भारत उत्‍सवों का देश है, भारत ज्ञान का देश है, भारत कोतुहल का देश है, भारत साधना का देश है और ये भारत ही है जो मंगल गान का देश है। शारदीय नौ-रात्र चल रहे हैं। सर्दी आने के पूर्व उत्‍सव धर्मी भारत में नौरात्र आते हैं तो चारो ओर शक्‍ति आराधना का दृष्‍य देखने को मिलता है। मां के जयकारे के साथ कन्‍या पूजन, जगह-जगह भण्‍डारे, गरीबों को दान देने की जैसे एक परंपरा साक्षात हो उठती है। किंतु इस वाह्य कर्मकाण्‍ड का आंतरिक पक्ष भी है जो हम सभी को जरूर जानना चाहिए।

मोदी सरकार श्रम कानूनों में बदलाव करने जा रही है और इस बदलाव के कारण किसी को नौकरी से निकालना आसान हो जाएगा। वो भी बिना छंटनी मुआवजा दिए किसी की भी छंटनी कर दी जाएगी. प्राइवेट सेक्टर में यूनियन नहीं बन पाएगा और ना ही मांगों को लेकर हडताल होगा। मैं तो कहता हूं कि नरेन्द्र मोदी जी श्रमिक विरोधी कानून बनाने से पहले एक बार पास के ही किसी मजदूर कॉलोनी का भ्रमण कर ले। मेरा दावा है इसे देखने के बाद या तो उन्हें खुद से घृणा हो जाएगी या .......... जाने भी दो।

वर्तमान में शहरों में सड़कों, नालियों और गटर सफाई का काम अधिकतर सफाई कर्मियों द्वारा हाथ से किया जाता है. इसमें सड़कों, नालियों और गटरों  तथा शुष्क  टट्टियों की सफाई हाथ द्वारा की जाती है. यह सर्वविदित है कि इस कार्य में लगे लगभग सभी कर्मचारी दलित वर्ग से आते हैं. इन लोगों का वेतन बहुत कम रहता है जो कुछ परिस्थियों में सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन से भी कम रहता है. नगरपालिकाएं और नगर महापलिकाएं अपना खर्च कम रखने के लिए सफाई कार्य हेतु ज़्यादातर ज़रुरत से कम कर्मचारी रखती हैं. इन कर्मचारियों को वेतन भी समय से नहीं मिलता है. कुल मिला कर इन कर्मचारियों का बहुत शोषण होता है.

लखनऊ । उरी हमले के बाद से देश में जो युद्धोन्माद का माहौल निर्मित किया जा रहा है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार देश को युद्ध में झोंकने की तैयारी कर रही है। शासकों को युद्ध से फायदा हो सकता है किंतु कोई भी युद्ध आम जनता के हित में नहीं होता। भारत-पाकिस्तान युद्ध तो कतई नहीं हो सकता क्योंकि दोनों देशों के पास परमाणु शस्त्र हैं। जो लोग युद्ध की बात कर रहे हैं उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या वे दोनों देशों में कई शहरों को हिरोशिमा-नागासाकी में तब्दील होते देखना चाहते हैं? युद्ध की बात करना भी पागलपन है। भारत पाकिस्तान के बीच चार युद्ध हो चुके हैं। उनसे समस्या का कोई समाधान तो निकला नहीं। न ही कोई युद्ध ऐसा निर्णायक ही रहा कि आगे युद्ध की जरूरत न पड़े। यानी युद्ध से समाधान निकलने की सम्भावना क्षीण ही है। फिर युद्ध से क्या लाभ?

Chief Justice of Delhi High Court Justice G. Rohini and Justice Sangeeta Dheengara directed Ministry of Health and Family Welfare to consider the Representation dated 20.06.2016 related to Population Control, submitted by of Ashwini Upadhyay, an Advocate and Spokesperson of BJP Delhi. Mr, Upadhyay submitted a Representation on 20.06.2016 to Ministry of Health and Family Welfare:

तकनीकी भर्ती के लिए गैर तकनीकी पाठ्यक्रम का अजब एलान... भाजपा सरकार (राजस्थान) भी गजब कारनामे कर रही है आजकल। बिजली विभाग में जे ईन और ए ईन की भर्तियां निकाली गयी हैं।
चूंकि बिजली विभाग एक तकनीकी विभाग है तो इंजीनियर भी तकनीकी ज्ञान वाले होने चाहिए पर भाजपा शाषित ऊर्जा मंत्रालय मानता है कि किसी भी प्रकार का तकनीकी ज्ञान भर्ती के लिए नहीं चाहिए। विद्युत विभाग के तकनीकी निर्देशक आलोक शर्मा को जब यह पूछा गया तो वह बोले "अलग अलग यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग का अलग अलग पाठ्यक्रम हैै ।इसी कारण विवादों से बचने के लिए सबका common सेलेबस किया गया है।" बड़ी वाहियाद दलील है इनकी। उनको मालूम नहीं कि AICTE , IIT, NIT द्वारा एक पाठ्यक्रम बनाया जाता है जो कि लगभग हर इंजीनियरिंग संस्थान follow करता है।

Lok Sabha has passed Child Labour (Prohibition and Regulation) Amendment Bill, 2012 to allow child labour below the age of 14 years in family enterprises is a regressive move. RTE Forum, a coalition of ten thousand grass-root organizations, people’s movement, educationists and teachers organizations, has said that  “Today is black day for the millions of Indian children; they will now be deprived from all their rights which they have achieved after the decades long struggles, like, right to education, equal opportunity for quality learning, play, protection and enjoyment of their childhood.”

अलीगढ शहर में जगह जगह रोड के किनारे लगे बड़े बड़े अवैध होर्डिंग और यूनिपोल हटाने को लेकर आरटीआई एक्टिविस्ट और युवा अधिवक्ता प्रतीक चौधरी ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में वाद दायर किया है. कोर्ट ने नगरायुक्त और मेयर को 29 अगस्त को तलब किया है. युवा अधिवक्ता प्रतीक चौधरी ने गत माह रामघाट रोड मिनाक्षी पुल पर छात्र की मौत और घोड़े की मौत के प्रकरण का भी उल्लेख कोर्ट  के सामने किया है.

राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र के कोशीथल गांव में दलित-मुस्लिम एकता का आगाज़ हुआ है। यहां हिन्दू व मुस्लिम वर्ग के लोग भाईचारे से रहते आए है। गांव में मजदूर, किसान व व्यापारी रहते है। धर्म के आधार पर गांव के किसी शुद्ध हिन्दू किसान, हिन्दू व्यापारी, हिन्दू मजदूर या दलित हिन्दू ने कभी किसी मुस्लिम पर अत्याचार नहीं किया। गर्व की बात है कि यहां हिन्दू-मुस्लिम झगड़े का एक भी मामला अब तक सामने नहीं आया है। मुस्लिम लोगों पर अत्याचार की कुछ घटनाएं हुई लेकिन वो कथित हिन्दूओं द्वारा की गई थी जो एक कथित हिन्दू संगठन से जुड़े हुए है।

हाल में एक समाचार पत्र में छपे लेख में चंद्रभान प्रसाद जी ने एक गाँव का उदहारण देकर दिखाया है कि भूमंडलीकरण के बाद दलित बहुत खुशहाल हो गए हैं क्योंकि रोज़गार के करोड़ों अवसर पैदा हो गए हैं. हमें इस कहावत को ध्यान में रखना चाहिए कि "हवा के एक झोंके से बहार नहीं आ जाती." मुट्ठी भर दलितों के खुशहाल हो जाने से सारे दलितों की बदहाली दूर नहीं हो जाती. दलितों की वर्तमान दुर्दशा का अंदाजा सामाजिक-आर्थिक जनगणना- 2011 के आंकड़ों से लगाया जा सकता है. इसके अनुसार ग्रामीण भारत में दलितों के 3.86 करोड़ अर्थात 21.53% परिवार रहते हैं. भारत के कुल ग्रामीण परिवारों में से 60% परिवार गरीब हैं जिन में दलितों का प्रतिश्त इससे काफी अधिक है. इसी प्रकार ग्रामीण भारत में 56% परिवार भूमिहीन हैं जिन में दलित परिवारों का प्रतिश्त इससे अधिक होना स्वाभाविक है. इसी जनगणना में यह बात भी उभर कर आई है कि ग्रामीण भारत में 30% परिवार केवल हाथ का श्रम ही कर सकते हैं जिस में दलितों का प्रतिश्त इस से काफी अधिक है. इससे स्पष्ट है कि ग्रामीण क्षेत्र में अधिकतर दलित गरीब,  भूमिहीन और अनियमित हाथ का श्रम करने वाले मजदूर हैं. जनगणना ने भूमिहीनता और केवल हाथ के श्रम को ग्रामीण परिवारों की सब से बड़ी कमजोरी बताया है. इस कारण गाँव में अधिकतर दलित परिवार ज़मींदारों पर आश्रित हैं और कृषि मजदूरों के रूप में मेहनत करने के लिए बाध्य हैं. इसी कमजोरी के कारण वे अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का प्रभावी ढंग से प्रतिरोध भी नहीं कर पाते हैं.

चंद दिनों पहले बदजुबानी के मसले पर जो मायावती बड़े आंदोलन की चेतावनी दे रहीं थीं, अचानक उनके सुर बदल गए। अब चूंकि पार्टी सुप्रीमो के सुर बदले तो जाहिर सी बात है कार्यकर्ता भी थम से गए। हालिया मसले ने पार्टी में निश्चित तौर पर जान फूंकने का काम किया, लेकिन दलित और आधी आबादी के कार्ड को भुनाने में लगी पार्टी की उम्मीदें उसके कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी के नेतृत्व में हवा हो गईं। बीएसपी के जबर्दस्त अटैक के बाद बीजेपी ने जिस तरह से बीएसपी के कथित रवैये को भुनाते हुए काउंटर अटैक किया वो काबिल ए तारीफ है। हालांकि इसका ये मतलब बिल्कुल भी नहीं कि वार-पलटवार की इन कारस्तानियों के बीच बीजेपी पाक-साफ है।

लीजिए मुलाहिजा फर्माइये, देश में एक नया कानून लागू होने जा रहा है। जिसका मसौदा ‘मातृत्व सुविधा संशोधन विधेयक’ परसौं 11 अगस्त के दिन राज्यसभा ने पारित कर दिया है। लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है। इसके तहत अब देशभर में कामकाजी गर्भवती महिलाओं को 26 हफ्तों (6 माह) का मातृत्व अवकाश वेतन सहित मिल सकेगा। यह नियम सभी सरकारी संस्थानों के अलावा 10 से अधिक कर्मचारियों वाले निजी उपक्रमों पर भी बाध्यकारी होगा। देश के कानून में अभी केवल 12 सप्ताह के अवकाश का प्रावधान है। इस नये कानून के लागू होने के बाद अवकाश की अवधि की दृष्टि से भारत दुनिया में तीसरी पायदान पर पहुँच जायेगा। अभी तक अधिकांश विकसित देशों में इतनी लंबी छुट्टी का प्रावधान नहीं है। नये प्रावधान से देश की 18 लाख कामकाजी महिलाओं को लाभ होगा।

डॉ राकेश पाठक
प्रधान संपादक, डेटलाइन इंडिया

भारत वर्ष को "हिन्दू राष्ट्र" बनाने की कोशिश अब कोई दबी छुपी बात नहीं रह गयी है।साधुओं,साध्वियों के अलावा मंत्री,सांसद तक खुल कर बोल चुके हैं। इनमें से किसी ने 2020 तो किसी ने 2022 तक "हिन्दू राष्ट्र' बन जाने की बाकायदा घोषणा भी कर दी है। (इनके बयान आसानी से मिल जायेंगे गूगल कर लीजिये) लेकिन इस हिन्दू राष्ट्र के लिए प्रथम चरण की लड़ाई थी "मुस्लिम मुक्त भारत"। अब ये तो अभी हुआ भी नहीं कि आपने दलित मोर्चे पर अपनी सेनाएं रवाना कर डालीं।मुस्लिमों के खिलाफ "यलगार" की आवाज़ अभी थमी भी न थी कि दलितों के विरुद्ध "आक्रमण" का घोष कर दिया गया।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गैंगरेप के मामले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। बुलंदशहर के बाद ग्रेटर नोएडा, विजय नगर व रामपुर में हुए गैंगरेप ने कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ा कर रख दी है।
दिलचस्प बात यह है कि जिन राजनीतिक दलों को अपराध रोकने तथा आरोपियों को सजा दिलाने कर ध्यान देना चाहिए, वे दल अपना वोटबैंक बढ़ाने के लिए बयानबाजी तथा पीड़ितों से मिलकर राजनीति करने में लग गए हैं। मामले पर दबाव बनता देख प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मामले की सीबीआई जांच कराना स्वीकार करने लगे हैं। साथ ही सरकार पीड़ित परिवार को दो फ़्लैट का लालच देकर मामले को दबाने की कोशिश कर रही है।

एक भद्दी गाली का जवाब 100 भद्दी गालियां तो हरगिज नहीं हो सकती... जो गलती भाजपा से बाहर किए गए दयाशंकर सिंह ने की उसी तरह की गलतियां मायावती समर्थकों ने अपने विरोध-प्रदर्शन के दौरान की। इसमें कोई दो मत नहीं कि बसपा अध्यक्ष मायावती के खिलाफ दयाशंकर सिंह ने जिन भद्दे शब्दों का इस्तेमाल अपने बयान में किया वह किसी भी तरह क्षम्य नहीं है। उसकी तो कड़ी से कड़ी सजा दयाशंकर को मिलना चाहिए और मिलेगी भी, क्योंकि भाजपा ने खुद ही जहां उसे निलंबित कर दिया वहीं पुलिस ने प्रकरण भी दर्ज करते हुए उसके भाई धर्मेन्द्र को गिरफ्तार कर लिया। अब दयाशंकर सिंह को एससी/एसटी कानून के तहत 7 साल की सजा मिले या ना मिले वह अदालतों का विषय है, लेकिन इस मामले में मायावती के समर्थकों ने उत्तरप्रदेश से लेकर देश के कई शहरों में  जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन किए।

एस. आर. दारापुरी

पिछले दिनों गुजरात के ऊना में मरी गाय का चमड़ा उतारने पर गाय को मारने के आरोप में गोरक्षा समिति के गुंडों द्वारा चार दलितों की बुरी तरह से पिटाई की गयी थी जिस पर दलितों ने विरोध स्वरूप मरी गाय को उठाने का बहिष्कार कर दिया है तथा इस के अतिरिक्त गुजरात में बहुत से स्थानों पर विरोध प्रदर्शन तथा सड़क जाम आदि भी किया गया है. दलितों ने इसकी शुरुआत 18 जुलाई को सुरेन्द्र नगर जिले के कलेक्टर के दफ्तर के बाहर मरी गायें फेंक कर की थी. इसके साथ ही दलितों ने 31 जुलाई को अहमदाबाद में एक बड़ा दलित सम्मलेन करके मरे जानवर न उठाने, गटर साफ़ न करने, भूमिहीन दलितों को 5 एकड़ ज़मीन देने,सफाई कर्मचारियों को 7वें वेतन आयोग के अनुसार वेतन देने तथा सफाई के काम में ठेकेदारी प्रथा समाप्त करने की मांग भी उठाई है.