नूतनकिसी ने कहा- सोने जा रहा हूँ, किसी ने कहा- चाय पीनी है, कोई खाने चला गया और कोई किसी दूसरे काम से निकल लिया. पर इनमें से लौट कर आया कोई नहीं. यह सब हादसा तब हुआ जब आज हम लोगों ने आईआईएम, लखनऊ में मंजुनाथ शंमुगम के पांचवीं पुण्य तिथि के अवसर पर अपनी संस्था आईआरडीएस और नेशनल आरटीआई फोरम की तरफ से एक कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें अन्य बातों के अलावा हम लोगों ने मंजुनाथ शंमुगम और आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र सत्येन्द्र दुबे को मरणोपरांत पद्म पुरस्कार से नवाज़े जाने और इस प्रकार से स्वयं इन पुरस्कारों की प्रतिष्ठा में वृद्धि होने के सम्बन्ध में चर्चा की थी. इस कार्यक्रम में कुछ सामाजिक कार्यकर्ता के अलावा आईआईएम लखनऊ के भी कुछ छात्र थे. लेकिन जो बात मुझे बेहद आश्चर्यजनक लगा, वह था इन तमाम छात्र-छात्राओं का बर्ताव और उनके व्यवहार. वैसे तो पिछले एक साल आईआईएम, लखनऊ के कैम्पस में रह कर हम लोगों ने देख लिया था कि यहाँ छात्र कितने संवेदनशील होते हैं, पर आज जो इसकी बानगी मैंने एक बार फिर देखी वह गौर फरमाने लायक थी.

उ.प्र. के जिला ललितपुर शहर कोतवाली अंतर्गत ग्राम पचोनी में इंसानियत की मौत हो गई. दरिंदों की हवस इतनी बाद गई कि एक किशोरी से बलात्‍कार की कोशिश की गई. असफल होने पर पांच भूखे दरिंदो ने लड़की पर मिट्टी का तेल छिड़क कर 17 साल उस नाबालिग किशोरी को जिन्दा जला डाला. दो दिन जीवन-मृत्‍यु के बीच झूलती किशोरी आखिरकार मौत से हार ही गई. तड़पती कराहती वो सरकारी अस्‍पताल में अपना दम तोड़ दिया. ललितपुर में ऐसी घटनाएं होना आम बात हो गई हैं. ऐसी दरिंरगी सुनकर किसी का भी कलेजा मुंह में आ सकता है. लेकिन यहां की पुलिस को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. इस मामले में भी एफआईआर लिखने से पहले पीडि़त के परिजनों को पुलिस ने खूब घुमाया. ललितपुर की इस घटना में पांच युवकों ने सरेआम एक घर में घुस कर अपने गांव की ही 17 साल की किशोरी के साथ बलात्कार करने की कोशिश की. लड़की ने जब अपना बचाव किया और उनकी शिकायत करने की बात कही तो उसे मिटटी का तेल छिड़क कर जला डाला गया. अस्‍पताल में कराहते, दर्द से बिलखते, जलन से सिसकते उसने दम तोड़ दिया.

दस साल के एक मासूम बच्चे को भूख क्या लगी कि पुलिस ने उसे इतनी कड़ी सजा सुना दी कि इंसानियत के रोंगटे तक खडे हो जाएं। राजधानी लखनऊ की चौक कोतवाली के शौचालय में पिछले छह दिनों से बंद प्रकाश नाम के मासूम बच्चे की पुलिसवालों ने जमकर पिटाई भी की है। पुलिस का कहना है कि यह बच्चा पैदाइशी क्रिमिनल है। लखनऊ पुलिस का यह क्रूरतम चेहरा आज तब बेनकाब हो गया जब महुआ न्यूज की निगाह चौक कोतवाली में बंद इस बच्चे पर पड़ी। प्रकाश की खता सिर्फ इतनी है कि उसने सड़क पर पड़ा एक पर्स उठा लिया जिसमें कुल बीस रुपये रखे थे। इन रुपयों से उसने पास के एक खोमचे से समोसे खरीद कर खा लिये, बस पुलिस को यह सहन नहीं हुआ और पिछले छह दिनों से यह बच्चा पुलिस के चंगुल में है। इस दौरान पुलिस ने उसके दूसरे साथियों के बारे में पूछताछ करने के नाम पर इसे मारा-पीटा भी।

माँ नर्मदा सामाजिक कुम्भ की विस्तृत कार्ययोजना से संबंधित जानकारी के लिए मंडला में पत्रकारों की कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें माँ नर्मदा सामाजिक कुम्भ समिति के सचिव राजेन्द्र प्रसाद, प्रशांत पोल, विनोद जी, जितेन्द्र जी एवं अन्य कुम्भ समिति से जुड़े व्यक्तियों द्वारा माँ नर्मदा कुम्भ से संबंधित विस्तृत जानकारी प्रदान की। इसके साथ ही कुम्भ से संबंधित चल रही तैयारियों का उन स्थानों पर ले जाकर भी पत्रकारों को दिखाया कुम्भ से संबंधित जानकारी के लिए म.प्र., छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली आदि प्रदेशों के अनेक स्थानों से पत्रकार इस कार्यशाला में शामिल हुए। कार्यशाला के दौरान जानकारी देते हुए बताया गया कि माँ नर्मदा सामाजिक कुम्भ नर्मदा जयंती पर 10-11 एवं 12 फरवरी 2011 को मण्डला में आयोजित होगा। इस महाकुम्भ में लगभग 20 लाख भिन्न-भिन्न प्रदेशों से श्रद्धालुओं के आने का अनुमान है।

शिरीष ‘‘हमारे समूह ने अपने गांव में एचआईवी के साथ जीने वाले एक बच्चे के साथ बरते जाने वाले भेदभाव के खिलाफ कदम उठाया.’’ उत्तर-प्रदेश की एक बाल पंचायत से किशन कुमार कहते हैं, ‘‘हमने उसके साथ खेला, उसके साथ खाया और वह हमारा दोस्त बन गया. इससे हमसे उम्र में बहुत बड़े लोग शर्मिदा हुए और उन्हें एचआईवी के बारे में फैली अज्ञानता का एहसास हुआ.’’ इसके बाद बाल पंचायत ने उनके दोस्त पर से हर तरह की पाबंदी हटाने के लिए प्रस्ताव पारित किया. उत्तर प्रदेश की एक बाल-पंचायत से चंदा कहती हैं, ‘‘जब मैं चौदह की हुई तो मेरी मां ने मेरी शादी करने चाही. मगर तब तक मैं यह जान चुकी थी कि कम उम्र में शादी करने वाली लड़कियों को बहुत नुकसान उठाना पड़ता है. आखिर मैं अपनी मां को शादी रोक देने की बात पर समझाने में कामयाब रही.’’ चंदा लड़कियों के विकास की सभी संभावनाओं और उनके शिक्षण के लिए जागरूकता फैलाने का काम कर रही हैं. इसके साथ-साथ वह बाल-विवाह, शीघ्र मातृव्य, नन्हें बच्चों और गर्भवती मांओं के पेट में पलने वाले कुपोषण के दुष्चक्र को तोड़ने का प्रयास भी कर रही हैं.

बी पी गौतमआधार न होते हुए भी पुरुष जाति के विरुद्ध खुल कर लिखने-बोलने की या कोसने की धारणा बनती जा रही है। ऐसा करने वाले खुद को सच्चा या श्रेष्ठ लेखिका/लेखक सिद्ध करने की बीमारी से ग्रसित नजर आते हैं, क्योंकि उनके लेखों में दिये तर्क को पढ़ कर कोसने का सटीक आधार नजर ही नहीं आता। इस बीमारी के कारण ही ऐसे प्रख्यात लेखक/लेखिका लिखते समय यह तक भूल जाते हैं कि देश और समाज को वह जो संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं, उन विचारधाराओं से वह स्वयं ही ग्रसित हैं, ऐसे में उनके लिखे शब्दों पर कोई और विश्वास क्यों करे? प्रसिद्ध महिला का एक लेख पढऩे का सौभाग्य मिला, जिसमें उन्होंने पुरुषों के साथ कानून व संविधान तक पर सवाल उठाये हैं। उनके लिखे शब्दों पर चर्चा करने से पहले यह बताना जरुरी है कि वह स्वयं भी एक महिला की तरह ही रहती हैं।