Samar Anarya : BSP cadre's slogan 'Dayashankar Singh- produce your daughter' is as horrible and abhorrent as it could ever get. But I look closely at the people so terribly hurt by this and wonder if these people ain't the same one who dragged things to this point!  What else were they expecting with making a PM out of a man who put a '50 Crore price tag' to a woman- even if one leaves aside the misogyny of reducing her into someone's girlfriend as a 'cultural oversight'.

इंदौर से विनोद शर्मा की रिपोर्ट

पांच साल में पैसा दोगुना करके देने या जमा पैसे की एवज में सोने का सब्जबाग दिखाकर लोगों को टोपी पहनाने वाली चिटफंड कंपनियों के खिलाफ आरबीआई से लेकर सेबी तक शिकंजा कस चुकी है। छत्तीसगढ़, बंगाल से लेकर झारखंड, उत्तराखंड तक कानून और नीतियां बनाई जा रही है। वहीं मप्र चिटफंड कंपनियों का महफूज गढ़ बन चुका है। यहां दो-पांच-दस नहीं बल्कि सैकड़ों की तादाद में कंपनियां नितनए कारनामे दिखा रही है। जबकि मप्र में एक भी चिटफंड कंपनी रजिस्टर्ड नहीं है। चटकदार आॅफिस और कैबिन दिखाकर जमा रकम दो से तीन गुना करके देने के दावे के साथ छोटे शहरों-कस्बों के लोगों का अपना शिकार बनाने वाली इन तमाम कंपनियों का कोई वैधानिक वजूद है ही नहीं।

कहा जाता है कि प्यार किसी जाति, धर्म, उम्र को नहीं मानता। ऐसे में घर-समाज के बीच कैसे तालमेल बैठाया जाय? प्रेम के प्रकार’ शीर्षक लेख में मैंने प्रेम के दो मुख्य भेद बताये हैं- प्राकृतिक और सामाजिक। जाति और धर्म प्राकृतिक चीज नहीं है, सामाजिक है। इसलिए केवल सामाजिक प्रेम जाति और धर्म को मानेगा जबकि प्राकृतिक प्रेम स्वभाववश इनकी बंदिशों का उल्लंघन करेगा। प्राकृतिक प्रेम की अपनी जाति होती है जो जन्म के आधार पर नहीं स्वभाव के मेल के आधार पर तय होती है। जन्म के आधार पर जो जाति समाज में प्रचलित है, वह भ्रामक है, वास्तविक जाति नहीं। उसका उपयोग समाज के धूर्त लोग अपने स्वार्थ के लिए और राजनेता वोट के लिए करते हैं।

भारत पाकिस्तान की सीमा पर बसे गाँव त्रिमोही की बेटी डेल्टा, जो इस रेगिस्तानी गाँव की पहली बेटी थी जिसने बारहवीं पास करके रीति रिवाजों में जकड़े समाज की सीमा का उल्लघंन किया था, उच्च शिक्षा के लिए बाहर गयी. उसके मन में कईं सपने थे, जिन्हें वो साकार करना चाहती थी, उन्मुक्त गगन में उड़ना चाहती थी वो, अपने मेहनकश माता, पिता और दलित समुदाय का आदर्श सितारा बनना चाहती थी वो, मगर अफ़सोस यह है की महज 17 वर्ष की डेल्टा इस व्यवस्था की क्रूरता की निर्मम शिकार हो गई. जिन लोगों के संरक्षण में डेल्टा को सुरक्षित मानकर छोड़ा गया था. वे रक्षक ही हत्यारे और बलात्कारी बन बैठे और 29 मार्च 2016 को उसकी बलात्कार के बाद जघन्य हत्या कर दी गई.

2 अक्टूबर यानि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की सालगिरह. ये दिन हर साल आता है लेकिन इस बार इसकी अहमियत कुछ ख़ास है. हाल में ही देश ने अन्ना की आंधी देखी. इस आंधी में गांधी के देश ने एक बार फिर दिखा दिया कि अहिंसा और अनशन से बड़ा दूसरा कोई हथियार ही नहीं है. जब-जब बापू के दिखाए रास्ते से इंकलाब की मशाल रोशन हुई है तब-तब दुनिया के बड़े से बड़े हुक्मरानों ने भी उसके आगे अपने घुटने टेक दिए. माना कि महात्मा गाँधी के देश में हिंसा आज एक स्थाई भाव जैसा रूप ले चुकी है. विभिन्न घटनाओं, माध्यमों, विचारों, प्रतिक्रियाओं और दृश्यों के माध्यम से हिंसा बेहद बारीक कणों के रूप में लगातार सामाजिक जीवन में बरस रही है, लेकिन जब हमारा पूरा जीवन ही क्षतिग्रस्त हो गया है और चारो तरफ घने अंधकार का आलम है तब प्रकाश का एक तिनका भी सूर्य जैसा लगता है.

मुंबई :  मायानगरी मुंबई की चकाचौंध में मॉडल बनने तथा पढाई करने के लिए २२ वर्षीय दो जुड़वा बहने उत्तर प्रदेश के भदोही शहर से घर छोड़कर भागी और मुंबई में तस्करों हाथों में फंसते-फंसते बाल बाल बची। दोनों नादान बच्चियों को इस बात का पता भी न था कि उन्हें बहला-पुâसलाकर तस्करी के लिए मुंबई बुलाया गया था। मामला ओशिवरा पुलिस थाने में ’मिशन पत्रकारिता’ एनजीओ के माध्यम से पहुचा जहा पुलिस ने पूरी छानबिन के बाद दोनों बच्चियों को उसके पिता एवं परिजनों के हवाले किया। दोनों बच्चि़यों की जिंदगी बचाने के इस कार्य को लेकर बच्चियों के परिवारवाले एवं पुलिस कमिश्नर ने ’मिशन पत्रकारिता’ की सराहना की।

उत्सव हमारी संस्कृति के प्रतीक है. यह हमारी आंतरिक खुशी, प्रसन्नता की अभिव्यक्ति का माध्यम है. ये उत्सव हमें एकजुटता का संदेश देते हैं. जब बात धर्म की होती है तो फिर धर्म हमें सामाजिक तौर पर सुसंस्कृत, शिक्षित, आदर्श आचरण और श्रेष्ठ मानव बनाने का कार्य करता है. धर्म का यह स्वरूप यदि धार्मिक उत्सव में परिलक्षित होता है तो यह हमारी संस्कृति की परंपरा का निर्वहन करते हुए समाज को धर्म के प्रति आसक्त करने का बेहतर माध्यम माना जाता है. आधुनिक दौर का समावेश और समय के साथ सामाजिक बदलाव का असर दुर्भाग्यवश धार्मिक उत्सवों पर भी पड़ा है. धार्मिक उत्सवों में विकृतियों का प्रकोप नित नये स्वरूप में बढ़ता ही जा रहा है. इस प्रकोप से हमारी संस्कृति, समाज को क्षति पहुंच रही है.

30 जून 1855 को प्रारंभ हुआ भारत में प्रथम सशस्त्र जनसंघर्ष, जो बाद में चलकर प्रथम छापामार युद्ध भी बना, 26 जुलाई 1855 को संथाल हूल के सृजनकर्ताओं में से प्रमुख व तत्कालीन संथाल राज के राजा सिद्धू और उनके सलाहकार व उनके सहोदर भाई कान्हू को वर्तमान झारखंड के साहबगंज जिला के भगनाडीह ग्राम में खुलेआम अंग्रेजों ने पेड़ पर लटकाकर यानी फांसी देकर हत्या करके भले ही ‘संथाल हूल’ को खत्म मान रहा था लेकिन हर तरह के शोषण के खिलाफ जल-जंगल-जमीन की रक्षा व समानता पर आधारित समाज बनाने के लिए सिद्धू-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो के द्वारा शुरू किया गया हूल आज भी जारी है। यह हूल तब तक जारी रहेगी जबतक कि वास्तविक में समानता पर आधारित समाज की स्थापना न हो जाए।

अगर हम हिंदू धर्म- जिसे न्यालालय ने भी केवल एक पंथ मात्र न मान उसे एक जीवन पद्धति कहा है- की सभी मान्यताओं को मोटे तौर पर दो मुख्य बिंदुओं में समाहित करें तो वह है पुनर्जन्म में आस्था और ये मानना कि इस अखिल ब्रम्हांड, चराचर जगत का कोई नियंता है इसका विश्वास करना. शास्त्र-पुराणों से लेकर विभिन्न मिथकीय कथाओं के द्वारा भी भारतीय जीवन में यह विचार रसा-बसा है. भारतीय पद्धतियों से भी निकले अपवाद स्वरूप कुछ दर्शनों एवं विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा थोपे गए विचारों, उनके वैचारिक आक्रमणों, मुग़ल से लेकर फिरंगी गुलामियों के बावजूद सनातन धर्मावलंबियों में कभी भी इस अवधारणा के प्रति आज तक कोई अनास्था जन्म नहीं ले पाया.

मायावती इस वक्त अपने सबसे मुश्किल समय में हैं. उनका चुनावों के लिए टिकट बेचना अब बड़ा मुद्दा बन गया है. पहले भी टिकट बेचने के आरोप लगाकर लोग बसपा से इस्तीफा देते रहे हैं लेकिन अब स्वामी प्रसाद मौर्य और राजेंद्र चौधरी के इसी आरोप के साथ इस्तीफे ने मायावती को कठघरे में खड़ा कर दिया है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी में विकेटों के गिरने का सिलसिला शुरू हो गया है. बीते एक हफ्ते में बीएसपी चीफ मायावती को दूसरा बड़ा झटका मिला है. पार्टी महासचिव और बीएसपी की सरकार में परिवहन मंत्री रहे आरके चौधरी ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है.

In the naming of crusading against corruption, a number of supporters of the caste system, who are also vociferously opposed to reservations for the historically oppressed castes, have got together to stir up a massive agitation against India’s democratic system, insisting that democracy must bow before their dictates. In effect, what they are demanding is that the government must do as it is ordered to by them, and that if it does not do so, they will engineer mass protests which will make it difficult for any government to survive.

मैं मध्यप्रदेश के ऐसे इलाके से ताल्लुकात रखता हूं, जो कई बातों के लिए सुविख्यात है और कुख्यात भी है। ग्वालियर का किला और यहां जन्मा ध्रुपद गायन ग्वालियर-चंबल संभाग को विश्वस्तरीय पहचान दिलाता है। वहीं मुरैना का 'पीला सोना' यानी सरसों से भी देशभर में इस बेल्ट की प्रसिद्धी है। बटेश्वर के मंदिर हों या कर्ण की जन्मस्थली कुतवार दोनों पुरातत्व और ऐतिहासिक महत्व के स्थल हैं। मुरैना पीले सोने के साथ ही राष्ट्रीय पक्षी मोरों की बहुलता के लिए भी जाना जाता है। ग्वालियर-चंबल इलाके की पहचान उसकी ब्रज, खड़ी और ठेठ लट्ठमार बोली के कारण भी है।

भारत देश में शिक्षक दिवस के मौके पर केन्द्र व राज्य सरकारें बेहतर अध्यापन के लिए कई शिक्षकों का सम्मान करती है, ताकि शिक्षक और भी अच्छे ढंग से बच्चों को ज्ञान प्रदान कर सकें, लेकिन दुर्भाय है कि उस सम्मान को पाने के लिए शिक्षकों को खुद ही अपना आवेदन देना पड़ता है। शिक्षक दिवस पर मिलने वाले राष्ट्रपति और राज्यपाल सम्मान के लिए उच्चाधिकारियों के समक्ष अपनी उपलब्लियां गिनवाना शिक्षकों की मजबूरी बन गई है। अच्छे शिक्षक होने के बावजूद सोर्स के बिना सम्मानित हो पाना मुश्किल ही नहीं असंभव है। शिक्षक पूरी ईमानदारी और निष्ठा से बच्चों को पढ़ाते है, लेकिन महज एक दिन ही उनका सम्मान होता है, जबकि साल भर उन्हें कई अपमान सहने पड़ते हैं।

भप्तियाही चैंतीस दस का इलाका। हालाकि यह कोई आबादी वाली जगह नहीं है। कोसी नदी के पूर्वी तट पर बसे 30 झोपड़ी में कोई 100 से ज्यादा परिवारों का रहबास है यहां। एक एक झोपड़ी में चार-चार परिवारों की गुंजाइश। कोसी में समा गए बलथरबा और भुलिया गांव के लोगों का कैंप भी आप कह सकते हैं। कीचड़ भरे झोपड़ी के भीतर खाट, टूटे फुटे बर्तन, कीचड़ भरे बिछावन और जलावन के लिए कुछ लकडि़यां। इन झोपडि़यों में रह रहे लोग अपने गांवों में बड़े किसान कहलाते थे और इलाके में उनकी अपनी पूछ थी। लेकिन यहां उनकी हालत किसी भिखारियों से भी बदतर है।

: 26 अगस्‍त से 2 सितम्‍बर पर विशेष : हमारे देश में पर्वों एवं त्यौहारों की एक समृ़द्ध परम्परा रही है, यहां मनाये जाने वाले पर्व-त्योहार के पीछे कोई न कोई गौरवशाली इतिहास-संस्कृति का संबंध जुड़ा होता है। सभी धर्मों में धार्मिक भावना की दृष्टि से मनाये जाने वाले पर्व हैं जैसे-हिंदुओं में दीपावली नवरात्रि, मुसलमानों में रमजान, ईसाइयों में क्रिसमस आदि। जैन संस्कृति में जितने भी पर्व व त्योहारों मनाये जाते हैं लगभग सभी में तप एवं साधना का विशेष महत्व है। जैनों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है पयुर्षण पर्व। यह पर्व ग्रंथियों को खोलने की सीख देता है। इस आध्यात्मिक पर्व के दौरान कोशिश यह की जाती है कि जैन कहलाने वाला हर व्यक्ति अपने जीवन को इतना मांज ले कि वर्ष भर की जो भी ज्ञात-अज्ञात त्रुटियां हुई हैं, आत्मा पर किसी तरह का मैल चढ़ा है वह सब धुल जाए।

‘‘बाबू जी, हम सोमालिया की दशा तो नहीं देखे हैं, लेकिन जो कुछ भी यहां हो रहा है, वह सोमालिया से भी बदतर है...।’’ यह कहना है, सुपौल-निर्मली जिले के दर्जनों गांवों के लोगों का, जो इन दिनों विस्थापन की जिंदगी बसर कर रहे हैं। इन दोनों जिले के दर्जनों गांवों के जो हालात हैं, वह सोमालिया से भी बदतर हैं। यहां दोनों जिलों को जोड़ने के लिए (नेशनल हाइवे) एनएच 57 और रेल पुल के निर्माण से बिहार में अब तक का सबसे बड़ा विस्थापन तो हुआ ही है, 70 हजार से ज्यादा लोग भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी की वजह से बर्बादी के कगार पर हैं। इनका वर्तमान तो खत्म हो ही गया, भविष्य भी अधर में है। विकास के नाम पर 58 से ज्यादा गांवों को ‘जल समाधि’ दे दी गई है।