गांधी, जेपी के बाद अब अन्ना हजारे ने देश को पूरी तरह झकझोर कर जगा दिया है। अन्ना द्वारा छेड़ी गयी भ्रष्टाचार की लड़ाई में हर तबका साथ है। हम किसी भी शहर का सर्वेक्षण करें तो वहां की सत्तर से लेकर नब्बे प्रतिशत तक जनता भावनात्मक रुप से अन्ना हजारे के साथ जुड़ी जुकी है। बनारस भी अन्ना के साथ पूरी तरह आन्दोलनरत हो चुका है। हांलाकि आन्दोलन से जुड़ने वालों में नब्बे प्रतिशत नौजवान हैं बावजूद इसके कतिपय राजनीतिक दलों को छोड़कर प्रायः सभी समाजसेवी व स्वयंसेवी संगठन जनलोकपाल व भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना का साथ देने के लिए पूरी सिद्दत के साथ जुड़े हैं।

: इसके लिए खुद के अंदर सुचिता और ईमानदारी लानी होगी : कारपोरेट तथा‍ निजी क्षेत्रों को क्‍यों रखा गया है जनलोकपाल से बाहर :  भ्रष्टाचार की परिभाषा :  आमतौर पर सरकारी विभागों में महज घूसखोरी को भ्रष्टाचार माना जाता है। जबकि भ्रष्टाचार का दायरा काफी व्यापक है। रिश्‍वतखोरी के अलावा यदि हम अपना काम समय से या ईमानदारी पूर्वक नहीं करते हैं तो वह भी भ्रष्टाचार है। आज भ्रष्टाचार हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है और हम सभी किसी न किसी स्तर पर इसमें भागीदार हैं।

उमेश सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू अपने सामाजिक सरोकारों वाले फैसले के लिए जाने जाते हैं। कानून की नीरस किताबों और पेंचीदगियों से उलझने वाले न्यायविद के अलावा भी उनकी एक छवि है। कम से कम मध्य प्रदेश के जिस मालवा इलाके से वे आते हैं, वहां के साहित्यिक और सांस्कृतिक हलकों में उनकी संवेदनशील उपस्थिति नजर आती है तो इसकी वजह यह है कि साहित्य की गंग-जमुनी धारा में उनकी दिलचस्पी है। लेकिन हाल ही में इंदौर में भरोसा न्यास के एक कार्यक्रम की अध्यक्षता करते वक्त उन्होंने जो मांग रखी है, उसे आसानी से स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस कार्यक्रम में निदा फाजली जैसे नामचीन शायर की मौजूदगी के बीच उन्होंने हिंदवी संस्कृति के मशहूर शायर गालिब को भारत रत्न देने की मांग दोहरा डाली।

23 जून 2011 को भोपाल के जिला न्यायालय में पेशी के लिये लाये गये एक अपराधी राजू खान की विनोद सिंह नामक व्यक्ति ने गोली मारकर हत्या कर दी। इस घटना के बाद से लगातार एक सप्ताह, जिला न्यायालय एवं शासन के मंत्रियों एंव अधिकारियों के बीच बैठकों की सुर्खियों में रहा। मीडिया से लेकर सभी की चिन्ता थी कि जिला न्यायालय में सुरक्षा के उपाय पर्याप्त नही हैं इसलिये यह घटना घटी। मीडिया ने यह भी याद दिलाया कि सुरक्षा के अभाव में इस प्रकार की घटना की पुनरावृत्ति हुई जबकि कई वर्ष पूर्व एक और गोलीकांड की घटना न्यायपालिका परिसर में घट चुकी थी। देखना यह होगा कि क्या ये घटनायें वास्तव में सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से देखी जाना चाहिये या न्याय व्यवस्था की असफलता से। 23 जून को विनोद सिंह ने गोली चलाने के बाद जो बयान दिया उसमें कहा कि मुझे नहीं मालूम था कि अपराधियों की संख्या तीन थी,  नहीं तो मैं तीन गोली लेकर आता।

जहाँ आज हम बात करते है महिला सशक्तिकरण की वहीं दूसरी ओर पुरुष के शक के दायरे में आ जाने से आज महिला कहीं भी सुरक्षित नहीं है. इधर कुछ दिनों में घटी घटनाओं ने दिल दहला कर रख दिया है और आज नारी पूरी तरह से कमज़ोर नज़र आ रही है. वो पत्नी हो या प्रेमिका सभी आज पुरुषों के शक के दायरे में जी रही हैं. आज नगर हो या महानगर सभी जगह इस बात की चर्चा ज़ोरों पर है और रही बात शक की तो ये एक ऐसी बीमारी है,  जिसका कोई इलाज अब तक नहीं है. एक नारी होने के नाते मैं उस दर्द को बखूबी समझ सकती हूँ जिसके पति ने उसे कुल्हाड़ी से काट कर मार डाला होगा. बीते कुछ दिनों पहले जौनपुर में भी एक ऐसी दर्द भरी दास्ताँ सुनने को मिली जिसमें पति द्वारा शक करने के कारण महिला ने ख़ुदकुशी कर ली थी.

: भीड़ के पांव होते हैं, दिमाग नहीं : जन लोकपाल बिल के लिए जो जुनून और जोश सड़कों पर दिखाई दे रहा है उसे आजादी की दूसरी लड़ाई का नाम दिया जा रहा है। अन्ना को तिहाड़ में बंद करना सरकार को भारी पड़ा। संसद से सड़क तक अन्ना को मिल रहे भारी जनसमर्थन से घबराई और बैक फुट पर आयी सरकार ने थक-हारकर अन्ना को रामलीला मैदान में 15 दिन के अनशन की अनुमति दे डाली। दरअसल मनमोहन सरकार इस मुगालते में थी कि रामदेव की तरह वो अन्ना के अनशन को भी कुचल डालेगी। लेकिन सरकार के दमनकारी नीति और नीयत ने जनभावनाओं को भड़का दिया। फलस्वरूप अन्ना के समर्थन में भारी जनसैलाब सड़कों पर उतर आया।

सुनील अमरकहावत है कि वह जुनून क्या जो सिर चढ़कर न बोले! ऐसा ही एक जूनून सिर पर सवार है लखनऊ के आदित्य कुमार के। आदित्य लोगों को अंग्रेजी में निपुण करना चाहते हैं वह भी फ्री में। वे चाहते हैं कि आज के छात्रों व युवाओं को कम से कम इतनी अंग्रेजी जरुर आये कि वे अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं को बेहिचक पूरी कर सकें। आदित्य साधनहीन हैं लेकिन यह साधनहीनता उनके उत्साह को कम नहीं कर सकी है। अपनी आजीविका के लिए वे ट्यूशन पढ़ाते हैं लेकिन समाज निर्माण का जज़्बा ऐसा है कि बड़े-बड़े साधन सम्पन्नों को उनके सामने शर्म करनी चाहिए। एक पुरानी सी बाइसिकिल पर अपना साजो-सामान बॉंधकर आदित्य सड़क-सड़क, गली-गली और झुग्गी-झोपड़ियों में घूम-टहल कर जरुरतमंदों को अंग्रेजी भाषा का निःशुल्क प्रशिक्षण देते हैं।

चार जून शायद कम लोगों को याद रहे लेकिन कुछ तो चाह कर भी नहीं भूल पाएंगे, जो भारत की राजधानी दिल्‍ली में रामलीला मैदान में एक साधू के बहकावे में आ टपके थे, किसी के हाथ टूटे किसी के पैर कोई छुप गया तो कोई भाग गया. सत्तामठों को ब्लैक मेल करने की चाहत और राजनीति के पिछले गलियारे से इंट्री कर किंग मेकर बनने की ख्वाइश इस कदर ले डूबेगी इसका अंदाज़ा गेरुआ चोला धारक को बिलकुल नहीं था. रही बात पूरे मामले में मीडिया की भूमिका की तो भ्रष्टाचार की गंगोत्री से फूटे प्रवाह में पत्रकारिता के मानदंड या तो बह गए या किनारे लग गए जो कुछ एक बचे हैं वो इतने हताश निराश और टूट चुके हैं कि उनकी कलम अंगार उगलने के काबिल ही नहीं बची, हिम्मत दीखाने वाले पर या तो दनदनाती गोलियां चलती है या उन्हें इतना प्रताड़ित कर दिया जाता है कि सच लिखने की परिभाषा तक भूल जाता है सच को लिखने के अक्षम्य अपराध में मुंबई के एक पत्रकार की हत्या और लखनऊ के दो संवाददाताओं पर हमला जल्द ही हुआ है.

यंग, डायनेमिक, एनर्जेटिक और ओपन माइंडेड पीढ़ी का जीने का अंदाज बिल्कुल बदल चुका है। ब्रान्डेड और डिजाइनर कपडे़, तेज रफ्तार बाइक-कार का दीवाना यूथ अब रूकने को तैयार नहीं। रोटी, कपड़ा और मकान पिछली पीढियों की तरह इनके पारंपरिक खांचे में नहीं आते। बेहतरीन करियर की दीवानी यह पीढ़ी खूब कमाने और जी भर के खर्चने में विश्वास रखती है। अंतर्राष्ट्रीय बैंक, शापिंग माल्स, मल्टीप्लेक्स और क्लब इसी पीढ़ी के भरोसे चल रहे हैं। जूते, मोजे, अंडरगारमेंट, शर्ट, टी-शर्ट, टाप, जीन्स, घड़ी, टाई, चश्मा, परफ्यूम, बाडी लोशन, फेस पैक, बर्तन, फर्नीचर, सिगरेट, वाइन- सब कुछ मंहगा, ब्रांडेड और डिजाइनर।

भारतीय संस्कृति में और जीवन-दर्शन में माँ गंगा का स्थान अनन्य है। लगभग ढाई हजार किलोमीटर में वृहद प्रक्षेत्र में प्रवाहित होती है। वह संबंधित इलाकों का तो सीधे भरण-पोषण कर रही हैं, इसके अतिरिक्त पूरे भारत के असंख्य लोगों के हृदय में प्राण-धारा बनकर प्रवाहित हो रही है। इसे दुखद कहा जायगा कि हमारी ही लापरवाही से आज गंगा की धारा कमजोर और प्रदूषित हो चली है। निश्‍चय ही गंगा के प्रति श्रद्धा का अभिव्यक्ति का सबसे सही तरीका यही होगा कि हम गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने व बचाने का दृढ़ संकल्प लें। मां गंगा का धरती पर अवतरण ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हुआ था। इस तिथि को गंगा दशहरा मनाने की परंपरा है। काशी में तो गंगा दशहरा का एक लोक-पर्व के रूप में लोकप्रिय है। इस अवसर पर कन्याएँ, गुड्डे-गुड़ियों का विवाह रचाती हैं, और उनका दीप-पुष्पादि के साथ विसर्जन कर देती हैं। वैसे तो सभी घाटों पर इसकी धूम रहती है, किन्तु दशाश्‍वमेघ घाट व पंचगंगा घाट पर विशेष गहमागहमी रहती है।

समाज में संतानों द्वारा अपनी ही मां-बाप के प्रति बढ़ती ईर्ष्या आज चरम पर है। ज़्यादातर देखा गया है कि खुद की संतानों द्वारा ही उन माँ-बाप को कोई महत्व नहीं दिया जाता, जिन्होंने उन संतानों को जन्‍म दिया और बड़ा किया और समाज में रहने के तौर तरीके से अवगत कराया। आज ऐसी संतानों को क्या हो गया है जो उन माँ-बाप यह कह कर चुप करा देते है कि ''तुम्हें क्या पता कि आज के ज़माने में क्या हो रहा है, तुम क्या जानो क्या गलत है क्या सही, मेरे कामों में दखल मत दिया करो।"  अक्सर सुनने में आता है कि खुद की संतानों द्वारा एक मज़बूर और असहाय पिता को घर से निकाल दिया गया या फिर उनसे उस समय अलग हो जाते है,  जब वो उनकी सेवा के मोहताज रहते हैं।

निरंकुश अल्पसंख्यक आर्यों के बेतुके और अहंकारपूर्ण तर्कों के अलावा भारत में सर्वाधिक स्वीकार्य मत के अनुसार सिन्धु नदी के किनारे आदिकाल से रहने वाले भारतीयों को आर्यों ने सबसे पहले हिन्दू सम्बोधन दिया था.  इसलिये इस निर्विवाद तथ्य की सत्यता पर सन्देह किये बिना हम भारतीयों ने इस बात को स्वीकार लिया है कि आर्य विदेशी नस्ल है.  इतिहासविदों द्वारा बार-बार प्रमाणिक तथ्यों से यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि आर्यों ने कालान्तर में अपनी कूटनीति और अपने बौद्धिक व्यभिचार, दुराचार, अपचार, अत्याचार और दुष्टताओं के जरिये मूल भारतीयों के धर्म (जिसे अब हिन्दू धर्म कहा जाता है) पर जबरन कब्जा कर लिया और स्वयं हिन्दू धर्म के सर्वेसर्वा बन बैठे.  इसके बाद इन्होंने जो नीतियां बनाई उन्हीं को उन्होंने हिन्दू धर्म कहना शुरू कर दिया और अपने इस थोपे गये हिन्दू धर्म को स्वीकार नहीं करने वालों के लिये नर्क के दण्ड की सजा निर्धारित कर दी.

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : यह दुर्भाग्‍य ही तो है कि भोजन को सुस्‍वादु और पौष्टिक बनाने की क्षमता रखने वाली चटनी को हमारे देश में उपहास का पात्र बना दिया गया। इतना ही नहीं, उस पर माखौल के हिंसक हमले किये गये और प्रस्‍तुतिकरण कुछ ऐसा किया गया कि लोगबाग उसके नाम से कांप उठें। लेकिन कण्‍व ऋषि के आश्रम से शुरू हुई उस घटना पर एक नजर डाल लीजिए, जिसका अंत भारत नाम के शिशु के रूप में पूरे आर्यावर्त में एक तेजस्‍वी उत्‍तराधिकारी के तौर पर सामने आया। इस पूरे काण्‍ड में शिक्षाओं को इतनी खूबसूरती से एक सूत्र में पिरोया गया है कि प्रसंग भी हो गया और एक पूरा का पूरा शिक्षासत्र भी संचालित हो गया।

बीपी गौतम: व्‍यवस्‍था परिवर्तन के लिए सोच में बदलाव जरूरी : धार्मिक गुरुओं को राजनीति में आना चाहिए या नहीं? इस सवाल पर समाज में कई तरह की विचारधारा के लोग हैं। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता या समर्थक कहते हैं कि धार्मिक गुरुओं को राजनीति से दूर ही रहना चाहिए, वहीं धार्मिक गुरुओं के चेले कहते हैं कि धार्मिक गुरु राजनीति में नहीं आयेंगे, तो क्या राक्षसी प्रवृत्ति के लोग आने चाहिए? दलीय विचारधारा से दूर रहने वालों में भी इसी तरह के दो पक्ष हैं, इसलिए इस सवाल का सही जवाब नहीं मिल पा रहा है, तभी दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी सोच सही मानते हैं, पर समाज में एक वर्ग ऐसा भी है, जो वर्तमान राजेनताओं के साथ धार्मिक गुरुओं से भी उतनी ही घृणा करता है। तटस्थ सोच रखने वाले इसी वर्ग के पास सही जवाब है, क्योंकि यह सामान्य सवाल नहीं है, इस एक सवाल के पीछे कई गंभीर सवाल हैं, जिनके बारे में जाने-समझे बिना, इस एक सवाल का सही उत्तर नहीं मिल सकता।

शेर आया... शेर आया ये सुनकर लोग भागने लगे, ये तो आप सभी ने सुना ही होगा... आख़िर जान जो बचानी है, ऐसे में न दिमाग ने काम किया, न किसी ने दिमाग चलाने की कोशिश ही की... अक्सर ऐसा ही होता है जन सैलाब के साथ एक निर्देशक और बाकी सभी अनुयायी होते हैं... अनुयायी जो साथ देते हैं, हल्ला करते हैं, नारे लगाते हैं और निर्देशक को हीरो बना देते हैं... अब बात करते हैं अनशन की क्या अनशन भी 'शेर आया शेर आया' जैसी कहावत को सार्थक करता है, जिसमें आयी भीड़ बस एक दिशा में भाग रही है जिसे ये भी नहीं पता कि वो किस लिये भाग रही है... अपने लिए?  देश के लिए? या फिर जिसे हीरो बनाया है उसके लिए? दरअसल अनशन आज भेड़चाल में तब्दील हो गया है, लेकिन इसका अंतर हमें ख़ुद ही करना होगा.

रोहित मंगलवार को जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा एक्‍टेंशन ज़मीन मामले में फैसला सुनाने के बजाय सुनवाई 17 अगस्त तक मुल्तवी कर दी तो ये साफ़ था कि अदालत पर दबाव बढ़ गया है. ये बात इससे भी साबित होती है कि आगे की सुनवाई के लिए इस मामले को बड़ी बेंच को रेफर कर दिया गया. पहले ही इस मामले को दो जज सुन रहे थे. ये दबाव बिल्डर लॉबी का तो था ही लेकिन साथ ही मीडिया का भी था. मंगलवार को हाई कोर्ट के फैसले के बाद आईबीएन7 पर चल रही हेडलाइन ''75000 का भविष्य दांव पर''  उस दबाव को बयां कर रही थी. मुझे इस हेडलाइन पर आपत्ति है. जब नोएडा एक्‍सटेंशन फ्लैट ऑनर्स वेल्‍फेयर एसोसिएशन''  खुद कहती है कि 30000 फ्लैट मालिकों की नुमयिन्दगी कर रही है तो ये 75000 का आंकड़ा कहाँ से आया.