, यह पेड़ नहीं छांटा जाएगा।