मदनजी: बाहुबली विधायक सुरेंद्र यादव और अनंत सिंह के बीच तनी रायफलें : गया के सम्‍बोधि रिसार्ट में हुई घटना : कहने को बिहार में सुशासन है। हथियारों की प्रदर्शनी नहीं दिखती। गुंडे बिल में दुबक गये हैं। यह प्रोपगंडा है मीडिया का और दावा है नीतीश का। लेकिन गुंडागर्दी अभी भी बदस्तूर जारी है सिर्फ़ गुंडों की जात और तरीका बदल गया है। लालू के समय में यादवों की चलती थी, नीतीश के शासन में वह जगह भूमिहारों ने हथिया ली है। यादव हथियारों का खुलेआम वीभत्स प्रदर्शन करते थे, अब हथियार सिर्फ़ डराने के लिये दिखाये जाते हैं। एक बाहुबली हैं, नाम है अनंत सिंह, मोकामा विधानसभा क्षेत्र से जीत कर आते हैं। भूमिहार जाति के लिये महान हैं। सभी जाति अपनी जात के गुंडे को महान मानती है ठीक वैसे ही।

कुमार सौवीर: शाहन के शाह : सामाजिक सुधार को समर्पित स्‍वामी रामानंद : भक्ति में जात-पात। ना बाबा ना। यह अनर्थ कम से कम मुझसे तो हर्गिज नहीं होगा। चाहे मैं इस सम्‍प्रदाय में रहूं या ना रहूं। स्‍वामी रामानन्‍द ने तो कम से कम यही कहा होगा, जब उन्‍हें अपने देशाटन के दौरान कथित विधर्मियों अथवा छोटी जाति के लोगों का छुआ खाने पर प्रायश्चित करने को कहा गया होगा। मगर रामानंद इन शर्तों पर तैयार ही नहीं हुए। नतीजा, उन्‍हें अपने गुरू का संप्रदाय छोड़ना ही पड़ा। लेकिन भक्तिमार्ग को सर्वोच्‍च प्राथमिकता देने वाले इस संत ने इन शर्तों के आगे सिर ना झुकाने के साथ ही एक और भी नजीर कायम की, जो इतिहास में एक अनुपम अभियान के तौर पर हमेशा हमेशा के लिए दर्ज हो चुकी है। कम से कम कड़ी जाति परंपराओं को तोडने में रामानंद का यह प्रयोग अप्रतिम ही कहा जाएगा।

भास्‍करभाषा, मजहब, सरहद के नाम पर बंटे लोगों की जितनी जुबानें होती है, उतनी ही मोहब्बत की दास्तानें होती हैं। पर सबसे अहम बात यह है कि मोहब्बत इंसानी होती है और हमेशा इन्सानियत के हक में खड़ी हक होती है। कुछ दास्तानें ऐसी होती हैं, जो अपने ही दौर में भुला दी जाती है, जबकि कुछ दास्तानें ऐसी होती हैं, जिन्हें हर दौर में न सिर्फ शिद्दत के साथ याद करते हैं बल्कि उनसे सीख भी लेते हैं। ऐसी दास्तान हमें ये बताती है कि एक से चलकर अनेक में तब्दील हो जाना ही प्रेम का मूल चरित्र है। प्रेम न तो कोई दिवस है और न ही विशेष पल। यह तो हम सबके जीवन का वह हिस्सा है जो हमें बताता है, जहां अंधेरा है वहा उजाला बन कर जाओ, जहां आसूं है वहां खुशी बनकर जाओ। प्रेम ही है जो हमें महसूस करवाता है कि ‘हर दिल में जो दर्द है वो हमारा है।’और फिर हमसे कहता है भागो नहीं दुनिया को बदलो।

: वर्धा में 'संत परंपरा और प्रभावी संचार' विषयक गोष्‍ठी आयोजित : कबीर के समकालीन संत रविदास की भक्ति निर्लोभ और छलरहित है। वे सामाजिक एकता और सौहार्द के प्रतीक थे यही संत परंपरा ही संचार का आदिश्रोत है। उक्त उद्भोधन अरूणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल डॉ. माताप्रसाद ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग द्वारा संत रविदास की 634वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित विशेष मीडिया संवाद कार्यक्रम के अंतर्गत ‘‘संत परंपरा और प्रभावी संचार’’ विशेषयक संगोष्ठी में कहा। संचार की वाचिक परंपरा को एक प्रभावी संचार माध्यम बताते हुए उन्होंने कहा कि भक्ति काल में इसी संचार का प्रयोग होता था और मेरा मानना है कि आज की तकनीकी संचार माध्यमों की अपेक्षा ज्यादा प्रभावी साबित हुआ। कबीर दास जी ने कहा था, ‘‘जात पात पूछे न कोई हरि को भजे सो हरि का होई’’ इस कथन को संत रविदास ने चरितार्थ किया। अपने मानवतावादी सोच और विचारों को घूम-घूम कर और गाकर आम लोगों तक पहुंचाया जो सचमुच वाचिक परंपरा का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत करता है।

महारास की अद्भुत बेला है। राधा-कृष्ण के रमने की बेला। प्रेम बन जाने का लक्ष्य। प्रिया-प्रीतम दोनों लुटे हुये हैं। श्री कृष्ण राधा बन गये हैं। राधा श्रीकृष्ण हो गईं हैं। दोनों ही एक-दूसरे की प्रतिकृति हो गये हैं। चहुँ दिशा में बस राधा-कृष्ण हैं। कृष्ण राधा हैं। कृष्ण की बंसी और मोरपंख राधिका के काजल और केशपाश में गुंथी कली से एकाकार हो गये हैं। संपूर्ण सृष्टि एकाकार हो गई है। भारतीय परिवेश में प्रेम यही है। प्रेम राधाभाव है। कृष्णभाव है। महाभाव है। समष्टि चेतना है। लुट जाना है। वंचित हो जाना है। बेखुद हो जाना है। मिट जाना है। और अगर ज्ञानेन्द्रपति की कविता के भावो में कहें तो ’दुनिया की नजर में बर्बाद, पर दिल की दौलत से मालामाल’ हो जाना है। कबीर, तुलसी, सूरदास, मीराबाई और राधा-कृष्ण, रति-कामदेव, शकुंतला-दुष्यंत भारतीय प्रेम की परम अभिव्यक्ति हैं। पराकाष्ठा हैं। लैला-मजनूं, हीर-रांझा, शीरी-फरहाद, सोहनी-महीवाल, सस्सी-पुन्नू, सारंगा-सदावृक्ष, नल-दमयन्ती... जैसी लोकगाथाएँ आज भी प्रासंगिक हैं।

नक्सली निरीह ग्रामीणों को क्यों उठा ले जाते हैं? पुलिस छुटभैया अपराधियों को क्यों पीटती है? गुस्से में लोग गाड़ियों का शीशा क्यों तोड़ते हैं, उन्हें आग क्यों लगाते हैं? मर्द बीवियों को क्यों पीटते हैं? बीवियां बच्चों को क्यों पीटती हैं? लोग रिक्शा वाले, ठेले वाले से क्यों बदतमीजी करते हैं? गृहिणियां सब्जी वाले से, बाई से क्यों मोलभाव करती हैं? पारिवारिक झगड़ों में लोग बच्चों को क्यों निशाना बनाते हैं? इन सभी सवालों का एक ही जवाब सूझता है कि कमजोर लोग इसी तरह अपना गुस्सा निकालते हैं। आपको सरकार पर गुस्सा आ रहा है किन्तु आप सुरक्षा प्रहरियों और अंगरक्षको से घिरे नेता का कुछ नहीं बिगाड़ पाते तो ट्रेन रोक लेते हैं, सरकारी दफ्तरों में तोड़फोड़ करते हैं। बॉस की गालियां हजम नहीं होतीं, बटमारों पर बस नहीं चलता तो घर में आकर बीवी पर गुस्सा उतार लेते हैं। बीवी कमजोर पड़ती है तो पति को पीटने के बजाय अपनी खीझ बच्चों पर उतार लेती है।

नासिरइस मुल्क में मुसलमान एक ऐसी हकीकत हैं जिन्हें नज़र अंदाज़ करना किसी के बूते की बात नहीं है. क्यूंकि जिस मुल्क में जम्हूरियत ने अपनी जड़ें जनमानस में इतनी गहरी जमा रखी हों, जहां एक वोट से पूरी सरकार हिल जाए वहाँ करीब 25 करोड़ के इतने बड़े तबके को नज़रंदाज़ करने का मतलब अपनी जड़ों को हिला देना है. मुसलमान आजादी के बाद ही से एक वोट बैंक की शक्ल में इस्तेमाल होते आये हैं और हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी पार्टी, जिसने सबसे ज्यादा वक़्त तक हुकूमत की है उसने भी हमेशा मुसलमानों को जज्बाती मुद्दों में उलझा कर रखा. कभी इस्लाम खतरे में है तो कभी उर्दू ज़बान खतरे में है का नारा लगा कर मुसलमानों को हमेशा जज़्बात में उलझाए रखा, जिसका नतीजा ये हुआ कि ये कौम दूसरी कौमों के मुकाबले बहुत पीछे रह गयी.

नूतन ठाकुरपंजाब कैडर की एक वरिष्ठ आईएएस अफसर सुजाता दास के बारे में गुरूवार की शाम को चंडीगढ़ के सेक्टर 38 के मार्केट में खरीदारी करने जाने पर वहाँ  तीन-वर्षीय एक लड़की गरिमा की उनके द्वारा की गयी निर्मम पिटाई का मामला हम सभी लोगों ने पढ़ा और सुना. यह भी जानकारी में बात आई है कि नर्सरी में पढ़ने वाली लड़की की इतनी सी गलती है कि वह स्कूल से आते समय जिस ऑटोरिक्शा पर बैठी थी, उसके ड्राइवर के हटने पर उसने कुछ खिलवाड़ शुरू कर दिया और इसी प्रक्रिया में ऑटोरिक्शा अचानक आगे चलने लगा. ऑटो के सीधे जा कर इस आईएएस अफसर सुजाता दास के होंडा सिटी को धक्का दे दिया. और इसमें होंडा सिटी गाड़ी को मामूली सा नुकसान हो गया.

परम आदरणीय श्री मोहन भागवत जी, इन दिनों ऐतिहासिक अजमेर शहर देश के सबसे बड़े विपक्षी दल भाजपा की आत्मज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के नाते आपकी गरिमामय मौजूदगी का गवाह बन रहा है। दुनिया भर को सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देने वाला यह शहर इस बात का भी गवाह रहा है कि राजा हो या रंक, हर कोई दोनों अंतर्राष्ट्रीय धर्मस्थलों तीर्थराज पुष्कर व दरगाह ख्वाजा साहब में हाजिरी जरूर देता है। ऐसे में आमजन में यह सवाल कुलबुला रहा है कि क्या आप भी इन स्थलों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करेंगे। जहां तक पुष्कर का सवाल है, अगर वहां जाते हैं तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा, या यूं कहिए कि उसमें कुछ भी असहज नहीं लगेगा, क्योंकि आप हिंदूवादी संगठन के अगुवा हैं, मगर क्या दरगाह जाएंगे, यह सवाल जरूर तनिक चौंकाने वाला हो सकता है। यह कदाचित संघ से जुड़े लोगों की मन:स्थिति को कुछ असहज भी कर सकता है कि कैसा बेहूदा सवाल उठाया जा रहा है? मगर सवाल तो सवाल है। अनुकूल जमीन पर हवा, पानी, धूप मिलते ही खुद-ब-खुद उगता है। बस फर्क सिर्फ उसे दबा देने अथवा उजागर करने का है।

तेरा साथ हैं तो..मुझे क्या कमी है..अंधेरों से भी मिल रही रोशनी है..ये रोशनी एक जीवन साथी के तौर पर मिल जाए तो क्या कहने. वह भी ऐसे मुकाम पर जब शारीरिक अपंगता जीवन में बतौर अंधेरा कायम हो. जो ठीक से अपने पैरों पर चल नहीं सकते हैं. अंधे होने के कारण जिनकी जिंदगी अंधेरों में गुजरी हो. ऐसे में जिंदगी में अगर रोशनी मिल जाए और कोई ऐसा साथी मिल जाए, जिसका सहारा पूरी जिंदगी के लिए हो जाए तो फिर क्या कहने. जी हां 2011 का वेलेंटाइन डे राजधानी रायपुर में कुछ ऐसे जोड़ियों के लिए यादगार बन गया, जो शारीरिक रूप से अक्षम तो थे, लेकिन किसी ने उनका हाथ थामा और पूरी जिंदगी साथ निभाने का वादा किया. कुछ बॉलीवुड की फिल्म मन की तरह. इस फिल्म में अपने पैर खो चुके मनीषा कोइराला को आमिर खान द्वारा अपने गोद में लेकर अग्नि के सात फेरे लेते.. रील लाइफ की यह कहानी रियल लाइफ में कुछ इसी तरह देखने को मिली, जब रायपुर के आशीर्वाद भवन में 51 विकलांग जोड़ियां शादी के बंधन में बंधीं.

उत्‍कर्ष दो दशक बीत चुके हैं अयोध्या के खूनी इतिहास के। और इस समय काल में दो पूरी पीढि़यां बाल्यावस्था से जवानी की दहलीज पर आ गयी हैं। इन सभी के लिए अयोध्या का मतलब हिन्दू-मुस्लिम झगड़े की वजह या फिर भावनात्मक हिन्दूवाद या भावनात्मक इस्लामवाद ही है। पर भावना से अलग अयोध्या का इतिहास क्या है, यह विचारने की न किसी ने हालिया दिनों में कोशिश की और न ही किसी ने अपनी पूरी नई पीढ़ी को अयोध्या की तस्वीर का कन्ट्रास्ट दिखाया। अयोध्या की तस्वीर में अब भी देखने वालों को या तो भगवा रंग दिखाई देता है या फिर हरा। पर अयोध्या की यह एक रंगी तस्वीर सच नहीं है। वास्तव में अयोध्या की ऐतिहासिक तस्वीर इन्द्रधनुषी है पर आज के दौर के सियासी दुकानदारों के लिए इस इन्द्रधनुष को छुपाना बहुत ही आवश्यक है और वे यही कर भी रहे हैं।

संजयक्या प्रेम का कोई दिन हो सकता है। अगर एक दिन है, तो बाकी दिन क्या नफरत के हैं? वेलेंटाइन डे जैसे पर्व हमें बताते हैं कि प्रेम जैसी भावना को भी कैसे हमने बांध लिया है, एक दिन में या चौबीस घंटे में। पर क्या ये संभव है कि आदमी सिर्फ एक दिन प्यार करे, एक ही दिन इजहार-ए मोहब्बत करे और बाकी दिन काम का आदमी बना रहे। जाहिर तौर पर यह संभव नहीं है। प्यार एक बेताबी का नाम है, उत्सव का नाम है और जीवन में आई उस लहर का नाम है जो सारे तटबंध तोड़ते हुए चली जाती है। शायद इसीलिए प्यार के साथ दर्द भी जुड़ता है और शायर कहते हैं दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना।

आजाद भारत में आजादी के बाद से महान विभूतियों के नाम पर अनेक महत्वाकांक्षी योजनाओं का क्रियान्वयन सरकारों द्वारा किया जाता है, जिससे उन महान विभूतियों का सम्मान भी हो सके व योजानाएं भी धरातल पर साकार होती रहें. लेकिन जब ऐसी योजनाओं का पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती तो ये आत्‍माएं भी स्‍वर्ग में रोने को मजबूर अवश्‍य होती होंगी. ऐसी ही स्थिति को बयान कर रहा है रूद्र प्रयाग में स्‍थापित श्‍यामा प्रसाद अभिनव विद्यालय. जी हां अपना भविष्य को सुधारने की ललक लिए बच्चे तथा उनके मां-बाप ने शायद ही सोचा होगा कि इन बच्चों को यहां पानी भरने तक ही सीमित रहना होगा। यह एक आवासीय विद्यालय है, जिसका अपना स्वयं का भवन तक नहीं है.

राहुलमैं इस सवाल का जबाब बीती 18 जनवरी से ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा हूं। दरअसल, उस रोज मैं अपने एक साथी पत्रकार के साथ नैनीताल शहर के डांठ पर खड़ा था। लोगों की भीड़ को देखकर मुझे कहानी समझ में आ गई थी। उसी बीच मेरी नजरों के सामने से एक नहीं बल्कि दो अर्थियां एक साथ गुजर गई। मैंने वहां खड़े एक पुलिसकर्मी से पूछा कि एक साथ जाने वाले दो लोग कौन थे? उसने जबाब दिया कि डीजीसी साहब और उनकी पत्नी। दरअसल, जिला शासकीय अधिवक्ता रवि साह की कार पिथौरागढ़ जिले में खाई में गिर गई थी। उस वक्त उनकी धर्मपत्नी मीना भी उनके साथ थी। रवि साह की मौत तो मौके पर ही हो गई थी, लेकिन उनकी पत्नी की कुछ सांसे बाकी थी। उन्हें पिथौरागढ़ के अस्पताल में भर्ती जरूर कराया गया, लेकिन जिन्दगी की जंग जीत नहीं पाईं।

क्या आम जनता इतनी असंवेदनशील हो सकती है कि उसके लिए जान देने वालों के खातिर कुछ घंटों का वक्त भी नहीं निकाल सके। सिर्फ अपने परिवार और परेशानियों में डूबी रहे। उसके दर्द और मजबूरियों से तड़पकर कोई बेनाम उसके लिए लड़ना शुरू करे और इसमें अपनी जान गंवा दें तो उसके लिए एक बूंद आंसू भी ना निकाल सके। क्या उसे अपने मददगार को भी पहचान पाने की गुरबत नही। अगर ऐसा है तो शायद बहुत भयानक है। उसे अहसास भी नहीं है कि समाज के दरिंदे उसकी बोटी-बोटी नोच खाएंगे और वह बस जिंदा मांस बनकर इंसानी भेडियों के पेट में चली जाएगी। मेरी तकलीफ महाराष्ट के उस अधिकारी जैसों की मौत से है, जिसने तेल माफियाओं से लड़कर अपनी जान दे दी। मेरी तकलीफ बिहार के उस अधिकारी के लिए भी है, जो सड़क की गुणवक्तता ठीक कराते-कराते ठेकेदारों की हैवानियत का शिकार हो गया। मेरी तकलीफ उस आरटीआई कार्यकर्ता के लिए भी है, जिसने आम आदमी के लुटेरों को बेनकाब करने की कोशिश में अपनी जान गंवा दी।

वेलेंटाइन14 फरवरी यानी वेलेंटाइन डे, इसकी कल्पना करते ही दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं। वैसे तो वेलेंटाइन डे का इतिहास काफी पुराना हैं, लेकिन भारत में 165 साल पहले हमने वेलेंटाइन डे का नाम सुना, ये जानकार आपको भी आश्चर्य होगा कि मसूरी के एक अंग्रेज ने अपनी बहन को लिखे खत में वेलेंटाइन डे का जिक्र किया था। वेलेंटाइन डे पर युवक-युवती सब कुछ भूलकर प्रेम में डूब जाते हैं, उन्हें लगता है कि दुनिया में प्रेम से बढ़कर और कोई दूसरा काम नहीं है। मगर सच्चाई इससे विपरीत होती है। होना तो यह चाहिए कि इस वेलेंटाइन डे की तमाम अच्छाइयों को हम अपनी संस्कृति में मिलाएँ और‍ फिर इसे मनाएँ, तब देखिए जिंदगी कितनी खुशहाल लगने लगेगी।