An RTI information by Department of Personnel and Training (DOPT) has revealed that Government of India is framing policy about Public Interest Litigations being filed by All India Service and other government servants. In a PIL filed by IPS officer Amitabh Thakur, Lucknow bench of Allahabad High Court had directed the Central and UP Government on 09 April 2014 to formulate policy as regards government servants filing PILs.

रूपेश कुमार सिंह
स्वतंत्र पत्रकार

झारखंड के बोकारो जिला स्थित बोकारो इस्पात संयंत्र भारत के सार्वजनिक क्षेत्र का इस्पात संयंत्र है। यह संयंत्र भारत के प्रथम स्वदेशी इस्पात संयंत्र के रूप में भी जाना जाता है। यह इस्पात कारखाना सार्वजनिक क्षेत्र में चौथा इस्पात कारखाना है। इसकी स्थापना 29 जनवरी 1964 को हुई थी। 25 जनवरी 1965 को भारत व सोवियत संघ सरकार के बीच बोकारो स्टील प्लांट बनाने पर सहमति हुई थी। 22 दिसंबर 1965 से जीपरोमेज मॉस्को द्वारा कार्यक्षेत्र की जमीन के समतलीकरण का काम डीपीएलआर ने शुरु  कर दिया था। 6 अपै्रल 1968 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथों बोकारो स्टील प्लांट की प्रथम धमन भट्टी के निर्माण कार्य का उद्घाटन हुआ था।

प्रिय मोदी जी,

मैं और मेरा परिवार शुरू से ही भाजपा को वोट करते आये हैं | 2014 में भी आपको चुनने के लिए वोट दिया। पर अब सोच रहे हैं कि कही ग़लत फ़ैसला तो नहीं लिया था। पता नहीं किस मूर्ख ने आपको एक  झटके में देश में से 500-1000 के नोट बैन करने की सलाह दी और आपने बिना सोचे समझे मान भी ली। क्या आपको किसी ने यह नहीं बताया कि देश में 86% सरकुलेशन इसी करेन्सी की है? मैं एक छोटा दुकानदार हूँ। पिछले दस दिन से काम बिलकुल ख़त्म ही हो गया है। मेरे जैसे करोड़ों और कारोबारी हैं हमारे देश में। बात हमारे घाटे की नहीं है। बात तो यह है कि मेरे पास 8 लाख कैश पड़ा है और मुझे ऐसा लग रहा है जैसे देश का सारा काला धन मेरे पास ही हो। मैं डर रहा हूँ। लोग वैट बचाने के लिए हमसे बिल नहीं लेते और हमारी मेहनत और हक़ की कमाई भी काला धन बन जाती है।

सहारा से लेंगे एक-एक पैसे का हिसाब : राजपूत

नोएडा। बिना 17 माह का बकाया वेतन मांगने पर कर्मचारियों को निकालना उत्पीड़न ही नहीं बल्कि अपराध भी है। एक ओर सहारा देशभक्ति का ठकोसला कर रहा है वहीं दूसरी ओर कर्मचारियों को उनका वेतन देने को तैयार नहीं। सहारा से एक-एक पैसे का हिसाब लिया जाएगा। यह बात फाइट फॉर राइट के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बंधुआ मुक्ति मोर्चा के वैचारिक सलाहकार चरण सिंह राजपूत ने सेक्टर 11 स्थित राष्ट्रीय सहारा के मेन गेट पर बर्खास्त कर्मचारियों के चल रहे धरने को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि मजीठिया, मणिसाना, बछावत वेजबोर्ड के हिसाब से बकाया वेतन के साथ बची नौकरी का हिसाब भी संस्था से लिया जाएगा।

नरेन्द्र मोदी जी कालेधन के खिलाफ की गई सर्जिकल स्ट्राइक पर जनता के साथ मेरा भी सलाम… एक अंग्रेजी कहावत है चैरिटी बिगेन एट होम यानि हर अच्छे कार्य की शुरुआत अपने घर से की जाना चाहिए। देश की जनता को आप पर पूरा भरोसा है और इसीलिए कतार में खड़े होने के बावजूद वह आपके साथ है। योजना सफल साबित हुई तो 2019 के आम चुनाव में आपको वोट डालने के लिए भी इसी तरह कतार में लगी नजर आएगी।

मकर-संक्रांति के मौके पर बहुत लोग नीरस और तनावपूर्ण जीवन से कुछ सुकून पाने हेतु पटना में गंगा के उस पार अर्थात् दियारे तरफ गए थे। जश्न मनाकर लौटते वक्त जो दर्दनाक हादसा हुआ ये कोई अप्रत्याशित नहीं था। आज समाज और प्रशासन का जैसा रवैया है उसमें तो ये होना ही था और अगर नियमों को सख्ती से नहीं लागू किया गया तो भविष्य में फिर इस तरह की घटनाएं होती रहेगी। घटना के बाद इस पर आरोप-प्रत्यारोप होगा, जाँच बिठाया जायेगा, कार्रवाई की मांग होगी; कारवाई होगी नहीं और हादसे में पीड़ित का पैसा डकार लिया जायेगा या इसका बंदरबांट हो जायेगा, फिर ये मामला चर्चा से भी गायब हो जायेगा। यही तो रवैया है इस समाज का और प्रशासन का।

पिछले 8 नवम्बर की रात्रि से जब से जनता को जानकारी हुई है कि 500-1000 के नोट निरस्त कर दिये गये हैं तभी से उनका दिन का चैन और रात की नींद उड़ी हुई है। कहीं वह लम्बी लाइनों में लगे हुऐ हैं तो कहीं लाइनों से बचने के लिये 20 से 50 प्रतिशत कमीशन देकर अपने नोट बदलने पर मजबूर नजर आ रहे हैं। कहने को मैं और मेरा परिवार भी आर.एस.एस एवं भाजपा से जुड़ा हुआ है और बचपन में ‘‘सौंगध राम की खाते हैं, मन्दिर वहीं बनाएंगे’’ के नारे की आंधी में बहकर लाठियां खाकर एक माह से अधिक जेल की हवा भी खा चुका हूँ। बल्कि बचपन से ही देशभक्त और राष्ट्रभक्तों की लाइन में लगकर आरएसएस एवं भाजपा की जय-जयकार करते हुए नरेन्द्र मोदी के अच्छे दिनों के नारों में बहकर अपनी वोट भी दे चुका हूँ। मई 2014 में जब नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पर की शपथ लेते हुए कहा था कि विदेशों में छिपे कालाधन को तो शीघ्र वापिस लायेंगे ही बल्कि कालाधन जमा करने वालों को जेल भेजेंगे। मोदी जी के इस ऐलान से लगा था कि अब आम जनता के अच्छे दिन आ जायेंगे। लेकिन अच्छे दिन का इंतजार करते-करते मुझ जैसे लोगों की उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आया। मोदी ने केन्द्र की सरकार संभालते ही विदेशों में भेजने वाले धन की प्रति व्यक्ति सीमा 75000 डाॅलर से बढ़ाकर 1.25 लाख डाॅलर कर दी जिसे बढ़ाकर अब 2.5 लाख डाॅलर तक कर दिया गया है। जिसके कारण 30 हजार करोड़ की ही राशि विदेशों में भेजी गई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी ने बाजार की हालत खराब कर दी है। बैंकों के बजाय अफसरों और नेताओं के घर पहुंचे गुलाबी नोटों की गड्डियां चीख चीख कर कह रही हैं कि नोटबंदी को फेल करने में असल में तो आपके नेता और अफसर ही जिम्मेदार हैं। मगर, डंडा सिर्फ व्यापारियों पर ही चल रहा है। अकेले व्यापारी को चोर बनाकर क्या मिलेगा। असली चोर तो सत्ता में बैठे हैं।

-निरंजन परिहार-

मोदीजी की नोटबंदी ने सारा गुड़ गोबर कर दिया। व्यापारियों को चोर बना दिया। ज्वेलरी के धंधे में जबरदस्त धमक आई थी। दीपावली की चमक तो बाद में आई। लेकिन ज्वेलरी का धंधा दीपावली से कुछ दिन पहले ही चमकना शुरू हो गया था। देश भर के ज्वेलरों ने राहत की सांस ली थी। साल भर से ज्वेलरी बाजार में भयंकर मंदी थी। ग्राहक बाजार से गायब थे। ऊपर से एक्साइज ड्यूटी के विरोध में दो महीने तक बाजार बंद रहे। ज्वेलरों को उसका भी मलाल था। लेकिन गोल्ड के भाव 30 हजार के पार जाने लगे, तो भी बाजार में ग्राहकी खुली। व्यापारियों के चेहरे की रौनक लौटी। सोचा था, साल भर में भले ही कुछ नहीं कमाया, पर अब तो बाजार चल निकला। लेकिन दूसरे दौर की ग्राहकी खुलते ही 8 नवंबर को जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया, बाजार धम्म से धड़ाम हो गया। व्यापारी चारों खाने चित और ज्वेलरी की चमक चिढ़ाने लगी। मुंबई के जवेरी बाजार से लेकर जयपुर के जौहरी बाजार और नागपुर के इतवारी बाजार व दिल्ली के सराफा बाजार आदि देश के सबसे बड़े ज्वेलरी मार्केट सन्नाटे से सराबोर हैं। हर व्यापारी की जुबान पर सवाल सिर्फ एक ही है कि नोटबंदी के बाद धंधे का क्या होगा।

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर वर्कर्स फ्रंट ने की गोष्ठी

आगरा :  देश के राष्ट्रपति भवन, संसद की कैन्टीन से लेकर आगरा के विद्युत वितरण खण्ड में कम्प्यूटर आपरेटर, लाइन मैन, आपरेटर से लेकर हर विभाग में नियमों और कानूनों का उल्लंधन करके स्थायी प्रकृति के कामों में संविदा  श्रमिकों से काम कराया जा रहा है। यह श्रमिक अपनी पूरी जिन्दगी एक ही स्थान पर काम करते हुए महज सात हजार से लेकर नौ हजार तक मजदूरी पर काट देते है। अपने बाल बच्चों की परवरिश की मजबूरियां उनसे खतरनाक व असम्मानजनक हालातों में काम कराती है। जबकि उसी काम के लिए उस विभाग में उसी पद पर लगा स्थाई श्रमिक सत्तर हजार तक वेतन प्राप्त करता है। इसलिए 26 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए निर्णय के आलोक में केन्द्र सरकार को समान काम के लिए समान वेतन हेतु तत्काल केन्द्रीय कानून बनाकर संविदा श्रमिकों के सम्मानजनक जीवन को सुनिश्चित करना चाहिए।

पिछले ढाई दशकों से भारत में जिस ‘वाद’ ने द्रुत गति से समाज परिवर्तनकामी तमाम ‘वादों’ को प्रायः हाशिये पर धकेल कर रख दिया है,उसका नाम आंबेडकरवाद है.इसके उत्तरोत्तर बढ़ते प्रभाव से देश में जो वाद सर्वाधिक क्षतिग्रस्त हुआ है,वह है ,मार्क्सवाद .कांशीराम के उभार के साथ –साथ तेजी से विस्तारलाभ किये आंबेडकरवाद के उदय के पूर्व सवर्ण तो सवर्ण,सामाजिक बदलाव के प्रति समर्पित अधिकांश दलित –पिछड़े भी मार्क्सवाद से चिपके हुए थे.पर, अब वे इससे प्रायः मोहमुक्त हो चले हैं.मार्क्सवाद के प्रति सम्मोहन के पीछे लोगों का यह दृढ़ विश्वास क्रियाशील रहा है कि मार्क्स पहला विचारक  था जिसने आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी,जोकि मानवजाति की सबसे बड़ी समस्या है, का हल निकालने का वैज्ञानिक ढंग निकाला;इस रोग का बारीकी के साथ निदान किया और उसकी औषधि को भी परख कर देखा.किन्तु आंबेडकरवाद के उदय के पूर्व मार्क्स को सर्वश्रेष्ठ विचारक माननेवालों ने कभी उनकी सीमाबद्धता को परखने की कोशिश नहीं की.

लखनऊ, 15 नवंबर 2016 : सेंटर फॉर एनवायर्नमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट (सीड) ने रविवार को लखनऊ में अपने सहयोगियों और स्थानीय सिविल सोसाइटी के सहयोग से 100% यूपी कैंपेन लॉन्च किया। 100% यूपी कैंपेन का मकसद रिन्यूएबल एनर्जी, स्वच्छ हवा, साफ पानी और वेस्ट मैनेजमेंट के सही तरीकों को सुनिश्चित करके राज्य में एक दीर्घकालिक स्वस्थ वातावरण तैयार करना है। तेजी से बढ़ते हुए शहरीकरण और विकास ने यूपी में कई दिक्कतें खड़ी की हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है कि राज्य के हर हिस्से में प्रदूषण का स्तर बढ़ गया है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक देश के सबसे 20 प्रदूषित शहरों में से चार यूपी के हैं। 2005 की एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में यूपी से सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जित होती है, जो देश के कुल उत्सर्जन का 14% है। ग्रामीण इलाकों के आठ करोड़ लोग और शहरी इलाकों के 50 लाख लोग अब भी बिना आधुनिक  बिजली के रह रहे हैं। सॉलिड वेस्ट का ठीक तरह से निस्तारण नहीं होने की वजह से जमीन, हवा और पानी की भी गुणवत्ता खराब हुई है।

मनसुखभाई वसावा

गुजरात के आगामी विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा के लिए पाटीदारों और दलितों के बाद आदिवासी समुदाय मुसीबत का बड़ा सबब बन सकते हैं। राज्य के आदिवासी इलाकों में षडयंत्रपूर्वक भिलीस्तान आंदोलन खड़ा किया जा रहा है जिसमें तथाकथित राजनीतिक दल एवं धार्मिक ताकतें भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर आदिवासी समुदाय को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। इस अनियंत्रित होती आदिवासी अस्तित्व और अस्मिता को धुंधलाने की साजिश के कारण आदिवासी समाज और उनके नेताओं में भारी विद्रोह पनप रहा है। यह प्रांत के लिए ही नहीं समुचे देश के लिए एक चिंता का विषय है। जिस प्रांत में भाजपा लगभग तीन दशक से सत्ता में है उस प्रांत में आदिवासी समुदाय की उपेक्षा के कारण उन्हें राजनीतिक जमीन बचाना मुश्किल होता दिख रहा है। यह न केवल प्रांत के मुख्यमंत्री श्री विजय रूपाणी व भाजपा अध्यक्ष श्री जीतू वाघानी के लिए चुनौती है बल्कि केन्द्र की भाजपा सरकार भी इसके लिए चिंतित है।

श्रीगंगानगर। जब तक ये शब्द आप तक पहुंचेंगे,  तब तक देश को परेशान हुए तीन दिन से अधिक हो चुके होंगे। देश मेँ उन व्यक्तियों को शामिल नहीं किया जो देश चलाते हैं या देश चलाने वालों के सहयोगी हैं। उनके साथ हैं। क्योंकि उन पर किसी सरकार के किसी भी फैसले का कोई असर नहीं होता। वे हर फैसले से ऊपर हैं। उनको ना तो बाजार जाना है। ना कहीं किसी लाइन मेँ लगना है। ना सौ रुपये का पेट्रोल डलवाना है और ना सब्जी लेनी है। ऐसे लोग खुद सरकार होते हैं। जो सरकार है वह देश नहीं। यहां उस देश का जिक्र है जिसे घर चलाने के लिये रुपए कमाने हैं। उसका नहीं, जिसके पास इतना है कि उसे उसी की चिंता है, घर की नहीं। आम आदमी वो नहीं जिसके पास हर साधन और सुविधा है। आम आदमी वो है जिसको एक सुविधा के लिये दुविधा मेँ जीना पड़ता है। बुजुर्ग माँ-बाप की चिंता है। बच्चों की पढ़ाई की फिक्र है। बेटियों की शादी करनी है। मामूली से बुखार पर एक हजार रुपया लग जाता है।

एच.एल.दुसाध
8 नवम्बर की रात 12 से उठी नोटबंदी की सुनामी के तीन के तीन सप्ताह गुजर चुके हैं और इसकी चपेट में आने से देश का शायद एक भी नागरिक बच नहीं पाया है.विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक़ इससे राष्ट्र का जीवन जिस तरह प्रभावित हुआ,वैसा  भारत-चीन या भारत-पाक के मध्य हुई लड़ाइयों में भी नहीं देखा गया.भारी आर्थिक क्षति के साथ ही इसमें 80 से अधिक लोग शहीद भी हो चुके हैं.इससे हुई हानि पर अपना कर्तव्य स्थिर करने में विपक्षी दलों ने कोई कमी नहीं की.इस मुद्दे पर एकबद्ध विपक्ष सड़क से संसद तक आक्रामक तरीके से मुखर रहा.वह  जनता तक यह बात भी पहुंचा दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी के जरिये आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला अंजाम दिया है.वह अपनी पार्टी,मित्रों तथा कुछ खास–खास उद्योगपतियों का पैसा ठिकाने लगाने में व्यस्त रहने के कारण बिना पूरी तैयारी के नोटबंदी का फैसला ले लिए, जिस कारण ही जनता को इतनी मुसीबतों का सामना करना पड़ा है.

जंतर-मंतर पर आदिवासी अधिकार मंच का हुआ धरना, लिए गए राजनीतिक प्रस्ताव, योगेन्द्र यादव, वृंदा करात, अखिलेन्द्र हुए धरने में शामिल, पूरे उ0 प्र0 से जुटे आदिवासी

नई दिल्ली, 9 नवम्बर 2016, मोदी सरकार ने उ0 प्र0 के आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए लम्बित विधेयक संसद
में वापस लेकर उन्हें चुनाव लड़ने तक के लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित कर दिया है। इसलिए केन्द्र सरकार तत्काल प्रभाव से अध्यादेश
लाकर उ0 प्र0 की दुद्धी व ओबरा विधानसभा सीट आदिवासियों के लिए आरक्षित करें। यह मांग आज जंतर-मंतर पर आल इण्ड़िया
पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) समर्थित आदिवासी अधिकार मंच की तरफ से आयोजित धरने व आमसभा में उठी। धरने व आमसभा का
नेतृत्व उ0 प्र0 सरकार के पूर्व मंत्री विजय सिंह गोंड़ ने और संचालन आइपीएफ के उ0 प्र0 के महासचिव दिनकर कपूर ने किया। धरने
व आमसभा में आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह, स्वराज इण्ड़िया के राष्ट्रीय अध्यक्ष
योगेन्द्र यादव, सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो सदस्य का0 वृंदा करात, पूर्व आईजी व आइपीएफ के राष्ट्रीय प्रवक्ता एस0 आर0 दारापुरी
समेत जनवादी आंदोलन के तमाम नेता शामिल हुए। धरने में पूरे उत्तर प्रदेश से आदिवासी, किसान और मजदूरों ने हजारों की संख्या
में हिस्सा लिया।

यह कहानी है आटी गाँव की, जो राजस्थान के बाड़मेर जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर पश्चिम में स्थित है। यह कहानी है यहाँ के माध्यमिक विद्यालय में पढ़ने वाली लड़कियों की। यह कहानी है यहाँ की लड़कियों के खेल के प्रति जुनून और उनके जज़्बे की। यह कहानी है सामाजिक धारणाओं के टूटने की, एक सकारात्मक बदलाव की। यह कहानी महज एक कहानी नहीं है, यह है हकीक़त एक ऐसे गाँव की जहाँ कुछ साल पहले बेटियों को स्पोर्ट्स में भेजना तो दूर उन्हें विद्यालय तक भेजना मुनासिब नहीं समझा जाता था। यह कहानी सच है, यह उन माँ-बाप के लिए एक पैगाम है जो इस आधुनिक काल में भी अपनी बेटियों को शिक्षा और खेलों से दूर रखते हैं और उन्हें बोझ समझते हैं। यह उन भाइयों के लिए सच्चाई का आइना है जो यह समझते हैं कि बहनों का सिर्फ घर तक सीमित रहना ही उनका नसीब है।